हाल ही में आई फिल्म ‘फ्रीकी अली’ हालांकि बौक्स औफिस पर धराशाई हो गई, लेकिन यह फिल्म इतना तो बता ही गई कि गोल्फ रइसों का खेल है और यदि किसी के अंदर इस खेल के प्रति रुझान है तो उसे इसका खर्च भी खुद ही उठाना होगा.

इसी वर्ष रियो ओलिंपिक में गोल्फ को शामिल किया गया तब बेंगलुरु की18 वर्षीय अदिति अशोक ने शानदार खेल का प्रदर्शन किया था. तभी लग गया था कि गोल्फ में एक और युवा खिलाड़ी आगे अपने जौहर दिखाएगी. अदिति ने बहुत ज्यादा समय नहीं लिया और हाल ही में हीरो महिला इंडियन ओपन गोल्फ टूर्नामैंट का खिताब अपने नाम कर लिया.

भारत में गोल्फ यूरोप की तरह लोकप्रिय नहीं है. यह महंगा खेल है जो सब के बूते की बात नहीं है. फिर यहां सुविधाओं की कमी है. गोल्फ कोर्स बनाने में बहुत खर्च करना पड़ता है.

खर्चीला होने के कारण भारतीय युवाओं का रुझान गोल्फ की तरफ कम है इसलिए भारतीय गोल्फ खिलाडि़यों का नाम जेहन में नहीं आता. भारतीय गोल्फ खिलाड़ियों में अर्निबन लाहिरी, गगनजीत भुल्लर, चिक्करंगप्पा और राशिद खान जैसे खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई है.

जहां तक महिला गोल्फ खिलाडि़यों की बात है तो भारत में महिला गोल्फ की शुरुआत 10 वर्ष पहले दिल्ली में हुई थी लेकिन इन 10 वर्षों में भारत को अदिति अशोक को छोड़ कर कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं मिला है जो गोल्फ को अंतर्राष्ट्रीय मंच में पहचान दिला सके.

यहां गोल्फ की सुविधाओं के बारे में बात करना ही बेमानी है क्योंकि इस देश में जहां हौकी, फुटबौल, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, रैसलिंग और कबड्डी आदि खेलों में किसी प्रकार की सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती हैं तो गोल्फ जैसे खर्चीले खेल में भला शासनप्रशासन कहां माथा खपाएंगे. हां, गोल्फ जिस दिन दुधारु गाय बन जाएगी उस दिन इस का भी कायाकल्प हो सकता है पर इस की उम्मीद फिलहाल दिख नहीं रही है.

खास लोगों का यह खेल आम लोगों का खेल बन पाएगा ऐसा लगता नहीं. फिर भी अदिति अशोक ने एक उम्मीद जगाई है तो वे वाकई बधाई की पात्र हैं.

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