सरिता विशेष

मैं काफी देर से करवट बदल रही थी. नींद आंखों से ओझल थी. अंधेरे में भी घड़ी की सूई सुबह के 4 बजाते हुए प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रही थी. हर ओर स्तब्धता छाई हुई थी. एक नजर अश्विनी की ओर देखा. वे गहरी नींद में थे. पूरे दिन दौड़धूप वही करते रहते हैं. मुझ से तो किसी प्रकार की सहानुभूति या अपनत्व की अपेक्षा नहीं करते वे लोग. किंतु आज मेरे मन को एक पल के लिए भी चैन नहीं है. मृत्युशय्या पर लेटी मां व भाभी का रुग्ण चेहरा बारबार आंखों के आगे घूम जाता है.

क्या मनोस्थिति होगी बाबूजी व भैया की आज की रात?

डाक्टरों ने औपरेशन के बाद दोनों की ही स्थिति को चिंताजनक बताया था. मां परिवार की मेरुदंड हैं और अंजू भाभी गृहलक्ष्मी. यदि दोनों में से किसी को भी कुछ हो गया तो परिवार बिखर जाएगा. किस प्रकार जोड़ लिया था उन्होंने भाभी को अपने साथ. घर का कोई काम, कोई सलाह उन के बिना अधूरी थी. मैं ही उन्हें अपना न पाई. एक पल के लिए भी अंजू की उपस्थिति को बरदाश्त नहीं कर पाती थी मैं.

उसे प्यार करना तो दूर, उस की शक्ल से भी मुझे नफरत थी. उसी के कारण मां को भी तिरस्कृत करती रही थी. जाने क्यों मुझे लगता उस के कारण मेरे परिवार की खुशियां छिन गईं. भैया का जीवन नीरस हो गया. क्या मां का जी नहीं चाहता होगा कि उन का घरआंगन भी पोतेपोतियों की किलकारियों से गूंजे. आज के इस भौतिकवादी युग में रूप, गुण और शिक्षा से संपन्न स्त्री को भी कई बार यातनाएं सहनी पड़ती हैं.

किंतु मेरे परिवार के सदस्यों ने तो उस अपाहिज को स्वीकारा था. उस की कई बार सेवाशुश्रूषा की थी. शारीरिक व मानसिक संबल प्रदान किया था. भाभी के प्रति मां को असीम स्नेह लुटाता देख मैं ईर्ष्या की अग्नि में जलने लगी थी.

ससुराल में अपना स्थान बनाने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ा था मुझे? इस अपाहिज नारी के कारण भी कुछ कम आक्षेप तो नहीं सहे थे. मेरे मातापिता दहेज के लोभी बन गए थे. कैसे समझाती इस समाज को कि उन्होंने यह सब मानवता के वशीभूत हो कर किया था. और मैं क्या एक पल को भी भाभी के किसी गुण से प्रसन्न हो पाई थी? मेरी दृष्टि में भाभी का जो काल्पनिक रूप था उस से तो वे अंशमात्र भी मेल न खाती थीं.

कुढ़ कर मैं ने मां से कहा भी था, ‘‘यह तो ग्रहण है तुम्हारे बेटे के जीवन पर और तुम्हारे परिवार पर एक अभिशाप.’’

मां स्तब्ध रह जाती थीं मेरे शब्दों पर. उन्हें कभी कोई शिकायत थी ही नहीं उन से.

सुबह के 5 बजे थे. फोन की घंटी बज रही थी. कहीं कोई अप्रिय समाचार न हो, धड़कते दिल से फोन का चोगा उठाया, बाबूजी थे.

‘‘रीना बेटी, तुम्हारी मां की तबीयत कुछ ठीक है, पर अंजू अभी खतरे से बाहर नहीं है,’’ उन के स्वर का कंपन स्पष्ट था.

मैं स्वयं को कोस रही थी. क्यों बाबूजी व अश्विनी के कहने पर घर आ गई थी. बाबूजी व भैया के पास बैठना चाहिए था मुझे. नितांत अकेले थे वे दोनों. पर मुझ से सहानुभूति की अपेक्षा वे रखते भी न होंगे. उन्हें क्या मालूम हर समय अंजू को तिरस्कृत करने वाली रीना आज पश्चात्ताप की अग्नि में इस तरह जल रही है.

