सरिता विशेष

पिताजी गुजरे तब मेरी उम्र 12 साल की थी. गीता दीदी 18 और भैया 22 साल के थे. अचानक हुए इस हादसे को हम सब बरदाश्त करने की स्थिति में नहीं थे. मुझे समझ थोड़ी कम थी, फिर भी इतना भी नासमझ नहीं था कि पिताजी के जाने का अर्थ न समझ सकूं. मां का रोरो कर बुरा हाल था. कच्ची गृहस्थी थी. ऐसे में उन्हें चारों तरफ सिवा अंधकार के कुछ नहीं दिख रहा था. सारे रिश्तेदार जमा थे. वे मां को समझाने का भरसक प्रयास कर रहे थे. मगर वे कुछ समझने को तैयार ही नहीं थीं. बस, एक ही रट लगाए थीं कि अब वे शेष जीवन कैसे गुजारेंगी. कैसे गीता की शादी होगी? हम सब को वे कैसे संभालेंगी? उन का रुदन सुन कर सभी की आंखें नम थीं. थोड़ाबहुत वे मामाजी को समझने को तैयार थीं.

मामाजी भरे मन से बोले, ‘दीदी, दिल छोटा मत करो. मैं तुम्हारे लिए सुरक्षाकवच बन कर तब तक खड़ा रहूंगा जब तक तुम्हारा परिवार संभल नहीं जाता.’ उन्होंने अपना वादा निभाया. रोजाना शाम को बैंक की ड्यूटी से खाली होते तो सीधे घर आ कर हमारा हालचाल जरूर लेते. उन के आने से हम सब को बल मिलता. उन्हीं के प्रयास से भैया को पापा की जगह पोस्ट औफिस में नौकरी मिली. फंड से मिले रुपयों से गीता दीदी की शादी हुई. पापा का बनाया मकान था, सो रहने की समस्या नहीं थी. आहिस्ताआहिस्ता हमारा घर संभलने लगा. गीता दीदी की शादी के बाद बचे रुपयों को मां ने अपने पास बुरे वक्त के लिए रख लिया. इस बीच भैया की शादी के लिए लड़की वालों के रिश्ते आने लगे. मां को एक जगह रिश्ता अच्छा लगा, सो मामा से रायमशविरा कर के भैया की शादी कर दी. अब वे निश्ंचत थीं. लेदे कर एक मैं ही बचा था. उन्हें विश्वास था कि मैं कहीं न कहीं पढ़लिख कर सैटल हो ही जाऊंगा. मगर नियति को और ही कुछ मंजूर था. मां को अचानक ब्रेनहेमरेज हुआ और वे हम सब को रोताबिलखता छोड़ चली गईं. भैया को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा पर मैं अकेला हो गया. मैं उस रोज फूटफूट कर रोया क्योंकि एक मां ही थीं जो मेरी राजदां थीं. मैं जब भी कभी उलझन में होता, वे बड़ी आसानी से मेरी समस्या का समाधान कर देतीं. एक तरह से वे मेरी संबल थीं.

मां की तेरहवीं तक गीता दीदी मेरे पास रहीं. जब तक थीं मेरी तन्हाई पर अंकुश लगा रहा. पर जैसे ही वे चली गईं, घर काटने को दौड़ने लगा. सब से बुरी बात यह हुई कि जिन भैयाभाभी पर मेरी जिम्मेदारी थी वे ही मुझ से विमुख होने लगे. एक दिन मैं ने मां की पासबुक देखी तो पाया कि उस में फूटी कौड़ी भी न थी. यह जान कर मैं स्तब्ध रह गया. भैया से पूछा तो बड़े तल्ख शब्दों में बोले, ‘‘मैं क्या जानूं?’’ ‘‘पूरे 2 लाख थे, भैया. मां ने मेरी पढ़ाईलिखाई के लिए रखे थे,’’ मैं लगभग रोंआसा हो गया. ‘‘जब तू जानता था कि पूरे 2 लाख रुपए थे तो तुझे यह भी पता होगा कि रुपए कहां गए. मुझे तो पता भी नहीं था कि मां ने इतने रुपए बैंक में रखे हैं,’’ भैया बड़ी सफाई से अपना दामन बचा ले गए.

