धार्मिक राज की स्थापना के लिए दौड़ाए गए अश्वमेध के घोड़े को बिहार में रोक दिया गया. राज्य में भाजपा ने विकास के मुलम्मे में जो धर्म इस्तेमाल किया था, जनता ने उसे ठुकरा दिया. मतदाताओं को भरमाने, बरगलाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं. गो, पाकिस्तान, आरक्षण की समीक्षा जैसे धार्मिक मुद्दों को नकार दिया गया. 243 विधानसभाई सीटों वाले इस प्रदेश में 178 सीटें जीत कर नीतीश-लालू की अगुआई वाले महागठबंधन ने हिंदुत्व राष्ट्रवादी ताकतों को परास्त कर दिया. महीनों पहले ही दो घोर विरोधी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने हाथ मिला लिया था. 2014 के लोकसभा  चुनाव में नरेंद्र मोदी की आंधी से आशंकित इन नेताओं ने महागठबंधन बनाया, हालांकि बारबार टूटने के लिए बदनाम इस गठबंधन को समाजवादी पार्टी छोड़ गई लेकिन राजद, जदयू और कांग्रेस ने मिल कर पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ा. उधर, रामायणमहाभारत सरीखे विभीषणों को ढूंढ़ने और फायदा उठाने की चालों में माहिर भारतीय जनता पार्टी ने जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा को साथ ले लिया. बिहार में दलित वोटों में पैठ रखने वाले रामविलास  पासवान को उस ने पहले से ही केंद्र की सत्ता में भागीदार बना रखा है.

चुनावों में प्रदेश की जनता के सामने आज भी शिक्षा, रोजगार, बिजली, पानी, सड़कों जैसे अहम बुनियादी सवाल खड़े थे पर दोनों ही गठबंधनों के पास इन सवालों के ठोस जवाब नहीं थे, न ही कोई रूपरेखा. ऐसे मुद्दे उठाए गए जिन का प्रदेश और प्रदेशवासियों की तरक्की से किसी तरह का वास्ता नहीं था. लालू यादव को प्रदेश में सब से बड़ी कामयाबी मिली. यह सफलता भाजपा की गलत नीतियों की वजह से मिली है. भाजपा के चुनाव प्रचार में धर्म की संकीर्णता की जहरीली हवा बही. पार्टी और संघ के नेता जो भाषण दे रहे थे वे उस जातीय, धार्मिक नफरत की वारदातों से प्रभावित थे जो देश के दूसरे हिस्सों में हो रही थीं. बिहार में बहुसंख्यक दलितों और पिछड़ों को गुजरात के हार्दिक पटेल के आंदोलन का पता लगने लगा था और ऊपर से संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा करने की बात का भी. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भाषण की इस बात से कि अगर नीतीश, लालू का महागठबंधन जीता तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे, लोगों ने भाजपा की संकुचित नजर को स्पष्ट तौर पर भांप लिया. स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 रैलियों से लोगों को आकर्षित नहीं कर पाए. प्रधानमंत्री के भाषणों में भीड़ तो जुटी पर वे उस भीड़ को भरोसा नहीं दिला पाए कि भाजपा की तरक्की का रास्ता दिखेगा.

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