‘‘सिया, सिया, जल्दी आओ. देखो, तुम्हारे पापा कुछ बोल ही नहीं रहे हैं. जाने क्या हो गया.’’

सिया और समीर दोनों अपने कमरे से भागते हुए आए.

सिया ने ‘पापा, पापा’ पुकार कर उन का हाथ उठाया. उसे उन का हाथ बेजान लगा.

समीर ने डाक्टर को फोन किया.

सुजाता फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘मम्मी, पापा को कुछ नहीं हुआ. आप रोइए मत, प्लीज, वरना मुझे भी रोना आने लगेगा.’’

डा. अनुराग समीर के मित्र थे, इसलिए तुरंत आ गए थे. उन्होंने आंख की पुतली देखी और ‘ही इज नो मोर’ कह कर कमरे से बाहर चले गए.

सिया मां से चिपट कर सिसकने लगी. जब कुछ देर वह रो चुकी तो समीर बोले, ‘‘सिया, अपने को संभालो.’’

समीर भी घबराए हुए थे. दीप की हरकतों से परेशान हो कर सिया मम्मीपापा को अपने साथ ले आई थी. अभी महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि पापा सब लोगों को छोड़ कर चले गए.

‘‘मम्मी, पापा शाम को तो एकदम ठीक थे. क्या आप से कुछ कहासुनी हुई थी?’’

‘‘नहीं, बेटी.’’

मम्मी को असमंजस में देख उस का शक पक्का हो गया था कि वे उस से कुछ छिपा रही हैं.

‘‘सच बताओ, मम्मी, रात में क्या हुआ था?’’

वे सिसकते हुए बोलीं, ‘‘दीप का फोन आया था. उस ने पापा के जाली दस्तखत बना कर मकान का सौदा तय कर लिया है और बयाना भी ले लिया है. इसी बात पर पापा नाराज हो उठे थे. जौइंट अकाउंट होने के कारण वह बैंक से रुपए पहले ही निकाल चुका था. 2 दिन पहले श्याम चाचा का भी फोन आया था. घर पर किसी लड़की को ले कर आया था उस के कारण उन से भी उस ने खूब गालीगलौज और हाथापाई की.

‘‘इसी बात को ले कर बापबेटे के बीच जोरजोर से बहस होती रही थी. मैं ने इन्हें सम झाने का प्रयास किया तो मु झे डांट दिया. फिर आधी रात में उठ कर कोई दवा खा कर बोले, ‘ऐसी औलाद से बिना औलाद होते तो ज्यादा सुखी होते.’’’

‘‘मम्मी, इतनी बात हो गई और आप ने मु झे कुछ भी नहीं बताया.’’

‘‘बेटा, तुम लोग रात में देर से थकेमांदे आए थे. यह सब तो मैं, जब से दीप जवान हुआ है तब से देखसुन रही हूं. मु झे क्या मालूम कि यह बात आज इन के दिल में ऐसी चुभ जाएगी.’’

समीर मम्मी और सिया से बोले, ‘‘बताओ, कहांकहां फोन करना है. मैं ने दिया और श्याम चाचा को फोन कर दिया है. कह दिया है आप जिन्हें ठीक सम िझए उन्हें सूचना दे दीजिए. आप के आने के बाद ही कुछ होगा.’’

समीर के मित्र और पड़ोसी एकत्र हो गए थे. उन सब की सहायता से शव को बरामदे में रख कर सब वहीं खड़े हो गए.

समीर ने बताया कि श्याम चाचा, दिया और सुचित्रा बूआ के आने में लगभग 5 घंटे लग जाएंगे, इसलिए उन लोगों के आने के बाद ही कुछ होगा. यह सुनते ही सब लोग तितरबितर हो गए.

वहां पर सिया, समीर और सुजाता ही रह गए. सुजाता की आंखों के सामने दीप के बचपन की बातें चलचित्र की तरह चलने लगीं.

