बसपा प्रमुख मायावती के पास अब इतने विधायक भी नहीं बचे हैं जो 2018 में उनकी राज्यसभा से सदस्यता खत्म होने के बाद दोबारा राज्यसभा या विधानपरिषद का सदस्य बना सकें. मायावती को अब चुनाव लड़ कर ही लोकसभा या विधानसभा का सदस्य बनना होगा. 25 साल में पार्टी वापस वहीं पहुंच गई जहां से वह चली थी. ऐसे में मायावती को वोटिंग मशीन की नहीं अपने दलित वर्ग बैंक की चिंता करने की जरूरत है. पार्टी को अपने दलित हित के स्टैंड पर वापस लौटना होगा नहीं तो हिन्दुत्व का शिकार हो रहे दलित पूरी तरह से बसपा से दूर हो जायेंगे.

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