एक दिन जब मोनिका ने अपने पति डा. सुधीर से कहा था, ‘‘शादी होने से ही अगर आप यह समझ लें कि मैं आप की दासी बन गई हूं तो यह आप की गलतफहमी है. मैं आजादखयाल औरत हूं और मर्द की ताबेदारी में रह कर अपनी जिंदगी सड़ा देने के खिलाफ हूं,’’ तब सुधीर थोड़ी देर हक्काबक्का सा रह गया था. फिर उस ने उसे समझाते हुए कहा था, ‘‘मैं समझा नहीं, मोनिका. तुम्हें किस बात का कष्ट है? इतना बड़ा मकान है, कार है, अपने लड़के जैसी उम्र का देवर है. और अब तो हमारी एक छोटी सी बच्ची ऋचा भी है. सभी तो तुम्हारा मुंह जोहते रहते हैं. हां, मैं जरूर जरा व्यस्त रहता हूं डाक्टर होने के नाते,’’ फिर जरा सूखी हंसी हंसते हुए उस ने यह भी जोड़ दिया, ‘‘और रही मर्द की ताबेदारी, सो, मोनिका, मेरे घर में तुम्हीं एक ‘मर्द’ हो. मैं तो एक परछाईं भर हूं.’’

मोनिका ने कुछ तल्खी से कहा था, ‘‘ये सब तुम मर्दों की चालाकी भरी बातें हैं. असलियत में ये सबकुछ, जो तुम ने गिना डाला, तुम्हारा है, तुम्हारा काम है. मैं अगर उस में फंसी रहूं तो वह मेरे लिए बंध जाना मात्र हुआ. मैं तुम्हारी बातों में भूली रह कर इस बंधन में पड़ी रहूं तो मैं ने अपने लिए, अपना काम क्या किया. आधुनिक स्त्री, मर्द की इस धोखाधड़ी को पहचान गई है. इसीलिए तो उस ने नारीमुक्ति का नारा बुलंद किया है. मैं ने जब शादी की तब तक बंधन के स्वरूप से परिचित न थी पर अब मैं खूब जान गई हूं और इसीलिए मैं मुक्ति की ओर जाना चाहती हूं, समझे, डाक्टर साहब?’’ सुधीर के मुख पर मुसकान आ गई थी, वह शायद अपने भीतर के तनाव को हलका करने का प्रयत्न कर रहा था. ‘‘समझा तो मैं अब भी नहीं. मैं ने अब तक सुन रखा था कि पुरुष के लिए स्त्री ही बंधनस्वरूप है. परंतु आज की स्त्री यदि कहे कि नारी के लिए पुरुष एक बंधन है और उस से उसे मुक्ति चाहिए तब तो मुझे सचमुच समझ में नहीं आता कि यह मुक्ति क्या बला है. खैर, तुम मेरी तरफ से आजाद हो. जो भी चाहो, कर सकती हो, जहां भी चाहो, रह सकती हो.’’

फिर सुधीर धीरे से, जैसे अपने को समझा रहा हो, बोला, ‘‘यह मुक्ति अगर कोई मर्ज, कोई सनक या फिसड्डीपन है, तब तो लक्षण पूरे प्रकट हो जाने पर ही इस का इलाज संभव है,’’ उस ने मोनिका के मुकरते हुए मुख पर ध्यान न दिया था. इसी के बाद तो डाक्टर सुधीर और उन की पत्नी मोनिका के रास्ते अलगअलग हो गए थे. मोनिका के लिए समाज में अपना स्थान बनाना कठिन काम न था. वह अत्याधुनिक विचारों वाली और उच्चशिक्षिता थी, किसी से मिलनेजुलने, हंसनेबोलने में कोईहिचक नहीं, जैसा रूपरंग उजला, उतनी ही आला काबिलीयत. एक विख्यात प्राइवेट कंपनी के जनसंपर्क अधिकारी के पद के लिए आवेदन करने पर उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. डायरैक्टरों के सामने उस ने शीघ्र ही सिद्ध कर दिया कि उम्मीदवारों में वह सर्वश्रेष्ठ है. अन्य बातों पर ध्यान देते हुए जब पता चला कि वह डाक्टर सुधीर की पत्नी है तो डायरैक्टरों ने बगैर विमर्श के उस को पद के लिए मनोनीत घोषित कर दिया.

उन में से एकदो ने शक करते हुए जाहिर किया कि डाक्टर सुधीर जैसे सुविख्यात व्यक्ति की पत्नी होते हुए भी मोनिका को नौकरी की क्या जरूरत पड़ गई तो उन्हीं में से एकदो ने उस का उत्तर भी दे दिया कि स्त्री अपनी सुशिक्षा और योग्यता को घर की चारदीवारी में बंद कर के सड़ा दे क्या? नौकरी लग जाने के बाद मोनिका ने अपने को पूरी तरह से नए काम के सिपुर्द कर दिया. वह अपने कर्तव्य का बड़ी सावधानी से, बड़े मनोयोग से पालन करती, यथासंभव अपने काम में कोई कमी न रहने देती. यही नहीं, इस बात की भी चेष्टा करती कि जो काम वह हाथ में ले वह उच्चाधिकारियों की आशा से अधिक सफल हो. इस कारण उस के अधिकारी उस से बहुत खुश थे तथा उस के ऊपर काफी जिम्मेदारी के काम डालते रहते थे. इस तरह मोनिका काफी व्यस्त रहती थी. अपने घर लौटने या परिवार के साथ कुछ समय बिताने में भी उसे कोई विशेष रुचि न थी. उस की छोटी बच्ची ऋचा को उस की समीपता का अधिक सुख न मिल पाता था. मोनिका के घर लौटने या खानेपीने का कोई निश्चित समय न रह गया था.