सिया और दिया के बाद दीप के पैदा होने पर घर में खुशियां छा गई थीं. अम्मा, सोम और श्याम भैया को बेटे की खबर सुनते ही मानो कारूं का खजाना मिल गया था. परिवार में पहला बेटा था, इसलिए अतिरिक्त लाड़प्यार का हकदार था. सीमित आमदनी होने के कारण बेटियों की जरूरतों पर कटौती शुरू हो गई. ढाईतीन साल का दीप अपने मन का न होने पर तब तक रोता जब तक उस की जिद पूरी न हो जाती.

सोम ने दोनों बेटियों को तो सरकारी हिंदी स्कूलों में पढ़ाया था. चूंकि कौन्वैंट स्कूल महंगे होते थे इसलिए उन का बहाना होता था कि वहां पढ़ कर बच्चे बिगड़ जाते हैं. सिया, दिया दोनों मेहनती थीं. हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम आतीं. इसलिए दोनों पढ़लिख कर डिगरी कालेज में लैक्चरर बन गईं.

परंतु जब दीप के ऐडमिशन का समय आया तो सोम ने उस का नाम कौन्वैंट स्कूल में 10 हजार रुपए डोनेशन दे कर लिखवाया था. सिया उस से 8 साल बड़ी थी, इसलिए उस से थोड़ा दबता था लेकिन दिया से तो उस की एक पल भी नहीं बनती थी.

दिया और दीप की आपसी मारपीट से परेशान हो कर मैं अकसर रो पड़ती थी. दोनों की गुत्थमगुत्था से खीज कर अकसर कहती, ‘ऐसा लगता है कि घर छोड़ कर कहीं चली जाऊं. लेकिन मेरा तो ठिकाना भी कहीं नहीं है.’

एक बार दोनों एक पैंसिल के लिए लड़ रहे थे. दीप ने दिया को गंदी सी गाली दी. सुनते ही मैं ने उसे एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया था तो वह मुझ से ही चिपट गया और मेरी बांह में दांत गड़ा दिए थे. आज भी उस जख्म का निशान मेरी बांह पर बना हुआ है. जैसे ही दर्द से बिलबिला कर मैं ने उसे हलका सा धक्का दिया, वह जानबू झ कर मुंह के बल गिर पड़ा. होंठ में दांत चुभ जाने के कारण उस के खून छलक आया था. वह मुंह फाड़ कर जोरजोर से चिल्लाने लगा. अम्माजी खून देखते ही मुझ पर गरम हो उठी थीं.

‘मां हो कि दुश्मन, ऐसे धक्का दिया जाता है,’ वे दीप के आंसू पोंछ कर बोलीं, ‘मेरा राजकुमार है. अभी तुम्हारे लिए पैंसिल का पूरा डब्बा मंगवा कर दूंगी. तुम इस कलूटी को एक भी मत देना.’

अम्माजी दिया को लाड़ से कलूटी ही कहती थीं.

फिर दीप के कान में फुसफुसा कर बोलीं, ‘मेरे साथ आओ, मैं ने तुम्हारे लिए लड्डू छिपा कर रख रखे हैं,’ रोना तो महज उस का नाटक था.

मैं आंखों में आंसू भर कर रह गई थी. दीप ने एक लड्डू मुंह में रखा, दूसरा हाथ में और घर से फुर्र हो गया.

सोम बहुत गरममिजाज और कायदेकानून वाले थे. लेकिन बेटे की मोहममता में सारे कायदेकानून भूल जाते थे.

मैं सुबह से रात तक घर का काम करतीकरती थक जाती. मुंह अंधेरे ही उठ कर तीनों बच्चों का टिफिन पैक कर देती. खाना, कपड़ा, बरतन करतेकरते थक कर निढाल हो जाती थी.

तीनों बच्चों का दूध बना कर मेज पर रख देती थी. दीप चीखता हुआ कहता, ‘मु झे नहीं पीना सादा दूध, बौर्नविटा डालो तभी पीऊंगा.’

