सरिता विशेष

‘‘खूबसूरत शब्दों का जामा पहना देने से अश्लील शील नहीं हो जाता. बुरा, अच्छा नहीं हो जाता है. अधर्म, धर्म नहीं हो जाता. द्रौपदी के 5 विवाह किसी भी कारण से हुए हों, किसी का वचन, देवताओं का श्राप और पांडवों के प्रति द्रौपदी की ईमानदारी, लेकिन अधर्म वह फिर भी था. उस काल में भी, इस काल में भी.

‘‘तुम स्त्री मुक्ति, अपमान का बदला या पति से बनी शारीरिक, मानसिक दूरी के अभाव में किसी परपुरुष के साथ बने संबंधों को उचित नहीं ठहरा सकतीं. फिर वापस पत्नी का कवच धारण कर के, उस गिरावट को कमजोर पल, भावुकता, भूल का नाम नहीं दे सकतीं. यदि तुम्हारा परपुरुष के साथ बिताया वह समय उचित था तो तुम उसी की क्यों न हो गईं. छोड़ देना था मुझे और अपना लेना था उसे, जिस की बांहों में तुम्हें मुझे भूलने की, मुझ से मिली कटुता से हृदय में उपजे विषाद को भुलाने की क्षमता मिली थी. अपनी चंचलता, चित्त की निम्न प्रवृत्ति को तुम जो भी नाम देना चाहो, स्वयं को अपराधमुक्त करने के लिए दे सकती हो किंतु उसे तुम उचित नहीं ठहरा सकतीं.

‘‘मैं तुम्हें कुलटा, पापिन, चरित्रहीन नहीं कह रहा हूं किंतु मैं तुम्हें अब उस दृष्टि से भी नहीं देख रहा हूं. मैं तुम्हारी गलती को अपनी किसी कमी के कारण तुम्हारा किसी और से जुड़ना तुम्हारी जरूरत मान कर स्वीकार कर लेता हूं क्योंकि कमी मुझ में है, लेकिन फिर भी तुम्हारी जरूरत जायज नहीं हो सकती. तुम्हारे इस सुख ने, सुकून ने, स्त्री की पूर्णता ने मेरे मन का सुखचैन सब छीन लिया.

‘‘मैं तो यही मानता हूं कि स्त्री वह धन है जिसे वह प्राप्त कर लेता है जिस में क्षमता होती है और मैं दीनहीन पति तुम्हारे निकृष्ट कर्म को न चाहते हुए भी लाचारी, मजबूरी में स्वीकार करता हूं. इस के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है मेरे पास. परिवार की समृद्धि के लिए मैं थकाहारा जल्दी सो गया, काम के सिलसिले में बाहर भटकता रहा. कभी तनाव में, गुस्से में कुछ भलाबुरा कह दिया तो तुम्हारे दिल में चुभ गया. तुम ने यह नहीं सोचा कि मैं आखिर इतनी मेहनत, इतनी परेशानियां, इतनी भागदौड़ करता किस के लिए हूं? अपने परिवार के लिए. लेकिन तुम ने ये सब नहीं सोचा और परपुरुष के आकर्षण में स्वयं को डुबो दिया और मेरी सारी मेहनत, कमाई, परिवार के प्रति समर्पण को गलत सिद्ध कर दिया.

‘‘मैं ने तुम्हें तुम नहीं, अपना समझा. अपना परिवार, अपने बच्चे, अपनी पत्नी…लेकिन तुम केवल एक स्त्री बन कर रह गईं. उन कमजोर पलों में तुम न पत्नी थीं, न मां थीं. थीं तो बस केवल एक स्त्री. अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए मर्यादा लांघती एक औरत.

‘‘तुम यह कहोगी कि मुझे ये सुखसुविधाएं, ऐशोआराम नहीं चाहिए था. मुझे बस तुम्हारा प्यार चाहिए था.

‘‘केवल प्यार से घर नहीं चलता. बहुत मिटना पड़ता है. बहुत घुटना और टूटना पड़ता है कमाने के लिए. आदमी को कमाने की मशीन बनना पड़ता है और मशीन बने आदमी के पास भी हृदय होता है. बस, वह बातबात पर आई लव यू जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर पाता. यदि अर्थव्यवस्था के बिना घरपरिवार चल सकता तो मैं क्यों मशीन बनता. मजनू बन कर तुम्हारे आगेपीछे न घूमता.