सुधीर को इस विषय में कोई फिक्र न थी. उस ने तो अपने को मोनिका के व्यक्तित्व से अलग करने का निश्चय ही कर लिया था. परंतु घर वाले उदास हो जाते, जब वे मोनिका को सारे दिन की भागदौड़ के बाद थकान से चूर हो कर पड़ते देखते. सुधीर स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के विकास में पूरी सुविधा देने का कायल था. मोनिका के साहस की वह मन ही मन सराहना करता. परंतु साथ ही उस के मन के किसी कोने में यह भी था कि मोनिका छोटी सी सफलता से ही संतुष्ट हो कर अपनी कार्यशक्ति को कुंद कर ले या अपने दायित्व की गुरुता से टूट कर अपना पैर पीछे हटा ले, इसलिए उस ने मोनिका को एक झटका देना चाहा. एक दिन मोनिका के कमरे में जा कर सुधीर ने पूछा, ‘‘कहो, कामधाम कैसा चल रहा है?’’ मोनिका गर्वित स्वर में बोली, ‘‘आप क्या मेरी हंसी उड़ा रहे हैं. मैं आप के बराबर चाहे कमाई न करती हूं परंतु काम के मामले में कंपनी के डायरैक्टर तक मेरा लोहा मानते हैं.’’

सुधीर ने हंस कर कहा, ‘‘कुछ भी हो, पर तुम्हारे डायरैक्टर्स मुझे ज्यादा जानते हैं.’’ मोनिका ने झपट कर कहा, ‘‘क्या मतलब?’’ ‘‘मतलब साफ है. यह मैं नहीं कहता कि तुम्हारा महत्त्व नहीं है, परंतु इस बात का भी महत्त्व है कि तुम डाक्टर सुधीर की पत्नी हो. वह डाक्टर सुधीर, जिस ने यहां के समाज में ऊंची प्रतिष्ठा बना ली है.’’

‘‘मैं पूछती हूं कि आप साफसाफ क्यों नहीं कहते कि आप तलाक चाहते हैं?’’

‘‘मेरा कहना है कि यदि तुम्हें मुक्ति की चाह है तो पूरी मुक्ति पा लो. अभी तो तुम खूंटे से बंधी हुई उस गाय की तरह हो जिस की रस्सी लंबी कर दी गई हो, और जो घूमघाम कर फिर खूंटे पर लौट आती हो. यह खूंटा, चाहे नाम का ही हो, नहीं रहना चाहिए.’’ मोनिका सन्न रह गई. उस की छाती के भीतर एक गोला उठा और गले पर आ कर अटक गया. आंखों के कोने पर जैसे कांटा चुभा, आंसू की बूंद छलकने को हुई कि वह संभल गई. उस ने सूखे स्वर में कहा, ‘‘आप ठीक कहते हैं.’’ दूसरे दिन जब मोनिका औफिस गई तो घर यानी कि डाक्टर सुधीर के मकान पर नहीं लौटी. कमाई उस की अच्छी थी ही, उस ने कामकाजी महिलाओं के होस्टल में एक कमरा ले लिया. परंतु उस के मन में शांति न थी. भीषण प्रतिक्रिया के आवेश में उस का मन अस्थिर रहता. सो, उस से बचने के लिए वह अपने को अधिक व्यस्त रखने लगी. उस ने अपने दफ्तर में ज्यादा जिम्मेदारी और वक्त की मांग करने वाले काम लेने शुरू कर दिए. यह चीज उस की उन्नति की दशा में सार्थक सिद्ध हुई. इस से कंपनी के संचालक वर्ग के बीच उस की प्रतिष्ठा भी बढ़ी.

दफ्तर के घंटे के बाद अपनेअपने घर की तरफ भागने की जल्दी सब को ही रहती है. काम से ज्यादा लदे हुए व्यक्तियों को जरूरी काम पूरे करने के लिए मजबूरन देर तक ठहरना पड़ता है. मोनिका को यदि उन चंद व्यक्तियों में गिना जाए, तब तो ठीक ही है. पर देर से उठने पर भी जहां दूसरे झटपट अपने घर पहुंचना चाहते थे, मोनिका के लिए तब भी कोई जल्दी न होती और तब उस के चेहरे पर एक अव्यक्त उदासी छा जाती. स्त्रियों के होस्टल में अकसर वही स्त्रियां रहती हैं जिन के घर कहीं दूर या

दूसरे शहर में होते हैं और वे नौकरियां इस शहर में करती हैं. अधिक बड़े परिवार की सदस्याएं भी कभीकभी आवास समस्या के कारण होस्टल में आ ठहरती हैं तथा इस प्रकार अपने घर में जगह की तंगी को पूरा करने की चेष्टा करती हैं. इन सब की अपनी मंजिलें हैं, निजी दायरे हैं, सगेसंबंधी हैं. ये सभी होस्टल में रह कर भी एक दूरी से निकटता का अनुभव करते हुए अपनेआप को उन के नजदीक पाती हैं, अपने मांबाप, भाईबहन, बच्चे या पति की बातें करती रहती हैं.

