पार्टी के शोरगुल और लोगों की भीड़भाड़ में चारु खुद को बेहद अकेला महसूस कर रही थी. खिलाखिला सा वातावरण भी मन की बोझिल परतों को राहत नहीं दे पा रहा था. बचपन से ही अंतर्मुखी रही है वह. न कभी किसी को आमंत्रण देती और न ही कभी स्वीकार करती थी. आज भी अणिमा की बात तो टाल ही गई पर आलोक की जिद को टाल नहीं पाई थी. तभी तो उस के कहने पर चली आई थी. भीड़ से दूर छिटक कर बाहर छोटी सी बगिया में आ गई थी. बेला और गुलाब के चटकीले रंगों और महकती सुरभि के बीच छोटीछोटी रंगीन कुरसियां पड़ी थीं, फुहारों से पानी झर रहा था. बीच में छोटा सा जलाशय था.

काफी देर तक जल की लहरों को गिनती रही थी. अचानक आलोक की आवाज ने उसे चौंका दिया था, ‘‘दीदी, देखो तो कौन आया है.’’ ‘‘मधुकर?’’ शब्द गले में ही घुट कर रह गए. नितांत अजनबी जगह में किसी आत्मीय जन का होना मरुस्थल में झील के समान ही लगा था उसे. मंद हास्य से युक्त उस प्रभावशाली व्यक्तित्व को काफी देर तक निहारती रही थी. तभी तो नमस्कार के बदले नमस्कार कहना भी भूल गई थी. देख रही थी, कुछ तो नहीं बदला इस अंतराल में. वही गौर वर्ण, उन्नत नासिका और घुंघराले बाल. हां, कहींकहीं बालों में छिटकी सफेदी उम्र का एहसास अवश्य करा दे रही थी. ‘‘कैसी हो, चारु?’’ वही पुराना संबोधन कैसा अपना सा लगा था उसे. ‘‘अच्छी ही हूं. आप कैसे हैं?’’ इतने बरसों बाद मात्र औपचारिक से प्रश्नोत्तर ही रह गए थे अब दोनों के बीच. ‘‘क्या कर रहे हैं आजकल?’’ ‘‘अपना नर्सिंगहोम है. सुबह से शाम तक मरीजों से घिरा रहता हूं. यों समझ लो दिन कट जाता है.’’ मधुकर के चेहरे पर घिर आई मधुर मुसकान में चारु ने कुछ ढूंढ़ने का प्रयत्न किया. मन में बहुत कुछ उमड़नेघुमड़ने लगा था, ‘मरीजों के अतिरिक्त समय बिताने के लिए आप के पास सुंदर पत्नी होगी, भरापूरा परिवार होगा.’ ‘‘चलो, अंदर चलें. बाहर ठंड है,’’ अपना हाथ उन्होंने चारु के कंधे पर टिका दिया. मनचाहे व्यक्ति का स्पर्श कितना हृदयस्पर्शी, सुखदायी है.

कनखियों से निहारा था उस ने मधुकर को. मधुकर के प्रश्न से एक बार फिर चौंकी थी, ‘‘आलोक की पत्नी कैसी है? खूब सेवा करती होगी तुम्हारी?’’ वह प्रश्न कम था, उस पर किया गया कटाक्ष अधिक, यह अच्छी तरह समझ रही थी चारु. आलोक के ब्याह से पूर्व जब मधुकर ने उसे ब्याह के बंधन में बांधना चाहा था और उस का नकारात्मक उत्तर सुन कर समझाया भी था, ‘वे सब अपनेअपने जीवन में व्यस्त हो जाएंगे, सिर्फ तुम ही अकेली रह जाओगी, चारु.’ सच ही कहा था मधुकर ने. अगर उस का प्रस्ताव तब ठुकराया न होता तो इस घुटनभरी जिंदगी से मुक्ति तो मिल गई होती. तब परिपक्व और व्यावहारिक बुद्धि वाली चारु को लगा था कि मधुकर स्वप्नजीवी है. मगर आज महसूस कर रही थी कि मधुकर तो ठोस धरातल पर ही खड़ा था.