‘‘खैर, तुम्हें अपने अंदर का क्रोध निकालना था तो तुम ने परपुरुष में सुख ढूंढ़ कर खुद को हलका कर लिया. यदि गरीबी होती तो तुम किसी धनी व्यक्ति से इसलिए जुड़ जातीं क्योंकि तब तुम्हारे पास गरीबी का बहाना होता. तुम ने अपने मन की सुनी. मन की ही की. मेरी नजर में यह मनमानी है, दहलीज को लांघना है. लेकिन तुम्हारी दृष्टि में क्या था वह सब, स्त्री का पूर्णत्व. तनमन की शांति.

‘‘जीवन के इस मोड़ पर जबकि बच्चे बड़े हो रहे हैं, इस घर की तुम जरूरत बन चुकी हो. भले ही इस घर की बुनियाद तुम ने हिला कर रख दी है. मैं तुम्हें न छोड़ सकता हूं, न तलाक दे सकता हूं. बिना नींव के यह घर खड़ा रहे, यही बेहतर है इस मकान के लिए. बच्चों के लिए तो घर बना रहे. तुम मुझ से यह भी कह सकती हो कि तुम ने मुझ से कभी मेरी रातों का हिसाब नहीं मांगा. मैं कुछ रातों की बात से तुम्हें क्यों अपनी दृष्टि में गिरा रहा हूं.

‘‘जीवन के इस मोड़ पर वासना का नहीं, जिम्मेदारियों का महत्त्व होता है. प्यार तो होता ही है. कर्तव्य महत्त्वपूर्ण होते हैं. मैं पुरुष से पति, पिता बन गया लेकिन तुम स्त्री ही बनी रहीं. घर स्त्री से बनता है. पुरुष की गलती स्त्री भी दोहराए तो फिर घर, घर नहीं रहता. तुम इसे पुरुष की दोगली मानसिकता कह सकती हो.

‘‘पुरुष होने का यह नुकसान तो है कि वह स्वयं राम न हो लेकिन पत्नी में सीता तलाशता है. फर्क इतना है कि मुझे तुम्हारी उन बेवफा रातों का पता चल गया. तुम्हें नहीं चला. पता चलता तो शायद तुम्हारा मन भी टूटता, दरकता. तुम रोतीं, लड़तीझगड़तीं. अलग हो जातीं, तलाक ले लेतीं. मन का धागा बहुत नाजुक होता है. जोड़ने पर गांठ तो पड़ ही जाती है.

‘‘मैं तुम्हें इस परिवार के लिए माफ करता हूं क्योंकि इस परिवार के लिए तुम ने भी दिनरात एक किया है. इस घर को सजायासंवारा. सब का खयाल रखा. मुझे पिता बनने का सुख दिया. मुझे पारिवारिक, सामाजिक व्यक्ति बनाया. मुझे रिश्तों में बांधा. लेकिन मैं तुम्हें कोई ऊंचा दरजा नहीं दे सकता. तुम एक आम स्त्री हो. शादी के बाद पति न चाहते हुए भी अपनी पत्नी को उस हैसियत पर बिठा देता है जहां से वह अपनी पत्नी पर व्यंग्य भी नहीं सुन सकता. अपनी पत्नी के लिए वह अपने मातापिता से भी अलग हो जाता है.

‘‘मैं जब काम पर बाहर जाता और शरीर के साथ मन व मस्तिष्क से जीतोड़ काम लेता तब तुम लक्ष्मण रेखा लांघने को तैयार हो गईं बिना यह सोचे कि इस का परिणाम पूरे परिवार को तहसनहस कर सकता है.

