प. बंगाल विधानसभा चुनाव की हर स्तर पर तैयारियां शुरू हो गयी है. हालांकि चुनाव की तारीख की अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन माना जा रहा है अप्रैल के मध्य तक चुनाव शुरू हो जाएगा. अब देखना ही है कि कितने चरणों में चुनाव होंगे. चुनाव के लिए गठबंधन की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है. इसी के साथ तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी पार्टियों समेत कांग्रेस और भाजपा की उम्मीदवारी के लिए चयन लॉबिंग शुरू हो गयी है. इस बीच राज्य चुनाव आयोग की भी तैयारियां जोरों पर है. मतदाता सूची में नए मतदाताओं का नाम शामिल करने से लेकर मतदाता पहचानपत्र में संशोधन का काम चल रहा है. वहीं राज्य के दौरान पर आए मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने चुनाव के दौरान गड़बड़ी की आशंका के मद्देनजर राज्य में बड़े पैमाने पर केंद्रीय बल क तैनाती का आश्वासन दिया है.

आयोग निष्पक्ष चुनाव के लिए कटिबद्ध

पिछले चुनाव की तुलना में इस बार के चुनाव में निष्पक्ष और बेखौफ मतदान के लिए मतदाताओं को चुनाव आयोग कुछ विशेष सुविधा मुहैया करा रहा है. किसी इलाके में गड़बड़ी या राजनीतिक पार्टी के नेताओं या कार्यकर्त्ताओं द्वारा के धमकाने-डराने के कारण मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं जा पा रहा है तो आयोग पुलिस की गाड़ी भेज कर मतदाता को मतदान केंद्र तक पहुंचाने तक का जिम्मा आयोग उठा रहा है.

इसके अलावा राज्य चुनाव आयोग ने पिछले दिनों समाधान नाम से एक मोबाइल एप्प लांच किया है. इस एप्प के जरिए मतदाताओं को अपने पहचानपत्र से लेकर मतदान केंद्र संबंधित तमाम जानकारी मतदाता आसानी से हासिल कर सकता है. यहां तक कि इस एप्प में मतदान के दिन किसी मतदान केंद्र में किस भी तरह की गड़बड़ी की सूचना चुनाव आयोग को भेजने तक की सुविधा मुहैया करायी गयी है. मतदाता चुनाव आयोग में सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. इस एप्प को लांच करते हुए चुनाव आयोग ने भरोसा जताया है कि किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत दर्ज कराने पर हर हाल में शिकायतकर्ता का परिचय गुप्त रखा जाएगा.

लेकिन राजनीतिक दल चुनाव आयोग के पोर्टल के जरिए शिकायत दर्ज करा सकते हैं. राजनीतिक दल के शिकायत पर 24 घंटे के भीतर और मतदाताओं की शिकायत की 48 घंटे के भतर जांच का काम पूरा किया जाएगा. शिकायतकर्ता अपनी शिकायत के मद्देनजर आयोग द्वारा की गयी कार्रवाई के बारे में पोर्टल जान सकता है.

गौरतलब है कि अपनी तरह का यह पहला एप्प है, जिसे चुनाव आयोग में इस बार पहली बार लांच किया है. इस एप्प के जरिए ैर कोई व्यक्तिगत तौर पर चुनाव पर्यावेक्षण का काम कर सकता है. अप्रैल में प. बंगाल के साथ पांच अन्य राज्य में भी चुनाव होनेवाले हैं. और एनरौयड फोन के इस एप्प क सुविधा पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिलने जा रहा है.

