आखिरकार जीतनराम मांझी नैया छोड़ कर भाग खड़े हुए और उन की नैया डूब गई. अपनी नाव डुबोने के साथसाथ मांझी ने भाजपा और जदयू की नावों में कई छेद कर दिए हैं, जिन्हें दुरुस्त करने में दोनों दलों के पसीने छूटेंगे. भाजपा के भरोसे बिहार के मुख्यमंत्री बने रहने की जीतनराम मांझी की कवायद ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’ साबित हुई. 20 फरवरी को बिहार विधानसभा में बहुमत साबित करने से पहले ही मांझी ने इस्तीफा दे कर हार मान ली और इस्तीफा देने के फैसले की भनक भाजपा को आखिरी वक्त तक नहीं लगने दी. मांझी और नीतीश के बीच चले 15 दिनों के ड्रामे में आखिर में नीतीश की जीत तो हुई पर मांझी हार कर भी जीत गए. नीतीश ने मांझी से ताज तो छीन लिया पर अपनी लाज बचाने में नाकाम रहे. मांझी ने उन के सिर पर यह कलंक तो लगा ही दिया कि नीतीश महादलित विरोधी हैं, जिस का खमियाजा उन्हें नवंबर में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में भुगतना पड़ेगा.

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