‘‘तुम स्त्री ही रहीं और मैं पुरुष न बन सका. तो वे कसमें, वे रस्में? वे वादे, वे इरादे निभातेनिभाते मैं मिटा दूंगा खुद को और तुम सच्चे, गहरे प्यार की तलाश में फिर से जुट जाओगी और पा कर तृप्ति का अनुभव करोगी. ऐसी तृप्ति जो तुम्हें मुझ से न मिल सकी कभी. तो वह क्या था जो रातें हम ने गुजारी थीं साथसाथ? तुम्हारी इस नादान बेवफाई को क्या कहूं? क्या तुम मेरी पत्नी नहीं हो? क्या तुम हमारे बच्चों की मां नहीं हो? किस बात की कमी थी? फिर ऐसा क्यों किया तुम ने?’’

पत्नी जो इतना सबकुछ सुन कर चुपचाप खड़ी थी, बोली, ‘‘कुछ बातें धर्म और अधर्म, तर्क और वितर्क, ज्ञान और विज्ञान, नैतिक और अनैतिक, बुराई और अच्छाई से परे होती हैं. कुछ बातें कर्तव्य और जिम्मेदारी, समाज और उस के नियमों से परे होती हैं. इतनी देर से आप ही आरोप लगा रहे हैं, दोषी ठहरा रहे हैं, सजा सुना रहे हैं, आप ही प्रश्न कर रहे हैं, आप ही उत्तर दे रहे हैं. मैं स्त्री हूं, इसलिए मां हूं. मैं स्त्री हूं इसलिए पत्नी हूं. मैं स्त्री हूं, यही पहला और अंतिम सत्य है. पहले मैं स्त्री हूं. मैं स्त्री हूं इसलिए मेरी देह को आप पुरुष होने के नाते अपनी जागीर समझ कर मेरी देह पर नैतिक और अनैतिकता, चरित्रहीनता के आरोप लगा रहे हैं. पुरुष की नजर में स्त्री की देह पर ही सबकुछ तय होता है. नीति, न्याय, दोषारोपण, पापिन, कुलटा-सारे आरोप मेरी देह पर हैं. और मेरे मन का क्या? जो पुरुषों के आघात सहता रहता है. तन पर तुम्हारा अधिकार लेकिन मन पर तो किसी का जोर नहीं. मैं ने जो किया वह अच्छा था या बुरा, गलत था या सही, उसे इस तरह नहीं तोला जा सकता. स्त्री देह से परे जब तक न सोचोगे, स्त्रीपुरुष के संबंध आत्मिक नहीं हो सकते. और शरीर के रिश्ते एक न एक दिन सड़गल कर टूटते ही हैं. यदि यह देह तुम्हारी रही भी और मन और कहीं रहा तो इस शरीर का क्या करोगे? यह तो मात्र मांस रहेगा तुम्हारे लिए.

‘‘मैं ने जो किया, मुझ से जो हुआ, वह गलत था या सही. मैं नहीं जानती. हां, तुम्हारे पुरुषप्रधान समाज की सोच के हिसाब से पाप हो सकता है लेकिन स्त्रियां हिसाब लगा कर कुछ नहीं करतीं, प्यार तो हरगिज नहीं. तुम जख्म दोगे और स्त्रियां कहीं मरहम तलाशें तो मेरी दृष्टि में यह गलत नहीं. हां, यदि पुरुष जख्म ही न दे और यदि जख्म दे कर मरहम भी दे तो स्त्री सहन कर लेगी. लेकिन जख्म को सड़ने देना, यह तो आत्महत्या करना हुआ. यही पहला और अंतिम सत्य है कि मैं स्त्री हूं.’’

पुरुष चाह कर भी क्षमा न कर सका. क्योंकि वह स्त्रीमन को समझने को तैयार न था. एकदूसरे के पूरक होने के बाद भी स्त्रीपुरुष न चाहते हुए भी विरोधी बने रहे. रिश्तों के बीच एक दरार बनी रही जो ताउम्र खटकती रही लेकिन दुनिया को दिखाते हुए वे रिश्तों का बोझ उठाते रहे. थक कर चूर होते रहे, फिर भी खींचते रहे रिश्तों को मरते दम तक. और घावों से भरा मन भटकता रहा इधरउधर शीतल ठंडी छांव के लिए. थोड़ा सा सुख पाने की चाह में सारी उम्र स्वाहा होती रही कर्तव्यों के हवनकुंड में.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं