मां की याद मुझे बहुत ही धुंधली सी है. मैं उन दिनों 8 साल का था. एक शाम मां के पेट में जोर का दर्द उठा था. वे दर्द से बुरी तरह कराह रही थीं. पिताजी पड़ोस में रहने वाले विष्णु काका के साथ मां को अस्पताल ले कर गए थे. अगली सुबह जब मेरी आंख खुली तो घर में बहुत से लोग जमा थे. आदमी लोग भले ही पिताजी के पास चुपचाप बैठे थे लेकिन औरतें दादी के गले लगलग कर खूब रो रही थीं. मैं उस भीड़ में अपनी मां को ढूंढ़ रहा था, लेकिन वे कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं. सब को इस तरह रोता देख कर मैं भी रोने लगा. फिर रोते हुए दादी के पास जा कर पूछा, ‘‘मां कहां हैं?’’ तो दादी मुझे सीने से लगा कर जोर से रोने लग गईं. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. अपने सवाल का जवाब न पा कर जब मैं पिताजी से पूछने बाहर आंगन में गया, तो उन्होंने भी बिना कुछ बोले मुझे बांहों में भर कर सीने से लगा लिया. मेरे कुछ कहने से पहले ही विष्णु काका के इशारे पर उन का बेटा दिनेश मुझे उठा कर अपने घर ले गया. वहीं उस ने मुझे नाश्ता करवाया और कई घंटों तक बैठाए रखा.

उस के बाद तो कई दिनों तक घर में अकसर लोगों का आनाजाना लगा रहा, लेकिन मां लौट कर नहीं आईं. फिर कई दिनों तक मां का इंतजार करकर और उन के बारे में सवाल पूछपूछ कर भी जब मैं कुछ जान नहीं सका तो मैं अकसर जिद करने और रोने लगा. तब एक दिन दादी ने समझाते हुए बताया कि मेरी मां अब कभी वापस नहीं आएंगी. यह सुन कर मैं हैरान रह गया. मुझे बिना बताए, मुझे यहां छोड़ कर मां कैसे कहीं जा सकती हैं? मेरे इस प्रश्न के उत्तर में दादी हर रोज एक नई कहानी सुना देतीं. हर रोज उन की कही नई बात, नई कहानी से मुझे यकीन हो चला था कि मां अब लौट कर आने वाली नहीं. उन दिनों मैं जब कभी भी रोते हुए कहता कि मुझे भी मां के पास जाना है तो दादी या पिताजी मुझे प्यार से गले लगा कर कहते, ‘बच्चे वहां नहीं जा सकते, तभी तो मां अकेली चली गई हैं.’ उन दिनों मैं बड़ी ही अजीब मनोस्थिति से गुजर रहा था. मेरी समझ में कुछ नहीं आता था. बस, कभी मां पर और कभी रोजरोज नई कहानियां सुनाने वाली दादी पर मुझे रहरह कर गुस्सा आता था. मैं दिन भर खीजता, चिड़चिड़ाता, जिद करता और रोता रहता. उधर पिताजी भी बहुत परेशान व उदास रहने लगे थे, क्योंकि वे तो बड़े थे, मां फिर भी उन्हें साथ ले कर नहीं गई थीं. पिताजी से कुछ पूछने, कहने की हिम्मत ही नहीं होती थी. वैसे वे घर पर ज्यादा रहते ही कहां थे. सुबह से देर रात तक काम के सिलसिले में घर से बाहर ही रहने लगे थे.

दिनभर चारपाई पर बैठ कर मां पर हुक्म चलाने वाली दादी पर एकाएक घर का सारा काम आ पड़ा था. दादी को वैसे भी जोड़ों के दर्द  के कारण उठनेबैठने में बहुत परेशानी होती थी. ऐसे में विष्णु काका की छोटी बहन गीता, दादी की मदद को आ जाया करती थी. धीरेधीरे वह मेरे भी सारे काम करने लगी थी. मुझे स्कूल से लाना, खाना खिलाना, मेरा होमवर्क करवाना वगैरावगैरा. उन्हीं दिनों उस ने बीए की परीक्षा दी थी. वह मुझ से इतनी बड़ी थी, फिर भी मैं उसे गीता ही पुकारता था, क्योंकि दादी उसे गीता बुलाती थीं. किसी से कोई रिश्ता जोड़ने की मेरी तब उम्र ही नहीं थी. दादी अकसर मुझे टोकतीं पर मैं दादी की उन दिनों सुनता ही कहां था. हां, गीता जरूर मेरी बात सुन कर हंस दिया करती थी. धीरेधीरे गीता ने घर का लगभग सारा काम ही संभाल लिया था क्योंकि दादी के जोड़ों के दर्द ने उन्हें चारपाई पकड़वा दी थी. मैं तब क्या जानता था कि मेरे ही घर में क्या चल रहा है, नियति मेरे साथ क्या खेल खेल रही है.

