जब से अंगरेजी के ‘परफौर्मैंस’ शब्द ने हिंदी के बाल पकडे़ हैं, तब से सड़क से ले कर संसद तक सब एकदूसरे से इस के सिवा कुछ और मांग ही नहीं रहे हैं. इस शब्द का मतलब चाहे पता हो या न हो, वे संसद में हर एक से ईमानदारी, देशभक्ति, त्याग, जनसेवा मांगने के बदले ‘परफौर्मैंस’ को मांगतेमांगते अपना गला सुखाए जा रहे हैं, तो घर में बाप अपने बेटे से ‘परफौर्मैंस’ पर ‘परफौर्मैंस’ मांगते हुए दिमागी बुखार किए जा रहा है, ‘‘अस्पताल में जब औक्सिजन नहीं मिलेगी, तो निकलेगी सारी हेकड़ी. देख बेटा, कुछ भी ले ले, पर मुझे ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. जो करना है कर, जैसे करना है कर...’’

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