हां, कुछ औरतें उस के होस्टल और दफ्तर, दोनों जगह ही थीं, जो उस के गुट में कुछकुछ फिट बैठ पाती थीं. वे सुशिक्षित कुमारिकाएं, जो विवाह बंधन में अभी तक न बंधी थीं तथा अपने को उन्मुक्त विचारों वाली आधुनिकाएं मानती थीं या फिर वे कार्यकुशल महिलाएं जो निश्ंिचत निर्द्वंद्व हो कर आगे बढ़ना चाहती थीं. परंतु सिद्धांत रूप से वे दोनों भी उस की धारणा के स्तर से नीची ही थीं, क्योंकि आधुनिकाओं का लक्ष्य था, ग्लैमर तथा कैरियर. मोनिका अकसर खीझ उठती थी कि पुरुष की गुलामी में घिसटती हुई यह स्त्री क्या अभी भी मुक्ति की तड़प का अनुभव नहीं कर पा रही है? साजशृंगार कर मर्द को रिझाने या तलवे चाट कर मर्द की खुशामद करने में ही स्त्री जीवन की सार्थकता क्यों मान रही है? कंपनी के कर्मचारियों का अपने बीच ही नहीं, संचालकों के साथ भी काफी सहृदयतापूर्ण व्यवहार था. वे सभी आपस में बड़े सद्भाव से हंसतेबोलते तथा सामाजिक अवसरों पर मिलतेजुलते थे. इसलिए मोनिका का दैनिक जीवन किसी प्रकार की नीरसता से नहीं गुजर रहा था. उसे अकसर कभी चायपार्टी के, कभी भोजन के, किसी के त्योहार के, किसी के उत्सव आदि के निमंत्रण मिलते ही रहते थे. वह उन सब में शरीक भी होती थी.

हरीश के घर में एक ऐसे ही सम्मेलन के मौके पर परिचय के समय हरीश ने जब यह कहा, ‘‘आप, मोनिकाजी हैं, डाक्टर सुधीर की श्रीमती,’’ तो श्रीमती उमा झट से बोलीं, ‘‘वाह, बड़ी खुशी हुई. डाक्टर सुधीर नहीं आए?’’ और मोनिका के कान लाल हो उठे. उस ने कहा, ‘‘क्यों, सिर्फ मेरा आना काफी नहीं है क्या?’’ तब हरीश को अपनी गलती का भान हो गया, तुरंत बात बनाने की कोशिश में बोला, ‘‘क्यों नहीं, इन्होंने तो ऐसे ही पूछ लिया.’’

मोनिका ऊपर से हंसते हुए भी भीतर के तनाव को स्पष्ट करते हुए बोली, ‘‘वह मैं समझती हूं, मिस्टर हरीश. क्या किया जाए, संस्कार ही ऐसे घुसे हैं कि स्त्री का अस्तित्व पुरुष के बिना अधूरा ही माना जाता है.’’कंपनी का एक युवा अधिकारी लोकेश नायक, जो अपनी तत्परता और हंसमुख प्रकृति के कारण बड़ा लोकप्रिय था, टोकते हुए बोला, ‘‘मैं आप के दृष्टिकोण की कद्र करता हूं, मोनिकाजी, बहुत योग्य और अति आधुनिक विचारों वाली स्त्री अपने पैरों पर खड़ी होने के बाद भी, जब अपने व्यक्तित्व को स्वतंत्र नहीं महसूस कर पाती तो यह बात विचारणीय हो जाती है.’’ लोकेश और मोनिका के मतैक्य ने उन के बीच अनायास ही मैत्रीभाव का सृजन कर दिया. दोनों अकसर साथसाथ देखे जाते. कभी दफ्तर में आते समय, कभी जाते समय. कभी लंच के समय, कभी चाय के समय, धीरेधीरे औफिस में ऐसी सामान्य धारणा बन गई कि जिस स्थान पर एक होगा, वहां दूसरे को भी होना चाहिए.

उस दिन सिनेमा के संध्या शो के बाद लोकेश और मोनिका, दोनों कार की सामने वाली सीट पर बैठे जा रहे थे. लोकेश कार चला रहा था. अन्यमनस्क सी मोनिका चुपचाप थी. लोकेश ने उस का मौन भंग करने की एकदो बार कोशिश की, पर वह हूं-हां कर के ही रह गई. जाने किस आवेग के वश लोकेश ने बायां हाथ मोनिका की कमर में डाल कर उसे अपनी ओर खिसका कर सटा लिया.मोनिका ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. उन दोनों के विषय में बाहर चाहे जिस तरह की अफवाहें जुड़ी हों, पर सच यह था कि संगसंग रहते हुए भी किसी ने दूसरे का स्पर्श कभी न किया था. सो, आज लोकेश ने जब हाथ लगाया तो मोनिका आश्चर्य में आ गई. वह क्रुद्ध तो न हुई, पर असमंजस में पड़ गई.

