सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को हटा दिया. लोढ़ा समिति की रिपोर्टें न मानने के कारण अध्यक्ष और सचिव को हटाया गया. प्रबंधकों की एक कमेटी फिलहाल बीसीसीआई का कामकाज देखेगी.

दरअसल, भारत में क्रिकेट की दीवानगी ऐसी है कि कोई दूसरा खेल आज गेंद और बल्ले का मुकाबला नहीं कर सकता. क्रिकेट के जरिए बीसीसीआई का खजाना भरता गया और दुनिया के सब से रईस माने जाने वाली संस्था बीसीसीआई की अध्यक्ष की कुरसी पर हर कोई बैठने के लिए बेताब हो गया. विडंबना देखिए इस कुरसी में खिलाड़ी छोड़ कर अब तक वही बैठ पाया जिस के पास पैसा और पावर था.

अनुराग ठाकुर वर्ष 2000 में हिमाचल प्रदेश राज्य क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने. वर्ष 2001 में भारतीय जूनियर क्रिकेट टीम के राष्ट्रीय चयनकर्ता बने, वर्ष 2008 में उपचुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे, वर्ष 2009 में हमीरपुर से फिर लोकसभा चुनाव जीते, वर्ष 2015 में बीसीसीआई के सचिव और वर्ष 2016 में अध्यक्ष की कुरसी पर काबिज हो गए.

इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीसीसीआई की कुरसी को पाने के लिए कितनी पावर चाहिए.

अनुराग ठाकुर अपने को सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर समझने लगे थे और वे कोर्ट को गुमराह करने की जुगत में लग गए. तमाम तरह की दलीलें देने लगे. सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को कई बार इस बारे में फटकार भी लगाई पर अनुराग अपनी तिकड़म भिड़ाते रहे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने उन की न चल सकी और अंत में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आउट कर दिया.           

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