‘‘किसी भी इंसान के शयन कक्ष (बेडरूम) में पड़ोसी या किसी भी इंसान को झांकने की इजाजत किसने दी, के सवाल के साथ अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के मराठी भाषा के प्रोफेसर स्व.सिरास के अंतिम तीन माह की कहानी को यथार्थ परक तरीके से फिल्म ‘‘अलीगढ़’’ में पेश करने का काम फिल्मकार हंसल मेहता ने किया है. ‘‘बुसान’’ व ‘17वें मामी’ सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में वाहवाही बटोर चुकी फिल्म ‘‘अलीगढ़’’ एक बेहतरीन संजीदा फिल्म है. यह फिल्म दर्शक को सोचने पर मजबूर भी कर सकती है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फिल्म दर्शकों को सिनेमाघर के अंदर खींच पाएगी? तो इसका जवाब ‘न’ में ही आता है.

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