उसी ने अपने चारों ओर कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी सीमारेखा बांध ली थी जिसे तोड़ना तो दूर, लांघना भी नामुमकिन था. डर रही थी कुछ दिन पहले जो फफोला अंतर में फूटा था, कहीं अपने अंतरंग साथी को देख कर उस का मवाद न रिस जाए. अंदर कमरे में बैठ कर मधुकर की उपस्थिति में वह सहज नहीं हो पा रही थी. अनचाहे ही वह पूछ बैठी, ‘‘आप कहां रह रहे हैं?’’ ‘‘यहीं, होटल हिलटौप में.’’ मधुकर सोच रहा था, ‘हमेशा की तरह होटल में रहने के लिए टोकेगी.’ पर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो खुद ही पूछ लिया उस ने, ‘‘घर आने के लिए नहीं कहोगी, चारु?’’ ‘‘घर? किस का घर? मेरा कोई घर नहीं है,’’ आह भरी थी चारु ने. ‘‘ऐसा क्यों कह रही हो?’’ ‘‘सच कह रही हूं. जिस घर को सजायासंवारा, अपने स्नेह से सींचा, अब वहां मुझे अपनी स्थिति अनावश्यक और निरर्थक लगती है. विश्वास न हो तो खुद आ कर देखो, कैसे बेगानों की तरह रह रही हूं. ऐसे, जैसे कोई किराए के मकान में रहता है.’’ इतने दिनों का संयम खुद टूटने लगा था.

इस से ज्यादा न मधुकर ने कुछ पूछा न ही चारु ने कुछ कहा. लोगों की भीड़ में चारु आलोक को ढूंढ़ने लगी थी. घर लौटना चाह रही थी अब. तभी उसे आलोक और अणिमा आते हुए दिखे. बंगले से बाहर निकल कर आलोेक ने मधुकर को निमंत्रण दिया था लेकिन चारु फिर भी चुप रही थी. आखिर दूसरे दिन आने का वादा कर के मधुकर होटल लौट आया. बिस्तर पर लेटेलेटे मधुकर बाहर फैले अंधकार को ताकता रहा था. जितनी बार आंखें बंद करने का प्रयास करता, चारु का उदास चेहरा और बोझिल पलकें उस के सामने आ जातीं. वह सोचने लगा, इतनी उदास तो वह तब भी नहीं दिखती थी जब टूटतेबिखरते घर को संवारने में संघर्षरत रही थी. बरसों पुराना विगत धुलपुंछ कर उस के सामने आ गया था. अतीत के गर्भ में बसी उन भूलीबिसरी यादों को भुला पाना इतना सहज नहीं था. फिर उन रिश्तों को कैसे भुलाया या झुठलाया जाए जो उस के जीवन से गहरे जुडे़ थे. अपने त्याग और खुशियों की आधारशिला पर तो चारु ने आलोक के भविष्य का निर्माण किया था. आज वही आलोक उस के साथ दुर्व्यवहार करता होगा? विश्वास नहीं हुआ था उसे.

उस ने भी तो आलोक को बचपन से देखापरखा है, फिर मनमुटाव की यह स्थिति क्यों उपजी? यादों के साए और भी गहराने लगे थे. उन दिनों वह उस शहर में नयानया आया था. चारु और उस के परिवार से उस का परिचय तब हुआ था जब वह उस की बीमार, अपाहिज मां का इलाज करने अकसर उस के घर जाया करता था. 4 लोगों का परिवार था उस का. पिता डा. भारती, उन की अपाहिज पत्नी, भाई आलोक और स्वयं चारु. बिस्तर पर लेटी चारु की मां शांत, निश्चेष्ट सी पड़ी छत को टुकुरटुकुर निहारती रहतीं. जब कभी पीड़ा सघन हो जाती तो वे जोरजोर से चीत्कार कर उठतीं. मां की सेवाशुश्रूषा में डूबी चारु कभी पिता का संबल बनती, कभी मां का मनोबल बढ़ाती तो कभी स्नेह का लेप लगा कर नन्हे भाई को ममता का कवच पहनाती. वैसे तो पत्नी की सेवा के लिए डा. भारती ने कई बार नर्स नियुक्त की थी, लेकिन सड़न से भरे हुए उस कमरे में रोगिणी की शंकित और कातर निगाहों का सामना करने का साहस किसी भी परिचारिका में नहीं था. तब कालेज की पढ़ाई के साथसाथ मां की देखरेख भी चारु की दिनचर्या का अंग बन गई थी.

