दीवाली के मौके पर घरों के रंगरोगन कराने की पुरानी लेकिन स्वस्थ परंपरा रही है. आज  के मौडर्न जमाने में रंगरोगन को ‘वाल फैशन’ भी कहा जाने लगा है. रोशनी के पर्व से पहले घर की साफसफाई और रंगरोगन कराने के पीछे वैज्ञानिक सोच भी है. रंगरोगन से जहां समूचा घर चमक उठता है वहीं दीवारों, खिड़की के पल्लों और कोने में पनपे कई तरह के कीड़ों व बैक्टीरिया की भी सफाई हो जाती है. रंगरोगन की वैज्ञानिक सोच को भी पाखंडी पंडितों और बाबाओं ने अंधविश्वास से जोड़ दिया है. अब वास्तुशास्त्र के हिसाब से घरों की बाहरी दीवारों, कमरों, बरामदे, रसोईघर और स्टडीरूम की रंगाईपुताई कराई जाने लगी है. अकसर लोग घर का रंगरोगन कर उसे चमकाने के बजाय उस पर अंधविश्वास की कालिख पोत डालते हैं, जिस में उन की ऊर्जा व धन दोनों बरबाद होते हैं.

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