आखिरकार जीतनराम मांझी नैया छोड़ कर भाग खड़े हुए और उन की नैया डूब गई. अपनी नाव डुबोने के साथसाथ मांझी ने भाजपा और जदयू की नावों में कई छेद कर दिए हैं, जिन्हें दुरुस्त करने में दोनों दलों के पसीने छूटेंगे. भाजपा के भरोसे बिहार के मुख्यमंत्री बने रहने की जीतनराम मांझी की कवायद ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’ साबित हुई. 20 फरवरी को बिहार विधानसभा में बहुमत साबित करने से पहले ही मांझी ने इस्तीफा दे कर हार मान ली और इस्तीफा देने के फैसले की भनक भाजपा को आखिरी वक्त तक नहीं लगने दी. मांझी और नीतीश के बीच चले 15 दिनों के ड्रामे में आखिर में नीतीश की जीत तो हुई पर मांझी हार कर भी जीत गए. नीतीश ने मांझी से ताज तो छीन लिया पर अपनी लाज बचाने में नाकाम रहे. मांझी ने उन के सिर पर यह कलंक तो लगा ही दिया कि नीतीश महादलित विरोधी हैं, जिस का खमियाजा उन्हें नवंबर में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में भुगतना पड़ेगा.

पिछले 9 महीने के अपने राज में मांझी ने खुद को महादलितों और दलितों के नेता के तौर पर लालू, नीतीश और रामविलास पासवान की बराबरी पर खड़ा कर लिया है. इस से इन तीनों महारथियों के वोटबैंक में सेंध लग सकती है. भाजपा अब निश्चित रूप से मांझी के बहाने नीतीश व लालू को महादलित विरोधी साबित करने की चुनावी मुहिम शुरू करेगी.

भाजपा की चाल

पूरी सियासी नौटंकी में भाजपा ने परदे के पीछे रह कर नीतीश के तीर (जदयू का चुनाव निशान) से ही यानी उन के ही दल के नेता से उन्हें शिकार बना लिया. 1990 से जिस बिहार में दलितों व पिछड़ों का दलितों के लिए और पिछड़े व दलितों के द्वारा ही राजपाट चलाया जा रहा था और उन के निशाने पर अगड़ी जातियां, जमींदार व ब्राह्मणवाद रहे, वहीं मांझी के बहाने पहली बार दलित और पिछड़े एकदूसरे पर निशाना साधते दिखे और भाजपा मजा लेती हुई राजनीति साधती रही. दलित तीर से भाजपा ने दलित सियासत का शिकार कर लिया. मांझी के जाल में नीतीश और उन का कुनबा कुछ इस कदर उलझा कि जनता दल परिवारों के विलय की कोशिशें दरकिनार पड़ गईं. सत्ता से हटाने और सत्ता पाने का खुला खेल फर्रूखाबादी चलता रहा और आखिरकार विश्वास मत पाने से ऐन पहले इस्तीफा दे कर मांझी ने अचानक कहानी को नया मोड़ दे दिया. अब मांझी खुद को शहीद बता कर महादलितों, दलितों और पिछड़ों के वोट को अपने पाले में करने की जुगत में लग जाएंगे और नीतीश व लालू को चुनौती देंगे.

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