दशहरे की छुट्टियां थीं. मैं  अपने मामा के घर गया हुआ था. छुट्टियों में मैं अकसर मां के साथ उन के घर जाया करता था. उस बार मामा स्वयं मुझे लेने आए थे. 4 दिनों बाद पिताजी के साथ जब मैं घर लौटा तो देखा कि गीता घर में सुंदर गोटे, किनारी वाला सूट और ढेर सारे गहने पहने, बालों का जूड़ा बनाए आंगन में दादी के पास बैठी उन के पैरों  की मालिश कर रही है. गीता उन सब चीजों में बहुत सुंदर लग रही थी. मैं ने शरारत से मुसकराते हुए उस के पास जा कर पूछा, ‘‘गीता, क्या तुम्हारी शादी हो गई?’’ तभी दादी ने मुझे प्यार से अपने पास खींचते हुए कहा, ‘‘गीता नहीं, मां कह. अब यह गीता नहीं तेरी मां है. अब यह यहीं रहेगी, तेरी देखभाल के लिए.’’इतना सुनते ही मुझे जैसे बिजली का करंट सा लगा. पिताजी ने रास्तेभर मुझे कुछ नहीं बताया था. मैं अपने जीवन में आए इस परिवर्तन को पचा नहीं पा रहा था. आंखों में आंसू लिए घर के अंदर भागा तो वहां दीवार पर मां की तसवीर की जगह पिताजी और गीता की मुसकराती हुई तसवीर टंगी थी. अब मेरे पास किसी से कुछ पूछने को बचा ही क्या था? मैं समझ गया कि इन तीनों ने मिल कर मुझे घर से दूर भेज कर यह खेल खेला है. मेरी रुलाई फूट पड़ी. गाल आंसुओं से भीग गए. मैं घर से भागा और भागता चला गया. मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. आखिर हार कर पेड़ के नीचे बैठ, घुटनों में सिर दे कर रोने लगा और  देर तक बैठा रोता रहा.

जल्दी ही पिताजी मुझे ढूंढ़ते हुए वहां आ गए थे. वे चेहरे से बहुत दुखी लग रहे थे. मैं चुपचाप उठ कर उन के साथ चल दिया. मेरे पास और कोई रास्ता भी तो नहीं था. उन के साथ न जाता तो उस उम्र में अकेला कहां जाता? मैं घर तो आ गया, लेकिन अब मेरे जीवन में परिवर्तनों का सिलसिला शुरू हो गया था. हर रोज कुछ बदल रहा था. मां के बाद पिताजी के साथ सोने वाला मैं, अब दादी के साथ सुलाया जाने लगा था. दादी के पास मुझे नींद नहीं आती थी. अगर कभी जिद कर के पिताजी के पास सो भी जाता, तो भी सुबह उठता दादी के ही कमरे में था. गीता, जिसे मैं मां कभी न कह सका, उस का दखल अब घर में ज्यादा हो गया था, जो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता था. गीता जितना मेरे पास आने की कोशिश करती उतना ही मैं उस से दूर होता जा रहा था. बचपन का भोला मन पता नहीं क्याक्या सोचने लगा था. सही और गलत का विवेक उस उम्र में था ही नहीं, सो मैं परिवार में सब से कटाकटा अपने में ही गुमसुम सा रहने लगा था. दादी की बातबात पर मुझे गीता की तरफ धकेलने की कोशिश मुझे दादी से भी दूर करने लगी थी. पता नहीं क्यों मुझे लगता था कि मेरी देखभाल तो मात्र बहाना है. गीता दरअसल हमारे पूरे घर और घर के लोगों पर कब्जा करना चाहती है. मेरी देखभाल तो वह पहले भी करती ही थी. इस के लिए उसे पिताजी के साथ शादी करने की क्या जरूरत थी? मेरा मन दुनियादारी, रीतिरिवाज, रिश्तों के तानेबाने जैसी बातों को समझने को तैयार ही नहीं था.

