भाइयों में ?ां?ालाहट बढ़ने लगी. भाभियां जैसे इसी मौके की तलाश में थीं. वे रमा और मुन्ने को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से जाने न देतीं.

बूढ़ी होती मां सिहर उठतीं, ‘मेरे बाद इस लाड़ली बेटी का क्या होगा? बेटेबहुओं का रवैया वे देख रही थीं. उन का चिढ़ना स्वाभाविक था क्योंकि सब की घरगृहस्थी है, बालबच्चे हैं, बढ़ते खर्चे हैं. इस  भौतिकवादी  युग में  कोई किसी का नहीं. उस पर परित्यक्ता बहन और उस का बच्चा जो जबरन उन के  गले पड़े हुए हैं.

कानूनी लड़ाई में ही महीने का  आखिरी रविवार कोर्ट ने मुन्ने को अपने पिता से मिलने का समय मुकर्रर किया था. मुन्ने को इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता. बाकी दिनों की अवहेलना को वह विस्मृत कर देता.

अवध बिना नागा आखिरी रविवार की सुबह आते. रमा मुन्ने को उन के पास  पहुंचा देती. दोनों एकदूसरे की ओर देखते अवश्य, लेकिन बात नहीं होती. मुन्ना हाथ हिलाता पापा के स्कूटर पर हवा हो जाता.

अवध ने मुन्ने को अपने संरक्षण में लेने के लिए कोर्ट से गुहार लगाई है बच्चे के भविष्य के लिए. ठीक ही है पापा के पास रहेगा, ऊंची पढ़ाई कर पाएगा, सुखसुविधाएं पा सकेगा. वह एक प्राइवेट स्कूल की टीचर, 2 हजार रुपए कमाने वाली, उसे क्या दे सकती है.

कोर्ट के आदेश से कहीं मुन्ना उस से  छिन गया, अपने पापा के पास चला गया तब वह किस के सहारे जिएगी. किसी निर्धन से उस की पोटली गुम हो जाए, तो जो पीड़ा उस गरीब को होगी वही ऐंठन रमा के कलेजे में होने लगी. ‘न, न, मैं बेटे को अपने से किसी कीमत पर अलग नहीं होने दूंगी. वह सिसकने लगी. स्वयं से जवाबसवाल करते उसे ?ापकी आ गई.

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