सरिता विशेष

मोनिका ने धीरे से पूछा, ‘‘घर पहुंचने की जल्दी तो नहीं है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो कार रिट्ज होटल के पोर्च में छोड़ दो. चलो, ऊपर खाना खाएंगे.’’खाना खाते समय मोनिका ने सवाल किया, ‘‘क्या सोच कर आप ने वैसी हरकत की?’’ लोकेश शायद तब तक इस प्रश्न के लिए तैयार हो चुका था, बोला, ‘‘अगर कहूं कि वह तो हमारी बढ़ती हुई घनिष्ठता को व्यक्त करने का एक ढंग है तो?’’

‘‘तो मैं पूछूंगी कि इस प्रकार के कितने ढंग आप को आते हैं?’’ तब लोकेश गड़बड़ा गया. कुछ बोल न सका.

‘‘लोकेशजी, आप मुझ से शादी करेंगे?’’

‘‘मोनिकाजी,’’ लोकेश बेसाख्ता बोल पड़ा.

‘‘क्यों, चौंक क्यों गए?’’ मोनिका ने कहा, ‘‘स्त्रीपुरुष की घनिष्ठता चरम सीमा पर पहुंच कर तो शादी ही बच जाती है न? तो आप करेंगे मुझ से शादी?’’

‘‘पर आप तो पहले से ही शादीशुदा हैं.’’

‘‘आप जानते हैं कि मैं डाक्टर सुधीर से अलग हो चुकी हूं.’’

‘‘कुछ भी हो, मोनिकाजी, पर मैं आप से शादी करने की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’

अब मोनिका हंसने लगी, ‘‘क्यों? आप को कोई ताजा माल, कोई नईनवेली चाहिए?’’

‘‘आप मेरा मजाक उड़ा रही हैं,’’ लोकेश क्रोधित हो कर बोला, ‘‘मैं तो केवल आप के वक्त में सहायक होना चाहता हूं. आप ने नारा बुलंद किया है कि ‘पुरुष स्त्री का शोषक है. स्त्री को उस के शोषण से मुक्त होना चाहिए. अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए स्त्री को उस शोषण से मुक्त होना चाहिए.’ अब आप यदि पुरुष की नकल में एक को छोड़ कर दूसरे से, फिर उस के बाद तीसरे या फिर चौथे से विवाह करती हैं, तब तो आप का फिर से उसी परतंत्रता के बंधन में पड़ जाना हुआ, जिस से आप आजाद होना चाहती हैं. स्त्री मुक्ति के सिद्धांत की चरम सीमा क्या यही है? और यही है तो डाक्टर सुधीर में किस बात की कमी थी?’’ मोनिका के दिमाग में लोकेश की बातें बड़ी देर तक झनझनाती रहीं. इस के बाद मोनिका में कुछ परिवर्तन आ गया. ऐसा नहीं कि कंपनी के काम में उस की कुछ रुचि या तत्परता कम हो गई. ऐसा भी नहीं कि लोकेश के साथ उस की घनिष्ठता में कमी आ गई. वास्तविकता यह थी कि कंपनी के कारोबार में उस की अंतर्दृष्टि में और भी तीक्ष्णता आई, जिस के कारण उसे और भी उच्चपद पर प्रतिष्ठित कर दिया गया. लोकेश की मैत्री पूर्ववत थी. हां, उस के व्यवहार में गंभीरता और सदाशयता की मात्रा बढ़ गई थी, तथापि उस के व्यक्तित्व जीवन में असंतोष की छाया बनी रही.

कारोबारी वार्त्तालाप में उस की वाक्पटुता का लोहा कंपनी के दूसरे अधिकारी भी मानते थे. इसी संबंध में एक विदेशी पार्टी के प्रतिनिधि के साथ सौदा पटाने का काम उसे सौंपा गया. कार्लटन होटल के एक वातानुकूलित शानदार कमरे में मोनिका जिस समय पहुंची, वहां कई लोग पहले से मौजूद थे. सभी भारी गद्दी वाले सोफों में धंसे बैठे हुए थे और उत्कंठा से एक हसीन व तेजतर्रार महिला की एक निगाह के लिए व्यग्र थे तथा बीचबीच में अपने बैग और फोल्डर्स खोल कर विज्ञापन, परचे आदि देखते, सजाते और पेश करने के लिए तैयार कर लेते.मोनिका समझ गई कि यह महिला मिस्टर स्टियक्स बांबेल की सचिव है. मिस्टर बांबेल एक विख्यात जरमन कंपनी के पार्टनर थे, जो कारोबार के लिए कई देशों का दौरा करने के क्रम में भारत आए थे. यह एक अच्छा मौका था उन कंपनियों के लिए, जो अपना माल जरमनी के बाजारों में पहुंचा देने के लिए उत्सुक थे.