‘‘भैया, याद कीजिए, मां ने आप को मेरी अनुपस्थिति में कुछ दिया हो?’’

‘‘तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया. मां से दिनरात तो तू चिपका रहता था. तुम दोनों क्या खिचड़ी पकाते थे, मैं ने कभी जानने की भी कोशिश नहीं की. फिर वे कहां से मुझे रुपए देंगी? मुझे रुपयों की जरूरत ही क्या है जो उन से मांगूंगा और वे मुझ को देंगी.’’

‘‘खिचड़ी? कैसी बात कर रहे हैं. न मैं ने, न मां ने आज तक आप से कुछ छिपाया. पापा का जो भी फंड मिला उस से गीता दीदी की शादी हुई और शेष रुपए जस के तस बैंक में जमा थे तो इसलिए कि अगर मुझे बेहतर पढ़ाई करनी होगी तो आप से मांगने की जरूरत न पड़े.’’

‘‘इतना घमंड?’’

‘‘मां आप पर आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती थीं. अब आप इसे जिस रूप में लें,’’ कह कर मैं ने इस विवाद को विराम दिया. क्योंकि जब मैं ने देखा ही नहीं तो क्या कर सकता हूं. जबकि सचाई यही थी कि रुपए भैया ही ने लिए थे. मां की आदत थी. वे चैकों पर अग्रिम हस्ताक्षर बना कर रखती थीं ताकि पैंशन के रुपए लेने के लिए मुझे मां का इंतजार न करना पड़े. कभीकभी मां दीदी के पास चली जाती थीं, तो वहीं से फोन कर देतीं कि मैं ने चैक पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, तू पैंशन निकाल लेना. मां के इस विश्वास का भैया ने नाजायज फायदा उठाया. मां के मरने की खबर रिश्तेदारों को देने जब मैं घर से बाहर निकला, उसी समय भैयाभाभी को मौका मिला मां का बक्सा खोल कर चैक और उन के रखे कुछ गहनों को चुराने का. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि एक तरफ मां की लाश जमीन पर पड़ी हो, दूसरी तरफ भैया ऐसे कुत्सित प्रयास में लिप्त रहेंगे. ये सब सोच कर मेरा मन भीग गया. उस रोज मांपिताजी की खूब याद आई. अगर आज वे जिंदा होते तो शायद यह सब न देखना पड़ता? इन सब वजहों से मैं ज्यादा पढ़लिख भी नहीं पाया.

घर में भैयाभाभी का मेरे प्रति कोई सहयोगात्मक रवैया नहीं था. वे मेरे साथ बेगानों की तरह व्यवहार करते. आखिरकार, जब मेरी पढ़ाई रुक गई तो मैं ने एक अस्पताल में वार्ड बौय की नौकरी कर ली. तनख्वाह कोई खास न थी. हां, लोगों की टिप्स ठीकठाक मिल जाया करती थी. अभी एक महीना भी न गुजरा था कि एक दिन मैं ने भाभी को भैया से यह कहते सुना, ‘‘कब तक मुफ्त की रोटियां तोड़ते रहेंगे देवरजी?’’

‘‘1 महीना होने दो,’’ भैया बोले.

‘‘अभी से कान भरोगे तभी कुछ सोचेगा,’’ भाभी बोलीं.

भैया ने घुमाफिरा कर भाभी की बात मेरे सामने दोहरा दी. मुझे नागवार लगा. भाभी न सही, कम से कम भैया को तो सोचसमझ कर बात करनी चाहिए. एक तो मेरी पढ़ाई बीच में छूट गई, दूसरे, नौकरी लगे जुम्माजुम्मा चार दिन हुए और घरखर्च का ताना देने लगे. अस्पताल से लौटने में कभीकभी मुझे देर हो जाया करती थी. ऐसे ही एक रात मैं देर से घर लौटा तो पाया कि घर के फाटक पर ताला लटक रहा था. मैं ने पड़ोसी से चाबी ले कर फाटक खोला. कमरे की चाभी भैया एक खास जगह रख कर जाते थे जिस का सिर्फ मुझे पता था. वहां से चाभी ले कर मैं ने कमरा खोला. बहुत भूख लगी थी. रसोई में जा कर बरतन उलटापुलटा कर के देखे, खाने के लिए कुछ न मिला. खिन्न मन से भैया को फोन लगाया तो पता चला कि वे ससुराल में हैं. अगले दिन दशहरा था, सो मना कर ही लौटेंगे. मैं ने स्वयं रोटी बनानी चाही. जैसे ही गैस जलाई, कुछ सैकंड जली, फिर बंद हो गई.

रात 12 बज गए. अब इतनी रात मुझे बाहर भी कुछ खाने को मिलने वाला न था. ऐसा ही था तो भैया मुझे फोन कर देते, मैं बाहर ही खापी कर आ जाता. खुद तो ससुराल में दावत उड़ा रहे हैं और मुझे भूखा मरने के लिए छोड़ गए. यह सोच कर मुझे तीव्र क्रोध आया, वहीं अपने हाल पर रोना भी. भैया को मुझ से क्या अदावत है, जो इतना दुराव कर रहे हैं. भाभी ही उन की सबकुछ हैं, मैं कुछ नहीं. अगर इतना ही है, साफसाफ कह देते, मैं अपना खाना खुद बना लूंगा. यही सब सोच कर क दिन मैं ने स्वयं पहल की. तनाव में रहने से अच्छा है, मैं खुद ही अलग हो जाऊं.

दशहरा बीतने के बाद भैयाभाभी घर लौट आए.

सरिता विशेष

‘‘आप लोग नहीं चाहते हैं तो मैं अपना खाना खुद बना लूंगा.’’

भाभी ने सुना तो तुनक गईं, बोलीं, ‘‘यह तो अच्छी बात हुई. 6 महीने से हमारा खा रहे थे, अब जब कमाने लगे तो अलग गुजारे की बात करने लगे.’’

‘‘अलग गुजारे के लिए आप लोगों ने विवश किया. वैसे भी 6 महीने खिला कर कोई एहसान नहीं किया. 2 लाख रुपए थे मां के खाते में जिसे आप लोगों ने छल से निकाल लिया.’’ मैं ने भी कहने में कोई कसर न छोड़ी. अब जब अलग रहना ही है तो मन की भड़ास निकालना ही मुझे उचित लगा.

‘‘बेशर्म, हम लोगों पर इस तरह इलजाम लगाते हुए शर्म नहीं आती,’’ भैया चीखे.

‘‘हकीकत है, भैया, आज वह रुपया होता तो मुझे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर अस्पताल की मामूली नौकरी न करनी पड़ती.’’

‘‘तो क्या कलैक्टरी करते?’’

‘‘कलैक्टरी नहीं करता मगर ढंग से नौकरी तो करता. आप ने पिता का फर्ज निभाना तो दूर, मेरा हक मार लिया.’’ उन्हें मेरा कथन इतना बुरा लगा कि मुझे थप्पड़ मारने के लिए उठे. मगर न जाने क्या सोच कर रुक गए.

‘‘आज से तुम्हारा हमारा संबंध खत्म,’’ कह कर भैया अपने कमरे में चले गए. पीछेपीछे भाभी भी पहुंचीं, ‘‘ऐसा भाई मैं ने जिंदगी में नहीं देखा था. बड़े भाई पर इलजाम लगा रहा है. 6 महीने से खिलापिला रहे थे यह सोच कर कि भाई है. उस का यह सिला दिया, एहसानफरामोश.’’ भैया सुनते रहे. तभी बड़ी बहन गीता आ गईं. मैं ने भरसक माहौल बदलने की कोशिश की तो भी वे समझ गईं. जब तक मां जिंदा थीं भैयाभाभी ने उन की खूब आवभगत की. मां पैंशन का आधा हिस्सा उन्हीं लोगों को दे देती थीं. शेष अपने लिए रखतीं. गीता के बच्चों की डिमांड वही पूरा करतीं. भैयाभाभी सिर्फ समय से नाश्ताखाना खिला देते. भाभी को इतना भी फर्ज पहाड़ सा लगता. पीठ पीछे भैया से भुनभुनातीं. दोचार दिन के लिए गीता दीदी आतीं तो भाभी चाहतीं कि दीदी किचन में उन का हाथ बंटाएं. अपने बच्चों का एक भी सामान वे गीता दीदी के बच्चों को देना नहीं चाहती थीं.

एक दिन रात सोने के समय उन का बौर्नविटा खत्म हो गया. दीदी का बड़ा बेटा उस के बिना दूध नहीं पीता था. सो, वे भाभी के पास गईं, ‘भाभी, जरा सा बौर्नविटा ले लेती हूं अपने सोनू के लिए. कल सुबह मंगा लूंगी.’ भाभी हंस कर टालने की नीयत से बोलीं, ‘अपना भी यही हाल है, थोड़ा सा बचा है, खत्म हो जाएगा तो मुश्किल होगी. इन का हाल तो जानती हैं,’ भैया की ओर मुखातिब हो कर बोलीं, ‘कोई सामान लाने में ये कितने आलसी हैं?’ भैया नजरें चुराने लगे.

दीदी को सबकुछ समझते देर न लगी. उन का मन तिक्त हो गया. वे उलटे पांव लौट आईं. मां को पता चला तो उन की त्योरियां चढ़ गईं. भाभी को सुनाने के लिए उठीं तो दीदी ने रोक दिया, ‘क्यों मेरे लिए उन से बैर लेती हो? मैं आज हूं कल अपने ससुराल चली जाऊंगी. रहना तो तुम्हें इन्हीं लोगों के साथ है.’ मां मन मसोस कर रह गईं.

भाभी का मायका आर्थिक रूप से कमजोर था. पिता एक प्राइवेट स्कूल में ड्राइवर थे. मां यह सोच कर उन्हें लाईं कि गरीब घर की बहू रहेगी तो निबाह हो जाएगा. मगर हुआ उलटा. कुछ न देखने वाली भाभी को जब सरकारी नौकरी वाला आर्थिक रूप से संपन्न पति मिला तो वे स्वार्थी और अहंकारी हो गईं. उन्हें लगा कि अब उन्हें किसी की जरूरत नहीं. मायके से उन्हें शह मिलती. उन की मां चाहती थीं कि किसी तरह उन के बेटीदामाद अपना अचल हिस्सा ले कर स्वतंत्र गृहस्थी बसाएं. मां के मरने के बाद भरसक उन का यही प्रयास रहा कि किसी तरह मैं इस मकान का अपना हिस्सा उन्हें बेच दूं. मैं ने मन बना लिया था कि चाहे वे जो भी कर लें, मैं पिताजी की अमानत नहीं छोड़ूंगा. मुझे मानसिक रूप से प्रताडि़त करने के पीछे उन की यही मंशा थी. इस प्रताड़ना से बचने के लिए जब मुझे तनख्वाह मिलने लगी तो उन के यहां खाना छोड़ दिया. यह भी उन्हें बरदाश्त न हुआ. कभी बिजली तो कभी मकान के टैक्स के नाम पर वे मुझे जबतब परेशान करतीं. एक दिन मुझ से रहा न गया, बोला, ‘‘भाभी, सब से ज्यादा बिजली आप खर्च करती हैं. टीवी, फ्रिज, इन्वर्टर, प्रैस सभी आप के पास हैं.’’

‘‘आप भी खरीद लीजिए. मैं ने मना तो नहीं किया है,’’ उन की वाणी में व्यंग्य का पुट था, ‘‘मगर बिजली का बिल आधा आप को देना ही होगा.’’

‘‘आधा क्यों?’’

‘‘कनैक्शन पिताजी के नाम है. घर की आधी हिस्सेदारी आप की भी बनती है. तो बिल भी तो आधा देना होगा.’’

‘‘अच्छा तर्क है आप का. बराबर क्यों?’’ मैं उखड़ा, ‘‘आप ज्यादा खर्च करेंगी, तो ज्यादा देंगी. मैं कम खर्च करूंगा तो कम दूंगा. बिजली के नाम पर मैं सिर्फ एक 15 वाट का सीएफएल और एक पंखे का इस्तेमाल करता हूं.’’ उन्हें मेरा तर्क नागवार लगा. तुनक कर भैया के पास गईं. भैया चुपचाप सुन रहे थे. मुझे अस्पताल की जल्दी थी, सो जल्दीजल्दी कपड़े पहन कर निकल गया. मेरे जाने के बाद दोनों के बीच जो भी खुसुरफुसुर हुई हो, मुझे पता नहीं. हां, 2 दिनों बाद भैया ने मुझे अपना फैसला सुनाया.

‘‘मैं रोजरोज की किचकिच से ऊब चुका हूं. बेहतर होगा हम इस मकान को बेच कर अलग हो जाएं.’’

यह सुन कर मैं सन्न रह गया. मुझे सपने में भी भान नहीं था कि भैया पिताजी की विरासत के प्रति इस कदर निर्मम होंगे. आदमी जानवर पालता है तो उस से भी मोह हो जाता है. यहां तो पिताजी के सपनों का आशियाना था. इस से कितनी यादें हम लोगों की जुड़ी थीं. कितने कष्टों को झेल कर उन्होंने यह मकान बनवाया था. किराए के मकान में रह कर उन्होंने बहुत परेशानी झेली थी. 10 किराएदारों के बीच सुबह 4 बजे ही मम्मीपापा को उठना पड़ता था ताकि सब से पहले पानी भर सकें. साझा बाथरूम अलग सिरदर्द था. चीलकौओं को पानी देने वाला समाज व्यवहार में भैया जैसा ही होता है. लिहाजा, मैं ने मन मार कर उन के फैसले पर मुहर लगा दी.

मकान बिकने के बाद भैया ने दीदी को फूटी कौड़ी भी न दी. मामा ने मुझे सलाह दी कि अगर बड़े भैया गैरजिम्मेदार हो गए हैं तो तुम अपनी जिम्मेदारी निभाओ. उन्हीं के कहने पर मैं ने 50 हजार रुपए दीदी को पापा के हक के नाम कर दे दिए. उन्होंने भरसक मना किया. यहां तक कि रिश्तों की कसम देने की कोशिश की मगर मैं टस से मस नहीं हुआ. जीजाजी थोड़े रुष्ट हुए, कहने लगे, ‘किस चीज की हमारे पास कमी है. उस धन पर तुम दोनों भाइयों का हक है.’ भले ही उन्होंने मना किया पर मैं ससुराल वालों की मानसिकता को जानता था. पीठपीछे सासससुर जरूर ताना मारते. थोड़े रुपयों के लिए मैं नहीं चाहता था कि उन का सिर नीचा हो.

मैं एक किराए के मकान में रहने लगा. वक्त ने मुझे काफीकुछ सिखा दिया. दीदी के प्रयासों से मेरी शादी हो गई. मेरी शादी में भैया की तरफ से कोई नहीं आया. मैं ने भी मनुहार नहीं की. जब उन्हें अपने फर्ज की याद नहीं रही तो मैं क्यों पहल करूं. 10 साल गुजर गए. इस बीच भैयाभाभी का थोड़बहुत हालचाल अन्य स्रोतों से मिलता रहा. 1 लड़की पहले से ही थी, 2 और हो गईं. वे 3 बच्चियों के पिता बन गए. शायद यही वजह रही जो उन्हें शराब की लत लग गई. लड़कियों को पढ़ालिखा कर आत्मनिर्भर बनाने की जगह जिम्मेदारियों से भागने का उन का यह तरीका मुझे कायराना लगा. एक दिन दीदी से खबर लगी कि उन की हालत बेहद खराब है. वे अस्पताल में भरती हैं. मैं सपरिवार उन्हें देखने गया. भाभी ने हमें खास तवज्जुह न दी. उलटे उलाहना देने लगीं कि इस संकट की घड़ी में किसी ने साथ नहीं दिया. चाहता तो मैं भी कह सकता था कि आप ने कौन सा रिश्ता निभाया? कभीकभार दीदी उन से मिलने जातीं तो इन का मुंह टेढ़ा ही रहता.

भैया किसी तरह ठीकठाक हुए इस चेतावनी के साथ कि अगर उन्होंने शराब नहीं छोड़ी तो निश्चय ही उन का गुर्दा खराब हो सकता है, फिर उन्हें कोई भी नहीं बचा पाएगा. भाभी सहम गईं. वे इस कदर कमजोर हो गए थे कि ठीक से उठबैठ नहीं सकते थे. औफिस कहने के लिए जाते. उन से कोई काम हो नहीं पाता था. पीने की लत अभी भी नहीं छूटी थी. शाम पी कर घर आते तो लड़ाईझगड़ा करते. वे हद दरजे के चिड़चिड़े हो गए थे. अपनी लड़कियों को फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करते थे. जबकि उन की बड़ी बेटी ही उन की देखभाल करने में आगे रहती थी. वे उन्हें हमेशा लताड़ते रहते. कहते कि तुम लोग मेरे लिए बोझ हो. उन्हें एक पुत्र की आस थी. 3 पुत्रियां ही हुईं.

एक दिन उन के पेट में फिर दर्द उठा. डाक्टर के पास ले गए तो उस ने वही पुरानी नसीहत दी मगर भैया पर कोई असर नहीं पड़ा. शराब ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया था. एक हफ्ते औफिस नहीं गए. जा कर करते भी क्या? एक दिन साहब ने भाभी को बुलाया, ‘‘मैडम, काम नहीं तो तनख्वाह कैसी?’’ 

यह सुन कर भाभी की आंखों से आंसू बहने लगे. साहब ने उन की परेशानी भांप ली. एक रास्ता सुझाया, ‘‘आप कितनी पढ़ी हैं?’’

‘‘इंटर.’’

‘‘नियमानुसार ठीक तो नहीं मगर मानवता के नाते मैं एक रास्ता सुझाता हूं. आप इन की जगह यहां आ कर 10 से 5 बजे तक ड्यूटी करें.

‘‘काम बेहद आसान है. आप को सिर्फ लिफाफों पर मुहर लगानी है व फाइलों को इधर से उधर ले जाना है.’’

भाभी राजी हो गईं. इस तरह घर में भैया की देखभाल बड़ी बेटी करती और वे नौकरी. भैया की देखभाल की वजह से बड़ी बेटी की पढ़ाईलिखाई हमेशाहमेशा के लिए छूट गई.? इन्हीं झंझावतों के बीच एक दिन खबर आई कि भैया नहीं रहे. सुन कर मुझे तीव्र आघात लगा. मैं अपनी बीवीबच्चों के साथ आया. भाभी का रोरो कर बुरा हाल था. तीनों लड़कियों के भी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. एक तरह से वे असहाय हो गए थे. मेरी पत्नी ने ढाढ़स बंधाया. ‘सब ठीक हो जाएगा.’

वे अपना रुदन रोक बोलीं, ‘‘मैं अकेली औरत 3-3 बेटियों को ले कर कैसे पहाड़ जैसी जिंदगी काटूंगी? कैसे इन की शादी होगी?’’

मैं ने अपनी ओर से आश्वासन दिया कि भैया की कमी भरसक पूरी करने की कोशिश करूंगा. 15 दिन बाद जब मैं सपत्नी वापस आने लगा तो भाभी रुंधे कंठ से बोलीं, ‘‘अगर सब एकसाथ होते तो अच्छा होता. कम से कम बुरे वक्त में एकदूसरे के करीब होते. एकदूसरे के काम आते.’’ मुझे मौका मिला अपने भीतर वर्षों से जमे जज्बातों को उड़ेलने का. किंचित भावुक स्वर में बोला, ‘‘भाभी, नौकरी के दरम्यान मृत्यु होने पर सरकार, उन के आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर इसलिए नौकरी देती है कि परिवार आर्थिक समस्या से न जूझे और वे अपने परिवार की जिम्मेदारियों को वैसे ही निभाएं जैसे मृतक. क्या भैया ने वैसा किया? उन्होंने तो नौकरी पा कर ऐसे मुख मोड़ लिया, जैसे उन्हें यह नौकरी उन की योग्यता पर मिली हो. वे यह भूल गए कि यह नौकरी उन्हें पिताजी की अधूरी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए मिली थी, न कि अपना घर बसा कर ऐश करने के लिए.’’ भाभी चुप थीं. क्या जवाब देतीं? आज विपत्ति आई है तब सब की याद आई. जब उन का सब ठीकठाक था तो मुझे ठीक से खाना तक नहीं देती थीं. बिजली के बिल तक का हिसाब लेती थीं. आज परिस्थिति प्रतिकूल हुई तो पता चला कि जिंदगी का हिसाबकिताब कितना जटिल होता है. क्या उन के पास इस जटिल हिसाब का कोई समाधान है? शायद नहीं.

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