उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. बाहर का दरवाजा खोल कर वह दूध की बोतलें उठाने के लिए लपकी तो वहां से बोतलें नदारद थीं.

बदहवास सी उम्मी ने नागेश को पुकारा, ‘‘अब चाय कैसे बनेगी? चौकीदार दूध तो दे कर ही नहीं गया?’’

‘‘यह कैसे हो सकता है? सुबह घंटी बजने की आवाज तो मैं ने खुद ही सुनी थी,’’ नागेश अपनी जगह से हिला न डुला, पूर्ववत बैठे हुए बोला.

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