थकीहारी चारु के चेहरे पर उस ने कभी भी तनाव की सुर्खी नहीं देखी थी, हमेशा मधुर मुसकान और निस्सीम पुलक के भाव ही देखे थे. उसे लगता, मां के उपदेशों से आहत हो कर चारु कभी भी मां का विरोध क्यों नहीं करती? विरोध न करे, प्रतिकार तो करे. एक दिन चारु को विश्वास में ले कर उस ने पूछा तो चारु के नेत्र सजल हो उठे थे. भर्राए स्वर में बोली थी, ‘हमेशा से मां ऐसी नहीं थीं, मधुकर. इस घर में रह कर मां ने जितना दुलार मुझे दिया है, शायद ही किसी दूसरे को मिला होगा. उन के ऋण से मैं कभी भी मुक्त नहीं हो सकूंगी. ‘कुछ दिनों पहले एक कार दुर्घटना में उन की दोनों टांगें जाती रहीं. उन के शरीर का निचला भाग चेतनाशून्य हो कर रह गया. हंसतीखेलती, चुस्तदुरुस्त गृहिणी का जीवन बिस्तर और डाक्टरों की दवाओं तक आ कर सिमट जाए तो उस की मनोदशा क्या होगी?

‘2 दिनों की बीमारी इंसान को परेशान कर देती है. मां जानती हैं कि यह बीमारी उन्हें आजन्म बरदाश्त करनी है. हीनभावना से ग्रस्त मां का मनोबल तो बढ़ा ही सकती हूं, अगर और कुछ नहीं कर सकती तो …’ वितृष्णा के स्थान पर बेटी की संवेदना को देख कर चकित हो उठा था मधुकर. सहानुभूति का दरिया उमड़ पड़ा था उस के मन में चारु के प्रति. इस सहानुभूति ने कब दोनों के मन में प्रणय का स्थान ले लिया, यह तब जान पाए जब दोनों एकदूसरे के सान्निध्य के लिए तरसते थे. पूरे दिन की शिथिलता एकदूसरे के साहचर्य में पलभर में विलुप्त हो जाती थी. इन मधुर क्षणों को कंजूस के धन की भांति दोनों प्रेमी सहेज कर रखते थे. एक दिन मधुकर ने जब चारु के मातापिता के सामने ब्याह का प्रस्ताव रखा तो इनकार नहीं किया उन्होंने. वे तो स्वयं उस नारकीय वातावरण से अपनी बेटी को निकालना चाह रहे थे. लेकिन चारु परेशान हो उठी. नन्हे भाई और पिता का खयाल उस की खुशियों को तिरोहित कर गया. लेकिन पिता बेटी की खुशियों की चिता पर बेटे का जीवन नहीं संवारना चाहते थे.

इसलिए साधारण सी रस्म के साथ सगाई संपन्न हो गई. उस दिन के बाद मधुकर उस घर का सदस्य ही बन गया. डा. भारती उस का परिचय ज्येष्ठपुत्र के रूप में सब से करवाते थे. कुदरत भी कैसा मजाक करती है कभीकभी. ब्याह की तारीखनिश्चित करवाने जा रहे थे डा. भारती, अचानक हृदयगति रुकने से उन की मृत्यु हो गई. कितना अप्रत्याशित सा था यह सब. ईंट दर ईंट रख कर जिस महल को दोनों प्रेमियों ने सजाया था, पलभर में ही ढह गया. अब तो नैतिक, मौलिक दायित्वों के साथ आर्थिक दायित्वों का निर्वहन भी चारु को ही करना था. सबकुछ तो चुक गया था, पत्नी की बीमारी में डा. भारती का. पति की मृत्यु का दुख ज्यादा समय तक चारु की मां झेल नहीं पाई थीं और उन्होंने भी दम तोड़ दिया. यों तो बिस्तर पर पड़ी मां बेटी को कुछ भी तो नहीं दे पाती थीं, पर कच्चे धागे के समान सहारा तो था, जो टूट गया था. इतनी बड़ी दुनिया में अकेली औरत का रहना कठिन ही नहीं, मुश्किल भी तो था. मधुकर ने चारु को उस के दायित्वों के साथ ही अपनाना चाहा था, ‘तुम्हारे दुखसुख और दायित्व मेरे हैं, चारु. विश्वास करो, पूरापूरा निभाऊंगा इन्हें.’

