राष्ट्रपति पद की मर्यादा और कूटनीति दोनों एक साथ निभाते आखिरकार प्रणव मुखर्जी ने नोट बंदी पर अपनी राय दे ही दी कि इससे गरीबों की परेशानियां बढ़ीं हैं. बयान सरकार से असहमति जताता हो और सरकार का स्पष्ट विरोध भी  न लगे, इस बाबत राष्ट्रपति ने कुछ किन्तु परंतु भी इसमे जोड़े मसलन यह कि वे इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि गरीबों को सशक्त बनाने की कोशिशें हो रही हैं और संभवतः नोटबंदी से लंबे समय में गरीबों का फ़ायदा होगा लेकिन इसमे शक है कि गरीब इतना लंबा इंतजार कर सकते हैं.

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