महिला का नाम था मिस दवीदो. नाकनक्श बहुत तीखे. बहुत फिट बैठने तथा खूब फबने वाले कपड़े पहने मिस दवीदो बड़ी तेजी से अपने काम को अंजाम दे रही थी. अपनी बारी आने पर मोनिका ने अपनी कंपनी की विनिर्मितियों का सारा विज्ञापन साहित्य मिस दवीदो के सामने सजाते हुए रख दिया. मिस दवीदो एकएक कर के फर्राटे से वे सभी पढ़ती जाती और चमकते नैनों से मोनिका को देखती, सिर हिलाती जाती तथा हंसते या मुसकराते हुए अस्फुट स्वर में ‘चार्मिंग, मार्वेलस’ आदि कहती और बीचबीच में मोनिका के कंधे, पीठ पर हाथ भी थपथपाती जाती. मोनिका केवल मिस दवीदो के स्तर तक ही नहीं अटक जाना चाहती थी. वह उस व्यक्ति बांबेल को भी देखना चाहती थी, जिस की निजी सचिव इतनी खूबसूरत और तेजतर्रार थी. मिस दवीदो जैसे मन की बात पढ़ लेती थी. उस ने पास रखे फोन को उठा कर कुछ सांकेतिक भाषा में बात की, और फोन रखते हुए मोनिका से कहा, ‘‘आप मिस्टर बांबेल से भी मिल सकती हैं.’’ मिस्टर बांबेल का कक्ष छोटा था, पर खूब सजा हुआ था. उस की हर चीज के बेशकीमती होने का एहसास उस कक्ष में घुसते ही होने लगता था. आलीशान मेज और कुरसियां और जाने क्याक्या. सबकुछ आलीशान और उस का स्वयं का व्यक्तित्व भी कम न था. एक ऊंचा कद वाला पुरुष, जिस के अंगप्रत्यंग से आकर्षण की लाली फूटी पड़ती थी तथा चेहरे पर सौम्यता व सहजता थी. उस ने अपना गदीला हाथ मोनिका की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप से मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई, मिस मोनिका.’’

मोनिका के दिमाग में ‘मिस’ शब्द खटाक से बजा और उस का दायां हाथ बांबेल के हाथ की गरमी महसूस कर रहा था. उस शब्द और उस हाथ के द्वारा जैसे मोनिका का सारा व्यक्तित्व पिघल कर किसी दूसरे सांचे में ढाला जा रहा था. मोनिका उस के कहने पर कुरसी पर बैठ गई और अपने कागजपत्र निकालने लगी. पर बांबेल को वह सब देखने में रुचि न थी. बांबेल ने कहा, ‘‘पिछली बार जब मैं आया था तब आप मिस्टर बागला की कंपनी में नहीं थीं क्या? लेकिन हो भी तो गया बहुत अरसा. मैं 5 साल पहले आया था.’’ बांबेल की बात का उत्तर देते हुए मोनिका की आंखों के आगे अपने मैनेजिंग डायरैक्टर फकीरचंद बागला का नक्शा खिंच गया.

बांबेल ने कहा, ‘‘बागला को देखिए तो सब से पहले उस की तोंद पर ही निगाह जाएगी और फिर उस के सपाट, गंजे सिर पर,’’ बांबेल अपनी इस बात पर उसे मुसकराते देख खुद भी मुसकराया. फिर उस ने जाने कहां कौन सा बटन दबाया कि उस की बगल में झलमल करती शीशे की एक छोटी सी अलमारी उभर आई. उस में विदेशी मदिराओं की रंगबिरंगी बोतलें कोई आधी, कोई पूरी भरी हुई सजी थीं. साथ में कई आकारों के क्रिस्टल कांच के गिलास भी थे. मोनिका का दिमाग शांशां करने लगा. वह समझ चुकी थी कि बांबेल भी उन लोगों में से है जो नशे की गंदी आदत को अपने बिजनैस का जरूरी हिस्सा समझते हैं. उस की नजर उधर न उठी.

‘‘आप क्या लेंगी?’’ बांबेल ने पूछा.

‘‘धन्यवाद, कुछ नहीं.’’

‘‘ओहो, मौडेस्टी,’’ बांबेल ने खुले दिल से आमंत्रित करते हुए कहा, ‘‘आइए, हम व्यापारी हैं. साथसाथ एंजौय करना हमारे व्यापार का एक हिस्सा है. देखिए, अब न नहीं करना. आप के लिए बहुत हलका पैग बनाया है,’’ और इस बीच अपनी इच्छा से जो 2 गिलास उस ने तैयार कर लिए थे उन में से एक मोनिका के सामने बढ़ाया, ‘‘आइए, अपने स्वास्थ्य और खुशी के लिए एकदो पैग लें…’’ मोनिका थोड़ीथोड़ी सिप करते हुए भी चिंतित थी. वह माल के विज्ञापन साहित्य की ओर बारबार देखती और फिर कुछ निराश सी हो जाती. बांबेल ने उस की हालत की हंसी उड़ाई.

‘‘आप अपने माल की बिक्री के लिए चिंतित हैं, मिस मोनिका. हम लोगों का सब से बड़ा व्यापार है आपस में एकदूसरे को खरीदना. मालसामान की बात क्या है? वह तो बाजार में खपता है. लोगों को चीजों की जरूरत है, उन को देना हमारा काम है और जो उन्हें देना है, उसे आप सब से खरीदना भी हमारा काम है, इसलिए उस सब को तो हमें लेना ही है. लेकिन असली व्यापारिक सफलता है, हमारा आप का मेल, हमारा आप का एक दिलदिमाग होना.’’ बांबेल अपनी कुरसी से उठ गया था और कमरे की उस थोड़ी सी जगह में टहलने लगा था, ‘‘तुम अच्छी हो, मिस मोनिका, और बहुत अक्लमंद भी,’’ उस ने मोनिका के कंधों पर हाथ रखा और उठा लिया. फिर एक चक्कर में उस ने मोनिका के कंधे छूते हुए गले को सहलाया, ‘‘तुम सचमुच अक्लमंद लड़की हो,’’ बांबेल धीमेधीमे बोलता रहा, ‘‘उन्नति के लिए ‘इस हाथ दो, उस हाथ लो’ की नीति सब से अच्छी होती है, तुम निश्चित ही उन्नति करोगी, मोनिका.’’