गीता हमारे घर में सब पर अधिकार जमाने और मुझे पिताजी से छीनने आई है, यह बात मेरे मन में कहीं गहरी बैठ गई थी. उस पर लगा सौतेली होने का ठप्पा मुझे ठीक से कुछ सोचने ही नहीं देता था. स्कूल में दोस्तों से सुनी जा रही सौतेली मां की कहानियां, बातें और ताने मेरे मन में गीता के सौतेलेपन को कठोर बनाते जा रहे थे. पिताजी से तो मैं उसी दिन ही दूर हो गया था जिस दिन उन्होंने गीता को मेरी मां की जगह दे दी थी और मुझे अपने इस निर्णय में शामिल करना तो दूर, मुझे इस बारे में बताया तक नहीं था. वैसे बीते इतने वर्षों में मुझे कई बार लगा कि पिताजी मुझ से बहुत कुछ कहना चाहते हैं. वे अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहते हैं या शायद अपनी मजबूरियां मुझे बताना चाहते हैं लेकिन कह नहीं पाते. पता नहीं यह उन का संकोच है या उन के प्रति मेरा रूखा व्यवहार है जो उन्हें ऐसा करने से रोकता है. वर्षों बाद पास के शहर में सरकस आया तो सब दोस्तों ने सरकस देखने का प्रोग्राम बना लिया. पिताजी काम के सिलसिले में 3 दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. दादी को सिधारे हुए 2 वर्ष हो गए थे और गीता को मैं किसी गिनती में लेता ही नहीं था. सो, बिना किसी से कुछ पूछे, कुछ कहे मैं ने भी दोस्तों के साथ जाने का मन बना लिया.

इसी साल कालेज में दाखिला होते ही पिताजी ने मेरे जन्मदिन पर मुझे बाइक, तोहफे में दी थी. पिताजी इसी तरह के कीमती तोहफों से अपने और मेरे बीच की दूरी को कम करने की कोशिश में लगे रहते थे लेकिन दूरियां थीं कि बढ़ती ही जा रही थीं, क्योंकि गीता जो बीच में खड़ी थी. पता नहीं क्यों मैं चाह कर भी न उसे स्वीकार ही कर पाया था और न ही खुल कर कभी कोई प्रतिवाद ही कर पाया था. 2 और दोस्तों के पास अपनी बाइक है, सो हम 6 दोस्त सुबह ही घर से निकले तो कालेज के लिए लेकिन शहर की ओर चल दिए. सरकस देखा, पूरे दिन शहर में खूब मौजमस्ती की और शाम को लौट रहे थे कि घर से लगभग 30 किलोमीटर दूर हाईवे पर एक तेज रफ्तार ट्रक ने हमारा संतुलन बिगाड़ दिया. दूसरे दोस्तों का तो पता नहीं, मैं सड़क पर उस ट्रक के साथ बहुत दूर तक घिसटता चला गया था. नीम बेहोशी की हालत में मैं ने स्वयं को अस्पताल के बिस्तर पर पाया. कब, किस ने कैसे मुझे अस्पताल पहुंचाया, मुझे कुछ पता नहीं. पट्टियों में बंधा, दर्द से निढाल था मैं और मुझे खून चढ़ाया जा रहा था. मेरे आसपास कोई नहीं था. तभी एक आवाज मेरे कानों से टकराई, ‘‘प्लीज डाक्टर साहब, कुछ भी कर के मेरे बेटे को होश में लाइए. यह हमारी इकलौती संतान है, हमारे जीने का एकमात्र सहारा है,’’ एक औरत रोंआसे स्वर में गिड़गिड़ा रही थी. मैं ने अपनी पूरी ताकत से अपनी बोझिल पलकें उठा कर आवाज की दिशा में देखा. वह औरत कोई और नहीं, गीता थी. मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