‘बौर्नविटा खत्म हो गया है, इसलिए चुपचाप दूध पियो, टिफिन बैग में रखो और स्कूल जाओ. वैन वाला कब से हौर्न बजा रहा है.’

मैं ने गिलास उठा कर दीप के मुंह में लगाने का प्रयास किया. आधा गिलास दूध देखते ही उस ने मेरे हाथ को  झटक दिया. हाथ से गिलास छूट कर दूध जमीन पर फैल गया. मैं चिल्ला कर बोली, ‘बहुत बदतमीज हो गया है. सिया, दिया को जितना देती हूं, चुपचाप पी कर चली जाती हैं. ये नालायक हर समय कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर देता है.’

सोम कमरे से भागते हुए आए, डांटते हुए बोले, ‘तुम्हारा कोई भी काम ढंग से नहीं होता. जब तुम्हें पता है कि वह गिलास भर कर दूध पीता है तो तुम ने उसे चिढ़ाने के लिए जानबू झ कर आधा गिलास दूध क्यों दिया?’

‘मेरे लिए तो तीनों बच्चे बराबर हैं. मैं तो तीनों को एक सा खिलाऊंगी, पहनाऊंगी. मेरे लिए बेटाबेटी दोनों एक समान हैं,’ मैं ने जवाब दिया.

‘ज्यादा जबान मत चलाओ. सिया, दिया एक दिन दूध नहीं पिएंगी तो मर थोड़े ही जाएंगी,’ अम्माजी ने सोम के सुर में सुर मिलाया.

सिया दीप को बुलाने के लिए बाहर से आई थी. दादी और पापा की सारी बातें उस ने सुन ली थीं. 14 वर्ष की सिया सम झदार हो चुकी थी. उस दिन के बाद से उस ने दूध को हाथ भी नहीं लगाया. दिया दीप को जिद करते देख खुद भी वैसा ही करने लग जाती थी.

एक दिन दीप टिफिन मेज पर पटक कर बोला, ‘मैं आज से टिफिन नहीं ले जाऊंगा. सब बच्चे पकौड़े, इडली, पुलाव और जाने क्याक्या ले कर आते हैं परंतु तुम तो परांठे के सिवा कुछ बनाना ही नहीं जानतीं.’

मैं चिढ़ते हुए बोली, ‘सुबह इतने सारे काम होते हैं. छप्पन भोग बनाना मेरे वश का नहीं है. अपने बाप से कहो, नौकरानी रख लें, वही रचरच कर बनातीखिलाती रहेगी.’

दीप ने टिफिन गुस्से से जमीन पर फेंक दिया, ‘मु झे नहीं ले जाना यह सड़ा परांठा.’

मैं चीख कर बोली, ‘खाना फेंक रहे हो. 2-4 दिन भूखे रहोगे तो सब सम झ में आ जाएगा.’

सोम दौड़ेदौड़े आए. दीप का हाथ पकड़ कर बाहर ले गए. उन्होंने निश्चय ही उस की मुट्ठी में रुपए रख दिए होंगे. वह हंसताखिलखिलाता साइकिल पर चढ़ कर स्कूल चला गया.

अंदर आते ही सोम बोले, ‘तुम भी कम थोड़े ही हो, जब तुम्हें पता है कि वह परांठा नहीं पसंद करता है तो कुछ और बना दो लेकिन तुम कुत्ते की दुम की तरह हो. चाहे कितनी सीधी करो, टेढ़ी की टेढ़ी रहती है.’

‘आप मत चिल्लाइए, उस को बिगाड़ने में आप ही ज्यादा जिम्मेदार हैं. आप ने उसे रुपए क्यों दिए?’

‘वह भूखा रहता कि नहीं?’

‘तो क्या हुआ? एकाध दिन भूखा रहता तो दिमाग ठिकाने आ जाता. आप खुद खाने की प्लेट फेंकते हो, वही उस ने भी सीख लिया है.’

‘चुप रहो, ज्यादा चबड़चबड़ मत करो.’

मैं रोतेरोते किचन से चली आई. यह सब तो रोज का काम हो गया था.

