"डाक्टर साहब मेरे पास इलाज के लिए पैसे नहीं है. दवा कहां से खरीदेंगे? मर जाएंगे हम. हमारा परिवार बर्बाद हो जाएगा. कुछ कीजिए डाक्टर साहब. मेरी जान बचा लीजिए.’’ यह कहते कहते मरीज की आंखें भर आती हैं. आवाज भर्रा जाती है. एड्स का मरीज दिनेश(बदला हुआ नाम) डाक्टर से जान बचाने की गुहार लगाता है. उसके पास ही उसकी बीबी रजनी चुपचाप खड़ी है. उनके 3 छोटे-छोटे मासूम बच्चों को अपने पिता की बिमारी के बारे में पता नहीं है. वे टुकुर-टुकर अपने पिता और डाक्टर को देख रहे हैं. पहले तो डाक्टर उसे डांटते हैं कि जब पहली बार ही कमजोरी या वजन घटने की शिकायत शुरू हुई तो उसी समय डाक्टर के पास क्यों नहीं गए? उसके बाद वह अपने कम्पाउंडर को बुलाते हैं और मरीज का सारा टेस्ट करवाने और उसके पूरे इलाज और दवा का इंतजाम करने की हिदायत देते हैं.

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