इस हकीकत से शायद किसी को भी परहेज  नहीं होगा कि भारत में नदियों के नाम पर नाले बहते हैं. यदि देश की सबसे बड़ी और जीवनदायिनी नदी गंगा की बात करें, तो इसमें पानी कम और कचरा ज्यादा दिखाई पड़ता है. खासतौर पर  धर्म के नाम पर तो शुद्ध अशुद्ध हर वस्तु को इसमें बहा दिया जाता है. लेकिन इसे साफ़ करने के लिए सरकार द्वारा कई कागजी घोड़े दौड़ाए जा चुके हैं मगर हल अभी तक कुछ भी नहीं निकला है.

इसी कवायद में एक बार फिर गंगा को साफ़ करने के प्रयास की कड़ी में आईआईटी कानपुर में 'रिवर साइंस' सेंटर खुलने  की चर्चा हो रही है. गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी कोऑर्डिनेटर के पद पर आईआईटी कानपुर में कार्यरत प्रो. विनोद तारे कहते हैं, 'आईआईटी कानपुर में विभिन्न नदियों को लेकर लगातार रिसर्च होती रही है. गंगा भी इनमें से एक है. यह रिवर सेंटर हमारे इन प्रयासों को और भी मजबूत बनाएगा.'

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में 'नमामी गंगे' इंजीनियर्स इण्डिया लिमिटेड द्वारा जो प्रोजेक्ट चलाया जा  रहा है उसके देखरेख की जिम्मेदारी प्रो. तारे को  ही दी गयी है. इस प्रोजेक्ट द्वारा गंगा नदी में गिर रहे नालों को रोकने के लिए प्लान तैयार किया जाएगा.  वैसे गंगा की सफाई को लेकर यह कार्य पहली बार नहीं हो रहा बल्कि कई बार अलग अलग स्तर पर इसके लिए  काम  किया जा चुका है.  यदि अतीत में जाया जाए तो गंगा में प्रदूषण की शुरुआत 1932  में तब हुई, जब कमिशनर हॉकिन्स ने बनारस का एक गन्दा नाला गंगा नदी से जोड़ने के आदेश दिए थे. इसके बाद इन नालों को गंगा से जोड़ने का सिलसिला आज तक नहीं थमा है.

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