दीप 9वीं कक्षा में आ गया था. उस की दोस्ती कक्षा के रईस, आवारा टाइप लड़कों से थी न कि पढ़ने में होशियार बच्चों से. एक दिन वह बोला, ‘पापा, यश मैथ्स की कोचिंग कर रहा है. मुझे भी कोचिंग जौइन करनी है.’

सोम दीप की किसी बात के लिए मना करना नहीं जानते थे. वे उस की हर फरमाइश पूरी करते.

‘पापा, आशू हमेशा ब्रैंडेड शर्ट ही पहनता है. मेरे पास तो एक भी नहीं है.’

अगले दिन ही सोम औफिस से लौटते हुए ब्रैंडेड शर्ट ले कर आए थे. शर्ट देख कर वह खुशी से सोम से चिपट कर बोला, ‘मेरे अच्छे पापा, आप बहुत अच्छे हैं.’

उसे सोम के ओवरटाइम की कोई फिक्र नहीं थी.

उसी साल सिया की शादी हो गई थी. दीप आजाद हो गया था. दिया से तो उस की अधिकतर बोलचाल ही बंद रहती थी.

सोम का प्रमोशन हो कर मंगलोर पोस्टिंग हो गई थी. वे दिया और दीप की पढ़ाई के कारण उन्हें श्याम भैया की देखरेख में यहीं छोड़ कर चले गए थे.

दीप घर से बाहर ज्यादा रहता, ‘मैं ट्यूशन पढ़ने जा रहा हूं,’ कह कर वह घंटों के लिए गायब हो जाता. उस पर डांटफटकार का कोई असर नहीं था. 2-3 महीने में सोम आते तो मैं मां होने के नाते शिकायतों का पुलिंदा खोल कर उन्हें सुनाने की कोशिश करती जिसे सोम ध्यान से सुनते भी नहीं थे.

हंस कर लाड़ से इतराते हुए दीप से कहते, ‘क्यों भई दीप, अपनी मम्मी का कहा माना करो. इन्हें परेशान मत किया करो. ये तुम्हारी ढेरों शिकायतें करती रहती हैं. हां, तुम्हारी इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा है. तुम्हारी तैयारी कैसी चल रही है?’

‘फर्स्ट क्लास, पापा. मेरे तो सारे सब्जैक्ट्स तैयार हैं. रिवीजन चल रहा है.’

मेरी बातों से ज्यादा उन्हें बेटे की बातों पर विश्वास था. सोम निश्ंिचत थे कि उन की बीवी को तो हमेशा बड़बड़ करने की आदत है.

दीप का हाईस्कूल का रिजल्ट निकलने वाला था. सोम छुट्टी ले कर मंगलोर से आ गए थे. सोम बेटे से लडि़याते हुए बोले थे, ‘दीप, तुम्हारे 80 प्रतिशत अंक तो आ ही जाएंगे.’

दीप बोला था, ‘श्योर, पापा.’

‘भई, फिर तुम क्या इनाम लोगे?’

मेरा मन नहीं माना था, बीच में ही बोल पड़ी थी, ‘सिया ने जब पूरे कालेज में टौप किया था तो आप ने कभी नहीं पूछा था.’

‘अरे, वह तो बेटी थी. यह तो मेरा बेटा है, मेरा नाम रोशन करेगा.’

‘पापा, मुझे अपने दोस्तों को तो होटल में पार्टी देनी पड़ेगी.’

‘देना, जरूर देना. अपना मन मत छोटा करना. मु झे पहले से बता देना कि कितने रुपए चाहिए.’

दीप का रिजल्ट इंटरनैट पर देखा गया. उस के 51 प्रतिशत अंक देख कर सोम ने आव देखा न ताव, उस पर थप्पड़ों की बरसात कर दी थी. बेटे को बचाने के चक्कर में 1-2 हाथ मेरे भी लग गए थे.

