विहान होने को था. मैं ने खिड़की से बाहर झांका, कालिमा से ढकी शहर की इमारतें उभरने लगी थीं. पंछियों की चहचहाहट भोर का संदेश पढ़ रही थी, तभी फोन भी उन के साथ संगीत देने लगा. बिस्तर छोड़ कर फोन उठाया. मां का फोन था. बिना किसी खास प्रयोजन के मां ने कभी इतनी सुबह फोन नहीं किया. कुछ बात जरूर है, मन में अंदेशा हुआ. तब सुबह के 6 बज रहे थे.

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