पर स्वाभिमानी चारु कहां मानने वाली थी. वह बोल पड़ी थी, ‘भावनाओं में बह कर लिया गया निर्णय कभी सही नहीं होता. तुम्हारे एहसानों के बोझ तले आलोक का व्यक्तित्व दब कर रह जाएगा.’ ‘ऐसा तब होता जब आर्थिक रूप से तुम मुझ पर निर्भर होतीं. तुम स्वयं भी तो प्रवक्ता हो.’ ‘हां, लेकिन घर तो तुम्हारा है.’ ‘यदि आलोक मेरा भाई होता तब क्या होता? क्या यों ही छोड़ देता मैं उसे?’ ‘दोनों परिस्थितियां अलगअलग हैं. अपने सुख की खातिर आलोक को अभिशप्त जीवन कैसे जीने दूं?’ मधुकर कुछ नहीं कह पाया था. इतने बड़े वीरान बंगले में दोनों भाईबहन रह गए थे. मधुकर नियमित रूप से वहां जाता. उस का सहारा बरगद की छांव जैसा प्रतीत होता चारु को. कुछ भी तो नहीं कर पाती थी उस की सलाह के बिना. उस वीरान बड़े से बंगले में अकेली चारु पूरा दिन तो कालेज और परिवार का काम निबटाती पर ज्यों ही शाम की लाली क्षितिज पर आने लगती, वह उदास हो जाती थी. नन्ही उम्र के भाई से अपने दुख, परेशानियां बांटती भी तो कैसे? कितनी बार मनोबल और संयम टूटे थे. कई बार वह बिखरी थी. अगर मधुकर की बांहों का सहारा न मिला होता तो कब की टूट चुकी होती. दुख, तकलीफ और परेशानियों को झेलती चारु जब परेशान हो उठती तो मधुकर के सुदृढ़ कंधों पर सिर टिका कर सिसक उठती. अश्रु की अविरल धारा से मन का पूरा विषाद धुल जाता था.

मनोबल टूटता तो सोचती, मधुकर का प्रस्ताव स्वीकार ले, पर तभी आलोक का ध्यान आ जाता. मधुकर की दया कहीं उसे आत्महीनता के आगोश में न समेट ले. कृत्यअकृत्य के चक्रवात में उलझी चारु कभी दुविधा से निकल नहीं पाई. आलोक दिनपरदिन सफलता के शिखर पर चढ़ता गया. दिन बीते, महीने बीते और फिर वर्ष. एक दिन ऐसा आया, जब चारु की मेहनत रंग लाई और आलोक डाक्टर बन गया. बहुत प्रसन्न हुई थी चारु. रोगियों की सेवा करते आलोक को वह मधुकर से परामर्श लेने के लिए कहती. एक बार आय अर्जित करनी शुरू की आलोक ने तो चारु को काम पर नहीं जाने दिया. बरसों से संघर्ष करती चारु खुद भी तो टूट चुकी थी अब तक. जीवन के अवसान की ओर अग्रसर चारु पूर्ण विश्राम की अधिकारिणी थी भी. बस, अब एक और साध रह गई थी उस के मन में, भाई के लिए सुंदर, गुणवान जीवनसंगिनी तलाश करना. हमेशा की तरह मधुकर से उस ने एक बार फिर सहायता मांगी थी. मधुकर उस का महज प्रेमी ही नहीं, मित्र और रहबर भी था. पगपग पर दिशा दी थी उस ने. अब तक के संघर्षपूर्ण जीवन का श्रेय मधुकर को ही तो देती थी वह.

