पिछले 20-25 सालों में देश में दलित राजनीति करने वाले नेताओं के हालात बदल गए हैं. दलित नेताओं के साथसाथ दलित अफसरों के हालात भी बदले हैं. इस के बाद भी आम दलितों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है. ज्यादातर दलित आज भी गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं. उन के पास खानेकमाने का कोई जरीया नहीं है. सेहत के मामले में भी वे सब से खराब हालात में हैं. ज्यादातर दलितों के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं. वे बचपन से ही मेहनतमजदूरी करने लगते हैं. बड़ी तादाद में दलितों के तन पर पूरे कपड़े नहीं दिखते हैं. इस से साफ लगता है कि देश भले ही तरक्की की राह पर हो, पर सामाजिक सुधारों की दिशा में दलित अभी भी बहुत पीछे हैं.

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