जिस पार्टी का गठन खुद मुलायम सिंह यादव ने किया और अपने खून पसीने से उसको सींचा पालपोस कर बड़ा किया वही आज उनके साथ नहीं हैं. इसे सत्ता का ही रंग कहा जायेगा कि मुलायम को छोड़ ज्यादातर लोग मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संग हैं.

मुलायम सिंह को पार्टी संरक्षक बनाकर जब से अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी संभाली तब से पार्टी के बहुतायत लोग उनके साथ हैं. विधायक, मंत्री, विधान परिषद सदस्य और सांसदों की संख्या सबसे अधिक अखिलेश यादव के पक्ष में है. यही वजह है कि मुलायम सिंह यादव ने 5 जनवरी को बुलाये गए पार्टी अधिवेशन को स्थगित कर दिया. मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी और चुनाव चिन्ह बचाने की जद्दोजहद में जुट गये हैं. दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सबकुछ पीछे छोड़ कर चुनाव की तैयारी में जुट गये हैं.

मुख्यमंत्री की रणनीति है कि चुनाव घोषणा के पहले पूरी तैयारी कर ली जाए. जिससे बिना सिंबल के या फिर किसी और दल के साथ तालमेल से चुनाव लड़ा जा सके. अखिलेश यादव के पास 2 रास्ते हैं. वह कांग्रेस और कुछ दूसरे दलों के साथ तालमेल का चुनाव लड़ सकते हैं. असल में पार्टी सिंबल को लेकर अखिलेश का मत साफ है कि वह चुनाव आयोग में पूरी बात रखेंगे.

अगर चुनाव आयोग उनकी बात नहीं मानता पार्टी का सिंबल किसी भी तरह से प्रभावित होता है तो वह अपनी इमेज पर चुनाव लड़ेंगे. अखिलेश खेमा मानता है कि मुख्यमंत्री की लोकप्रियता और साफसुथरी इमेज से यह लड़ाई आसान हो जायेगी.

यह सच है कि सपा का पुराना खेमा पार्टी प्रमुख मुलायम के साथ हैं. इसके बाद भी नई पीढ़ी में अखिलेश की स्वीकायर्ता बढ़ रही है. मुलायम की पीढ़ी के साथी नेता भी अपनी परिवार के लोगों को राजनीति में उतार रहे हैं. इसके चलते वह अखिलेश का विरोध नहीं कर सकते हैं. ऐसे लोग दिखावे के लिये भले ही मुलायम के साथ रहते हों पर असल में वह अब इस लड़ाई में अपने को दूर ही रखना पंसद कर रहे हैं. मुलायम के साथ खुले रूप से अमर सिंह और शिवपाल यादव के अलावा कोई बडा नेता दिख नहीं रहा है.

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