लेकिन इस बार आलोक बहन के इस निर्णय पर बौखला उठा था. हमेशा दूसरों के लिए सुख का संधान करने वाली बहन को अपना घरसंसार बसाने का अधिकार भाई से पहले था. मधुकर कितने बरसों से प्रतीक्षा कर रहा था. चारु को समझाया था मधुकर ने, ‘यों ही भावनाओं में कब तक बहती रहोगी, चारु? आदर्शों की सलीब पर कब तक टंगी रहोगी? तुम्हारी प्रतीक्षा करतेकरते थक चुका हूं मैं. दिल भी टूट चुका है.’ ‘जीवन में यही सब तो माने रखता है. भावनाओं से अलग तो नहीं रहा जा सकता है. अब तो इन बच्चों के खानेखेलने के दिन हैं. अब क्या इस उम्र में दुलहन का जोड़ा पहनूंगी?’ वह हंस दी थी. ‘तुम्हारे यहां रहने या मेरे पास रहने से इन बच्चों को क्या फर्क पड़ेगा? सुखदुख बांटने को अनेक दोस्त, रिश्तेदार हैं इन के.’ मधुकर ने चारु को समझाया था, पर नहीं मानी वह, शायद पिंजरे में बंद हो कर रहने की आदी हो चुकी थी.

हार कर विदेश चला गया था मधुकर. आलोक और अणिमा के ब्याह तक भी नहीं रुका था वह. अपने अरमानों से सजे महल के खंडहरों को देखने के लिए रुकता भी क्यों? अपना कहने को क्या रह गया था यहां? 4 बरसों तक अमेरिका में रह कर मधुकर जब वापस भारत लौटा तो लखनऊ में नर्सिंगहोम खोला. फिर स्वयं को पूर्णरूप से व्यस्त कर लिया था उस ने. मरीजों के बीच रह कर कई बार चारु के पास जाने का मन किया था उस का पर जा नहीं सका था. कहीं सही व्यवहार नहीं मिला और उस का संवेदनशील मन आहत हुआ तो? खुद चारु ने कब टोह ली थी उस की? अपने ही संसार में तो रमी रही. फिर भी एकांत के क्षणों में चारु बहुत याद आती थी. उस का अनिंद्य सौंदर्य, शांत, संयमित व्यवहार उसे बारबार याद आता. जीवन संध्या की इस बेला में जीवनसाथी की कमी हमेशा खलती थी. पिछले साल एक सेमिनार में उस की भेंट आलोक से हो गई थी. इतने साल बाद मिले आलोक पर प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी मधुकर ने. हर प्रश्न चारु के इर्दगिर्द ही घूमता रहा. उस के बाद आलोक ही अपने समाचारों से मधुकर को अवगत कराता रहता. हर महीने आलोक आता और अपने घर की पूरी सूचना उसे दे जाता. ऐसा लगता जैसे सबकुछ सही तरीके से चल रहा है. इधर, पिछले कुछ दिनों से आलोक बहुत परेशान दिख रहा था. हर समय बुझाबुझा सा रहता. मधुकर इतने बरसों तक जुड़ा था उस परिवार से इसलिए थोड़ा सा दुख भी उस परिवार का नहीं सह पाता था. उस ने आलोक को कुरेदा तो चुप नहीं रह पाया था वह. फिर उस ने कहना शुरू किया, ‘अजीब सा चिड़चिड़ा स्वभाव हो गया है मधुकर भैया, चारु दीदी का.

पूरे घर का वातावरण ही नारकीय बन गया है.’ मधुकर ने उसे अविश्वास से घूरा था. आलोक ने फिर कहा, ‘मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे दीदी मेरी खुशियों की सब से बड़ी दुश्मन हैं. अणिमा को मेरे साथ देख कर ईर्ष्यालु हो उठती हैं.’ ‘यह क्या कह रहे हो? तुम्हारे सुख के लिए जिस बहन ने अपनी खुशियों की तिलांजलि दे दी, वह तुम्हारी दुश्मन कैसे हो सकती है? अणिमा को वह स्वयं अपनी इच्छा से तुम्हारी बहू बना कर लाई थी.’ ‘यह सच है भैया, पर आप भी दीदी का व्यवहार देखेंगे तो परेशान हो उठेंगे, कभी दरवाजे की दरार में से अंदर झांकती हैं तो कभी दरवाजे की आड़ में हो कर पतिपत्नी की बातें सुनती हैं. हमारे हर कार्यकलाप और गतिविधि पर गिद्धदृष्टि है दीदी की. मैं ने हमेशा दीदी का आदर किया है, पर अणिमा तो पराए घर की है. मेरा कुछ फर्ज पत्नी के प्रति भी तो है. दीदी के बरताव से तालमेल बिठाना बहुत मुश्किल हो गया है.’ आलोक के जाने के बाद मधुकर बेहद बेचैन हो उठा था. विश्वास नहीं हो रहा था, पढ़ीलिखी, सुलझे विचारों वाली चारु क्या वास्तव में ऐसा ही व्यवहार करती होगी? आज वह आलोक के कहने पर ही उस शहर में आया था.

