लेखिका-ज्योति मिश्रा 

रागिनी का बर्थडे हो या और कोई विशेष दिन, जब भी रागिनी याद करती, उस के भइयू हाजिर हो जाते. फिर सुबह से शाम तक दोनों होस्टल से बाहर जा कर साथ घूमते, शौपिंग करते, खानावाना खा कर वापस  आते. रागिनी के पिता के अतिरिक्त  भइयू का नाम अभिवाहक के रूप  में होस्टल के रजिस्टर में दर्ज था. इसलिए उन के साथ होस्टल से बाहर जाने में किसी तरह की कोई आपत्ति न होती थी. कभीकभी रागिनी अपने  लोकल गार्जियन, अपनी रिश्ते की बूआ, के घर भी रात में ठहर जाती और दूसरे दिन उस के भइयू उसे पहुंचा दिया करते थे.

एक दिन रागिनी ने बताया, ‘मुंबई में मेरी कजिन सिस्टर सुगंधा की शादी है. सुगंधा की बैंक में नईनई नौकरी लगी है. अब  नेवी में जौब करने वाले लड़के से उस की शादी है.’ रागिनी ने मुझे अपना एक पुराना फोटो अलबम दिखाया जिस में 3 बच्चियां और  उन के मम्मी डैडी हैं. रागिनी ने कहा, ‘बड़ी वाली सुगंधा दीदी हैं  और ये घुंघराले बालों में 4 साल की मैं हूं और  दूसरी मेरी हमउम्र नंदा है.’

तसवीर देख कर मैं चौंक गई, ‘छोटी वाली नंदा तो बिलकुल तुम्हारी जुड़वां लग रही है रागिनी? और ये घुंघराले बालों वाली आंटी  बिलकुल जैसी तुम अभी हो वैसी ही दिखती हैं.’रागिनी के मुंह से अचानक निकला, ‘हां, मम्मी हैं न.’ फिर  उस ने कहा, ‘ये मेरी मौसी हैं. इन्हें मैं मौसी मम्मी कहती हूं. और ये दोनों मेरी मौसेरी बहनें हैं. छोटी वाली नंदा अभी सीए की पढ़ाई कर रही है. मौसाजी मुंबई में एक प्राइवेट कंपनी  में जौब करते हैं. जब मैं छोटी थी, तब मौसाजी छोटे पद पर थे लेकिन अब तो ये बड़ी कंपनी के बड़े अधिकारी बन गए हैं. बड़ा घर  और बड़ी गाड़ियां हैं इन के पास. घर में नौकरचाकर लगे हैं.

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