अयिरातिल ओरूवन 60 के दशक की एक कामयाब तमिल फिल्म थी. इस के नायक एमजीआर यानी एम.जी. रामचंद्रन थे, जिन पर तब के निर्माता आंखें बंद कर पैसा लगाते थे और कमाते भी खूब थे. इस फिल्म की नायिका एक नईनवेली किशोरी थी, जिस में अभिनेत्री होने के सारे गुण मौजूद थे. वह सुंदर और भरे बदन की लड़की थी. उस समय दक्षिण भारतीय फिल्मों में ऐसी लड़कियों को बहुत पसंद किया जाता था. फिल्मी सेटों का अपना एक अलग प्रोटोकाल होता है, जिस के तहत नामी स्टार का अलग ही रुतबा होता है. जब बड़ा स्टार आता है तो यूनिट के सारे लोग हाथ बांध कर सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं. उस जमाने में एम.जी. रामचंद्रन का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था.

जब वह सेट पर आते थे तो पिन ड्रौप सन्नाटा छा जाता था. ‘अयिरातिल ओरूवन’ की शूटिंग के लिए जब वह सेट पर आते थे तो यह नवोदित अभिनेत्री लापरवाही और खामोशी के साथ अपनी जगह पर किसी किताब में नजरें गड़ाए बैठी रहती थी. ऐसा लगता था जैसे उस पर किसी एम.जी. रामचंद्रन की मौजूदगी का कोई फर्क न पड़ता हो.

यह नायिका थीं जयराम जयललिता. एमजीआर के लिए यह हैरानपरेशान कर देने वाली बात थी कि एक नई लड़की उन की मौजूदगी से न तो प्रभावित होती है और न विचलित. जयललिता की यह हरकत उन की शान और रुतबे के खिलाफ थी. एक ओर नए कलाकार उन की एक झलक और सान्निध्य पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे. यहां तक कि उन के पांवों में झुक जाते थे और दूसरी तरफ वह गुस्ताख लड़की थी कि उन के आभामंडल के दायरे में आने को तैयार नहीं थी.

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