तृणमूल ने कसी कमर

चुनाव के मद्देनजर तृणमूल कांग्रेस की ओर से पहली जनवरी से तैयारियां शुरू हो गयी हैं. इस बार के चुनाव के मद्देनजर पार्टी की ओर से अलग-अलग हरेक सीट के लिए सम्मेलन बुलाया जा रहा है, इसे विधानसभा सीट आधारित सम्मेलन का नाम दिया गया है. इस सम्मेलन में हरेक सीट के सांसद, विधायक से लेकर स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों, यहां तक कि ग्राम्य पंचायत के प्रधना को भी सम्मेलन में उपस्थित होना अनिवार्य है. हरेक स्तर पर समस्याओं की पड़ताल और समाधान की चर्चा इस सम्मेलन में हो रही है. गौरतलब है कि प. बंगाल में विधानसभा में 294 सीटें हैं. इसके अलावा हरेक जिले के पार्टी प्रमुखों और पार्टी के कार्यकर्त्ताओं के साथ पार्टी आला कमान ममता बनर्जी अलग से बैठक कर रही हैं. जाहिर है ममता बनर्जी इस बार चुनाव की नतीजा पिछली बार की तुलना में कहीं बेहतर देखना चाहती हैं और इसीलिए तमाम सीटों की समस्या और उसके समाधान की विस्तार से चर्चा ही इस तरह के सम्मेलन या बैठक का मकसद नहीं है. असली मकसद अलग-अलग स्तर के जनप्रतिनिधियों को मतदाताओं का जनसंपर्क कराना है. ममता बनर्जी अपने नेताओं और कार्यकत्ताओं को जनसंपर्क बढ़ाने के लिए हैी विशेष जोर दे रही हैं.

तृणमूल कांग्रेस के चाणक्य पूर्व अध्यक्ष मुकुल राय का महत्व एक बार फिर से बढ़ गया है. गौरतलब है कि शारदा कांड में मुकल राय से सीबीआई की पूछताछ के बाद ममता बनर्जी की मुकुल राय के साथ एक दूरी बन गयी थी. पार्टी में भी मुकुल राय का कद छोटा कर दिया गया था. इसके बाद जुबान जंग का भी दौर शुरू हुआ. फिर मुकुल राय की एक अलग पार्टी बनाने की भी चर्चा सुनने में आयी. लेकिन अंतत: एक बार फिर से मुकुल राय का पार्टी में महत्व बढ़ गया है. चुनाव की तैयारी और जीत के लिए रणनीति बनाने का जिम्मा मुकुल राय को ही पूरी से ममता बनर्जी ने सौंप दिया है.

लेकिन शुरूआती तौर पर मुकुल राय के जिम्मे दक्षिण बंगाल के नदिया, बर्दवान, वीरभूम, मालदह और उत्तर 24 परगना जिले हैं. माना जा रहा है कि अगले चरण में मुकुल राय की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाएगी. हो सकता है उत्तर बंगाल का कई मत्वपूर्ण जिले का दायित्व भी उनके कंधों पर डाल दिया जाएगा. इसके अलावा हरेक सीट के लिए उम्मीदवारों के चयन से लेकर कांग्रेस, वामपंथी पार्टियों और भाजपा विरोधी छोटी पाटियों के साथ चुनावी समझौते के लिए बातचीत करने का भी जिम्मा मुकुल राय को ही दिया गया है.

कौन किसके आमने-सामने!

इस बार के चुनाव में यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि कौन-कौन-सी पार्टी एक-दूसरे के आमने-समाने खड़े होकर चुनाव लड़ रही है. विधानसभा में कहने को तो माकपा विपक्ष में है. लेकिन सच तो यह है कि पिछले पांच सालों में  राज्य का विधानसभा एक तरह से विरोधी शून्य है. जहां तक राज्य में कांग्रेस का सवाल है तो जाने कबसे वह माइक्रोस्कोपिक हो गयी है. वाममोर्चा का भी फिलहाल कोई भविष्य सुधरने नहीं जा रहा है. 34 साल के शासन में वाममोर्चा ने जितना नाम कमाया था, उसका कहीं अधिक गवां चुका है.

रही बात भाजपा की तो कुछ समय पहले तक यही लग रहा था कि हो सकता है तृणमूल कांग्रेस के तगड़े विपक्ष रूप में भाजपा खड़ी हो जाए. वैसे यह धारणा लोकसभा चुनाव  के दौरान बन थी. लेकिन नतीजे में कुछ खास निकल कर नहीं आया. लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन के नारे में भाजपा का वोट महज 17 प्रतिशत बढ गया. जहां तक सीटों का सवाल है तो कुल जमा दो सीटें ही हासिल हुई. इससे पहले राज्य के कुछ पौकेट में भाजपा का नामलेवा था. लेकिन तब भी सांसद केवल एक ही था. 2014 में मोदी लहर के बीच केवल मौजूदा लोकसभा में एक और सीट भाजपा के हाथ लगी. गौरतलब है कि 2011 विधानसभा चुनाव में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी. हां, उपचुनाव में एक सीट मिल गयी. 2006 विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी.

