विद्युत विभाग में जूनियर इंजीनियर प्रियंका जब विभागीय प्रमोशन के बाद पहली बार अधिकारी की कुरसी पर बैठी तो लगा मानो सारे विभाग की पावर उस के हाथों में आ गई. एक नई ऊर्जा, नए जोश और ईमानदार सोच के साथ जब उस ने 7 साल पहले जूनियर इंजीनियर के रूप में जौइन किया था तो कुछ ही दिनों में विभाग में फैले भ्रष्टाचार व कर्मचारियों में फैली कामचोरी की आदत ने उस के कोमल मन को बेहद आहत कर दिया था.

जूनियर होने के नाते उस के पास अपने फैसले लेने के अधिकार नहीं थे और नई होने या फिर शायद महिला होने के नाते भी उसे अधिक जिम्मेदारी वाले काम भी नहीं दिए जाते थे, इसलिए भी वह मन मसोस कर रह जाती थी. उन्हीं दिनों उस ने ठान लिया था कि जिस दिन उस के पास अधिकार और फैसले लेने की पावर आ जाएगी उसी दिन से वह आम लोगों में अति भ्रष्ट विभाग की छवि के नाम से कुख्यात इस विभाग की कालिख को धोने का प्रयास करेगी.

7 साल के लंबे इंतजार के बाद उसे यह प्रमोशन मिला है और सीट भी वह जिसे विभागीय भाषा में मलाईदार कहा जाता है. जाहिर सी बात है कि घर में खुशी का माहौल था. पति शेखर ने अपने खास दोस्तों और नजदीकी रिश्तेदारों के लिए एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया. सभी यारदोस्त बधाइयों के साथसाथ विद्युत विभाग में अटके अपने काम करवाने के लिए सिफारिश भी कर रहे थे. साथ ही साथ, विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों को भी कोस रहे थे.

रात को शेखर ने प्रियंका को बाहों में भरते हुए कहा, ‘‘तो भई, हम भी अफसर बीवी के पति हो गए अब. हमारा भी कुछ तो रुतबा बढ़ा ही होगा. आप को मलाई मिलेगी तो कुछ खुरचन हमारे भी हिस्से में आएगी ही.’’

पति की महत्त्वाकांक्षा और ऊंचे सपने देख कर प्रियंका सोच में पड़ गई, ‘लगता है युद्ध की शुरुआत घर से ही करनी पड़ेगी.’ यह सोचतेसोचते उसे नींद आ? गई.

सुबह साढ़े 9 बजे तक औफिस की गाड़ी नहीं आई तो प्रियंका ने ड्राइवर को फोन लगाया तो ड्राइवर बोला, ‘‘बस मैडम, रास्ते में ही हूं. अभी पहुंच रहा हूं.’’

‘पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है,’ ड्राइवर का उत्तर सुन कर प्रियंका खीझ उठी. लगभग 10 बजे ड्राइवर गाड़ी ले कर आया तो प्रियंका ने सख्ती से कहा, ‘‘विभाग ने यह गाड़ी 24 घंटे के लिए अनुबंधित की है. मुझे 9 बजे गाड़ी घर के सामने चाहिए, याद रहे, वरना सिर्फ एक नोटिस पर गाड़ी हटा दूंगी.’’

औफिस में, जैसा कि वह शुरू के दिनों से देखती आई थी, अभी तक कोई कर्मचारी नहीं पहुंचा था. मगर तब उस के पास अधिकार नहीं था उन पर सख्ती करने का. आज वक्त बदल चुका था. उस ने चपरासी से हाजिरी रजिस्टर अपने पास मंगवा लिया. 11 बजतेबजते कर्मचारियों का एकएक कर आना शुरू हुआ. जब सब आ चुके तो उस ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी, ‘‘चूंकि आज मेरे साथ आप का पहला दिन है इसलिए समझा रही हूं. कल से जिसे औफिस टाइम में अगर कोई पर्सनल काम हो तो कैजुअल लीव ले कर आराम से अपने काम करे और जिसे ड्यूटी करनी है वह समय से औफिस आ जाए.’’

अब तक सरकारी कार्यालय को आरामगाह समझते आए कर्मचारियों के लिए यह 440 वोल्ट का झटका था. कुछ वरिष्ठ कर्मचारी तो यह भी हजम नहीं कर पा रहे थे कि इतनी कम उम्र की बौस और वह भी एक महिला. सभी तिलमिला गए. रोष में भरे कामचोर कर्मचारी प्रियंका के खिलाफ गुटबाजी करने लगे. ऐसा नहीं था कि सभी लोग भ्रष्ट और कामचोर थे, कुछ ईमानदार लोग भी थे मगर उन्हें दूसरे कर्मचारी ‘विभाग का चमचा’ कह कर पथभ्रष्ट करने की कोशिश करते थे, उन्हें चिढ़ाते थे. उन्होंने प्रियंका की निष्ठा और लगन का सम्मान किया. शायद, वे बरसों से ऐसे ही किसी अधिकारी की तलाश कर रहे थे जिस के साथ काम कर के वे अपने जमीर को जवाब दे सकें, मन की संतुष्टि पा सकें.

प्रियंका के औफिस का तकनीकी सहायक राकेश भी उन्हीं में से एक था. तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त राकेश अपने काम में बेहद होशियार था. यही नहीं, औफिस के अन्य रूटीन काम भी वह बखूबी कर लेता था. एक सौम्य मुसकान हमेशा उस के चेहरे पर रहती थी. उस के पास काम करने के कई तरीके होते थे, न करने का कोई बहाना नहीं. जल्दी ही प्रियंका का भरोसा जीत लिया था उस ने.

धीरेधीरे सारा स्टाफ 2 खेमों में बंट गया. एक काम करने वालों का और एक काम को अटकाने वालों का. मगर राकेश का साथ मिलने से प्रियंका का हौसला मजबूत होता गया और काम न करने वालों को अकसर मुंह की खानी पड़ती.

एक दिन प्रियंका के पास एक फोन आया. उस व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, ‘‘मैडम, पिछले एक महीने से आप के कर्मचारी मेरी फैक्टरी को विद्युत कनैक्शन नहीं दे रहे. मैं रिश्वत नहीं देता, इसलिए वे फाइल पर बारबार औब्जैक्शन लगा कर वापस भेज देते हैं. अगर मैं रिश्वत नहीं दूंगा तो क्या मेरा काम नहीं होगा?’’

‘‘आप कल सुबह अपनी फाइल ले कर मेरे औफिस आइए,’’ प्रियंका ने संयत स्वर में कहा.

प्रियंका ने पूरी फाइल को ध्यान से पढ़ा और उस में जो औपचारिक कमियां थीं वे उसे समझाईं. साथ ही, कहा कि इन्हें दूर कर के फाइल मेरे पास लाइए. आप का काम हो जाएगा.

2 दिनों बाद वह व्यक्ति फाइल कंपलीट कर के हाजिर हुआ. प्रियंका ने स्टाफ को कनैक्शन जारी करने के आदेश दिए मगर चूंकि स्टाफ पहले भी इस तरह के काम के लिए रिश्वत लेता रहा है इसलिए बिना पैसे काम करना उन्हें बहुत अखर रहा था. एक तरह से उस व्यक्ति के सामने वे अपनेआप को बेइज्जत सा महसूस कर रहे थे. स्टाफ में किसी ने तबीयत खराब होने का बहाना बनाया तो किसी ने जरूरी काम का बहाना बना कर आधे दिन की छुट्टी ले ली. प्रियंका परेशान हो गई. तभी राकेश ने कहा, ‘‘आप फिक्र न करें, मैं हूं न. मैं करवा दूंगा.’’

‘‘मगर तुम अकेले कैसे करोगे? जानते हो न कि कितना रिस्की काम है. बिजली किसी की दोस्त नहीं होती, जरा सी चूक जान पर भारी पड़ सकती है,’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘मैं पूरी सेफ्टी के साथ काम करूंगा,’’ राकेश ने उसे आश्वस्त किया.

पता नहीं क्यों जब तक राकेश का फोन नहीं आया कि काम हो गया है तब तक उस की सांसें अटकी रहीं. जैसे ही राकेश का फोन आया, उस ने राहत की सांस ली. काम होने के बाद प्रार्थी ने प्रियंका को धन्यवाद देते हुए फोन किया और कहा, ‘‘मैं ने इस विभाग में पहली बार ऐसा अफसर देखा है. आप अपनी यह सोच बनाए रखें.’’ सुन कर प्रियंका मुसकरा दी.

ऐसे न जाने कितने ही नाजुक मौकों पर राकेश प्रियंका के विश्वास पर खरा उतरा था. प्रियंका उसे थैंक्यू कहती और राकेश बस मुसकरा देता. एक बेनाम से रिश्ते की कोंपलें फूट रही थीं दोनों के दिलों में.

नया काम, नई जिम्मेदारियां, औफिस का पहले से बिगड़ा हुआ ढर्रा और स्टाफ के असहयोगात्मक रवैये से प्रियंका परेशान हो जाती थी. घर पहुंचते ही बच्चों की फरमाइशें और फिर रात में पति की इच्छाएं. सबकुछ इतना थका देने वाला होता था कि कभीकभी सोचने लगती, ‘प्रमोशन के नाम पर अच्छी मुसीबत गले पड़ गई. इस से तो जूनियर ही ठीक थी. कम से कम दिल का सुकून तो था.’ मगर अगले ही दिन फिर उसी जोश और हिम्मत के साथ काम पर जुट जाती.

औफिस में काफीकुछ व्यवस्थित हो चला था. हर रिकौर्ड, हर फाइल अपडेट हो गई थी. सिर्फ एक कर्मचारी रामदेव के अलावा सब अपनाअपना काम भी जिम्मेदारी से करने लगे थे. कुल मिला कर प्रियंका को संतोषजनक लग रहा था.

दीवाली का त्योहार नजदीक आ गया. सभी विद्युत लाइनों और ट्रांसफौर्मरों की सालाना मेंटेनैंस करवानी थी. दिनभर शहर में घूमतेघूमते प्रियंका थक जाती थी.

एक दिन वह अपनी टीम को साइट पर भेज कर खुद औफिस के आवश्यक कागजात निबटा रही थी. अपनी मदद के लिए उस ने राकेश को भी रोक लिया था. काम निबटातेनिबटाते बाहर अंधेरा सा हो गया. वह अपने चैंबर में थी और राकेश अपनी सीट पर. तभी राकेश

2 कप कौफी ले आया. उसे सचमुच इस की बहुत जरूरत थी. राकेश ने कहा, ‘‘आप इतना टैंशन न लिया करें. सरकारी कामकाज ऐसे ही चलते रहते हैं. यों बेवजह परेशान होती रहीं तो कोई बीमारी पाल लेंगी. अगर आप को मुझ पर भरोसा हो तो बाहर के काम आप मुझे सौंप सकती हैं.’’

अचानक राकेश उठा और स्नेह से उस के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘आप घर जाइए, सुबह आप को ये सारे कागजात तैयार मिलेंगे.’’ न जाने क्या था उन आंखों में कि प्रियंका ने अपना सिर उस भरोसेमंद हाथ पर टिका दिया.

दीवाली वाले दिन सुबहसुबह ही शिकायत मिली कि वाल्मीकि बस्ती में ट्रांसफौर्मर जल गया. प्रियंका इस इमरजैंसी को अटैंड कर के घर लौटी तो डाइनिंग टेबल पर ढेर सारे पटाखे, मिठाइयां और कई गिफ्ट देख कर चौंक गई. शेखर ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भई, इतने दिनों में आज पहली बार लग रहा है कि सरकारी अफसर के अलग ही ठाठ होते हैं. तुम्हारे जाते ही ठेकेदारों की लाइन लग गई. और देखो, घर गिफ्ट से भर गया.’’

‘‘हमें इस में से कुछ भी नहीं रखना है,’’ कहते हुए प्रियंका ने एकएक कर सारे ठेकेदारों को फोन कर के सारा सामान वापस ले जाने की सख्त हिदायत दे दी. शेखर को पत्नी से ऐसी उम्मीद न थी. उस ने उसे काफी भलाबुरा सुना दिया. बच्चों के मुंह उतर गए, सो अलग. त्योहार का सारा मजा किरकिरा हो गया. बच्चे तो खैर थोड़ी देर में सबकुछ भूल गए मगर शेखर ने अगले कई दिनों तक उस से सीधेमुंह बात नहीं की.

दीवाली निबटते ही मौजूदा वित्तीय वर्ष के बकाया टारगेट पूरे करने का प्रैशर बनने लगता है. प्रियंका को भी स्पैशल विजिलैंस चैकिंग के टारगेट दिए गए. राकेश भी उस के साथ ही होता था. एक दिन चैकिंग करतेकरते शहर से बाहर बने एक बड़े से फार्महाउस के बाहर उन्होंने गाड़ी रोकी. साफसाफ बिजली चोरी का केस था. प्रियंका ने विजिलैंस शीट भर कर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगा दिया. फार्महाउस का मालिक शहर के विधायक का रिश्तेदार था. विधायक ने फोन पर प्रियंका को मामला

रफादफा करने के लिए दबाव डाला. प्रियंका ने इनकार कर दिया. बात उच्च अधिकारियों तक पहुंची तो उन्होंने भी प्रियंका को समझाया कि पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर ठीक नहीं. शेखर ने भी डराया कि कहीं दूरदराज ट्रांसफर न हो जाए. मगर उस पर तो ईमानदारी का जनून सवार था.विधायक के रिश्तेदार ने पैनल्टी जमा नहीं करवाई तो प्रियंका ने फार्महाउस का कनैक्शन काटने का आदेश जारी कर दिया. कर्मचारियों ने विधायक के डर से वहां जाने से मना कर दिया तो राकेश के साथ पुलिस प्रोटैक्शन ले कर प्रियंका स्वयं गई. वहां मौजूद विधायक के आदमियों ने प्रियंका से बदतमीजी करने की कोशिश की. पुलिस चुपचाप खड़ी उन की आपसी बहस देख रही थी. तभी एक गुंडाटाइप आदमी आगे बढ़ा और प्रियंका के दुपट्टे की तरफ हाथ बढ़ाया. राकेश ने उसे प्रियंका तक पहुंचने से पहले ही मजबूती से पकड़ लिया. प्रियंका को जीप में बैठने का इशारा किया और ड्राइवर के साथ गाड़ी रवाना कर दी. प्रियंका की आंखें छलछला उठीं मगर उन आंसुओं में राकेश के प्रति अनुराग भी शामिल था.

यह केस अभी लोगों में चर्चा का विषय बना ही हुआ था कि अचानक जैसे प्रियंका की जिंदगी में तूफान आ गया. उस का कर्मचारी रामदेव एक ठेकेदार की टैंडर फाइल पास करने के एवज में रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों पकड़ा गया. पुलिस को दिए अपने बयान में उस ने कहा कि यह काम वह प्रियंका मैडम के लिए करता है. उस के बयान के आधार पर प्रियंका को भी गिरफ्तार कर लिया गया. विभागीय नियमानुसार उसे निलंबित कर दिया गया. अखबारों ने सुर्खियों में इस खबर को प्रकाशित किया. महल्ले वाले कनखियों से देखदेख कर मुसकराते. सामने तो सहानुभूति दिखाते मगर पीठपीछे कई तरह की बातें करते. कोई कहता, ‘बड़ी ईमानदार बनती थी, आ गई न असलियत सामने.’ किसी ने कहा, ‘जितना रिश्वत ले कर कमाया था, सारा कोर्टकचहरी की भेंट चढ़ जाएगा, बदनामी हुई सो अलग.’ जितने मुंह उतनी बातें. कहते हैं न कि ‘मारने वाले का हाथ पकड़ा जा सकता है मगर बोलने वाले की जबान नहीं.’

बच्चों के दोस्त उन्हें स्कूल में चिढ़ाते. शेखर के औफिस में भी सब चटकारे लेले कर बातें करते. प्रियंका बुरी तरह से आहत थी. तन से भी और मन से भी. कुल मिला कर अब वह खुद भी इसे अपनी ईमानदारी और काम के प्रति निष्ठा की सजा मानने लगी थी. शेखर को भी सारा दोष उसी में दिखाई देता था. आएदिन उसे ताना देता था कि क्या जरूरत थी हरिशचंद्र की औलाद बनने की. अच्छीभली घर में आती कमाई का अपमान किया. यह उसी का नतीजा है. आपसी नाराजगी के चलते शेखर और उस के रिश्ते में भी ठंडापन आ गया था. आजकल उन में आपस में भी बहुत कम बात होती थी.

दम तोड़ती हुई मछली सी प्रियंका के लिए राकेश जैसे पानी की बूंद बन कर आया. शेखर के लाख मना करने के बावजूद, एक बड़े वकील से मिल कर उस ने प्रियंका से उस के निलंबन के खिलाफ कोर्ट में याचिका दाखिल करवाई. व्यक्तिगत प्रयास कर के उन तमाम उपभोक्ताओं और ठेकेदारों से प्रियंका के पक्ष में गवाही दिलवाई जिन के अटके हुए काम और लटके हुए बिलों का भुगतान प्रियंका ने बिना रिश्वत लिए करवाए थे. उसी के समझाने पर स्टाफ में भी कई लोगों ने अपनी अधिकारी के पक्ष में बयान दिए.

उन्हीं बयानों में यह बात भी निकल कर सामने आई कि रामदेव आदतन इस तरह की हरकतें करता है. वह अकसर मैडम के खिलाफ साजिशें रचता रहता था. यही नहीं, प्रियंका से पहले भी वह कई अधिकारियों को परेशान कर चुका था. स्वयं रामदेव अदालत में प्रियंका के खिलाफ सुबूत नहीं पेश कर सका. काफी लंबी कानूनी लड़ाई चली. सभी गवाहों को सुनने और सुबूतों को देखने के बाद कोर्ट की कार्यवाही तो पूरी हो गई थी मगर कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

आज प्रियंका की याचिका पर फैसले का दिन है. राकेश ने उसे कोर्ट जाने के लिए मना कर दिया क्योंकि वह जानता था कि अगर कोर्ट का फैसला प्रियंका के हक में नहीं आया तो वह बिखर जाएगी. सचाई और ईमानदारी पर से उस का विश्वास उठ जाएगा. राकेश वकील के साथ कोर्ट गया.

दोपहर के लगभग 3 बजे दरवाजे की घंटी बजने पर प्रियंका ने सेफ्टीहोल से झांक कर देखा. राकेश का उतरा हुआ चेहरा देख कर उस के पांव वहीं जम गए. दोबारा घंटी बजने पर उस ने बुझे मन से दरवाजा खोला. राकेश चुपचाप खड़ा था. उस ने कोर्ट का फैसला उसे थमा दिया. प्रियंका ने कांपते हाथों में पकड़ कर डबडबाई आंखों से उसे पढ़ा. यह क्या, कोर्ट ने मुझे बेकुसूर मानते हुए बाइज्जत बरी कर दिया. पढ़तेपढ़ते प्रियंका फूटफूट कर रो पड़ी. राकेश ने उसे बांहों में थाम लिया. प्रियंका ने भी आज अपनेआप को रोका नहीं. न जाने कितना दर्द, कितना लावा था जिसे आज बहना था. आज जीत हुई थी, सचाई की, विश्वास की, ईमानदारी की, दोस्ती की.