घर में मातम का माहौल था, परंतु दीप पर कोई असर नहीं था. वह ढीठ की तरह कह रहा था, ‘मेरे तो सारे पेपर अच्छे हुए थे, जाने कैसे इतने कम अंक आए हैं. जरूर कहीं गड़बड़ है. मैं स्क्रूटनी करवाऊंगा.’

सोम को बहुत बड़ा सदमा लगा था. शर्म के कारण वे 2-3 दिन घर से बाहर नहीं निकले. वे सम झ नहीं पा रहे थे कि दीप को सही रास्ते पर कैसे लाएं.

तमाम दौड़धूप कर के सोम ने दीप का ऐडमिशन कौमर्स में करवाया. बेटे को अपने पास बिठा कर प्यार से खूब सम झाया, ‘बेटा दीप, मेरे पास कोई दौलत नहीं रखी है कि मैं तुम्हें कोई दुकान या व्यापार करवा सकूं. तुम्हें मेहनत से पढ़ना होगा क्योंकि तुम्हें पढ़लिख कर भविष्य में आईएएस औफिसर बनना है.’

‘जी पापा, मैं अब मन लगा कर पढ़ाई करूंगा.’ आंखों में आंसू भर कर सोम मंगलोर चले गए.

दीप फिर पुराने रवैए पर लौट आया था. कोचिंग के बहाने वह दिनभर घर से गायब रहता. जब घर में रहता तो या तो मोबाइल पर बातें करता या इयरफोन कानों में लगा कर गाने सुनता.

श्याम भैया ने एक दिन डांटते हुए कहा, ‘दीप बेटा, पढ़ाई पर ध्यान दो. इस वर्ष तुम्हारी इंटर की बोर्ड परीक्षा है. हाईस्कूल की तरह इस बार रिजल्ट खराब न हो.’

दीप बिगड़ कर बोला, ‘चाचा, मैं अपना भलाबुरा सम झता हूं. आप को उपदेश देने की जरूरत नहीं है.’

श्याम भैया ने उस दिन के बाद से दीप की हरकतों की ओर से अपनी आंखें बंद कर लीं. दीप की शामें दोस्तों के साथ रैस्टोरैंट में पिज्जाबर्गर खाए बिना नहीं बीतती थीं. सब बीयर पार्टी का भी लुत्फ उठाते थे. खर्चे से बचाए हुए जो रुपए अलमारी के कोनों में मैं छिपाए रखती थी, आसानी से उन पर वह हाथ साफ करता रहता. धीरेधीरे उस की हिम्मत बढ़ती जा रही थी. मैं परेशान रहती. परंतु यदि भूल से भी दीप से कुछ कहती तो वह मुझ से लड़ने पर उतारू हो जाता था. मैं मन ही मन घुटती रहती. मेरे दिल के दर्द को कोई सुनने वाला नहीं था. दिनबदिन मैं सूख कर कांटा होती जा रही थी.

एक दिन श्याम भैया मुझे डाक्टर के पास ले कर गए तो डाक्टर ने तमाम टैस्ट कर डाले. ईसीजी करने के बाद उन्होंने दिल की बीमारी बताई. डाक्टर ने ढेर सारी दवाएं और पूरी तरह आराम करने की सलाह दी.

सोम मेरी बीमारी की खबर सुन कर भागे चले आए. मेरी हालत देख उन की आंखों में आंसू आ गए थे. दीप पक्का नाटकबाज था. जब तक सोम थे, उन के सामने कौपीकिताब खोल कर बैठा रहता. सोम का और मेरा भी काम में हाथ बंटाता. मेरी देखभाल भी करता. सोम को लगा कि मेरी बीमारी के कारण वह सुधर गया है.

डाक्टर की दवाओं और सोम की देखभाल से मेरा स्वास्थ्य जल्दी ही सुधरने लगा. सोम ने इन दिनों महसूस किया कि श्याम भी दीप से नाराज और खिंचेखिंचे से रहते थे परंतु पुत्र के मोह में उन्हें श्याम ही गलत लगे थे.

