दुनियाभर के देशों में वर्ष 2011 में उठी क्रांति की ज्वाला अब ठंडी पड़ गई है. काहिरा के तहरीर चौक, दिल्ली के जंतरमंतर, न्यूयौर्क की वालस्ट्रीट जैसी जगहों पर आक्रोश में जो मुट्ठियां हवा में लहरा रही थीं अब वे तालियों में तबदील हो गई हैं. जिन भ्रष्ट, बेईमान, धार्मिक, सामंती, तानाशाही सोच के खिलाफ जो जनसैलाब उमड़ा था अब वहां गुस्सा नहीं, जयजयकार है. मानो बदलाव की आंधी में तमाम बुराइयों का सफाया हो गया.  क्या दुनिया के देशों में शासकों की तानाशाही सोच और नीतियां बदल गई हैं? क्या उदार लोकतांत्रिक मूल्य, समानता, स्वतंत्रता स्थापित हो चुके हैं? जातीय, धार्मिक, नस्लीय, अमीरीगरीबी का भेदभाव व छुआछूत खत्म कर चुके हैं?  सामाजिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार खत्म कर दिया गया है? बिलकुल नहीं. फिर भी दुनियाभर, खासतौर से विश्व के 2 सब से बड़े और पुराने लोकतंत्रों अमेरिका और भारत में जनता के बीच कहीं कोई गुस्सा नहीं दिखता.

COMMENT