खेल संघों में जो राजनेता कुंडली मार कर बैठे हुए हैं या बैठना चाहते हैं वे जब खेल की बात आती है तो एक बात जरूर कहते हैं कि खेल में राजनीति नहीं होनी चाहिए. यही कह कर वे अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहते हैं. जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच खेला जाना हो तो राजनेताओं की बाछें खिल जाती हैं. अपनी राजनीति चमकानी हो तो भारत और पाकिस्तान के बीच मैच होना चाहिए, दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधरने की बात हो तो मैच होना चाहिए. अगर दोनों देशों के बीच बातचीत हो रही है और उसे रुकवाना हो तो मैच का विरोध होना चाहिए. जैसा कि टी 20 विश्वकप में देखने को मिला.

टी 20 में दोनों देशों के बीच 19 मार्च को धर्मशाला के मैदान में होना था और बीसीसीआई के सचिव और भारतीय जनता पार्टी के नेता अनुराग ठाकुर चाहते थे कि यह मैच धर्मशाला में हो. बीसीसीआई में अपनी ताकत दिखाने के लिए अनुराग ठाकुर ऐसा चाहते थे पर हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है जिस के मुखिया वीरभद्र सिंह हैं तो भला भाजपा नेताओं की जिद वे पूरी कैसे होने देते. वीरभद्र सिंह अनुराग ठाकुर की मंशा भांप गए और उन्हें सफल होने नहीं दिया. इस से अनुराग ठाकुर का हिमाचल प्रदेश में कद घटा.

दरअसल, इस बार दोनों देशों के मैच का विरोध पूर्व सैनिकों ने किया. वे विरोध इसलिए कर रहे थे क्योंकि सैनिकों का मानना था कि सीमापार से आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान का हाथ है और हाल के पठानकोट आतंकी हमले में हिमाचल से शहीद हुए जवानों के परिवार के साथ ये सैनिक खड़े दिखे. इसी का हवाला देते हुए वीरभद्र सिंह ने दोटूक यह कह दिया कि हम पाकिस्तान के खिलाडि़यों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते. चूंकि सुरक्षा का जिम्मा राज्य सरकार के पास होता है, इसलिए अनुराग ठाकुर की वीरभद्र सिंह के सामने एक न चली और यह मैच कोलकाता के ईडन गार्डन में शिफ्ट किया गया. कमोबेश यही डर अब खेल से पैसा बनाने वालों को सता रहा है. यदि सेमीफाइनल में पाकिस्तान की टीम पहुंचती है, जिसे मुंबई में खेला जाना है तो वहां शिव सैनिक क्या करेंगे, यह भी सभी को मालूम है.

क्रिकेट मैचों को राजनीतिक रिश्तों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए पर यह तय है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक रिश्तों का उतारचढ़ाव हमेशा आएगा क्योंकि दोनों देशों के नेता ऐसा चाहते हैं. इस देश में वही होता है जो नेता चाहते हैं हां, पाकिस्तान में केवल नेताओं की चलती हो, इस में संदेह है. पर क्या भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक रिश्तों में क्रिकेट इतना माने रखता है? क्या दोनों देशों के मुखिया इतने कमजोर हैं कि इन्हें खिलाडि़यों का सहारा लेना पड़ रहा है? अगर ऐसा है तो उन्हें खिलाडि़यों को सैल्यूट करना चाहिए क्योंकि उन के खेल के कारण इन की दुकानें चलती हैं.

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