मोनिका के ऊपर जैसे नशा छाता जा रहा था. पर अंतर में कहीं विवेक उसे बारबार कुरेद रहा था. मादकता में आकंठ निमग्न होने की दिशा में और आगे कदम बढ़ाने के पहले उस ने सवाल किया, ‘‘क्या आप मिस दवीदो को भी ऐसे व्यापारिक सौदे के लिए भेजते हैं?’’

‘‘हमें भेजना नहीं होता है. यह उस का कर्तव्य है,’’ बांबेल ने कहा.

‘‘ओह,’’ मोनिका ने होंठों में ही कहा. असल में वह अपने भीतर उस सामर्थ्य को संजो रही थी, अपने मनोसंस्कारों के उस कवच को तोड़ने का साहस तौल रही थी, जो उस की समझ में अन्य स्त्रियों की उन्नति की दिशा में अग्रसर होने से रोकते हैं.

‘‘आप इतनी झिझकती क्यों हैं?’’ बांबेल अपनी धीमी नशीली आवाज में बोला, ‘‘क्या आप सोचती हैं कि आप किसी के दबाव में हैं अथवा कि किसी मजबूरी में आप का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है?’’ तब तक बांबेल कई कदम आगे बढ़ गया था. मोनिका का जिस्म पत्ती की तरह कांप रहा था तथा आंखों के सामने सब धुंधला सा हो गया था. वह कमजोर हाथों से बांबेल के प्रश्नों का निवारण करती हुई, ‘‘मिस्टर बांबेल, मुझे सोचने का समय दें,’’ कहते हुए भी कहीं अंतर में इस भव्य विदेशी व्यक्तित्व के प्रति भीषण आकर्षण के बहाव में बही जा रही थी. साथ ही, अपने को समझाबुझा रही थी कि यदि स्त्री को सचमुच पुरुष के शासन से मुक्त होना है तो उसे अपनी अंत:प्रेरणा को आंतरिक प्रतिरोधों के चंगुल से छुड़ाना होगा.

बांबेल अपने प्रभावी स्वर में कहता रहा, ‘‘चीजों को उन के सही परिप्रेक्ष्य में देखिए, मिस मोनिका. आप नारियां अपनेआप को सदैव भोग्या के रूप में क्यों मानती हैं? पुरुष के समान ही आप भी मानव सृष्टि की एक प्रबल हस्ती हैं. उसी आधार पर अपने को भोक्ता के रूप में देखिए. दुनिया के इस नीलाम घर में आप स्वयं को हमेशा नीलाम पर चढ़ी हुई ही क्यों महसूस करती हैं? अपने को नीलाम की बोली बोलने वाले या चीजों को खरीदने वाले के रूप में क्यों नहीं पेश कर पाती हैं आप? इस संसार में जो खरीद सकता है, वही बलिष्ठ है, वही मुक्त है.’’ मोनिका की आंखें मुंदी हुई थीं. वह बांबेल की बांहों में बंधी हुई किसी कल्पना लोक में पहुंच गई थी तथा उस के गाढ़े चुंबन का वैसा ही प्रत्युत्तर दे रही थी. पूरे माहौल में एक रोमानी भीनी सुगंधि बसी थी. पर कुछ क्षणों में बांबेल ने बिलकुल व्यापारिक ढंग से अपने को अलग कर लिया और मोनिका के गालों को थपथपाता हुआ बोला, ‘‘हम लोग फिर कभी और खुलेरूप में मिलेंगे, बाय.’’

मोनिका की बुद्धि को जैसे नई दृष्टि प्रदान कर दी जरमन व्यवसायी ने. मोनिका ने अपनी मुक्ति के मार्ग में जैसे नया आलोक पा लिया हो. उस के पास शिक्षा थी, दक्षता थी, वाक्पटुता थी और थी सुंदरता. उस की महत्त्वाकांक्षा अब पंख लगा कर उड़ चली थी. धीरेधीरे उस कंपनी में मोनिका एक के बाद दूसरे उच्चपद पर प्रतिष्ठित होती गई. धाक जमाती गई. यहां तक कि वह भी मिस्टर बांबेल की भांति अनवरत अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर रहने लगी. उस का एक पैर मुंबई में होता तो दूसरा कोलकाता में. यदि आज वह टोकियो जा रही है तो कल बेरूत, परसों न्यूयार्क और नरसों हैंबर्ग. अब वह भी कंपनी की एक डाइरैक्टर थी. फकीरचंद बागला मर चुका था. अब उस का लड़का नरेशचंद कंपनी का प्रबंध संचालक था. अवकाश के एक दिन मोनिका ने अपने विगत जीवन पर एक विहंगम दृष्टि डाली, एक आत्मचिंतन किया. इतने बड़े विलासपूर्ण फ्लैट में मोनिका अकेली ही रहती थी. कुछ नौकरनौकरानियां, जो हमेशा उस की आज्ञा का पालन करने को खड़े रहते, और कोई नहीं. अपनों के नाम पर उस के मित्र और सहकर्मी थे. उन के भतीजे, लड़के उसे आंटी कह लेते. यही एक आत्मीयता का संबोधन उसे सुनने को मिलता.

