चुनावों में मुसलमानों को सिर्फ वोटबैंक के नजरिए से देखने वाले राजनीतिक दलों को एहसास ही नहीं है कि मुसलिम मतदाता मजहब और जाति की दीवारों से परे विकास, शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दों के आधार पर वोट देते हैं. इन्हें अभी भी लगता है कि मजहबी टोपी पहन कर, मुसलिम चेहरा बनने का दावा कर या आरक्षण का लौलीपौप दे कर मुसलिम वोटरों को बरगलाया जा सकता है. जबकि हकीकत कुछ और है. पढि़ए बुशरा खान का लेख.

सत्ता और धर्म के लिए दुनियाभर में कितनी कत्लोगारत मची. बड़ीबड़ी लड़ाइयां लड़ी गईं. तलवार के दम पर देशों और लोगों को गुलाम बनाया गया. खून बहा, लूटमार हुई. यह वह दौर था जब हुकूमतें तलवार के दम पर चलती और बदलती थीं और धर्म का नाम भी लिया जाता था. लोकतांत्रिक प्रणालियों में तलवार का स्थान वोट ने ले लिया और शासन करने वाले जनता के सेवक बन गए.

इस प्रणाली में सत्ता तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया से हो कर गुजरना पड़ता है इसलिए इस ने आम आदमी का कद बढ़ा दिया. अब जनता की रजामंदी, विश्वास और समर्थन पाने की होड़ में सभी राजनीतिक दल चुनावी मैदान में एकदूसरे को पछाड़ने के लिए जोरआजमाइश करते दिखते हैं.

हालांकि चुनाव जीतने के लिए नेता व दल ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति व तरहतरह के हथकंडे अपनाते हैं लेकिन आखिरकार जीतता वही है जिसे देश की आम जनता का पूरा समर्थन मिलता है. यही कारण है कि खुद को उदारवादी बताने और साबित करने वाले राजनीतिक दल हर धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय को खुश करने का प्रयास करते हैं. हिंदू वोटरों को खुश करने के लिए वे टीका लगाते हैं, तो मुसलिम मतदाताओं की रजामंदी के लिए टोपी पहनते हैं.

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