इतनी बेबस, परेशान, दुखी और आंसू बहाती और डाक्टर के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाती गीता का यह रूप मुझ से देखा नहीं गया. मैं ने अपनी आंखें मूंद लीं. बचपन से अब तक का जीवन आंखों के सामने चलचित्र की भांति घूम गया. शरीर का दर्द कहीं पीछे छूट गया. दिल में एक टीस सी उठी. मुझे अपने जीवन का एकमात्र सहारा, अपनी इकलौती संतान कहने वाली को मैं ने तो कभी मां का दरजा ही नहीं दिया. मन आत्मग्लानि से भर गया. शायद किसी दोस्त, राहगीर या पुलिस ने घर पर खबर कर दी थी. गीता रात में अकेली कैसे, किस हाल में खबर पाते ही यहां पहुंची, कुछ पता नहीं. मैं अपनेआप को धिक्कारने लगा. आंखों से पश्चात्ताप के आंसू बह निकले. ज्यादा कुछ सेचने की स्थिति में मैं हूं ही नहीं. एकाएक दिल और शरीर से दर्द की एक लहर सी उठी और मैं मां कह कर कराह उठा.

नर्स गीता के पास जा कर बोली, ‘‘लगता है आप के बेटे को होश आ गया है. वह आप को पुकार रहा है.’’ गीता एक आह भरते हुए बोली, ‘‘मुझे नहीं पुकार रहा, मुझे तो यह गीता कहता है.’’ ‘‘आप तो कह रही थीं यह आप का इकलौता बेटा है?’’ नर्स ने हैरान होते हुए पूछा. उत्तर में वह कुछ नहीं बोली. क्या कहती, क्या समझाती वह उस नर्स को? नर्स ने भी कुछ और नहीं पूछा. वर्षों से हर रोज नएनए मरीजों की देखभाल में लगी रहने वाली नर्स के पास उन के जीवन में झांकने का समय ही कहां होता है. नर्स कंधे उचकाते हुए बाहर चली गई. मैं ने एक ममतामयी स्पर्श माथे पर महसूस किया, जिस के लिए मैं वर्षों से तरस रहा था, जो मेरे पास था लेकिन मैं ही उस से दूर भागता रहा. उस स्पर्श में जादू था जो धीरेधीरे मेरे दर्द को सुला कर मेरी चेतना जगा रहा था. सुबह जब ठीक से होश आया तो पिताजी मेरे सामने खड़े थे. मुझे जागा देखते ही, उन के अंदर मेरे प्रति वर्षों से जो आक्रोश दबा था वह फूट पड़ा, ‘‘यह वर्षों से चली आ रही इस की जिद, इस की मनमानी का ही नतीजा है. किसी को कुछ समझता ही नहीं. अरे मां सौतेली है लेकिन बाप तो तेरा अपना है, लेकिन नहीं जी…’’ गुस्से में वे और भी न जाने क्याक्या बोलते जा रहे थे.

गीता पिताजी को चुप कराती हुई बोली, ‘‘देख नहीं रहे, बेटा कितनी तकलीफ में है. ऐसे में गुस्सा करना जरूरी है क्या? बच्चा है, मन हुआ तो दोस्तों के साथ चला गया. सारी गलती तो उस ट्रक वाले की है, और आप…’’‘‘तुम आज भी इस की वकालत कर रही हो जबकि यह तुम्हें किसी गिनती में लेता ही नहीं. बेटाबेटा कहते तुम्हारा मुंह सूखता है. एक यह है जिस ने तुम्हें कभी…’’ पिताजी अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पाए थे कि मैं ने ‘मां’ कहते हुए गीता का हाथ पकड़ लिया. मेरी आंखों में पश्चात्ताप के आंसू थे. मां और पिताजी की आंखें भी नम हो आईं. मैं आगे कुछ बोल ही नहीं पाया. मेरे आंसू सबकुछ कह गए थे. पिताजी फौरन बाहर चले गए. शायद अपनी आंखों में आए खुशी के आंसुओं को वे किसी को दिखाना नहीं चाहते थे. गीता ने मेरे आंसू पोंछते हुए मेरा माथा चूम लिया.

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