उस का उद्देश्य था मुक्ति. लेकिन कौन सी मुक्ति और किस से? उस ने पैर बाहर निकाले थे, पुरुष से मुक्ति का विधेय ले कर. लेकिन उस मुक्ति का स्वरूप क्या ऐसा ही होता है? उस ने तो नकल की है. उस ने वही किया है जो एक पुरुष करता. यानी उस का सारा प्रयत्न केवल पुरुष बनने तक सीमित रह गया. यहां तक कि उस ने अपने स्त्रीत्व का वह अंश भी दांव पर लगा दिया, जो स्त्री का एकमात्र मूलधन है. यह कैसी मुक्ति हुई स्त्री के लिए कि जिस की परिणति है केवल पुरुष तुल्य बन जाना. क्या यही इस मुक्ति की चरम सीमा है? यही सीमांत है?स्त्री ने किस मंतव्य को ले कर पुरुष से मुक्ति का नारा लगाया है. क्या पुरुष की जगह लेने के लिए? क्या पुरुष को अपदस्थ करने के लिए? क्या पुरुष को इस संसार से ढकेल कर किसी अतल गहराइयों में गिरा देने के लिए, ताकि वह अकेली रह जाए. यदि वह अकेली रह सकती है तो पुरुष की प्रेयसी बनने, विवाह करने की इच्छा क्यों? संतान की कामना क्यों? मातृत्व का स्वप्न क्यों?

या फिर कि स्त्री की आकांक्षा है कि पुरुष उस का गुलाम बन कर रहे. पुरुष की हस्ती को अपने इशारों पर नाचने वाली पुतली के रूप में ला कर, स्त्री उस से घर के, बाहर के सारे कामकाज, सारी टहल कराए, अपनी परिचर्चा में खड़ा रखे, अपनी मरजी से उठाएबैठाए. यह क्या स्त्री की किसी खिलंदड़ी प्रकृति का तकाजा है? या कि फिर घोर प्रतिकार के रूप स्त्री ऐसा चाहती है? यदि हां, तो किस का प्रतिकार? पुरुष के अन्यायों, अत्याचारों का? तो स्त्री अभी भी पुरुष विषयक विचारों से ही बंधी है, तो मुक्ति क्या हुई? आज कितने समय के बाद मोनिका को अपने पति की याद आई, साथ ही अपनी छोटी सी बच्ची ऋचा की भी. ‘डाक्टर सुधीर बूढ़े हो गए होंगे. ऋचा पढ़लिख कर कोई काम कर रही होगी, या फिर उस की शादी हो गई होगी.’ मुक्ति के नशे में मोनिका ने उन के बारे में जरा सा सोचना भी पराधीनता की बात मानी थी. सो, उस ने सच ही कभी भूले से भी उन की याद नहीं की, और यदि कभी कोई अंश उस के मन में उठा तो बलपूर्वक मन को मोड़ लिया. बड़े ही आत्मअनुशासन से उस ने ‘पुरुष से मुक्ति’ के व्रत का निर्वाह किया था परंतु आज उसे वह व्रत निरुद्देश्य और निष्फल लगने लगा था.

सरिता विशेष

डाक्टर सुधीर अपने दवाखाने के बरामदे में एक आरामकुरसी पर लेटे हुए थे. एक स्वच्छ सफेद कुरता, हलकी महीन धोती तथा आंखों पर जामुनी रंग के फ्रेम का चश्मा. कुरसी के पास ही उन की चप्पलें पड़ी हुई थीं, उन की निगाह चारों ओर घूम रही थी. चुस्त, लेकिन सादे लिबास में एक हंसमुख लड़की, रोगियों की परीक्षा करती और नुसखे लिख रही थी. डाक्टर सुधीर के लिए, गंभीर रोगियों की अवस्था पर, ऋचा को सलाह देने का काम मात्र रह गया था. एकाएक उस स्थान पर एक भीनी खुशबू व्याप्त हो गई. अंतिम मरीज का नुसखा लिख कर उसे थमाते हुए ऋचा की और साथ ही सुधीर की नजर एकसाथ उठी. एक हलके रंग की मामूली साड़ी, सादी सी चप्पलें पहने हुए मोनिका द्वार पर आ कर खड़ी थी. ऋचा के मुख से फुसफुसाते स्वर में निकला ‘मां’ और वह दौड़ कर पिता के पीछे जा खड़ी हुई, जैसे मोनिका उसे पकड़ ले जाएगी.

सुधीर ने अपने चश्मे के भीतर आंखें फैला कर देखा, ‘‘मोनिका.’’ बहुत धीमे अस्फुट स्वर में निकला उन के मुंह से और नेत्रों में आंसू उमड़ने लगे.

मोनिका की आंखों से भी अश्रुधारा बह रही थी, जिस से उस के सामने की साड़ी कुछ भीग गई. ऋचा अपने पिता के बालों में उंगलियां फिराती हुई होंठ बिसूरती थी, बहुत चेष्टा कर के रोकने पर भी उस की सिसकियां निकल पड़ती थीं. मोनिका दुख के अत्यधिक भार से जैसे थक कर बरामदे में बैंच पर बैठ गई और अपने अंदर के हाहाकार को मुख में साड़ी ठूंस कर दवा देने की व्यर्थ कोशिश करती रही. सुधीर ने चंद मिनटों में अपने को स्वस्थ कर लिया, ‘‘क्या बात है, मोनिका? तुम पैदल ही आई हो क्या? गाड़ी पर क्यों नहीं आईं? या छोड़ दी है कहीं?’’

