इन दिनों इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल सीजन 10 की खुमारी क्रिकेट प्रशंसकों में छाई हुई है. कई लोग देररात तक जाग कर तालियां पीटते हैं तो कई मायूस हो कर सो जाते हैं. क्रिकेट प्रतियोगिताओं की हालत अब धार्मिक आयोजनों सरीखी हो गई है जिन में लोग दूसरों के इशारों और मरजी से अपना वक्त व पैसा बरबाद करते हैं. आईपीएल इस का जीताजागता उदाहरण है. हालांकि पहले के मुकाबले आईपीएल का बुखार दर्शकों में उतरा है पर कारोबारियों को तो खासा मुनाफा दे ही रहा है.

इस आयोजन की तुलना आएदिन होने वाले यज्ञहवनों और भगवद्कथा से की जा सकती है जिस में बिना शामिल हुए भी कब और कैसे लोगों की जेब ढीली हो जाती है, इस का उन्हें पता ही नहीं चलता. देररात जो लोग आईपीएल देख रहे होते हैं उन की हालत सचमुच में भक्तों जैसी होती है जिन के बारे में यह व्यंग्य किया जाता है कि रामायण खत्म होने के बाद वे पूछते हैं कि सीता कौन थी. अधिकतर दर्शकों को नहीं मालूम रहता कि किस टीम में कौन खिलाड़ी है, फिर भी देखते हैं, तो साफ समझ आता है कि उन्हें एक और लत लग गई है. आईपीएल का सट्टा लगे या मैच फिक्स हो, इस से दर्शकों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. वर्ष 2013 के सैशन में हुई स्पौट फिक्ंिसग ने जो धब्बा आईपीएल पर लगाया था उस का अब कहीं अतापता नहीं है. क्रिकेट में पारदर्शिता लाने के लिए लोढा समिति का गठन हुआ पर सुधार के नाम पर क्या हुआ, यह बहुतों को  मालूम नहीं. पर हां, बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट जरूर सख्त है, यह अच्छी बात है. लेकिन क्रिकेट के कारोबारी चांदी काट रहे हैं और खिलाडि़यों को उम्मीद के मुताबिक नीलामी राशि मिल रही है. तो इस में बड़ा योगदान प्रायोजकों और दर्शकों का है जो इस यज्ञ में आहुति जरूर डालते हैं.

खिलाड़ी तो रामलीला के पात्रों की तरह हैं जिन्हें अभिनय के एवज में दक्षिणा या फीस, जो भी कह लें, दी जाती है पर राशि का बड़ा हिस्सा आयोजकों की जेबों में जाता है. फिर यही आयोजक खेल संघों पर अपनी मजबूत पकड़ बना कर मनमरजी के फैसले लेते हैं. अपनी पसंद के खिलाडि़यों का चयन करते हैं जो उन के हिसाब से नहीं चलता उसे बाहर का रास्ता भी दिखा देते हैं. खेल को धंधा बनाते इन कारोबारी लोगों के चलते यह विशुद्ध कमाने का जरिया बन गया है. इसलिए दर्शकों को भी चाहिए इस खेल को बहुत गंभीरता से न लें और अपना धन व समय किसी अच्छे काम में लगाएं.

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