पहले भी तो वह कई बार अस्पताल आई थीं, किंतु तब मेरे मन के किसी कोने से अस्फुट सी यही आवाज उठती थी कि भाभी इस दुनिया से चली जाएं और मेरे भैया का जीवन बंधनों से मुक्त हो जाए. एक पल को न समझ पाई थी कि भैया का जीवन भाभी के बिना अधूरा है. मां ने एक बार समझाया था कि एक बार वह इस घर की बहू बनी है तो अब वह मेरी बेटी भी बन गई है. उस की देखभाल करना हमारा नैतिक ही नहीं, मौलिक दायित्व भी है.

‘‘और उन के मायके वालों का क्या कर्तव्य है? धोखे से अपनी बीमार बेटी दूसरे के पल्ले बांध कर खुद चैन की नींद सोएं? कहने को तो करोड़ों का व्यापार है, टिकटें भेजते रहते हैं अपनी बेटी व दामाद को. अमेरिका घूम आने के निमंत्रण भेजते रहते हैं पर बीमार बेटी की सेवा नहीं की जाती उन से,’’ मैं गुस्से से कांपकांप जाती थी.

‘‘रीना, वह स्वयं मायके नहीं जाना चाहती. जानती है, कल मेरे गले में हाथ डाल कर बोली थी, ‘मां, मेरी मां व पिताजी से बढ़ कर प्यार आप लोगों ने मुझे दिया है. मेरा जी आप लोगों को छोड़ने को नहीं चाहता.’’’

‘‘बस तुम से तो कोई मीठा बोले तो पिघल जाती हो.’’

बड़ी मुश्किल से अश्विनी मुझे चुप करवाते. दिखावे के संबंध मुझे हमेशा विचलित करते रहे हैं. मां के पास जा कर भी अंजू को अपना न पाती थी मैं. कितना प्रतिरोध किया था भैया के ब्याह पर मैं ने? उन के जैसे सौम्य, सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी के लिए रिश्तों की क्या कमी थी? उन्होंने एमबीए किया था. बाबूजी का लाखों का व्यापार था. भैया दाहिने हाथ के समान उन की मदद करते थे. मैं मचल कर बाबूजी से कहती, ‘‘भैया के लिए सुंदर सी भाभी ला दीजिए न.’’

‘‘पहले तुझे इस घर से निकालेंगे तब बहू आएगी यहां.’’

पर मैं एक सखी के समान भाभी के साथ रहना चाहती थी. हमउम्र ननदभाभी सखियों के समान ही तो होती हैं. पर मेरी किसी ने भी न सुनी थी. उन का तर्क था, ‘‘हम तुझे इसी शहर में ब्याहेंगे, जब जी चाहे आ जाना.’’

और धूमधाम से ब्याह दी गई थी मैं. आदर्श पति के समान अश्विनी रोज मुझे मां से मिलवा लाते थे. पूरा दिन मां से बतियाती, मेरी पसंद के पकवान बनते. मां बताती रहती थीं भैया के रिश्तों के बारे में. बाबूजी भी पास बैठे रहते. भैया का स्वभाव कितना मृदु था. उन की आवाज की पारदर्शी सरलता से उन का आकर्षक व्यक्तित्व परिलक्षित होता था.

मुझे नाज था अपने भाई पर. मेरी कितनी सहेलियां उन पर फिदा थीं.

पर वे तो आदर्श पुत्र थे अपने माता-पिता के.

एक दिन मां ने बताया था, ‘‘तेरी देविका मौसी का पत्र आया है अमेरिका से. वे अपनी देवरानी की बेटी का रिश्ता करना चाहती हैं विपिन के साथ.’’

ये वही देविका मौसी थीं जिन्होंने अपने मातापिता को बचपन में ही खो दिया था. दरदर की ठोकरें खाने के बाद भी उन्हें किसी ने सहारा न दिया था. अभागिन कह कर लोग दुत्कार देते थे. मेरे नाना ने उन्हें पालापोसा, पढ़ायालिखाया और उच्च कुल में ब्याहा था.

मां तो यहां तक कहती हैं कि दहेज भी उन्होंने मौसी को मां से बढ़ कर ही दिया था. पुराने जमाने में रिश्ते निबाहना लोग भली प्रकार जानते थे शायद. वे हमेशा नानाजी के एहसानों से दबी रहती थीं. यदाकदा अमेरिका से आ कर ढेर सारे उपहारों से हमारा घर भर देतीं. हम भाईबहन को बहुत प्यार करतीं. वे दोनों सगी बहनों से बढ़ कर थीं.