एक दिन मैं दीप पर  झुं झला रही थी तो श्याम भैया भी उस की हां में हां मिला कर कुछ बोलने लगे. सोम को यह अच्छा नहीं लगा. इसलिए बीच में बात काटते हुए मेरी ओर इशारा कर के बोले, ‘तुम लोग सम झते क्यों नहीं हो? वह जवान हो गया है. अपना भलाबुरा खुद सम झता है. हर समय टोकाटाकी करना अच्छा नहीं होता,’ फिर श्याम भैया की ओर मुखातिब हो कर बोले थे, ‘श्याम, तुम्हें भी सम झना चाहिए कि यही उस के खानेखेलने की उम्र है. फिर तो आगे चल कर जिम्मेदारियों में पड़ जाएगा.’

मैं थोड़ी नाराज हो कर बोली थी, ‘आप की आंखों पर बेटे के मोह की पट्टी बंधी हुई है. आप सम झते क्यों नहीं हैं? आप का बेटा बिगड़ गया है. उस के लक्षण अच्छे नहीं हैं. उस का संगसाथ अच्छे लड़कों का नहीं है.’

सोम मुझ पर चिल्ला पड़े थे, ‘तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है. हर समय ऊटपटांग बातें करना तुम्हारा काम है.’

मैं भी नाराज हो कर जोर से बोली थी, ‘आप ने तो कसम खा रखी है, मेरी बात न मानने की. मैं तो दिल की मरीज हूं, मर जाऊंगी. आप ही बुढ़ापे में सिर पर हाथ रख कर रोएंगे. तब मु झे और मेरी बातों को याद करेंगे.’

सोम की छुट्टियां समाप्त हो गई थीं. वे चले गए थे. ट्रांसफर करवाने की कोशिश में लगे हुए थे. सोम के जाते ही दीप अपने असली रंग में आ गया. एक दिन उस ने अलमारी से घर खर्च के रखे हुए 2 हजार रुपए निकाल लिए.

मैं ने घर में शोर मचा दिया. मैं ने दिया से, फिर दीप से भी रुपयों के बारे में पूछा. दीप ने हड़बड़ाहट में नौकरानी गुडि़या का नाम ले लिया.

सुबह का समय था, इसलिए श्याम भैया भी घर पर ही थे. उन्होंने दीप से पूछा, ‘तुम ने उसे रुपए निकालते हुए देखा था?’

‘हां, वह अलमारी के पास खड़ी हो कर अपने कुरते के अंदर कुछ छिपा रही थी.’

गुडि़या कसमें खाती रही कि उस ने रुपए नहीं लिए हैं लेकिन श्याम भैया पर क्रोध का जनून सवार था. उन्होंने उस की तलाशी ले कर बेइज्जती भी की. उस को 1-2 थप्पड़ भी जड़ दिए. पुलिस में शिकायत करने की धमकी भी दी. लेकिन रुपए उस ने लिए हों तब तो मिलें. काम करने वाली से जरूर मैं हाथ धो बैठी थी. इस बीच दीप कब छूमंतर हो गया, कोई नहीं देख पाया.

गुडि़या की अम्मा ने महल्ले में बदनामी और कर दी थी. वह चिल्लाचिल्ला कर कहती फिर रही थी, ‘बड़े लोग होंगे अपने घर के. मेरी भी कोई इज्जत है. मेहनत कर के पेट भरते हैं. दीप बाबू बिलकुल आवारा हैं. उन्होंने ही रुपए चुराए हैं. वे हमारी गुडि़या को छेड़ रहे थे, उस के शोर मचाने पर उन्होंने उस से बदला लेने के लिए उस पर चोरी का इलजाम लगा दिया. दीप तो पक्का चोर है.’

श्याम भैया तो महल्ले में किसी से आंख भी नहीं मिला पा रहे थे. मैं भी शर्म से पानीपानी हो गई थी. बेटे की नीच हरकतों के कारण मैं ज्यादातर बीमार और अकेली रहने लगी थी.

श्याम भैया ने दीप की नित्य नईनई करतूतों से परेशान हो कर आंगन के बीच में दीवार खड़ी करवा कर सोम से सारे संबंध तोड़ लिए थे. देवरदेवरानी से नाता टूटने का सदमा  झेलना मुझे बहुत भारी पड़ रहा था. घर के सारे काम मुझे अकेले ही करने पड़ते थे. अकसर मैं हांफती हुई पलंग पर लेट जाती थी. अंदर ही अंदर दिनभर घुटती रहती थी.

दीप गिरतेपड़ते बीकौम पास कर चुका था. दोस्तयारों के साथ यहांवहां घूमताफिरता और बातें लंबीलंबी करता. सोम बेटे की नौकरी के लिए फार्म भरवाते रहते, परंतु सफलता कहीं नहीं मिलती थी. वे दीप की नौकरी के लिए यहांवहां भागते रहते, सिफारिश के लिए लोगों के हाथपैर जोड़ते रहते. निराश हो कर अपने फंड के पैसे से दीप के लिए एक छोटी सी मोबाइल की दुकान भी खुलवाई. लेकिन दीप के लिए वह उस के स्टैंडर्ड की नहीं थी. 8-10 दिन से ज्यादा उस पर वह नहीं बैठा. फलस्वरूप सोम के पैसे बरबाद हो गए.

वे मन ही मन बेटे के भविष्य को ले कर निराश हो गए थे. एक ओर मेरी बीमारी और दूसरी ओर बेरोजगार बेटा. इसी बीच दिया की शादी भी आ गई थी. शादी में होने वाले खर्च को देख कर एक दिन दीप बोला, ‘फंड के सारे रुपए पापा दिया की शादी में खर्च कर दे रहे हैं, तो मेरे लिए क्या बचेगा?’

बेटे की यह बात सुनते ही मैं सकते में आ गई थी, यदि सोम को बेटे की यह बात पता चलेगी तो उन्हें कितना दुख होगा.

दीप के दोस्त अपनीअपनी नौकरी में व्यस्त हो गए थे. स्वयं दीप अपनी बेरोजगारी से तंग आ चुका था. न तो वह समय से नहाता था, न खाता था, चुपचाप अपने कमरे में लेटा हुआ टकटकी लगा कर छत को निहारता रहता.

हंसताखिलखिलाता हुआ घर उदासी और मनहूसियत के बादल के पीछे छिप सा गया था. सोम और उन के लाड़ले के बीच आपस में बोलचाल लगभग बंद सी हो गई थी.

तभी एक दिन दीप सोम से आ कर बोला, ‘पापा, यदि आप घर गिरवी रख कर कुछ रुपयों का इंतजाम कर दें तो मु झे नौकरी जरूर मिल जाएगी. एक एजेंट से मेरी बात हुई है, उस ने मु झे बताया है कि 3 लाख रुपए लगेंगे, उस के एवज में स्थायी नौकरी दिलवाने का वादा किया है.’

‘देखो दीप, तुम किसी ठग के चक्कर में मत पड़ना. कुछ धोखेबाज लोगों का यही धंधा है कि वे जवान लड़कों को बहलाफुसला कर उन्हें बड़ेबड़े ख्वाब दिखा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं.’

दीप क्रोधित हो कर चिल्ला उठा था, ‘पापा, आप तो मेरा जीवन बरबाद कर के छोडि़एगा. आप मेरे बाप हैं कि दुश्मन.’

यह सुन कर मैं चुप नहीं रह पाई और बोल पड़ी, ‘दीप, पापा से इस तरह बात करते हो.’

‘बुढि़या, तुम तो चुप ही रहो. खांसखांस कर जीना हराम कर रखा है.’

सोम ने तमक कर हाथ उठा लिया था. मैं ने  झट से उन का हाथ पकड़ लिया था, ‘यह क्या कर रहे हो?’