जी तो कल ही मचल उठा था, लेकिन चारु ने तो तब एक बार भी रुकने के लिए नहीं कहा था. यों चले जाना शिष्टाचार के विरुद्ध नहीं होता क्या? चारु के कहे शब्द उस के अंतस्थल को एक बार फिर कचोटने लगे थे. सुबह उठ कर उस ने अपना सामान सूटकेस में बंद किया और चारु के घर की ओर रवाना हो गया. रिकशे वाले को पैसे दिए और बाहर लौन में आ कर खड़ा हो गया था. पहले का समय होता तो धड़धड़ाते हुए बंगले की सीढि़यां चढ़ कर सीधे चारु के कमरे में पहुंच जाता किंतु अब एक अव्यक्त संकोच ने उस के पांव जकड़ लिए थे. काफी देर तक वह असमंजस की स्थिति में दरवाजे पर ही टिका रहा. अंदर से आती आवाज ने उसे दरवाजे पर ही रोक दिया था. गलत समय पर तो नहीं आ गया? उसे लगा, नहीं आना चाहिए था इस समय. शांत, सहिष्णु और संयमित चारु का कभी उग्र स्वर नहीं सुना था उस ने. और आज ये आवाजें? लौटने को हुआ तो आलोक की गाड़ी की आवाज ने रोक दिया उसे. ‘‘कहां जा रहे हैं भैया? यह सब तो प्रतिदिन होता है यहां,’’ वापस लौटते हुए मधुकर को रोक कर आलोक उसे बैठक में ले आया.

मधुकर सोच रहा था, ‘शांत, निश्छल स्वभाव वाली चारु को कभी क्रोध आता भी तो मुंह से कभी कुछ नहीं कहती थी. बस, माथे पर बल डाल देती थी.’ पूरे 9 साल के परिचय की उस की एकएक भंगिमा, एकएक आदत याद हो गई थी उसे. ऐसा तीखा व्यवहार तो अनपेक्षित ही था चारु का. आलोक के सूचना देने पर चारु अंदर आ कर कमरे में बैठ गई थी. मधुकर को ऐसा लगा चारु को देख कर जैसे कोई नन्हा बालक मचलमचल कर जिद कर रहा हो और अब रो कर खुद को हलका महसूस कर रहा हो. कुछ देर बादखाना खा कर आलोक और अणिमा अपने शयनकक्ष में चले गए तो चारु उस के पास आ कर कमरे में बैठ गई थी. उसे लगा, चारु के मन में भाईभाभी के प्रति उपजी ईर्ष्या ने असुरक्षा को जन्म दिया है. ‘‘ठंड नहीं लग रही है? खिड़की क्यों नहीं बंद कर लेते?’’

चारु का साधिकार आग्रह अच्छा लगा था उसे. ‘‘रहने दो, अच्छा लग रहा है,’’ उस ने चारु का हाथ पकड़ लिया, ‘‘नींद नहीं आ रही है?’’ पूछा. ‘‘नहीं. ये दोनों रात 11 बजे कमरे में बंद हो जाते हैं. मैं अकेली बाहर घूमती रहती हूं,’’ चारु के शब्दों में अश्लीलता का पुट था. ‘ब्याहता पतिपत्नी का इतनी रात को अपने शयनकक्ष में जाना गलत था क्या? पूरा दिन अस्पताल में मरीजों की तीमारदारी करने के बाद दो पल सुस्ताने में असंगत तो कुछ भी नहीं था,’ मधुकर सोच रहा था. ‘‘तुम अपना समय कैसे बिताती हो?’’ ‘‘कुछ खास नहीं करने को. घर पर तो पूरा आधिपत्य अणिमा का ही है. कालेज की नौकरी जबरन आलोक ने छुड़वा दी. चार पैसे कमाती थी तो लगता था, मेरा भी कोई अस्तित्व है.’’ ‘‘ऐसा क्यों सोचती हो, चारु? बहुत काम किया है तुम ने. अब कुछ पल सुस्ता लो. आलोक तुम्हें आराम करते देखना चाहता है.’’ मधुकर ने अपने स्नेहिल स्पर्श से उस के कंधे को छुआ तो कांप गई थी चारु. कितना अपनत्वभरा स्पर्श था चारु के लिए? घंटों यों ही बातें करते रहे थे दोनों. उस के बाद कुछ दिन और रहा था मधुकर वहां. अणिमा हर काम चारु से पूछ कर करती थी. ऐसा कभी नहीं लगा उसे कि चारु का कोई अपमान कर रहा है. शायद भाईभाभी के सुखी दांपत्य को देख कर चारु ईर्ष्या से जलने लगी है. चिर कुंआरेपन की बगिया में उस की सुप्त आकांक्षाएं गृहस्थी का फूल खिलाने का स्वप्न देख रही हैं शायद.