‘‘लड़की स्वभाव से सुशील है, सुंदर है और सब से बड़ी बात एमबीए है,’’ खुशी के अतिरेक में मां बही चली जा रही थीं.

‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि वह रूपवती है?’’

मां फोटो निकाल लाई थीं. ऐसा लगा जैसे चांद धरती पर उतर आया हो, पर न जाने क्यों मेरा शंकालु हृदय इस रिश्ते को अनुमति नहीं दे रहा था.

‘‘मां, विदेश में पलीबढ़ी लड़की क्या यहां पर तारतम्य बिठा पाएगी? वहां के रहनसहन और यहां के तौरतरीकों में बहुत अंतर है.’’

‘‘तू नहीं जानती देविका का स्वभाव. मेरे ही साथ पलीबढ़ी है. उस के और मेरे संस्कारों में कोई अंतर थोड़े ही है. क्या उसे नहीं मालूम कि मैं विपिन के लिए कैसी लड़की पसंद करूंगी?’’

मैं देख रही थी भैया की भी मूक अनुमति थी इस संबंध में. बाबूजी का हस्तक्षेप सदा ही नकारात्मक रहा है ऐसे मामलों में. संबंध को स्वीकृति दे दी गई. ब्याह की तारीख 2 माह बाद दी गई थी. मांबाबूजी का विश्वास देखते ही बनता था. 

मेरे जाने से जो सूनापन वहां आ गया था उसे अंजू भाभी पाट देंगी, ऐसा उन का अटूट विश्वास था. बारबार कहते, ‘जाओ, बाजार से खरीदारी कर के आओ.’ रोज मैं मां के साथ खरीदारी करती. उस के काल्पनिक गोरे रंग पर क्या फबेगा, यह सोच कर कपड़ा लिया जाता. इस घर में धनदौलत, मोटरबंगला, नौकरचाकर किसी की भी कमी नहीं थी. हीरेमोती के सैट लिए गए थे. समधियों के रहने का इंतजाम एक होटल में किया गया था. हर तरह की सुखसुविधाएं उन के लिए मुहैया थीं. मुझे भी कीमती साड़ी व जड़ाऊ सैट बाबूजी ने दिलवाया था. अश्विनी मना करते रह गए थे. मां का तर्क था कि इकलौते भाई की शादी में यह सब लेने का हक था मुझे.

एकएक दिन युग के समान प्रतीत हो रहा था. कब वह दिन आए और मैं भाभी से मिलूं? आकांक्षाएं आसमान छू रही थीं. मां का उत्साह इकलौती बहू के प्रति देखते ही बनता था. बारबार कहतीं, ‘जोड़ी सुंदर तो लगेगी न?’ हम मुसकरा कर अपनी सहमति देते थे. विवाह का समय ज्योंज्यों नजदीक आता मांबाबूजी की बेचैनी बढ़ती जाती थी. सब काम अलगअलग लोगों में बंटा था. किसी प्रकार की कमी वह सह नहीं पा रहे थे.

भैया सदैव से अल्पभाषी रहे हैं, पर उन की उत्सुकता मां से छिपी न थी. आज भाभी और उन के पिताजी जो आ रहे थे. बारबार आंखों के सामने एक खूबसूरत चेहरा, छरहरा बदन व लंबे कद की रूपसी खड़ी हो जाती.

हम सब हवाई अड्डे पहुंच चुके थे. वहां पहुंच कर अश्विनी ने छेड़ा, ‘‘मां, अपनी बहू को कैसे पहचानोगी?’’

‘‘देविका के साथ जो सब से सुंदर लड़की होगी वही मेरी बहू है,’’ मां का अटूट विश्वास देखते ही बनता था.

उद्घोषिका ने सूचित किया, अमेरिका से आने वाला वायुयान आ गया है. उत्सुक निगाहें हर आगंतुक में भाभी को ढूंढ़ रही थीं.

सहसा मां को किसी ने अंक में भर लिया था, देविका मौसी थीं.

‘‘हमारी बहू कहां है?’’

‘‘और मेरी भाभी?’’ मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं पा रही थी.

उन्होंने एक 5 फुट की लड़की को आगे कर के कहा, ‘‘यही तो है तुम्हारी बहू.’’

मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. कहां वह फोटो वाली रूपसी और कहां यह कुम्हलाया सा चेहरा? कहीं ये मजाक तो नहीं कर रही हैं, या मैं ही कोई दुस्वप्न देख रही हूं? उस के दोनों हाथ जुड़े हुए थे, शायद कभी पक्षाघात का शिकार हुई थी. कदकाठी का पूर्ण विकास हुआ लगता ही न था.

बाबूजी संज्ञाशून्य से परिस्थिति का विवेचन कर रहे थे और भैया अपना गांभीर्य ओढ़े कभी अंजू को निहार रहे थे, कभी हम सब को. अपनी जीवनसंगिनी को इस रूप में देख कर उन की आकांक्षाओं पर बुरी तरह तुषारापात हुआ था. मां गश खा कर गिर पड़ी थीं. किसी प्रकार उन्हें उठाया. रुग्ण सी काया व संतप्त मन लिए वे कांपती रही थीं. कितने अनदेखे दंश खाए होंगे उन्होंने, यह मैं भली प्रकार से महसूस कर पा रही थी. शक्ति की स्रोत मां बुरी प्रकार से टूट चुकी थीं.

पर ऊपरी तौर पर सभी सामान्य थे. किसी ने एक शब्द भी न कहा था. मेरा हृदय चीत्कार कर के देविका मौसी को बुराभला कहने को चाह रहा था. खूब बदला लिया था उन्होंने हम सब से अपने पर किए गए एहसानों का. जाने कब का बदला लिया था उन्होंने भैया से? किंतु मातापिता की शिक्षा के कारण कुछ भी तो अनर्गल न कहा गया था.

फोटो वाली सुंदरसलोनी अंजू की तुलना इस अपाहिज से कर के मन दुखी सा हो गया था. भविष्य की सुंदर सुनहरी हरीतिमा की कल्पना यथार्थ की धरती पर मरुभूमि की सफेदी में परिवर्तित हो गई थी. सारे बिंबप्रतिबिंब टूट पड़े थे. ऐसा प्रतीत होता था कि सामने पड़े वैभव को किसी ने कालिमा से पोत दिया हो.

सरिता विशेष

समधियों को उन के रहने के स्थान पर छोड़ा गया. उन की आवभगत के लिए कुछ लोग तैनात थे. एक बात कुछ विचित्र सी लगी थी, देविका मौसी सामान्य ही थीं. उन के व्यवहार से ऐसा नहीं लगा कि उन्होंने हमारे साथ विश्वासघात किया हो.

घर आ कर हर परिचित, रिश्तेदार की जबान पर एक ही प्रश्न था, ‘बहू कैसी है?’

क्या बताते? मृत्यु के बाद का सा सन्नाटा छा गया था. ऐसा लगता, हम सब के शरीर का रक्त किसी ने चूस लिया हो. रात्रिभोज तक हम सब सामान्य थे या सामान्य होने का प्रयत्न कर रहे थे. अभी विवाह में 3 दिन का समय बाकी था. रहरह कर मां व बाबूजी पर क्रोध आ रहा था. इस नवीन विचारधारा के युग में महज फोटो देख कर ब्याह निश्चित करना कितनी बड़ी भूल थी. कुंठा कहीं दिल में कैद थी और जबान को मानो ताला लग गया था.

किस से कहें, क्या कहें? भोलीभाली मां छलप्रवंचनाओं के छद्मों को कदापि नहीं पहचान पाई थीं, तभी तो ‘हां’ कर बैठी थीं.

मेहमानों की खुसुरफुसुर सुन कर लग रहा था उन्हें अंजू के बारे में पता लग चुका था. अभी रात्रि के 10 बजे थे. सहसा देविका मौसी घर आई थीं. बोलीं, ‘‘दीदी, तुम सब से अंजू मिलना चाहती है. उस की जिद है कि जब तक विपिन से बात नहीं करेगी, यह विवाह संपन्न न होगा.’’

इस पल तक हर दिल में व्याप्त समुद्री शोर थम सा गया. एक लमहे के लिए मानो सन्नाटा छाया सा लगने लगा था वहां. मुझे कुछ आशा की किरण दमकती लगी. गाड़ी निकाल कर मैं, मां व भैया अंजू के पास गए थे. बाबूजी अपने उच्च रक्तचाप के कारण जा नहीं पाए थे. कमरे में अंजू व देविका मौसी ही थीं. उस ने आगे बढ़ कर मां के चरण स्पर्श किए. मां ने भी आशीर्वाद दिया था. अंजू ने ही मौन तोड़ा था :

‘‘मां, क्या आप मुझे बहू के रूप में स्वीकार कर पाएंगी?’’

मां इस प्रश्न के लिए तैयार न थीं.

वे भैया की ओर उन्मुख हो कर बोलीं, ‘‘कोई भी फैसला किसी भी प्रकार के दबाव में आ कर मत कीजिएगा. इस में देविका चाची का भी कोई दोष नहीं है. लगभग 3 वर्ष पूर्व मेरी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी. बुरी तरह जख्मी हो गई थी मैं. डाक्टरों ने प्रयत्न कर के मुझे तो बचा लिया पर आज भी मुझे कई दिनों के अंतराल पर बेहोशी के दौरे पड़ते हैं. उस के 1-2 दिन बाद तक मेरे हाथ यों टेढ़े हो जाते हैं. सामान्य होने में कुछ वक्त लगता है. मांजी, मैं आप के घर की खुशियां बरबाद करना नहीं चाहती. देविका चाची भी इस दुर्घटना के बारे में अनभिज्ञ थीं. मैं पूर्णरूप से एक आदर्श बहू बनने का प्रयत्न करूंगी. विपिनजी, आप का निर्णय ही मेरा अंतिम निर्णय होगा.’’

स्पष्ट रूप से उस ने बात समझाई थी. मैं ने सोचा, भैया का उत्तर अवश्य ही नकारात्मक होगा. उन्होंने तो एक पल भी हामी भरने में देर न की थी.

मां को भी यह संबंध शायद स्वीकार था. कहीं कोरी वचनबद्धता के तहत तो भैया व मां ने हामी नहीं भरी थी? या दहेज के लालच में आ कर मां अपने बेटे का जीवन बलिदान कर रही थीं? मैं ने भैया से पूछा भी था, ‘एक अपाहिज के साथ जीवन बिता सकेंगे आप?’

मां से भी कहा था, ‘धनदौलत तो हाथों का मैल है, मां. अपने बेटे को यों बेचो मत. भैया का जीवन अंधकारमय हो जाएगा. अब क्या तुम्हारे दिन हैं सेवाटहल करने के, थक जाओगी तुम?’

अपने भाई की खुशियों को आग में जलता देख भला किस बहन का दिल रुदन करने को न चाहेगा. भैया ने अपना स्नेहिल हाथ मेरे सिर पर रख कर कहा था, ‘रीना, यदि अंजू विवाह के बाद यों दुर्घटनाग्रस्त हुई होती तो क्या हम उसे स्वीकार न करते?’

‘तब की बात और थी, भैया.’

‘अच्छा एक बात बता, यदि हमारी कोई बहन अपाहिज होती तो क्या हम उस का घर बसाने का प्रयत्न न करते?’

‘अवश्य करते, पर छल से नहीं.’

‘तो इस पूरे घटनाक्रम में अंजू तो दोषी नहीं. मैं वादा करता हूं मैं अपनी तरफ से किसी को शिकायत का मौका नहीं दूंगा.’

हम सब चुप रह गए थे. सीधासरल व्यक्तित्व लिए भैया भविष्य की दुश्ंिचताओं से अनभिज्ञ से थे. मेरे प्रतिकार, विरोध, प्रतिवाद सब व्यर्थ हो गए थे. मैं मूकदर्शिका सी बनी अपने परिवार की खुशियां अग्नि के हवाले होते देख रही थी. जी चाहा, इस विवाह में सम्मिलित ही न होऊं, कहीं भाग जाऊं. पर सामाजिक बंधनों में जकड़े मनुष्य को मर्यादा के अंश सहेजने ही पड़ते हैं.

भैया का विवाह संपन्न हो गया.

विवाहोपरांत दिए जाने वाले प्रीतिभोज के अवसर पर मेहमानों की अगवानी व स्वागतसत्कार के लिए भैया के साथ खड़ी भाभी मेहमानों की भीड़ में गश खा कर गिर पड़ी थीं. मेहमानों के समक्ष बहाना बनाना पड़ा था, थकावट के कारण ऐसा हुआ है. एक टीस सी उभरी दिल में. यदि तब भाभी मृत्यु की गोद में समा गई होती तो मेरे भैया का जीवन यों बरबाद न होता.

मां व बाबूजी ने पूर्ण स्नेह व सम्मान दिया था बहू को. फूल की कोंपल के समान उस की रक्षा की जाती थी. मां किसी भी अभद्र व्यवहार को बरदाश्त नहीं करती थीं. कपोत की तरह अपने डैनों से ढक कर वे भाभी की रक्षा कर रही थीं. सभी के होंठ सी गए थे. मानवता की मूर्ति बनी थीं वे. यदि भाभी सामान्य होतीं तो मां पर अवश्य गर्व करती. पर एक बीमार स्त्री को अपने बेटे के साथ प्रणयसूत्र में बांध कर उन्होंने उस के प्रति जो अन्याय किया था, उसे मैं भूल नहीं पा रही थी.

दहेज में रंगीन टीवी, वीसीआर और एअरकंडीशनर से ले कर हीरे, माणिक, मोती सभी कुछ तो थे, पर इन चीजों की यहां कोई कमी न थी.

घर आ कर मैं फूटफूट कर इतना रोई कि शायद दीवारें भी पसीज गई होंगी. अश्विनी ने बहुत प्यार से समझाया था, ‘वैवाहिक संबंध संयोगवश बनते हैं. तुम्हारे भैया की शादी जिस से होनी थी, हो गई. इस संबंध में व्यर्थ चिंता करने से क्या लाभ है. और यह भी तो हो सकता है कि तुम्हारी भाभी का स्वभाव इतना मृदु हो कि तुम सब को वह स्नेहपाश में बांध ले.’

मैं चुप हो गई.

तभी सास, ननद आ धमकी थीं. सास बोलीं, ‘‘हां भई, अब तो एसी दहेज में मिलने लगे हैं. हमारे बेटे को तो कूलर भी नहीं मिला था. अब बहू टेढ़ीमेढ़ी हो तो क्या हुआ?’’

जी चाहा प्रत्युत्तर में उन का मुंह नोच लूं. तुम्हारे हृदय में मानवता हो तो जानो मोल मानवता का, पर अश्विनी ने इशारे से चुप करवा दिया था. 3-4 दिन बाद मां को फोन किया. सोचा, अकेली होंगी. कुछ तो मन हलका कर लेंगी मेरे साथ. भैयाभाभी तो हनीमून पर गए थे. फोन अंजू ने उठाया, ‘‘हैलो, रीना तुम? इतनी जल्दी क्यों आ गईं अपने घर?’’

‘‘……’’

‘‘तुम लोग तो 15 दिन बाद आने वाले थे न?’’

‘‘हां, वहां जा कर मां से फोन पर बात की तो मालूम पड़ा, बाबूजी बीमार हैं, इसीलिए वापस आ गए.’’

उस के स्वर में मिसरी घुली थी. मैं ने सोचा, ‘तुम्हारे जैसी बीमार स्त्री कश्मीर की वादियों में भैया का क्या मन मोह पाई होगी?’

तभी मैं बाबूजी से मिलने चल पड़ी थी.

अंजू उन के सिरहाने बैठी थी. मां को जबरदस्ती सुला दिया था उस ने. बोली, ‘‘परेशान हो जाती हैं मां बाबूजी को देख कर. मैं तो हूं ही यहां.’’

और वह एक ट्रे में बाबूजी के लिए जूस व मेरे लिए चाय ले कर आ गई थी. दीनू को भेज कर समोसे भी मंगवाए थे उस ने. बोली, ‘‘खाओ न, तुम्हें बहुत पसंद हैं न ये.’’

उस के बाद वह हर एक घंटे बाद बाबूजी का बुखार देखती रही. अच्छा तो बहुत लगा यह सब, पर फिर सोचा, कहीं यह आडंबर तो नहीं. अपना दोष छिपाने के लिए नाटक कर रही हो? पर आत्ममंथन करने पर मैं ही ग्लानि से भर गई थी. बेटी होने का मैं ने कौन सा कर्तव्य निभाया.

शाम को उस ने अश्विनी को भी फोन कर बुला लिया. जबरदस्ती हमें रोक लिया था उस ने. पूरी मेज मेरी पसंद के भोजन से सजी थी, पर मेरे मुंह से प्रशंसा का एक भी शब्द नहीं निकल रहा था. भैया भी हाथोंहाथ ले रहे थे. सभी सामान्य थे.

वापस अपने घर आई तो यहां भी जी नहीं लग रहा था. तभी भैया मां को ले कर आए थे. मां बोली थीं, ‘‘कल अंजू फिर बेहोश हो गई थी. उस की तबीयत देख कर घबरा जाती हूं. कौन से अस्पताल में दाखिल करूं, समझ नहीं आता?’’

‘‘तो इस में घबराने की क्या बात है, मां? भेज दो उस के मायके. बड़े चालाक बनते हैं वे. अपनी बीमार बेटी तुम्हारे मत्थे मढ़ गए.’’

‘‘उन्होंने तो हवाई जहाज की टिकटें भी भेजी हैं पर अंजू खुद नहीं जा रही और सच पूछो तो मेरा भी मोह पड़ गया है उस में, इतनी प्यारी है वह.’’

‘‘तो ठीक है, करती रहो सेवा उस की.’’

और फिर एक बार भी पलट कर उस का हाल नहीं पूछा था मैं ने. वैसे भी इधर व्यवसाय के सिलसिले में अश्विनी काफी परेशान थे. कई जगह माल भेज कर पैसों की वसूली नहीं हो पा रही थी. एक दिन शाम को बहुत झल्लाए थे मेरे ऊपर.

‘‘रीना, क्या तुम्हें नहीं मालूम तुम्हारी भाभी अस्पताल में हैं.’’

‘‘तो इस में नया क्या है?’’

‘‘क्या औपचारिकतावश उन का हाल नहीं पूछना चाहिए तुम्हें? अब वे घर आ गई हैं. चलो, मिल कर आते हैं. बीमार मनुष्य से यदि दो शब्द भी सहानुभूति के बोलो तो दुख बंट जाता है.’’

बेमन से मैं तैयार हो कर चल पड़ी थी. एक पल के लिए उन का पीला चेहरा देख कर तरस भी आया, पर न जाने दूसरे ही पल वह घृणा में क्यों बदल गया था. मैं मां से बतियाती रही. मां लगातार अंजू का ध्यान रख रही थीं और मैं कुढ़ रही थी. वातावरण को सामान्य बनाने के लिए मां बोली थीं, ‘‘रीना, अंजू का गाना सुनोगी?’’

मैं ने बेमन से ‘हां’ कहा. अंजू के प्रति छिपा तिरस्कार मां बखूबी पहचानती थीं. और तभी अंजू का गाना सुना. इतना मीठा स्वर मैं ने पहली बार सुना था. उन्होंने उस के कपड़े बदलवाए. उस की उंगलियां फिर मुड़ गई थीं. वह हमारे जाने से बहुत खुश होती थी. जितना मेरे पास आने का प्रयत्न करती मैं उसे मूक प्रताड़ना देती.

अचानक अश्विनी अपने व्यवसाय की परेशानियां ले बैठे. अंजू सबकुछ चुपचाप सुनती रही. फिर भैया के साथ मिल कर उस ने बहुत मशविरे दिए. बाबूजी भी हतप्रभ से उस के सुझावों को सुन रहे थे. उस के सुझावों से अश्विनी को वाकई लाभ हुआ था. वह जब भी ठीक होती, भैया के साथ मेरे घर आती. गाड़ी में बैठ कर भैया के साथ कई बार दफ्तर जाती. बाबूजी तो अब वृद्ध हो गए थे. भैया दौरे पर चले जाते. वह फैक्टरी व दफ्तर अच्छी प्रकार संभाल लेती थी. 4 वर्ष के वैवाहिक जीवन में एक बार भी तो पलट कर मायके को न निहारा था उस ने. मेरी बिटिया को भी इतना प्यार करती कि कहना मुश्किल है. बाबूजी भी बेटी से ज्यादा स्नेह देते उसे. पर मैं उस वातावरण में घुटती थी.

बाबूजी तो अपने साथ घुमा भी लाते थे उसे. मां को कई बार हाथों से दवा और जूस पिलाते देखा था मैं ने. पर न जाने क्यों मेरे हृदय की वितृष्णा स्नेह में नहीं बदल पा रही थी. अश्विनी कई बार समझाते, पर मेरा दिल न पसीजता. बारबार अंजू का जिक्र होता और मैं उसे और तिरस्कृत करती. अब तो मैं ने वहां जाना भी छोड़ दिया था.

उड़तीउड़ती खबर सुनी थी कि आज अंजू मां की सेवा कर रही थी. अब उस ने घर भली प्रकार संभाल लिया है. कभी उस की बीमारी की खबर भी सुनती, पर एक कान से सुनती दूसरे कान से निकाल भी देती. एक दिन बाबूजी का फोन आया था. घबराहट से पूछ रहे थे, ‘‘अश्विनी कहां है?’’

‘‘वे तो अभी आए नहीं. क्यों? क्या बात है? क्या आज आप की बहू फिर बीमार हो गई?’’