बहरहाल, इतने पर ही केवल प्रदेश भाजपा ही नहीं, केंद्रीय भाजपा भी इतराने लगी. इन्हें लगने लगा कि भाजपा के पैरों को बंगाल में जमीन मिलने ही वाली है. लेकिन हाल के अन्य कुछ राज्यों के विभिन्न चुनावों में मोदी लहर को लगे धक्के के बाद भाजपा में खुद ही सुगबुगाहट होने लगी है कि प. बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी का कुछ विशेष नहीं बन पाएगा. शायद इसीलिए भाजपा अल्पसंख्यकों का मुद्दा बना कर मालदह का शोर मचा रही है. मामला जितना बड़ा है नहीं, उसे चुनाव की सरगर्मियों के बीच उतना बड़ा बनाया जा रहा है.

दरअसल, यह मामला अफीम की अवैध खेती और बांग्लादेश के रास्ते नकली नोट का जितना है, उतना है और यह पूरे साल भर चलता है. ठीक चुनाव के समय में इतना शोर क्यों? जाहिर है भाजपा इस मुगलते में है कि इससे कुछ चुनावी फायदा मिल जाएगा. राज्य में जिस तरह जमीन का एक कतरा पाने के लिए जितना हाथ-पांव मार रही है, वह इस तरह के मुद्दे को हवा देगी ही. अब अगर राष्ट्रीय न्यूज चैनल की बात की जाए तो चुनाव के समय में बंगाल उनके लिए शुष्क है. कोई मुद्दा है नहीं चर्चा के लिए, क्योंकि मैदान बिल्कुल खाली है. जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है तो वह अल्पसंख्यकों की राजनीति चला रही है, इसमें कोई दो राय नहीं. इससे पहले यही काम वाममोर्चा कर रही थी. अब बंगाल का अल्पसंख्यकों को तृणमूल कांग्रेस ने एक हद तक हाईजैक कर लिया है. उसे में मुद्दे जबरन बनाए जा रहे हैं. और न्यूज चैनलों को मालदह जैसी घटना को हवा देने के सिवाल कुछ करते नहीं बन रहा है.

गठबंधन के लिए तोड़-जोड़

जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि बंगाल का चुनाव मैदान लगभग खाली है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस इस बार भी चुनाव में छायी रहेगी. बंगाल में भाजपा को फैक्टर नहीं नहीं है इसीलिए बिहार के दिखाए रास्ते पर चल कर महागठबंधन की जरूरत नहीं है. यहां तृणमूल को हराने के लिए विपक्षी पार्टियों में आपसी गठबंधन की चर्चा शुरू हो गयी है. इसके लिए वे तोड़जोड़ भी कर रही हैं. सीताराम येचुरी कांग्रेस के साथ गठबंधन के पक्ष में अपना विचार जाहिर कर चुके हैं. राज्य के माकपा नेता गौतम देव मान ही चुके हैं कि तृणमूल को हटाना वाममोर्चा के फिलहाल वश की बात नहीं. लेकिन अगर बंगाल में वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता है तो वाममोर्चा को केरल को परेशानी होगी. गौरतलब है कि केरल में भी चुनाव है और वहां कांग्रेस और वाममोर्चा दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने हैं.

लेकिन प्रदेश कांग्रेस के ज्यादातर नेता तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन के पक्ष में है. ताकि उनकी कुछ सीटों में इजाफा हो जाए. वहीं दूसरे खामे का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस लगातार कांग्रेस को मरघट में पहुंचा रहा है. तृणमूल कार्यकर्त्ताओं के प्रताप के आगे कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं को कुछ सुझता नहीं है. लेकिन कांग्रेस आलाकमान की चिंता दूसरी है. उसक नजर 2019 में लोकसभा चुनाव पर है. कांग्रेस आलाकमान चाहती है कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस सरकार बनने के करीब पहुंच जाए तब तृणमूल के बजाए वामपंथियों का समर्थन प्राप्त करना कहीं अधिक सहज होगा. भाजपा बहुत हुआ तो हर राजनीतिक पार्टी का वोट काटेगी. लेकिन सरकार बनाने में इसकी कोई भूमिका नहीं होगी, इतना तय है. कुल मिलाकर तृणमूल कांग्रेस के किले में सेंध लगाना तमाम राजनीतिक पार्टियों के लिए डेढ़ी खीर है.

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