वक्त की आंधी ने

सुनामी को धीमा कर दिया

बचपन, लड़कपन

तेज रफ्तार सा गुजर गया

आज वक्त थमता हुआ

नजर आ रहा है

बाग के कोने में रोती

लड़की का जख्म चीख रहा है

अपनों के हाथों मरती

ममता का गला घुट रहा है

खुशी इस तरह धूमिल हुई कि

रेत पर पड़े पत्थर चुभने लगे

 

रेगिस्तान में खड़ा

कीकर का पेड़ भी दम तोड़ने लगा

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