‘‘गाड़ी होटलों और पार्टियों में जाने के लिए है. आज तो घररूपी मंदिर में आई हूं.’’

‘‘बेटी, जरा एक कौफी तो बना लाना,’’ ऋचा से सुधीर ने कहा, ‘‘कुछ भी हो, मोनिका, मैं तुम्हें अपने अंतरतम से बधाई देता हूं. विकास के जिस रास्ते पर तुम अग्रसर हुईं, उस पर सच में सफलता प्राप्त की तुम ने. मैं उस से अपने को गौरवान्वित महसूस करता हूं.’’

‘‘वह इसलिए कि आप मेरे भीतर की सचाई को नहीं जानते,’’ मोनिका व्यथित स्वर में बोली, ‘‘जिसे आप विकास कहते हैं, एक स्त्री के लिए उस की संज्ञा हो जाती है, विक्रय. पुरुष के लिए जो व्यक्तित्व का विकास है, स्त्री के लिए वही है व्यक्तित्व का विक्रय. किसी ने मुझ से कहा कि खरीदने वाला ताकतवर होता है इस संसार में. लेकिन खरीदने के लिए कीमत अदा करनी होती है.’’ डाक्टर सुधीर अवाक् हो मोनिका का मुख देखते रहे.

‘‘आत्मविकास के जिस ध्येय को मैं ने आत्ममुक्ति से संयुक्त किया था, वह एक डरावने स्वप्न सा आ कर ठहर गया है. मैं आज बहुत अकेली हूं. कहने के लिए मैं होटलों में अच्छे से अच्छा खातीपीती हूं, हवाई जहाजों से सफर करती हूं, बड़ेबड़े लोगों से सरोकार रखती हूं, पर मैं बड़ी तृषित, बड़ी अतृप्त हूं. मुक्ति के नाम पर मैं ने अपने जीवन को रेगिस्तान बना लिया है,’’ मोनिका का गला इतना कहतेकहते रुंध गया था. वह बिलख पड़ी थी.

‘‘परंतु,’’ सुधीर ने सांत्वना के स्वर में कहा, ‘‘अभी भी हमारे मन में तुम्हारी जगह वैसी ही बनी हुई है. मैं हूं, तुम्हारी बेटी ऋचा.’’

‘‘इसी सहारे को ले कर तो मैं जिंदा हूं. वरना अभी तक तो कभी की मरखप गई होती.’’ तब तक ऋचा एक ट्रे में कौफी और कुछ बिस्कुट ले आई. मां के सामने एक छोटी सी मेज सरका कर ट्रे रखती हुई बोली, ‘‘लो, मां. कुछ ताजगी आ जाएगी.’’

ऋचा को भीगी, तृप्त आंखों से देखती हुई मोनिका ने कहा, ‘‘मेरी ताजगी, मेरी जिंदगी, जो कुछ भी है, वह तू है, मेरी बेटी. तुझे देख लिया मैं ने, बस, तरोताजा हो गई.’’ डाक्टर सुधीर के मुख पर अप्रसन्नता झलकी, कुछ कड़े स्वर में बोले, ‘‘यह क्या, मोनिका, ऋचा कितनी साध से ले आई है, और तुम इनकार कर रही हो.’’

‘‘नाराज न हों, डाक्टर साहब,’’ मोनिका ने नम्रता से कहा, ‘‘यहां की सभी वस्तुएं मेरे लिए अनमोल हैं, परंतु उन्हें छूने का अधिकार मैं खो चुकी हूं. जब अवसर आएगा, तब मैं उन्हें माथे पर चढ़ा कर कृतार्थ हो लूंगी,’’ कहती हुई मोनिका उठ खड़ी हुई, ‘‘अब चलती हूं, बेटी. असह्य वेदना उभरउभर कर मेरी छाती को फाड़े डाल रही थी, सो उसे पति के सामने निवेदन करने आ गई और जी हलका कर लिया.’’

डाक्टर सुधीर ने कहा, ‘‘जब उस जीवन से इतनी दुखी हो तो हमारे बीच ही आ जाओ.’’

‘‘हां, मां,’’ ऋचा ने भी उत्सुकता से कहा, ‘‘हमारे लिए बड़े आनंद की बात होगी.’’‘‘नहीं, बेटी, वह पाखंड अब मुझ से न होगा,’’ मोनिका पछताती हुई बोली, ‘‘जो शाखा किसी विशाल वृक्ष से विलग हो कर उड़ चली थी, हवा उसे अपने झकोरों से जर्जर करती हुई अभी ऊपर ही ऊपर ठहराए हुए है, नीचे नहीं आने देती. वह हवाओं का खिलौना मात्र बन कर रह गई है,’’ कहते हुए मोनिका मन की अतीव वेदना के प्रवाह में फिर फफक कर रो पड़ी, ‘‘मुझे क्षमा कर दे, बेटी.’’ और शिथिल पांवों से धीमेधीमे मोनिका बरामदे की सीढि़यां उतर गई. मनोव्यथा से कांपते डाक्टर सुधीर के कमजोर कंधों को अपने दोनों हाथों से कस कर दबाए उन की बेटी ऋचा बड़ी देर तक सिसकती रही.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं