सरिता विशेष

चारों तरफ से पर्वतों से घिरे नाथुला दुर्ग को सूर्य की रश्मियां जैसे अलौकिक आभा प्रदान कर रही थीं. वहां पहुंचते ही सुमन का मन अभिभूत हो गया. चारों तरफ हरियाली और उस पर छिटके हुए रूई के फाहे के समान बर्फ को देखना काफी सुखद था. एक तरफ भारतीय तिरंगा लहरा रहा था. कांटों की बाड़ के दूसरी तरफ के दुर्ग पर चीन का लाल ध्वज लहरा रहा था. हवा काफी तेज थी. लग रहा था कि ध्वज काफी मजबूती से

बंधे होंगे. वह कांटों की बाड़ की तरफ बढ़ चली.

‘‘आगे मत जाइए, मैडम,’’ एक भारतीय सैनिक ने उसे टोका, ‘‘चारों तरफ बारूदी सुरंगें बिछी हैं. जरा सी लापरवाही से वे फट सकती हैं.’’

उस के कदम वहीं ठिठक गए.

‘‘धन्यवाद,’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘अरे भाई, उस चीनी सैनिक से बात करूं क्या?’’ सुधाकर बोला, ‘‘आप को कोई आपत्ति तो नहीं होगी?’’

‘‘भला मु झे क्या आपत्ति होगी,’’

वह सैनिक हंस कर बोला, ‘‘शायद वह आप की भाषा जानता हो. कर लीजिए बातचीत.’’

सुधाकर ने उस चीनी सैनिक से भाषा से कम, भावों से ज्यादा बातें कीं. वैसे भी वह सिविल विभाग का कुशल अभियंता ही नहीं, रंगमंच का पारंगत अभिनेता भी था. चीनी सैनिक भी जैसे उस के भावों को सम झ गया हो क्योंकि अब उस के सूखे, सपाट चेहरे पर मुसकराहट की लकीरें खिंचने लगी थीं.

मगर सुमन अभी भी उस स्थल को काफी गौर से देख रही थी. उस के पापा ने उसे बताया था कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के वक्त उस के चाचा यहीं शहीद हुए थे. यह अलग बात है कि बाकी मोरचे के मुकाबले यहां भारत की जीत हुई थी. और इसी कारण सुमन के चाचा का शव उन्हें मिल पाया था.

दूर किसी पर्यटक ने हांक लगाई, ‘हिंदी-चीनी, भाईभाई.’

‘ये चीनी कभी विश्वसनीय नहीं होते सुमन,’ उस के पापा का स्वर उस के मन- मस्तिष्क में गूंज रहा था, ‘घात और विश्वासघात यही इन्होंने सीखा है.’

‘फिर भी पापा, समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलाव आ ही जाते हैं.’

‘मैं ने कहां मना किया,’ वह शांत स्वर में बोले, ‘सब का अपनाअपना सच होता है. मैं ने अपने भाई का शव देखा है. कोई खास उम्र नहीं थी उस की. यही कोई 22-23 साल का रहा होगा. मेरे लिए तो ये चीनी हमेशा शत्रु की तरह ही रहेंगे, जिन्होंने मेरे भाई की बलि ले ली.’

‘‘क्या सोच रही हो,’’ सुधाकर मुसकरा कर बोला.

सरिता विशेष

‘‘यही कि तुम मु झे अच्छी जगह ले आए,’’ सुमन बोली, ‘‘हालांकि यहां से मेरी एक दुखद याद जुड़ी है इसलिए यहां आने का मन न था.’’

‘‘तो तुम यहां आ चुकी हो?’’

‘‘अरे नहीं, यह मु झ से नहीं, बल्कि मेरे चाचाजी के साथ हुई घटना है. मेरे पापा ने बताया था कि 1962 के

भारत-चीन युद्ध के वक्त वे यहीं तैनात थे. इसी नाथुला नामक स्थान में तब भयंकर युद्ध हुआ था. अन्य मोरचों के विपरीत यहां भारतीय सेना विजयी रही थी. किंतु मेरे चाचाजी शहीद हो गए थे. मेरे घर में ड्राइंगरूम में उन्हीं की तो बड़ी सी तसवीर टंगी है. तुम ने तो वह तसवीर देखी भी है.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है,’’ सुधाकर मुसकरा कर बोला, ‘‘इसीलिए तुम यहां आना चाहती थीं.’’

पहाड़ों के बीच कांटेदार जालियां थीं. भारतीय और चीनी सिपाही अपनेअपने क्षेत्र में मुस्तैदी से डटे हुए चहलकदमी कर रहे थे. कभी उन के भाव सख्त हो जाते, तो कभी सहृदयता से भरपूर दिखते. गंगटोक शहर से गाडि़यों में भरभर कर लोगों के हुजूम आजा रहे थे. लगभग सभी के चेहरे रोमांच से परिपूर्ण थे. आखिर हों भी क्यों न, चीन के नाम भर से ही हर भारतीय उत्तेजित हो जाता है, शायद सतर्क भी. कौन जाने, ये कब किस पोजीशन पर आ जाएं.

कुछ पर्यटक दुर्ग के दूसरी तरफ इशारे से चीनी सैनिकों का अभिवादन करते. 1-2 चीनी सैनिक इशारे पर कांटों की बाड़ के पास आ खड़े हुए. कुछ पर्यटक उन से हाथ मिलाने लगे. सुमन ने भी सुधाकर के कहने पर उन से हाथ मिलाया. मानवीय स्पर्श इतना तरंगित करने वाला, इतना सुकूनदेह और इतना हसीन होगा, यह कल्पनातीत था.

मगर यही युद्ध का समय हो तब. न हो रहा हो युद्ध, तनाव ही हो सिर्फ, तो क्या यही स्पर्श वह सुख दे सकेगा? शायद नहीं. मनुष्य के भाव समयसमय पर रूप बदलते हैं. और इसी के साथ बदल जाता है इतिहास. अचानक मौसम बदरंग होने लगा. कालेसफेद बादल घिरने लगे.

‘‘अरे, हमें जल्दी ही वापस लौटना होगा,’’ अचानक सुधाकर चिल्लाया, ‘‘बारिश की बूंदें गिरने लगी हैं.’’

यह वही सुमन थी, जिसे यहां आने का बिलकुल मन नहीं था. पर अभी उस का यहां से इतनी जल्दी जाने का मन नहीं कर रहा था. उसे काफी आश्चर्य हुआ. अभीअभी तो आसमान इतना साफ था कि सबकुछ साफ दिखाई दे रहा था. सूर्य चमक रहा था और अचानक ये कालेकाले मेघ कहां से घिर आए.

‘‘जल्दी वापस लौट जाइए, मैडम,’’ एक दूसरा भारतीय सैनिक उस से कह रहा था, ‘‘बारिश की ये बूंदें जल्दी ही बर्फ के रूप में गिरने लगेंगी. फिर वापस लौटना मुश्किल होगा.’’

‘‘हम लोग तो वापस लौटेंगे ही,’’ वह हंस कर बोली, ‘‘और आप लोग क्या करेंगे?’’

‘‘हम कहां जाएंगे, मैडम,’’ वह भी हंसता हुआ बोला, ‘‘हम तो देश की सेवा हेतु अपने कर्तव्य पथ पर हैं.’’

जिस बात का डर था वही हुआ. इधर वे गाड़ी में बैठे नहीं कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और वे गाड़ी में ही कैद हो कर रह गए. बारिश कम हो तब तो रास्ता दिखे. थोड़ी देर बाद बारिश रुकी तो वातावरण में रूई के फाहे समान बर्फ के फाहे उड़ने लगे. गाड़ी का स्थानीय ड्राइवर ऐक्सपर्ट था.

‘‘आप घबराएं नहीं, मैडम,’’ वह बोला, ‘‘यह हमारे लिए रोज की बात है.’’

गाड़ी मंथर गति से, या यों कहें कि बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रही थी. चारों तरफ एक अजीब सन्नाटा था. शायद किसी अनहोनी की आशंका से या और कुछ बात थी, वह सम झ नहीं पाई. ऐसा अकसर होता है कि जब हम किसी संभावित विपदा में फंस जाते हैं तो किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त हो जाते हैं. लेकिन यहां आने का निर्णय तो उसी का था. सुधाकर ने सिर्फ कहा भर था कि पश्चिम और उत्तरदक्षिण बहुत घूम लिए, अब जरा पूरब भी देख लिया जाए.

‘मगर पूरब में हम जाएंगे कहां?’

‘सिक्किम और कहां,’ वह उसे चौंकाता हुआ सा बोला, ‘वहां तुम्हें भारत-चीन की सीमा भी दिखा देंगे.’

वह चौंक कर बैठ गई, ‘क्या सचमुच, वह भारत-चीन की सीमा देख सकती है. क्या आर्मी वाले उसे वहां जाने देंगे?’

‘और क्या,’ सुधाकर हंस पड़ा था, ‘वहां कोई युद्ध तो हो नहीं रहा, जो जाने नहीं देंगे. अलबत्ता तुम वहां चीनी सिपाहियों से हाथ भी मिला सकती हो, बातें भी कर सकती हो.’

‘आश्चर्य की बात है कि कोई आपत्ति नहीं करेगा.’

‘आपत्ति क्यों करेगा. भारत सरकार ने उस स्थान को पिकनिक स्पौट सा डैवलप कर रखा है,’ सुधाकर की हंसी छूट पड़ी, ‘लोग वहां कंचनजंघा के पहाड़ की बर्फ का लुत्फ लेने जाते हैं.’

दरअसल, सुधाकर की नाटकों में अभिनय की बेहद रुचि थी. दिल्ली में वह एक प्रतिष्ठित नाटक मंडली से शौकिया तौर पर जुड़ा हुआ था और उसी नाटक मंडली को सिलीगुड़ी में एक नाटक की प्रस्तुति करनी थी. इसीलिए वह उन लोगों के साथ सिलीगुड़ी जा रहा था. आमतौर पर वह अकेला ही जाता था मगर इस बार उस ने सुमन से पूछ ही लिया कि क्या वह साथ चलेगी.

‘सिलीगुड़ी से सिक्किम कोई

125 मील दूर है. दार्जिलिंग तो मैं कई बार घूम चुका. इस बार सिक्किम जाने का इरादा है. अगर तुम साथ चलो तो ठीक है. वहां हम भारत-चीन सीमा भी देख लेंगे.’

उस ने सहमति दे दी.

दिल्लीगुवाहाटी राजधानी एक्सप्रैस से वे सिलीगुड़ी पहुंचे.

दूसरे दिन ही सुधाकर की नाटक मंडली की प्रस्तुति थी. उस से निवृत्त हो कर अब वह स्वतंत्र था. उस ने सब से पहले ही कह रखा था कि वे सिक्किम जाएंगे.

अगले दिन सुबह 8 बजे सिक्किम की राजधानी गंगटोक के लिए वे बस में सवार हुए. सिलीगुड़ी से गंगटोक के 125 मील के हरियाली से आच्छादित, चक्करदार रास्ते ने जैसे उन्हें चकरा दिया था. साल, चीड़ और देवदार के आसमान छूते वृक्ष से जंगल पटा पड़ा था. उस ने इधर ही सुना था कि सिक्किम में और्किड के फूल की सैकड़ों प्रजातियां हैं, जो अपने मौसम में खिलने पर पूरे जंगल को अपने सौंदर्य के आगोश में समेट लेती हैं. मगर अभी सिर्फ लाल फूलों से गदराए पलाश के वृक्ष ही दिखाई दे रहे थे.

लगभग 1 बजे वे सिक्किम की राजधानी गंगटोक पहुंच गए.

गंगटोक के प्रमुख बाजार में ही सुधाकर ने अपने एक मित्र के माध्यम से एक होटल में कमरा बुक करा लिया था. किसी शहर के पौश इलाके के मार्केट की भांति यहां की मुख्य मार्केट थी. अधिकांश गिफ्ट आइटम ही बिक रहे थे. कहने के लिए स्थानीय, मगर सभी में चीन निर्मित सामान भरे पड़े थे. और क्यों न हों, जब होली की पिचकारियां और दीवाली के दीए तक चीन में बन कर भारतीय बाजार में बिक रहे हैं तो यह तो चीन का सीमावर्ती राज्य है. यहां क्यों न बिकें चीन के खिलौने और उपहार सामग्री. वैसे अन्य सभी खाद्य अथवा स्टेशनरी सहित अन्य सामग्री भारतीय ही थी.

होटल का मैनेजर उन्हें सिक्किम के आसपास के पर्यटक स्थलों की जानकारी दे रहा था. मगर सुमन की इस में कोई रुचि न थी. वह तो बस सिर्फ नाथुला क्षेत्र की भारत-चीन सीमा को देखना चाहती थी.

‘आखिर वहां ऐसा है क्या जो तुम उसे ही पहले देखना चाहती हो,’ सुधाकर हंसते हुए बोला था, ‘वैसे भी तुम देहरादून में रह चुकी हो और कश्मीर की घाटियों व पहाड़ों को देख चुकी हो, इसलिए वहां की कोई चीज शायद ही तुम्हें आकर्षित कर सके.’

वह उसे क्या बताती कि उस नाथुला से उस का एक ऐसा संस्मरण जुड़ा है जो राष्ट्रीय महत्त्व का तो है ही, कुछकुछ उस का वैयक्तिक महत्त्व भी उस के लिए है.

टाटा सूमो स्टैंड पर गाडि़यों की लाइन लगी थी. उस के ड्राइवर और खलासी स्थानीय लोग ही थे. वह अचंभित थी यह देख कर कि इतने सारे लोग बर्फ से ढकी भारत-चीन सीमा देखने जा रहे हैं. सुधाकर ने चूंकि गाड़ी रिजर्व करा रखी थी इसलिए वे शीघ्र ही अपने गंतव्य की ओर चल पड़े.

चढ़ाई पर मंथर गति से गाड़ी बढ़ती जा रही थी. एक तरफ विशालकाय पहाड़ों की चोटियां तो दूसरी तरफ हजारों फुट गहरी खाई. जरा सी नजर चूकी नहीं नहीं कि गाड़ी गहरी खाइयों में जा गिरे. दूर से पर्वतों के रास्ते चित्रकारी किए त्रिभुजाकार सफेद रेखाओं से दिखते थे, जिन पर कतारबद्ध गाडि़यां रेंग रही थीं. पर्वत और घाटियां हरियाली से आच्छादित थे. अब सुमन को थोड़ी सिहरन होने लगी थी. कुछ ठंड से, कुछ भय से.

आखिरकार वह मंजिल आ ही गई जिस का उसे बेसब्री से इंतजार था. दूर पर्वतों की चोटियों पर सैनिक चौकियां दुर्ग सी बनी थीं. यही है वह ओल्ड सिल्क रूट, जिस के रास्ते फाहियान और ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्री हजारों साल पूर्व भारत आए थे और यहां से महात्मा बुद्ध का शांति, सत्य और अहिंसा का संदेश ले कर वापस हुए थे.

यही कुछ तो हुआ था उस के और सुधाकर के परिवार के साथ. विभागीय प्रतिस्पर्धा में उन लोगों के पिता एकदूसरे के जानी दुश्मन बन चुके थे. एक ही जगह नौकरी और एक ही स्थान पर अगलबगल क्वार्टर्स थे उन के. मगर पास  रह कर भी कितने दूर. वे दोनों बचपन से एकदूसरे को जानते थे. एक ही विद्यालय में, एक ही बस में चढ़ कर आनाजाना होता था. मगर स्वार्थ और अहं की आंधी में सबकुछ स्वाहा होने लगा.

एक बार तो सुमन के पिता ने सुधाकर के पिता को लक्ष्य कर अपनी रिवौल्वर से गोली भी चला दी थी. यह संयोग ही था कि गोली उन्हें लगी नहीं और बाद में उन्होंने कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं की.

इसी घटना के बाद उन दोनों का स्थानांतरण अलगअलग कर दिया गया था.कोलकाता से सुधाकर के पिता का ट्रांसफर मुंबई हो गया. जबकि वह अपने परिवार और पापा के साथ देहरादून चली आई थी. बचपन की वह मित्रता और प्रतिशोध की अग्नि की आंच को उस ने महसूस किया था. क्या होता जब सुधाकर के पिता को गोली लग जाती और वे नहीं रहते. तब क्या सुमन के पिता किसी जेल में सलाखों के पीछे होते अथवा फांसी पर लटका दिए जाते. और तब दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते. यह तो सुधाकर के पापा की बुद्धिमानी थी कि उन्होंने कोई ऐक्शन नहीं लिया और चुप्पी साध ली. हालांकि उन्हें भड़काने वाले लोग बहुत थे मगर वे शांत ही रहे.

उस समय उन दोनों को पता नहीं था कि झगड़े की वजह क्या है. सिर्फ आंसुओं से भरी उदास आंखों से सुधाकर के घर को देखते हुए वह गाड़ी में चढ़ी थी. प्रेम और घृणा, दोनों को ही जैसे उस ने बचपन में ही आत्मसात कर लिया था.

देहरादून से थोड़े समय बाद ही उस के पापा का ट्रांसफर मथुरा हो गया, जहां से उस ने स्नातक की परीक्षा पास की. अंगरेजी से एमए करने के लिए उस ने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया और वहीं दिल्ली में होस्टल में रह कर अपनी पढ़ाई करने लगी थी.

एक दिन सहेलियों के बहुत आग्रह पर वह उन लोगों के साथ एक थिएटर में नाटक देखने आई थी. मुंबई से कोई नाटक मंडली आई थी, जिस के इस नाट्य प्रस्तुति की धूम थी. नाटक के छपे पात्र परिचय में सह नायक के रूप में सुधाकर शर्मा का नाम पढ़ कर चौंक गई.

‘कहीं यह वही सुधाकर तो नहीं,’ दिल के किसी कोने से एक आवाज उठी, ‘क्या यह संभव है. क्या एक ही नाम के अनेक लोग नहीं होते, जो वह अचानक ही पागलों की तरह उलटापुलटा सोचने लगी है.’

‘फिर भी मान लो, अगर वही हुआ तो,’ यह सोचते ही उस का सीना धड़क उठा.

उस से रहा नहीं गया. नाटक का शो खत्म होने के पहले ही वह ग्रीनरूम में चली गई और एक व्यक्ति से बोली, ‘मुझे सुधाकर शर्मा से मिलना है.’

‘वह नीले रंग की शर्ट पहने है, सुधाकर शर्मा,’ वह व्यक्ति बोला, ‘उस की ऐक्ंिटग पसंद आई न. बहुत अच्छा ऐक्टर है वह. मिल लो, बधाई दे दो.’

सुधाकर ने भी यही समझा था कि वह उस की ऐक्ंिटग की बधाई देने आई है. मगर सुमन ने उस से सीधेसीधे सवाल कर दिया, ‘आप के पिताजी का क्या नाम है?’

वह एकदम से हंस पड़ा.

‘ओ, तो आप मेरे पापा से मिलना चाहती हैं. मैं तो समझा कि आप मेरे अभिनय की प्रशंसा करने आई हैं. ऐसा लगता है कि आप को मेरा अभिनय पसंद नहीं आया. इसलिए आप मेरे पापा से मेरी शिकायत करना चाहती हैं. वैसे मेरे पिताजी का नाम विमल शर्मा है.’

‘और मेरा नाम सुमन है,’ वह उसे देखते हुए झट से बोल पड़ी, ‘तुम ने शायद मुझे पहचाना नहीं. मैं सुमन हूं. तुम लोग कोलकाता से मुंबई चले गए और हमलोग देहरादून पहुंच गए.’

‘अरे, सुमन तुम,’ सुधाकर ने झपट कर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘यहां कैसे आईं? तुम्हारे मम्मीपापा देहरादून में कैसे हैं? तुम कैसी हो? क्या कर रही हो आजकल?’’

सवाल ही सवाल थे उस के पास.

‘देखो, रात बहुत हो गई है. मेरी सहेलियां मुझे न पा कर परेशान हो जाएंगी. सो, हम कल बात करेंगे. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में अंगरेजी विषय से एमए की पढ़ाई कर रही हूं,’ वह शीघ्रतापूर्वक बोली, ‘तुम मेरा फोन नंबर रख लो. कल शाम कहीं कौफी पीते हुए बातें करेंगे.’

वापस होस्टल में लौटने के बाद भी वह चैन से कहां रह पाई थी और सारी रात उसी के बारे में सोचती रही थी. एक दुबलापतला किशोर अब सुंदर सुदर्शन, तेजस्वी युवक के रूप में बदल चुका था. कल वह उस से मिला तो क्या कहेगी. क्या बातें करेगी उस से. कहीं उस से मिल कर गलती तो नहीं की उस ने. क्या यह जरूरी है कि अतीत की राख को कुरेदा जाए.

अगले दिन लगभग 9 बजे सुबह ही सुधाकर का फोन आ गया, ‘शाम को क्यों, क्या हम अभी नहीं मिल सकते? ऐसा करो कि हम आज एकसाथ सुबह का नाश्ता लेते हैं.’

‘मुझे विश्वविद्यालय जाना है,’ उस ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘फाइनल ईयर की पढ़ाई है.’

‘क्या इतवार को भी विश्वविद्यालय खुला रहता है,’ उधर से हंसने की आवाज आई, ‘वैसे नहीं मिलना चाहती हो तो कोई बात नहीं मगर बहाना तो मत बनाओ.’

‘बहाना ही बनाना होता तो मैं तुम्हें भीड़ में से क्यों निकालती,’ वह बोली. वैसे उस का चौंकना स्वाभाविक था कि उसे बिलकुल खयाल न आया कि आज इतवार है. वह तो नियमित तैयारी कर विश्वविद्यालय जाने को तैयार बैठी थी. कोई बात नहीं. अभी बात करने में क्या हर्ज है.

उस ने मिलने के लिए विश्वविद्यालय के समीप एक रेस्तरां का नाम बता दिया.

‘कुछ संयोग कितने अप्रत्याशित होते हैं,’ सुधाकर उस से मुखातिब था, ‘अभी भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं तुम्हारे सामने बैठा हूं.’

‘वही तो मैं भी सोच रही हूं कि इस भीड़भाड़ भरी जिंदगी में हमारा मिलना कितना सुखद है. शायद यह हमारी हार्दिक इच्छा थी कि हम मिलें. और सुना है कि अंतर्मन में उठी तीव्र इच्छाशक्ति अवश्य फलीभूत होती है,’ सुमन एक सांस में बोल गई, ‘और इसलिए जब नाटक के पात्र परिचय में तुम्हारा नाम देखा तो मिलने की इच्छा बलवती हो गई.’

‘इस के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं.’

‘इस में आभार कैसा. इस में तो मेरा भी स्वार्थ था,’ वह बोली, ‘वैसे तुम ने अभिनय के क्षेत्र को अपना लिया है.’

‘अरे नहीं,’ सुधाकर झेंप कर बोला, ‘यह तो बस शौक के बहाने जीवन में एक चेंज सा आ जाता है. इसी बहाने नईनई जगह घूमने और नएनए लोगों से मिलने का मौका भी मिलता है. यह अलग बात है कि इस बार एक पुराने परिचित से मुलाकात हो गई.’

उस के इस परिहास पर दोनों एकसाथ हंस पड़े. उस दिन वे दोनों दिनभर एकसाथ रहे. नाश्ता, खाना, घूमनाफिरना सब चलता रहा. शाम को अपनी नाटक मंडली के साथ सुधाकर को राजधानी मेल से मुंबई वापस लौटना था. वह उसे स्टेशन तक छोड़ने साथ आई.

इस के बाद एक सिलसिला चल निकला. फोन पर अकसर बातें होने लगीं. अपनी सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सुधाकर गाजियाबाद के एक संस्थान में नौकरी पा गया तो मिलनाजुलना भी होने लगा. तब तक वह भी एक विद्यालय में अंगरेजी की शिक्षिका के तौर पर जौब करने लगी थी.

इन 3 वर्षों के दौरान महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि न तो सुधाकर ने और न ही सुमन ने अपनेअपने परिवार की चर्चा की और न ही परिवार को इस बात की जानकारी दी थी. इन के परिवार के सामने इन का राज तो तब खुला जब सुमन के विवाह के लिए उस के घर में चर्चा चलने लगी. तब उस ने अपनी मां को सुधाकर के बारे में जानकारी दे दी और साफ कह दिया कि वह उस से विवाह करना चाहती है.

सुमन के मम्मीपापा को इस में आपत्ति नहीं थी मगर उन्होंने इस के पूर्व सुधाकर से मिलने की इच्छा जताई.

सुधाकर मथुरा जा कर सुमन के मम्मीपापा से मिल आया. सुमन के पापा तब तक नहीं जान पाए थे कि सुधाकर उन्हीं के मित्र विमल शर्मा का पुत्र है, जिन को लोग उन के शत्रु के रूप में जानते हैं. उन्हें अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश थी, जो घरबैठे पूर्ण हो रही थी.

यह राज तो तब खुला जब सुधाकर के मम्मीपापा अपने बेटे के विवाह के लिए औपचारिक रस्म निभाने मथुरा आए.

थोड़ी देर के लिए तो वे दोनों अवाक् रह गए कि वे क्या देखसुन रहे हैं. और उन्हें क्या और कैसे बात करनी है.

‘मुझे माफ कर दो, विमल,’ आखिरकार सुमन के पापा रुंधे कंठ से बोले, ‘15 साल पहले की गई गलती का एहसास मुझे समय रहते हो गया था. मगर समय को वापस लौटाना कहां संभव है. अगर वह हादसा हो जाता जिसे करने की मैं ने कोशिश की थी, तो दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते.’

‘अब उस बात को जाने भी दो.’

‘मैं सुमन का विवाह सुधाकर से करूं, यही मेरा प्रायश्चित्त होगा.’

‘अरे, यह प्रायश्चित्त की नहीं, प्रसन्नता की बात है. मैं अपने बेटे के लिए तुम्हारी बेटी का हाथ मांगने आया हूं,’ विमल शर्मा उन्हें गले लगाते हुए बोले, ‘उस दुस्वप्न को तो मैं कब का भूल चुका हूं.’

विवाह की रस्म पूर्ण होने के कुछ दिन बाद वह सुधाकर के घर चली आई थी.

‘‘अरे सुमन, कहां खो गईं,’’ सुधाकर बोला तो उस की तंद्रा टूटी, ‘‘जरा बाहर का नजारा तो देखो, कितना खूबसूरत है.’’

वह शीघ्रतापूर्वक संभल कर चैतन्य हुई. गाड़ी के शीशे से वह बाहर प्रकृति का नजारा देखने लगी. रास्ते की ढलान पर गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. जरा सी फिसलन हुई नहीं, जरा सा चूके नहीं कि सैकड़ों फुट गहरी खाई में गिरने का खतरा था.

जैसा कि भय था, वही हुआ. बारिश अब बर्फबारी में बदल चुकी थी. रूई के फाहे के समान बर्फ के झोंके गिर रहे थे. देखते ही देखते पहाड़ों और घाटियों की हरियाली बर्फ की सफेद चादर से ढक गई थी. चारों तरफ दूरदूर तक निशब्द सन्नाटा था. वातावरण पर जैसे एक ही सफेद रंग पुत सा गया था. बर्फ की परत जमी कंक्रीट की सड़क पर गाडि़यों का काफिला बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रहा था. जैसे किसी आसन्न खतरे का आभास हो, वैसी चुप्पी सब के चेहरे पर चस्पां थी. चूंकि गाडि़यों के ड्राइवर स्थानीय थे और एक्सपर्ट थे, यही एक बात आश्वस्त करने वाली थी कि दिक्कत नहीं आएगी.

रास्ते में कहींकहीं कुछ अर्द्धवृत्ताकार टिन के घर दिखे, जिन के बाहर सन्नाटा पसरा था. वहीं कहीं कुछ धर्मचक्र घुमाते बौद्ध भिक्षु दिखे. मंत्र लिखित सफेद पताकाओं की शृंखलाएं भी पहाड़ों और घाटियों के बीच दिख जाती थीं, जो हवाओं से लहराते हुए रहस्यमय वातावरण का सृजन करती प्रतीत होती थीं.

रास्ते में छोटेनाटे, मगर हृष्टपुष्ट कदकाठी के स्थानीय स्त्रीपुरुष दिखे, जो सड़क के निर्माण कार्य में व्यस्त थे. रबर के गमबूट और दस्ताने पहने, पत्थर तोड़ते और बिछाते हुए स्थानीय लोग. कभी खाली हाथ तो कभी बेलचोंकांटों की मदद से काम करते. भीमकाय डोजरक्रशर आदि कहीं पत्थरों में छेद करते तो कहीं काटतेतोड़ते, कहीं हटाते और डंपरों में भरते अथवा खाली करते थे.

जीवन में रोमांच क्या होता है और हजारों फुट ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ों का जीवन कितना कठिन होता होगा, यह उसे अब समझ में आने लगा था. रास्ते के किनारे पैरों में गमबूट और हाथों में रबर के दस्ताने पहने रास्ते को ठीक करने वाले स्थानीय मजदूर इस जोखिम भरे मौसम में भी काम कर रहे थे.

सड़क के कार्यरत स्थल पर पहाड़ी कुत्ते रास्ते की बर्फ में ही कुलेल कर रहे थे. एक स्थान पर भैंसे समान याक पर सामान लादे कुछ स्थानीय लोग उधर से गुजर गए.

ओ, तो यही याक है. इसे देखना भी एक सुखद संयोग था.

बादलों के बीच सूर्य पता नहीं कहां छिप गया था. बर्फबारी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रास्ते की फिसलन बढ़ती जा रही थी. एक स्थान पर गाडि़यों का काफिला रुका तो सभी गाडि़यों के ड्राइवर गाड़ी के पिछले पहियों में लोहे की जंजीर पहनाने लगे ताकि फिसलन का दबाव कम हो. यह भी एक अलग रोमांचक अनुभव था.

लगभग 9 बजे रात में गाड़ी ने जब गंगटोक शहर की सीमा में प्रवेश किया तो सभी की जान में जान आई. इधर हिमपात के बजाय वर्षा हो रही थी. गाडि़यों की गति में अब तीव्रता आ गई थी. एक खतरनाक अनुभव से गुजर कर अब सभी जैसे चैन की सांस ले रहे थे.

होटल पहुंच कर उन्होंने कपड़े बदले. होटल का नौकर खाना लगाने लगा.

‘‘बहुत दिक्कत हुआ न साहेब,’’ वह बोला, ‘‘अचानक ही मौसम खराब

हो गया. यहां अकसर ही ऐसा हो

जाता है.’’

‘‘हां भई, बड़ी मुश्किल से जान बची,’’ सुधाकर बोला, ‘‘बर्फ भरे रास्ते पर गाड़ी का चलना बहुत मुश्किल था. मुझे लगा कि अब हमें वहीं सड़क के किनारे रात काटनी होगी. अगर ऐसा होता तो हमारी तो कुल्फी ही जम जाती.’’

वह चुपचाप बाहर का दृश्य देख रही थी. बारिश बंद हो चुकी थी और सितारों से सजे आकाश के नीचे गंगटोक शहर  कृत्रिम रोशनी में झिलमिला रहा था. वैसे भी पहाड़ी शहर होते ही ऐसे हैं कि हमेशा वहां दीवाली सी रोशनी का आभास होता है. मगर वहां का नजारा ही कुछ अलग था. वहां के ऊंचेऊंचे दरख्त हरियाली से भरे पड़े थे.

‘‘अरे, तुम कुछ बोलो भी,’’ सुधाकर बोला, ‘‘लगता है तुम काफी डर गई हो.’’

‘‘डर तो गई ही थी, सुधाकर,’’ वह बोली, ‘‘फिलहाल मैं नाथुला की सीमाओं के बारे में सोच रही हूं, जहां भारतीय और चीनी सैनिक आमनेसामने खड़े थे. हम तो वहां से सुरक्षित निकल कर यहां आ गए. मगर उस बर्फबारी में भी वे अपनी सीमाओं पर डटे होंगे. मैं यह सोच रही हूं कि इस परिस्थिति में भी क्या उन्हें अपने परिवार की याद नहीं आती होगी, जैसे कि हमें आई थी?’’

‘‘क्यों नहीं याद आती होगी, सुमन,’’ सुधाकर गंभीर स्वर में बोला, ‘‘तमाम प्रशिक्षण के बावजूद आखिर वे भी मनुष्य हैं. उन के सीने में भी दिल धड़कते हैं. और उन के मन में भी मानवीय विचार अंगड़ाई लेते होंगे. उन के हृदय में भी भावनाएं हैं. मगर कर्तव्य सर्वोपरि होता है, इस का एहसास उन्हें है. इसी कारण हम यहां सुरक्षित हैं. देश और समाज इसी तरह आगे बढ़ता और सुरक्षित रहता है. तुम्हारे एक चाचाजी भी तो इसी प्रकार के सैनिक थे.’’

सुमन का मन एक गहरी टीस से

भर गया.

‘‘हमारे और तुम्हारे परिवार के बीच में भी एक खटास थी, जो हम ने खत्म कर दी. क्या इसी प्रकार राष्ट्रों के बीच की यह खटास खत्म नहीं हो सकती?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकती,’’ वह बोला, ‘‘स्वार्थ और संघर्ष की व्यर्थता का एहसास होते ही दूरियां खत्म होने लगती हैं,’’ सुधाकर उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया था, ‘‘काश ऐसा हो पाता, जैसा कि तुम सोच रही हो.’’

बाहर बारिश थम गई थी. बादल छंट गए थे और आकाश सितारों से सज गया था. धुला हुआ गंगटोक शहर अब कृत्रिम प्रकाश से और चमक उठा था.