मां की सीख और बौलीवुड में कुछ करने की ललक ही मोहनीश को मायानगरी की रंगीन दुनिया में लाई थी. 1983 में आई फिल्म ‘बेकरार’ से ऐक्टिंग की शुरुआत करने वाले मोहनीश आए तो थे ऐक्टर बनने पर 1989 की ब्लौकबस्टर फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में सलमान के अपोजिट उन के नैगेटिव किरदार ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया.  मोहनीश ने कई यादगार किरदारों को निभाया है. फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ और ‘हम साथसाथ हैं’ में उन के द्वारा निभाया गया आदर्श बड़े भाई का किरदार हमेशा याद रहेगा. 3 साल पहले आई फिल्म ‘जय हो’ के बाद वे छोटे परदे से जुडे़ और दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं. इन दिनों वे ऐंड टीवी पर आ रहे क्राइम शो ‘होशियार’ को होस्ट कर रहे हैं. पेश हैं, शो के प्रमोशन के दौरान उन से हुई बातचीत के कुछ अंश :

फिल्मों में कैसे आना हुआ?

फिल्मी परिवार से होने के कारण सैट्स पर मेरा अकसर आनाजाना होता था. जब मां मुंबई से बाहर शूटिंग के लिए जाती थीं तो मैं भी उन के साथ ही रहता था. एक दिन फिल्म निर्माता राज खोसला ने मुझे उर्दू सीखने के लिए बुलाया, तब मैं 18-19 साल का था, सैट्स पर ही मेरी उर्दू की क्लास चलने लगी. फिल्मों में जाने का मन मैं पहले ही बना चुका था. खोसलाजी से मिलने पर यह बात फैल गई कि मैं इंडस्ट्री जौइन कर रहा हूं. सन्नी देओल, संजय दत्त, कुमार गौरव समेत मेरे साथ बहुत से स्टार संस ने डैब्यू किया था. शुरुआती फिल्में बौक्स औफिस पर बुरी तरह फ्लौप हुईं.

उस दौर की ‘पुराना मंदिर’ मेरी हिट फिल्म थी, लेकिन हौरर फिल्मों को उस समय बी ग्रेड माना जाता था. फिल्मों में नाकामयाब होने के बाद मैं ने इंडस्ट्री छोड़ने का मन बना लिया और फ्लाइंग सीखना शुरू कर दिया, क्योंकि काम तो करना ही था. सलमान खान से मेरी दोस्ती बहुत पहले से थी, सूरजजी ‘मैं ने प्यार किया’ फिल्म के औडीशन ले रहे थे, सलमान ने कहा कि तू भी एक बार औडीशन क्यों नहीं देता. मैं गया और फिल्म के लिए सिलैक्ट हो गया. उस फिल्म में निभाया गया मेरा ग्रे करैक्टर मेरे कैरियर का टर्निंग पौइंट साबित हुआ.

मां का कितना प्रभाव पड़ा?

मां का अपने बच्चे पर प्रभाव पड़ना तो लाजिमी है. मां ने 3 बातें मुझे सिखाई थीं, पहली कैमरे के सामने सिंसियर हो कर काम करो, दूसरी, बड़ी तकनीकी वाली बात थी कि शूटिंग के समय रीटेक के बाद जब दोबारा शूटिंग शुरू हो तो याद रखना कि पहले हाथ का ऐंगल क्या था? यह छोटी बात जरूर थी मगर टैक्निकली बहुत बड़ी है. तीसरी बात वे हमेशा कहती थीं कि तुम्हारी नाक लंबी है इसलिए कैमरे के सामने इस का ध्यान रखना.

नूतनजी इतनी बड़ी अदाकारा थीं, परिवार को उन की कमी तो महसूस नहीं हुई?

वे जितनी अच्छी अदाकारा थीं उतनी ही अच्छी एक मां व एक पत्नी भी थीं. सामंजस्य क्या होता है यह मैं ने उन से ही सीखा. वे बेहद बहादुर थीं. कैंसर जैसी बीमारी का उन्होंने बहादुरी से सामना किया. जब उन्हें कैंसर का पता चला तो वे मायूस नहीं हुईं. उन्होंने कैंसर से पहली जंग जीत ली थी, लेकिन उस के बाद कैंसर ने उन के लिवर पर आक्रमण किया. बीमारी के दौरान भी वे हमें हौसला देती रहीं.