 

अगर ऐसा हो तो चारु क्यों नहीं आ जाती उस के पास? वह तो अब भी प्रतीक्षारत है. जब तक मधुकर वहां रहा चारु खिलीखिली सी रही. बरसों पुराने मधुर क्षण याद आ गए थे उसे. आखिर वह दिन भी आया जब मधुकर को लौटना था. सामान बांधते हुए उस के हाथ चारु के शब्दों से रुक गए थे. ‘‘मत जाओ मधुकर. तुम चले गए तो सुबह की प्रतीक्षा में पूरी रात करवटें बदलती रहूंगी. तुम मेरी दुर्दशा देख तो रहे हो.’’ कुछ देर रुक कर फिर फुसफुसाहट सुनी थी मधुकर ने, ‘इस में मेरा क्या दोष है मधुकर?’ ‘‘गलत समझा है तुम ने चारु. दोषी कोई भी नहीं. दोषी वह घटनाक्रम है जिस ने हमें हर बार नए मोड़ पर खड़ा कर दिया और नदी के 2 किनारों के समान हम आज तक नहीं मिल पाए. जीवन की 2 राहों पर खड़े 2 राही आज तक एकसाथ जीने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं. पर लगता है वह दिन शायद कभी नहीं आएगा.’’

चारु अबोध बालिका की तरह मधुकर का मुंह देख रही थी. मधुकर कहता रहा, ‘‘इन बच्चों को अपने जीवन में व्यस्त देख कर तुम्हें अपने रीतेपन का एहसास हो रहा है. मैं ने तुम्हें तब भी कहा था कि तुम ही अकेली रह जाओगी. आलोक अब बच्चा नहीं रहा जो तुम्हारी उंगली पकड़ कर चलेगा. अपने जीवन के निर्णय लेने में अब वह खुद सक्षम है. पीछे लौटना तो मुश्किल है चारु. सामने अब भी सुनहरी सुबह हमारी प्रतीक्षा कर रही है. तुम्हारी तरह मैं भी बहुत अकेला हूं, चारु.’’ चारु उदास आंखों से उसे निहारती रही थी. फिर बोल उठी थी, ‘‘कहीं तमन्नाओं का बहलाव तो नहीं है यह, मधुकर?’’ ‘‘नहीं चारु, पुराने रिश्तों पर नए संबंधों की मोहर ही तो लगानी है.’’ सहसा चारु को अपनी जीवनसंध्या का एहसास होने लगा था. प्रतिक्षण, प्रतिपल एकदूसरे की बाट जोहते प्रेमी अगर अब भी नहीं मिले तो बहुत देर हो जाएगी. आंसू के दो कतरे चारु की आंखों से टपके तो मधुकर ने उन्हें पोंछ लिया था. फिर अपनी बांहों में भींच कर पूछा था उस ने, ‘‘ये आंसू किसलिए हैं चारु?’’ ‘‘जो पीछे छूट गया. उस के लिए नहीं हैं ये आंसू, मधुकर. आने वाली सुबह की खुशी के हैं ये आंसू. अब मुझे अकेला मत छोड़ना.’’ मधुकर ने अपनी हथेली चारु के होंठों पर रख दी थी. टेसू के दो फूल टपटप गिर रहे थे. उधर आलोक और अणिमा की भी आंखें नम हो गई थीं.

 

 

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