‘मारो, मारो, और क्या कर सकते हो. तुम दोनों ने मेरे लिए किया ही क्या है? न तो अच्छे स्कूल में पढ़ाया. न डोनेशन दे कर इंजीनियर बनाया. कौमर्स में ऐडमिशन करवा के कहीं का नहीं छोड़ा. बस, पैदा कर के छोड़ दिया. मेरी बेकारी के लिए तुम ही जिम्मेदार हो. तुम यह घर और बुढि़या तुम अपने जेवर ले कर चाटो. मु झे बेकार देख कर तुम बहुत खुश हो रही होगी न. एक दिन रेल की पटरी पर जा कर सो जाऊंगा तो घी के दीपक जलाना.’

सोम और मेरे लिए यह सब अप्रत्याशित था. रोंआसी आवाज में सोम बोले थे, ‘दीप, इतने नाराज न हो, बेटा. मैं अपने औफिस में तुम्हारी नौकरी की जुगाड़ में जीजान से लगा हुआ हूं. बड़े साहब से बात भी हो गई है. उन्होंने कहा है कि अभी अस्थायी पद होगा. यदि ठीक से काम करेगा तो स्थायी कर दिया जाएगा.’

‘रहने दो एहसान करने को. खबरदार, जो मेरे लिए किसी से बात की. मैं घर छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा. दोनों चैन से रहना.’

घर में सन्नाटा छा गया था. सोम पत्थर की मूर्ति की तरह वहीं कुरसी पर बैठे थे. थोड़ी देर में स्थिति संभालने के लिए मैं ने दीप को सम झाने का प्रयास किया, ‘बेटा दीप, तुम्हारे पापा कोशिश में लगे हैं, सब ठीक हो जाएगा. गुस्सा थूको, मेरा बच्चा भूखा है. आओ, मैं खाना गरम करती हूं.’

दीप मुझे धक्का दे कर बोला, ‘हट जाओ मेरे सामने से. बदमाश कहीं की. मैं तुम लोगों का मुंह भी नहीं देखना चाहता.’

सोम ने मुझे जमीन से उठाया और चुपचाप हम अपने कमरे में आ गए. रात में सोम बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगे. बोले, ‘सुजाता, मैं ने ही उसे बिगाड़ा है. हमेशा उसे अपनी असलियत से दूर ख्वाबों की दुनिया में ही रखा. ब्रैंडेड शर्ट, जूते, बैग आदि ला कर देता रहा. स्वयं स्लीपर में चलता परंतु उस को एसी का टिकट ला कर देता. सिया और दिया ने उस को ऊंचेऊंचे सपने दिखाए. वही बेटा, आज मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गया है. यदि मैं तुम्हारा कहा मानता तो आज यह दिन न देखने पड़ते,’ हम दोनों रातभर रोते रहे.

अगली सुबह ये सब बातें जब मैं ने सिया को बताईं तो सिया और समीर गाड़ी ले कर आए और हम दोनों को डाक्टर को दिखाने के बहाने ले कर आ गए. दीप सुबह ही घर से कहीं चला गया था.

तभी अचानक श्याम भैया के रोने की आवाज से सुजाता की तंद्रा टूटी. दिया और सिया आपस में लिपट कर फफक पड़ी थीं. श्याम सोम के पैरों पर पड़े रो रहे थे.

लुटापिटा सा दीप भी साथ में ही आया था, पापा के पैरों से लिपट कर चिल्लाचिल्ला कर माफी मांग रहा था.

तभी सुजाता कड़कती आवाज में बोली, ‘खबरदार, यदि तुम ने उन के शरीर को हाथ लगाया. मेरे लिए तुम मर चुके हो. अपने पति की अंतिम क्रिया मैं करूंगी.’

उसी समय सोम के औफिस से उन के बड़े साहब सुरेशजी और 4-5 सहयोगी एक गाड़ी से उतरे. वे आपस में फुसफुसा कर बातें कर रहे थे, ‘बड़े बाबू के रिटायरमैंट में अभी 6 महीने बाकी थे अत: वे जातेजाते भी अपने बेटे की नौकरी का जुगाड़ पक्का कर गए.’

यह सुनते ही सुजाता की सूनी आंखों से झरना बह उठा.