18वीं सदी और 21वीं सदी के बीच का फासला इतना है कि अब उस दौर के शासकों व हुक्मरानों के किस्से इतिहास के चंद पन्नों में सिमट कर रह गए हैं. कुछ फिल्मकार इन पर व्यावसायिक फिल्में और धारावाहिक बना कर उन पात्रों को अपनेअपने तरीके व नजरिए से पुनर्जीवित करने की कोशिश करते रहे हैं. पर इस इतिहास पर शोध की बराबर गुंजाइश भी बनी रहती है. यही गुंजाइश बीते कल को कई बार अपने शोध के आधार पर बदले स्वरूप में पेश कर देती है जिन से इन पर अकसर विवाद उठते हैं और सियासत करने वालों को विवादों से कुछ मुद्दे मिल जाते हैं. टीपू सुलतान की बात कर लीजिए या फिर अंगरेजों से लोहा लेने वाले किसी दूसरे शासक की.

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