उन के जीवित रहते मेरा फिल्मी कैरियर शुरू हो चुका था, लेकिन परवान नहीं चढ़ा था. उन्होंने मेरी फिल्में ‘मैं ने प्यार किया’ और ‘बाग़ी’ देखीं. उन्हें मेरा काम पसंद आया. जब बीच में मेरे पास कोई काम नहीं था तब वे हमेशा मेरी हिम्मत बढ़ाती रहतीं और अमितजी का उदाहरण देतीं. हालांकि मेरे ऊपर घर चलाने की जिम्मेदारी नहीं थी, लेकिन वे कहती थीं कि लाइफ में किसी भी चीज की गारंटी नहीं है. 

उन की कौन सी फिल्में आप को सब से ज्यादा पसंद हैं?

जब मैं छोटा था तब उन की फिल्में कम देखता था, क्योंकि मां अपनी फिल्मों में रोती बहुत थीं और मुझे उन्हें रोते हुए देखना बिलकुल पसंद नहीं था.  मैं उन्हें परदे पर ही सही, लेकिन तकलीफ सहते हुए नहीं देख सकता था. कुछ फिल्में तो मैं ने तब देखीं, जब बड़ा हो गया था. उन की फिल्में ‘सुजाता’, ‘बंदिनी‘, और मिलन’ मुझे बहुत पसंद हैं.  मां के नाम का सहारा इतना रहा कि 20-22 साल तक तो इसी नाम से फिल्में चलती रहीं और काम मिलता रहा. 

आप की इमेज एक ग्रे शेड ऐक्टर की बनी है, अब आप पौजिटिव किरदार निभा रहे हैं तो क्या इस बदलाव को दर्शक पचा पा रहे हैं?

यह सही है कि मैं ने नैगेटिव किरदार ज्यादा निभाए हैं, लेकिन सूरज की फिल्मों में दर्शकों ने मेरे बदले अवतार को बहुत सराहा है. जो प्यार मुझे अच्छे किरदार को निभाने में मिला वह कभी भी ग्रे शेड किरदार में नहीं मिला, इसलिए ऐसे रोल करने से बच रहा हूं क्योंकि इस उम्र में अपनी पहचान विलेन की नहीं एक अच्छे कलाकार की बनाना चाहता हूं.

आप के साथी कलाकारों ने ऊंचाइयां छू लीं. आप कैसे पीछे रह गए?

मैं ने फिल्म ‘तेरी बांहों में’ और ‘पुराना मंदिर’ में हीरो का किरदार निभाया था, लेकिन फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में काम करने के बाद मैं विलेन बन गया. मैं ने कौमेडी भी की, पौजिटिव संजीदा किरदार भी निभाए हैं. इस के बाद अब छोटे परदे पर भी सक्रिय हूं.

मैं मानता हूं कि मेरे साथी कलाकार आज सितारे बन गए हैं, लेकिन मुझे अपने आप से कोई शिकायत नहीं.

35 साल में आप में क्या बदलाव आया है?

असुरक्षा की भावना से मैं आज तक नहीं उबर पाया हूं. मैं मानता हूं कि हम सभी में असुरक्षा की भावना रहती है. जब मैं इंडस्ट्री में नया आया था तब से ले कर आज तक फिल्मों में जो बदलाव आया है वह तकनीकी रूप से ज्यादा आया है. पहले बंदिशें बहुत थीं, आज उतनी नहीं हैं. आज किसी ऐक्टर को देख कर आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि यह ऐसी फिल्म बनाएगा. पहले सभी के स्लौट सीमित थे. हर फिल्म में कौमेडियन, विलेन, हीरो सभी अलग होते थे, लेकिन आज की फिल्मों की कहानी अलग तरह की होती है. यह बदलाव ही है.

हमेशा से आप राजश्री की फिल्मों में रहे हैं, लेकिन ‘प्रेम रतन धन पायो’ में क्यों नहीं थे?

जब सूरजजी इस फिल्म को बना रहे थे तब मेरे पास उन का फोन आया था कि एक बार मैं इस फिल्म की स्क्रिप्ट देख लूं, लेकिन मैं ने स्क्रिप्ट पढ़ी तो पूरी कहानी में मेरे लायक कोई रोल नहीं था. सलमान इस फिल्म में वैसे ही डबल रोल निभा रहे थे.

आजकल कई सारे क्राइम शो आ रहे हैं, उन के हिट होने का क्या कारण है क्यों लोगों को अपराध देखना पसंद है?

उत्सुकता एक ऐसा शब्द है जो हर जगह होता है. मानवीय प्रवृत्ति ही ऐसी है जिस में दीवार के पीछे क्या है इस की उत्सुकता बनी रहती है. इसलिए ऐसे शोज हिट हैं.  

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