क्या आपने किसी ऐसी कंपनी के बारे में सुना है जो अपने कर्मचारियों को सोने के लिए पैसा देती है. नहीं सुना तो अब सुन लीजिये. जापान की कंपनी क्रेजी इनकॉर्पोरेशन अपने कर्मचारियों को अच्छी नींद लेने के लिए पैसा और अवॉर्ड दोनों दे रही है. अब सवाल उठता है ऐसा क्यों?

दरअसल दुनिया भर के युवाओं में नींद पूरी न लेने की समस्या यानी इन्सोमनिया की महामारी बनती जा रही है. जिसके परिणामस्वरूप स्ट्रेस, एंग्जाइटी, पैनिक अटैक्स और ब्रेन स्ट्रोक्स के मामले बढ़ते जा रहे हैं.

आप सोच रहे होंगे इन सब बातों से कम्पनी को क्या दिक्कत. तो बात यह है कि आज की कंपनी मानती हैं कि पर्याप्त नींद लेने वाला कर्मचारी उत्पादक होता है और जो पर्याप्त सोता नहीं है उस से दफ्तर में आकर कुछ होता नहीं है.

ओवरटाइम और डेडलाइन का चाबुक

जापान समेत दुनिया भर में 20 साल की उम्र से ज्यादा के 92 फीसदी लोगों का कहना है कि वो पर्याप्त नींद नहीं ले पाते. अमेरिका रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के मुताबिक एक-तिहाई लोगों का कहना है कि वे रोजाना भरपूर नींद नहीं ले पाते. नींद न लेना युवाओं को जहाँ हेल्थ हैजार्ड देता है वहीँ कम्पनियों को मोटा आर्थिक नुकसान.

एक सर्वे के मुताबिक़ कर्मचारियों के पर्याप्त न सोने के चलते जापान समेत अमेरिका जैसे विकसित देशों को भी लाखों-करोड़ों का नुकसान हुआ है. ज्यादा समय नहीं हुआ जब एक रिपोर्टर की मौत उसके लगातार ओवरटाइम करने के कारण हो गयी थी.

31 साल की मिवा सादो ने महीने में करीब 159 घंटे ओवरटाइम करना था. सच तो यह है कि पूरी दुनिया में वर्कप्लेस पर तनाव, डेडलाइन की मार इस कदर बढ़ गयी है कि युवा होलीडेज नहीं ले पाते. सर्वे के मुताबिक 10 में 8 युवा कर्मचारी तनाव की समस्या से पीड़ित हैं.

भारतीय युवा खस्ताहाल

देश में नींद के मारे युवाओं का हाल तो और भी बुरा है. आंकड़े बताते हैं कि करीब 93% भारतीय नींद की कमी के शिकार हैं. और नींद की यह कमी किसी के लिए कारोबार बन चुकी है. शायद इसीलिए नींद से जुड़ी थैरेपी का बाजार पहले से 20% बढ़ गया है.

रिपोर्ट तो यह भी कहती है है कि करीब 58% भारतीयों का काम नींद की वजह बुरी तरह प्रभावित होता है. लिहाजा वे दफ्तरों का काम टाइम पर पूरा नहीं कर पाते और कम्पनियां नुकसान झेलती हैं.

युवा बनाम बुजुर्ग

अब सवाल उठता है कि युवा ही क्यों नींद के मारे हैं. बुजुर्ग आबादी में यह समस्या इतनी विकराल क्यों नहीं है. ऐसा इसलिए हैं क्योंकि ज्यादातर बुजुर्ग नौकरी से रिटायर हो गए हैं और अपनी आर्थिक जिमीदारियों से भी. लिहाजा उनके सर पर न तो महीने की कमाई का बड़ा टार्गेट है और न ही कम्पनी की पीपीटी का स्यापा.

इसके अलावा युवाओं के आधुनिक लाइफस्टाइल जिसमें देर रात तक पार्टी करना, दोस्तो के साथ लौंग ड्राइव पर जाना या नाइट शोज के चक्कर लगाना भी अपर्याप्त नींद का प्रमुख कारण है. जब इतना सब रात में युवा करेंगे तो जाहिर है सुनाह ऑफिस जाने के चक्कर में कम से कम सो पायंगे और दिन भर अपनी डेस्क पर ऊघेंगे. जबकि बुजुर्ग अपने सारे काम नियत समय पर पूरे कर दवा खाकर आराम से सो जाते हैं. लिहाजा इस इन्सोमनिया की चपेट में नहीं आते.

कौन है नींद का दुश्मन

दरअसल टेक्नीकल डिजिटल साइंस के एक शोध के मुताबिक फास्ट स्पीड ब्रॉडबैंड और मोबाइल इंटरनेट की वजह से ज्यादा देर तक मोबाइल में लगे रहने वालो की नींद 25 मिनट तक घटती है. वहीं इटली के बोकोनी विश्वविद्यालय के शोध में ये देखा गया कि ज्यदातर युवा फास्ट स्पीड के ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल करते हैं और सोने के समय भी सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं.

रात भर वे वीडियो गेम्स, चैट और मूवीज में लगे रहते हैं जो इनकी औसतन आधे घंटे की नींद वो रोज  गँवा रहे हैं. अगले दिन ऑफिस, स्कूल या कॉलेज जाने की वजह से उन्हें जल्दी उठना पड़ता है. इससे उनकी नींद के घंटे कम होते जा रहे हैं. अमेरिकन नॉन-प्रॉफिट कॉमन सेंस मीडिया द्वारा कराए गए अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि दुनियाभर में 8 से 12 साल के बीच के बच्चे हर दिन करीब 4 घंटा 36 मिनट स्क्रीन मीडिया के सामने बिताते हैं.

से नो टू होम डिजिटलाइजेशन

हुआ यह है कि हर घर पूरी तरह से इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटलाइजेशन से लैस है. सबकी सुनिया इसे में सिमट गई है. ब्राऊजर के तिलिस्म में सब ऐसे खोएं हैं कि किसी को खाने, पढ़ने और सोने की फिक्र नहीं. जबकि ये होम डिजिटलाइजेशन न सिर्फ आपकी बेशकीमती नींद आपसे चुरा रहा है बल्कि आको बीमार भी कर रहा है. माना कि टेक्नोलॉजी और मोबाइल आज हमारी अनिवार्य जरूरतों में शामिल हैं, लेकिन इनके गुलाम न बनें, वर्ना शारीरिक व मानसिक दिक्कतों के साथ साथ हम अपनों से भी दूर होते जायेंगे.

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