देश कहने को ही कृषि प्रधान रह गया है, नहीं तो है यह दरअसल में चुनाव प्रधान जिसमें आए दिन सरपंची से लेकर राष्ट्रपति पद तक के चुनाव होते रहते हैं. चुनाव कोई भी हो बड़ा दिलचस्प होता है इसका रोमांच सट्टे के नंबरों और घुड़दौड़ सरीखा होता है. अंदाजा सही निकला तो चेहरे पे यह गुरूर कि देखा हमने तो पहले ही कह दिया था कि फलां ही जीतेगा, फिर ढिकाना चाहे कितना ही ज़ोर लगा ले, अंदाजा गलत निकले तो भी रेडीमेड खीझ मिटाऊ वक्तव्य पान की पीक की तरह रिसते रहते हैं, मसलन अरे वो तो बाल बाल चूक गए, राजनीति हो गई, नहीं तो जीतता तो फलाना ही.

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