रोनी सी सूरत लिए नत्थू मेरे पास आया. मैं ने पूछा, ‘‘क्या परजाईजी से खटपट हो गई है?’’

नाम तो उस का नरसिया सिंह है पर हम सब उसे नत्थूजी ही कहते हैं क्योंकि उस के प्रकांड पंडित पिता ने नरसिया नाम क्यों रखा, मालूम नहीं.

‘वो, आप तो अंतर्यामी हैं प्रभु’ के भाव लिए ‘सही पकड़े हैं’ कह कर मेरे निकट कालीन पर बैठ गया. कुरसी खाली थी पर लगता है आज वह याचक की भूमिका पूरी तरह निभाने को तैयार हो कर आया था.

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