क्या हो गया है खेलों को, क्रिकेट के बाद अब टैनिस पर फिक्सिंग का साया मंडरा रहा है. आस्ट्रेलियन ओपन से ठीक पहले टैनिस जगत के 16 पेशेवर खिलाडि़यों के फिक्सिंग में शामिल होने के सुबूत मिले हैं. बजफीड न्यूज और ब्रिटिश ब्रौडकास्टिंग कौर्पोरेशन ने इस का खुलासा किया है.

खेल प्रेमियों को तो आभास तक नहीं होता कि फलां मैच में किस खिलाड़ी की हार या जीत होने वाली है. माना जाता है कि सट्टेबाजों द्वारा मैच फिक्स करने के लिए खिलाडि़यों को 50 हजार डौलर का प्रस्ताव दिया जाता था. इतने रुपए पा कर भला खिलाडि़यों का मन क्यों नहीं डोलेगा.

इस खुलासे के बाद भले ही चार टैनिस निकायों-महिला टैनिस संघ, अंतर्राष्ट्रीय टैनिस संघ, टैनिस पेशेवर संघ और ग्रैंड स्लैम बोर्ड के पदाधिकारी यह दंभ भर रहे हों कि उन का तंत्र मजबूत है और किसी भी तरह का भ्रष्टाचार करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा पर यह तय है कि खेल संघ खेल को बचा पाने में असफल रहे हैं.

टैनिस संघों की हिदायत के बाद भी खिलाड़ी मैच फिक्स कर रहे हैं. इस का मतलब तो यही है कि खिलाडि़यों को कोई भय नहीं है. ऐसे में खिलाडि़यों का मनोबल बढ़ता है.

वर्ष 2007 में एसोसिएशन औफ टैनिस प्रोफैशनल ने एक जांच शुरू करवाई थी. जांच में 2 खिलाडि़यों निकोलाई देविदेको और मार्टिन वास्लयो आर्गुल्यो के बीच खेल में कथित सट्टेबाजी के मामले की जांच की जानी थी. बाद में इन दोनों खिलाडि़यों के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला था पर इस जांच में नामचीन व बड़े खिलाडि़यों के नाम सामने आए जिन्होंने मैच फिक्स किए थे. पर हुआ क्या, जांचदल ने वर्ष 2008 में रिपोर्ट पेश की और कहा कि 28 खिलाडि़यों के खिलाफ जांच हो. लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया.

जाहिर है जब मामला आगे बढ़ ही नहीं पाता और खिलाडि़यों के ऊपर कार्यवाही होती ही नहीं है तो भला खिलाड़ी इस से डरेंगे क्यों? खेल संघों के पदाधिकारी केवल जांच की बात करते हैं पर जांच केवल कागजों में ही होती है यदि वे खिलाडि़यों व सट्टेबाजों पर लगाम लगाते तो खेल की ऐसी दुर्गति  न होती.

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