मेरे स्वर की कड़वाहट छिपी न थी. उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, फोन का चोगा रख दिया था. तभी अश्विनी का क्रुद्ध स्वर सुनाई पड़ा था, ‘‘हद होती है शुष्क व्यवहार की. एक व्यक्ति जीवनमरण के बीच झूल रहा है और तुम्हारे विचार इतने ओछे हैं कि तुम उन का मुख भी नहीं देखना चाहतीं. मनुष्य को मानवता के प्रति तो प्रतिबद्ध होना ही चाहिए. रीना, कम से कम इंसानियत के नाते ही मां का हाल पूछ लेतीं.’’

‘‘क्या हुआ मां को?’’

‘‘पिछले कई दिन से वे डायलिसिस पर हैं. डाक्टर ने गुरदे का औपरेशन बताया है,’’ वे कपड़े बदल कर कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे.

‘‘कहां जा रहे हो?’’

‘‘अस्पताल.’’

‘‘तुम ने मुझे आज तक बताया क्यों नहीं कि मां बीमार हैं?’’

‘‘इसलिए कि तुम्हारे जैसी पाषाण- हृदया नारी कभी पसीज नहीं सकती. जीवनमरण के बीच झूलती तुम्हारी मां

को गुरदे की आवश्यकता है? तुम्हारे जैसी मंदबुद्धि स्त्री को इन बातों से क्या सरोकार?’’

मैं भी साथ जाने को तैयार हो गई थी. कितना गिरा हुआ महसूस कर रही थी मैं स्वयं को. यदि मां को कुछ हो गया तो? बूढ़ा जर्जर शरीर एक अनजान की सेवा करता रहा, उसे अपनाता रहा, और मैं? उस की कोखजायी उस की अवहेलना ही तो करती रही. आज अपने शरीर का एक अंग दे कर मां की जान बचा लूं तो धन्य समझूं स्वयं को.

गाड़ी की गति से तेज मेरे विचारों की गति थी.

अस्पताल के बरामदे में भाभी, भैया व बाबूजी बदहवास से खड़े थे. अंजू फूटफूट कर रो रही थी.

‘‘दीदी, मेरा परीक्षण करवाइए. मैं गुरदा दूंगी मां को.’’

मैं ने मन में सोचा, ‘ढोंगी स्त्री, यह मां की जान बचाएगी? वह सुखी संसार इसी के कारण तो नरक बना था.’ डाक्टर से विचारविमर्श करने के बाद मेरा व अंजू का परीक्षण किया गया. हम दोनों ही गुरदा दे सकते थे, पर अंजू जिद पर अड़ी रही. बोली, ‘‘मेरे जीवन का मूल्य ही क्या है? मैं ने इस परिवार को दिया ही क्या है. यदि रीना को कुछ हो गया तो उस की बिटिया को कौन पालेगा?’’ उस के तर्क के सामने हम चुप हो गए थे. भाभी व मां को औपरेशन थिएटर में ले जाया गया था.

औपरेशन का समय लंबा ही होता जा रहा था. डाक्टर ने बताया कि औपरेशन कामयाब हो गया है पर अंजू खतरे से बाहर नहीं है.

हम सब सन्नाटे में आ गए थे. पहली बार मैं ने भाभी के गुणों को जाना था. किस प्रकार उस ने स्वयं को इस परिवार से बांधा, मैं यह सब अब समझ सकी थी. मेरी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी. आज तक अंजू की मौत मांगने वाली रीना उस की दीर्घायु की कामना कर रही थी. डर सा लग रहा था कहीं उस का यह अंतिम पड़ाव न हो. भाभी के साथ भैया व मांबाबूजी का बंधन अटूट है. मेरा मन उस के प्रति सहानुभूति से भर गया था. तभी डाक्टर ने बताया, ‘‘अब अंजू खतरे से बाहर है.’’

भाग कर उस के बिस्तर तक पहुंच गई थी मैं. उस के माथे पर चुंबनों की बौछार लगा दी थी. सभी विस्फारित नेत्रों से मुझे देख रहे थे. शायद विश्वास नहीं कर पा रहे थे पर मेरी आंखों की कोरों से निकले आंसू भाभी के आंसुओं से मिल कर यह दर्शा रहे थे मानो यथार्थ और प्रकृति का समागम हो. मां का हाथ मेरे सिर पर

था इंतजार था कब दोनों स्वास्थ्यलाभ ले कर अपने घर लौटेंगी.