मदन ने फोन उठाया. ‘‘कैसी तबीयत है तुम्हारी? यदि हम फोन न करें तो तुम से कभी बात भी न हो… पूर्वा की शादी के लिए कोशिश कर रहे हो या उसे ऐसे ही बैठाए रखने का इरादा है?’’ उधर से आवाज आई.

‘‘नहींनहीं, भाई साहब… आप को तो मालूम है कि उस ने बैंक से लोन ले कर पढ़ाई पूरी करी है, तो पहले उसे लोन चुकाना है, इसलिए नौकरी देख रही है.’’

‘‘तो अब तुम बैठ कर बेटी की कमाई पर ऐश करोगे.’’

‘‘अरे नहीं, मैं तो अपाहिज हूं… उस की शादी आप को ही करनी है. कोई लड़का निगाह में हो तो बात चलाइएगा.’’

‘‘ठीक है.’’

मदनजी पत्नी संध्या से बोले, ‘‘भाई साहब को हम लोगों की कितनी फिक्र रहती है.’’

तभी चहकती हुई पूर्वा मां से लिपट कर बोली, ‘‘मां, मेरा कैंपस सलैक्शन हो गया है.’’

‘‘अरे वाह, शाबाश,’’ वे बेटी का माथा चूमते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हारी जौब किस कंपनी में लगी है?’’

‘‘विप्रो,’’ कह उस ने पापा के चरणस्पर्श किए.

पापा की आंखें सजल हो उठीं. बोले, ‘‘खूब तरक्की करो, मेरी बेटी… कब और कहां जौइन करना है?’’

‘‘पापा, जौइनिंग लैटर आने के बाद ही पता लगेगा… वैसे मैं ने दिल्ली के लिए लिखा था.’’

‘‘ठीक है, तुम्हारा रहने का प्रबंध ताऊजी के यहां हो जाएगा.’’

‘‘पापा, मैं अपने रहने के विषय में निर्णय नहीं कर सकती?’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या?’’

पूर्वा का जौइनिंग लैटर आ गया था. दिल्ली औफिस में जौइन करना था.

दिल्ली का नाम सुनते ही पापा खुश हो उठे. उन्होंने तुरंत ताऊजी को फोन लगा कर सूचना दे दी, ‘‘भाई साहब, पूर्वा की नौकरी दिल्ली में लग गई है. 15 तारीख से जौइन करना है.’’

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है.’’

‘‘अभी कुछ दिन आप के पास रहेगी, फिर अपने लिए कमरा देख लेगी.’’

‘‘क्यों? क्या वह मेरी बेटी नहीं है? डौली, बिन्नी का कमरा खाली ही तो पड़ा है. हम लोगों का भी मन लग जाएगा.’’

संध्याजी धीरे से बोलीं, ‘‘उन के घर पर रहना ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि औफिस के चक्कर में घर के कामों में यह हाथ नहीं बंटा पाएगी, तो भाभीजी को अच्छा नहीं लगेगा.’’

‘‘तुम्हारे दिमाग में तो बस ऊटपटांग बातें ही घूमती रहती हैं. मेरे भाई साहब तो हमेशा तुम्हारी आंखों की किरकिरी रहे हैं. जवान लड़की यहांवहां रहेगी वह तुम्हारे लिए ठीक है, पर भाई साहब के घर ठीक नहीं है. तुम्हें तो कभी यह अच्छा ही नहीं लगता कि हम दोनों भाई आपस में प्रेम से रहें.’’

पूर्वा ने स्थिति को संभालते हुए कहा,

‘‘बस पापा, आप शांत हो जाएं… मैं ताऊजी के घर ही रहूंगी.’’

संध्या मन ही मन सोचने लगीं कि यदि उन के पास पैसा होता तो उस के लिए कोई राजकुमार ढूंढ़ कर उसे डोली में बैठा कर विदा कर देतीं. परंतु मजबूरी जो न करवाए वह थोड़ा है.

वे सोचने लगीं कि बैंक से लोन उठा कर किसी तरह बेटी को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई है. इसीलिए शादी से पहले नौकरी कर के लोन चुकाना जरूरी है. दूसरी बात आजकल सभी लोग बताते हैं कि नौकरी करने वाली लड़कियों को अच्छे लड़के जल्दी मिलते हैं, क्योंकि महंगाई के जमाने में एक की कमाई से सारे शौक पूरे नहीं हो सकते. इसलिए अपने सपनों को सच करने के लिए दोनों का कमाऊ होना आवश्यक हो गया है.

आजकल शादियों में खर्च भी अधिक होने लगा है. उस दिन घरघर झाड़ूपोंछा करने वाली माधुरी भी अपनी बेटी की शादी में क्व4 लाख खर्च हो जाने की बात कह रही थी. वह क्व4 लाख खर्च कर सकती है तो वे तो सरकारी स्कूल में टीचर हैं. उन के पास तो कुछ भी नहीं है… जो कुछ कमाया वह पति की बीमारी और बेटी की शिक्षा पर खर्च करती रही हैं.

उन्होंने तो यह शपथ भी ले रखी है कि बेटी की शादी में दहेज नहीं देंगी और बेटे की शादी में लेंगी नहीं.

तभी बेटी की आवाज से उन की तंद्रा भंग हुई, ‘‘मां, यह आप ने इतने बड़े डब्बे में क्या भर दिया है?’’

‘‘तू नहीं समझती, तेरे ताऊजी को लड्डू बहुत पसंद हैं और अचार व मठरियां तेरी ताई के लिए हैं,’’ फिर आंखों में आंसू भर आगे बोलीं, ‘‘देख बेटा, दूसरे के घर में निभाना आसान थोड़े ही होता है. यहां की तरह पटरपटर मत करना… ताऊजी के सामने तो बिलकुल मुंह बंद रखना. ‘‘ताऊजी को तो तुम जानती ही हो.

3-5 कर के उन्होंने 2-4 किताबें छपवा ली हैं, तो अपने को बहुत महान लेखक, ज्ञानी और विद्वान समझने लगे हैं. मेरी बात गांठ बांध ले,

उन से न तो बहस करना और न ही उन्हें कभी जवाब देना.’’ संध्याजी ने भीगी आंखों से बेटी को विदा किया था. जबकि उस के पापा भाई साहब के घर भेज कर बहुत खुश और आश्वस्त थे कि उन की बेटी अपने घर पर रहेगी और वहां उसे कोई परेशानी नहीं होगी.

पूर्वा पहली बार दिल्ली अकेले जा रही थी, इसलिए थोड़ी घबराई हुई थी, मगर स्टेशन पर ताऊजी को देख उस ने राहत की सांस ली. घर पहुंचते ही ताईजी की निगाहें उस से अधिक उस के साथ आए बड़े से डब्बे पर थीं.

ताऊजी के सूने घर में पूर्वा के आने से मानो नवजीवन का संचार हो गया. ताऊजी को उन की ऊलजलूल तुकबंदियों को सुनने के लिए एक श्रोता मिल गया था और ताईजी को उन की किचन के लिए एक पार्टटाइम सहायक.

कुछ दिन तक तो पूर्वा इन सब परिस्थितियों से तालमेल बैठाने का प्रयास करती रही, पर चक्की के 2 पाटों के बीच वह पिसने लगी थी. थकीमांदी औफिस से आती तो दोनों अपनीअपनी जरूरतों के लिए उसे अपने पास चाहते और फिर दोनों के बीच लड़ाई शुरू हो जाती. उस की समझ नहीं आता कि क्या करे?

उस ने मन ही मन हल सोचा कि वह औफिस से देर से आया करेगी. तब तक दोनों अपने टीवी सीरियल में व्यस्त हुआ करेंगे.

मगर ताऊजी बहुत तेज दिमाग थे या कह लो पूरे घाघ. उन्हें यह उस की उद्दंडता लगी थी. वे उस की चतुराई को समझ गए थे. इसलिए उन्होंने विरोधी पार्टी वाले तेवर दिखाने शुरू कर दिए.

अगले ही दिन उसे घुड़कते हुए बोले, ‘‘इतनी देर औफिस में क्या करती रहती हो? समय से लौटा करो. यह कोई होटल थोड़े ही है कि जब मरजी मुंह उठा कर चली आई. वहां दिन भर चहकती रहती होगी और घर में घुसी नहीं कि मुंह लटक जाता है.’’

वह चुप रही थी. इसी तरह से दिन बीतते रहे. 6 महीने पूरे हो गए थे. उस का प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो गया था. वह परमानैंट हो गई थी. उसे इंक्रीमैंट भी मिल गया था. वह खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थी. वह रास्ते से मिठाई खरीदती लाई.

‘‘ताऊजी, मेरी प्रमोशन हो गई है… लीजिए मिठाई. मुंह मीठा करिए,’’ कह उस ने डब्बा

उन के सामने कर दिया.

‘‘अब कितनी सैलरी हो गई तुम्हारी?’’

‘‘50 हजार.’’

‘‘वाह रे… मैं तो इतना विद्वान लैक्चरर था, परंतु इतनी जल्दी इतनी सैलरी नहीं हुई.’’ ‘‘ताऊजी, अब समय बदल गया है. इंजीनियर को इतनी ही सैलरी मिलती है और फिर आईटी सैक्टर में इंक्रीमैंट जल्दीजल्दी मिलता है.’’

‘‘हां… हां… मैं सब समझता हूं कि तुम्हारा क्या चल रहा है,’’ उन की निगाहों में शक साफ झलक रहा था.

औफिस से लौटने में पूर्वा को रोज रात के लगभग 8 बज जाते थे. एक दिन औफिस में पार्टी थी. दूसरे साथियों के आग्रह को वह ठुकरा नहीं सकी और लौटने में उसे 10 बजे गए. वह तेजी से दौड़तीभागती घर पहुंची तो ताऊजी ने ही दरवाजा खोला. उन की आंखों में लाल डोरे तैर रहे थे.

आज उन्होंने उस पर सीधा हमला बोला, ‘‘मैं सब कुछ जानसमझ रहा हूं कि औफिस के नाम पर क्या चल रहा है. शरीर के सारे अंग अलगअलग पैसा कमाने के साधन बन गए हैं. लता मंगेशकर अपने गले की बदौलत धनकुबेर बन बैठी हैं तो सलमान खान हो या प्रियंका चोपड़ा अपनी कमर मटका कर धन कमा रहे हैं. मजदूर बोझा उठा कर पैसा कमा रहा है. नाचने वालियां नाच कर और सैक्स वर्कर अपने शरीर से धन कमा रही हैं.

‘‘यह भौतिकवाद का युग है. जिस के पास जितना अधिक धन है, वह उतना ही सामर्थ्यवान है. मैडमजी, आधुनिक बन कर क्या लड़कियां शरीर बेच कर धन नहीं कमा रही हैं… आप को मुझे सफाई देने की जरूरत नहीं है.’’

पूर्वा भाग कर ताईजी के पास पहुंच गई. इस समय ताऊजी की भावभंगिमा डरावनी लग रही थी. ताईजी ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘कुछ नहीं बिटिया… आज इन्होंने कुछ ज्यादा चढ़ा ली होगी… तुम्हारी फिक्र में सोए न होंगे इसलिए बकबक करने लगे होंगे. हम लोग भी तो बेटीबहू वाले हैं और फिर तुम भी तो हमारी बिटिया ही हो. ऐसी गंदी बात वे सोचते हैं तो इस का पाप तो उन्हें ही लगेगा… शराब व मुराद बड़ी बुरी चीज है. तुम इन की बातों को दिल पर मत लो.’’

उस रात ताईजी उसे बहुत ममतामयी लगी थीं. उसे इस बात की खुशी थी कि कम से कम ताईजी तो उसे गलत नहीं समझतीं. उस से खाना भी नहीं खाया गया था. उस की आंखों से आंसू बह निकले थे.

ताईजी ने प्यार से उस के आंसू पोंछे थे. वे बोली थीं, ‘‘अपने पापा से कुछ मत कहना, क्योंकि ये दोनों भाई एक से हैं. मेरी तो जिंदगी बीत गई इन के साथ रोते हुए.’’

पूर्वा मन ही मन सोच रही थी कि यदि इन बातों की भनक भी मांपापा को लगी तो नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी.

ताईजी की प्यार भरी बातों से उस का मन हलका हो गया था. कुछ ही दिन बीते थे कि सुबहसुबह वह न्यूजपेपर खोल कर उस पर निगाहें टिकाए कमरे में जा रही थी. तभी उधर से ताऊजी चाय का प्याला हाथ में ले कर आ रहे थे. वह उन से हलकी सी टकरा गई और चाय उन के हाथ पर छलक गई. बस फिर क्या था.

वे आपे से बाहर हो उठे, ‘‘तुम अफसर होगी तो अपने दफ्तर की… हमें नहीं सौंप रही अपनी कमाई… 26 साल की होने को आई, शादी नहीं हुई वरना तो अब तक 2 बच्चों की मां होती.

‘‘तमीज तो सीखी ही नहीं है… नीचे देख कर तो चलना ही नहीं सीखा… मेरी बात गांठ बांध लो, यदि यही हाल रहा तो एक दिन तुम जिन ऊंचाइयों का ख्वाब देख रही हो, उन से औंधे मुंह गिरोगी. उस दिन सारा दिमाग ठिकाने आ जाएगा.’’

धीरेधीरे ताऊजी को शायद उस की शक्ल से ही चिढ़ होने लगी थी. रोज सुबह ही शुरू हो जाते. किसी न किसी बात पर बड़बड़ कर उस का मूड खराब कर देते. सुबह वह चाहे जितनी जल्दी बाथरूम जाए वे उसी समय बाहर से खटखटाना शुरू कर देते कि कोई इतनी देर बाथरूम में लगाता है भला?

वह बाजार से कभी सब्जी, कभी फल तो कभी नाश्ता ला कर ताईजी को तो खुश रख पा रही थी, पर ताऊजी बहुत विचित्र थे. उन्हें खुश रखना टेढ़ी खीर था.

जब पूर्वा बहुत परेशान हो गई तो एक दिन फोन पर मां से अपने मन का गुबार निकाल ही दिया, ‘‘मां, लंच और सुबह का नाश्ता में औफिस में खाती हूं. बस एक टाइम रात का खाना खाती हूं. इस के एवज में मैं बराबर घर का सामान लाती रहती हूं. अब मेरी सहनशक्ति जवाब देने लगी है. मेरा यहां रहना अब नामुमकिन होता जा रहा है… अगले महीने मैं कोई पीजी देख कर उस में शिफ्ट हो जाऊंगी.’’

पापा हमेशा मां की बातों पर अपने कान लगाए रहते थे. छोटे घरों की यह मजबूरी होती है कि कोई बात किसी से छिपाना आसान नहीं होता.

वे तुरंत मोबाइल अपने हाथ में ले कर बोले, ‘‘बेटी, यदि पीजी में जा कर रहोगी तो हम दोनों भाइयों के बीच दरार पड़ जाएगी… इसलिए समझदारी से काम लो. जब वे आज भी मुझे कुछ भी बोलने से बाज नहीं आते हैं तो तुम तो मेरी बिटिया हो… उन्हें तो हमेशा चीखनेचिल्लाने और उलटासीधा बोलने की आदत रही है. मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं, मान जाओ.’’

बस बात यहीं समाप्त हो गई थी. पूर्वा के चुप रहने के कारण ताऊजी ओछी हरकतों पर उतर आए थे. लाइट जाते ही यदि इनवर्टर से पंखा चल रहा होता तो दौड़ कर आते और पंखा बंद कर देते.

4 बातें अलग से सुनाते, ‘‘मैडमजी, यह औफिस नहीं घर है. यहां दूसरे लोग भी रहते हैं.’’

यदि फ्रिज से पानी की बोतल निकालती तो व्यंग्य से बोलते, ‘‘इस गरीब पर दया कर के यदि एक ठंडी बोतल छोड़ दी जाए, तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

जब कभी वह रात में खाना नहीं खाती तो उसे अगली सुबह बासी रोटियां खानी पड़तीं या फिर ताऊजी की उलटीसीधी बातें सुननी पड़तीं. ताऊजी को सांस फूलने की बीमारी थी. सर्दियों का मौसम आ गया था. उन्हें ठंड बहुत लगती थी. इसलिए वे हफ्तों नहीं नहाते थे.

शरीर में तेल मालिश के बड़े शौकीन थे. धूप में बैठ कर घंटों तेल मालिश करना उन का प्रिय टाइमपास था. जब वे पास से निकलते तो सरसों के तेल की तेज महक से नाक बंद कर लेने का मन करता, परंतु उन के डर से पूर्वा सांस रोक कर रह जाती थी.

एक दिन पूर्वा से बोले, ‘‘अभिमान तो किसी का नहीं रहा है, तुम भला कौन सी चीज हो… दुनिया में जाने कितने अफसर पड़े हैं,

परंतु ऐसा अनर्थ नहीं देखा कि मंदिर में सिर भी न झुकाए?’’

उस ने इशारे से ताईजी से पूछा था तो वे धीरेधीरे बड़बड़ाईं, ‘‘सठिया गए हैं. हर समय दारू के नशे में रहेंगे तो ऐसे ही उलटासीधा बकेंगे. इन की इन्हीं हरकतों के चलते न तो बेटाबहू कभी यहां आना चाहते हैं और न बेटी.

‘‘बिटिया, तुम इन की बातों पर ध्यान मत दिया करो. इन की तरह जोरजोर से घंटा बजाने से ही थोड़े पूजा होती है.’’

रात में जब ताऊजी टीवी बंद कर के अपने कमरे में चले जाते तो वह अपना मनपसंद सीरियल, गाने या फिर पिक्चर लगा लेती. परंतु उसे परेशान करने के लिए वे फिर से लौट कर वहां आ जाते और झट चैनल बदल देते. अनावश्यक घंटों ऊंघते हुए हाथ में रिमोट ले कर चैनल बदलते रहते.

कभी भूलवश टीवी की आवाज अधिक हो जाती तो चीखते हुए हाजिर हो जाते, ‘‘महारानीजी, आज आप सोने देंगी या रात्रिजागरण का कार्यक्रम करवाओगी.

‘‘मैडमजी आप तो जवान हैं. मैं 65 साल का बूढ़ा हूं… अब इतना दमखम तो बचा नहीं कि रात भर जाग सकूं.’’

पूर्वा तुरंत टीवी बंद कर के सोने का अभिनय करती और मन ही मन टीवी से दूर रहने का निश्चय करती. मगर 2-4 दिन बाद उस का मन मचल उठता और रिमोट हाथ में उठा लेती.

वहां रहते हुए लगभग 2 साल हो चुके थे. अपनी कंपनी और सैलरी दोनों से वह खुश थी, परंतु ये ताऊजी तो पूरी तरह से हाथ धो कर उस के पीछे पड़े रहते थे.

कुछ दिनों से ताऊजी अखबार के वैवाहिक विज्ञापनों में निशान लगाने में व्यस्त थे. एक दिन पूर्वा ने उन्हें ताईजी से कहते सुना, ‘‘अब तो इस ने बहुत रुपए जमा कर लिए होंगे. उन्हीं पैसों से इस की शादी कर देंगे.’’

उस ने उन विज्ञापनों को देखा, जिन पर निशान लगे थे. उन में से कोई 40 वर्ष का था तो कोई विधुर. यहां तक कि एक मंदबुद्धि भी था.

अब वह परेशान हो उठी थी कि ताऊजी ने तो हद ही पार कर दी. वह परेशान हो उठी थी. इस समस्या का सामना वह कैसे करे. उस का औफिस में भी मन नहीं लगता था. तभी एक दिन किसी लड़के को उस के औफिस का पता बता कर वहां भेज दिया. उस समय उस की स्थिति बहुत विचित्र हो गई. फ्रैंड्स के बीच उस का खूब मजाक बना. वह बिफर पड़ी थी. घर पहुंचते ही ताईजी से लिपट कर बिलख पड़ी.

जब वह काफी देर रो ली तो उन्होंने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखो बिटिया, तुम्हारे ताऊजी की सब बेवकूफियां हम जानते हैं. तुम अपने औफिस के किसी लड़के को पसंद करती हो तो बताओ, मैं तुम्हारा साथ दूंगी.’’

ताईजी ने प्यार से अपने हाथ से उसे खाना खिलाया था. रात में जब वह लेटी तो उस की नींद उड़ी हुई थी. उसे अपने कालेज के मस्ती भरे दिन याद आ रहे थे. वह बीटैक में फ्रैशर थी. रैगिंग के डर से कांप रही थी. उसे अपने सीनियर को प्रोपोज कर के किस करना था. उस की आंखें बरस पड़ी थीं.

उस के आंसू देख कर एक सीनियर को उस पर दया आ गई. उस ने शालीनतापूर्वक अपनी हथेली उस के सामने रख कर किस करने को कहा. उस दिन वह आसानी से बच गई थी. वह सीनियर शशांक था. उसी दिन से वह उस का दोस्त बन गया. दोनों साथ पढ़ाई करते, कौफी पीते, साथ घूमते. उस की सारी समस्याओं का हल शशांक चुटकियों में कर देता.

धीरेधीरे न जाने कब शुरू हो गया मोबाइल पर कभीन खत्म होने वाला लंबीलंबी बातों का सिलसिला. जिस दिन दोनों एकदूसरे को न देखते या बात न करते सब कुछ अधूराअधूरा लगता. शायद इसी को प्यार कहते हैं, परंतु अभी तो दोनों के सामने अपनाअपना कैरियर था. यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा था.

शशांक की फाइनल परीक्षा हो चुकी थी. वह बहुत खुश था. उस का कैंपस सलैक्शन भी हो चुका था. बस प्लेसमैंट मिलना था. उस की जाने की तैयारी चल रही थी. वह उदास हो उठी थी. तब उस ने गंभीर हो कर उसे शादी के लिए प्रोपोज कर दिया. बस इसी बात को ले कर वह उस से नाराज हो गई और उस से बातचीत बंद कर दी.

जब जाने का समय आया तो शशांक उस से मिलने आया. उस ने प्रौमिस किया कि दोनों दोस्त बने रहेंगे, उस से अधिक कुछ नहीं. वह सिलसिला आज भी चल रहा था.

शशांक को बैंगलुरु में पोस्टिंग मिली थी. वह गुड़गांव में थी, इसलिए मुलाकातें तो मुश्किल हो गई थीं, पर औनलाइन चैटिंग और फोन पर मस्ती चलती रहती थी.

अब जब ताऊजी उस की शादी की कोशिश करने लगे हैं और ताईजी भी उस से उस के मनपसंद लड़के के बारे में पूछ रही हैं तो उस के लिए प्यार की मीठीमीठी घंटियां बजने लगीं. शशांक जैसा जीवनसाथी ही तो उसे अपने लिए चाहिए पर उस ने तो इन दिनों उस से इस संबंध में कोई बात ही नहीं की. उस का मन तरंगित हो उठा…

मगर क्षण भर में ही उसे अपने सपने टूटते से लगे, क्योंकि शशांक एसटी कोटे से था. पापा और ताऊजी दोनों को ही अपने ब्राह्मणत्व का बड़ा गुमान था. इस विषय को ले कर वे पक्के रूढि़वादी थे. कई दिनों तक वह अनिर्णय की स्थिति में रही.

अब वह करे तो क्या करे? मांपापा की आंखों में तैरती खुशियों की चमक, ममतामयी ताईजी का पलपल प्यार से गले लगा कर कहना कि मेरी लाडो को दुनियाजहां की सारी खुशियां मिलें. परंतु ताऊजी उसे संदिग्ध लगते थे. वे फोन पर फुसफुसाते हुए न जाने किस गुणाभाग में लगे रहते थे.

पूर्वा को दूरदूर तक कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. वह ताऊजी की फुसफुसाहटों पर अपने कान लगाए रहती. उसे पूरा विश्वास था कि ताऊजी उस की शादी फिक्स करवाने के एवज में अवश्य कोई लंबा हाथ मार रहे होंगे. वह चुपके से उन के कागज टटोलती, उन का फोन चैक करती कि कोई एसएमएस उसे पढ़ने को मिल जाए, परंतु वह अपने शक को सच में परिवर्तित करने में सफल नहीं हो पा रही थी.

पूर्वा को ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे किसी दलदल में धंसती जा रही है जहां से निकलना कठिन है. वह इसी उलझन में थी. तभी उसे ऐसा अनुभव हुआ कि शशांक ने उस की हथेलियों को पकड़ लिया है और उसे दलदल से बाहर निकाल लिया है. वह उस के साथ भागती जा रही है.

वह चौंक कर अपने चारों ओर देखने लगी, क्योंकि वह अब भी अपनी हथेलियों में उस के हाथों के स्पर्श को महसूस कर रही थी. उस ने शरमाते हुए अपनी हथेलियों को स्वयं ही चूम लिया जैसे वे अपनी नहीं वरन शशांक की हों. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. शशांक जैसे उस के रोमरोम में समाया हो. अब वह उस के बिना एक पल भी नहीं रह सकती थी.

उस के मन की ऊहापोह एवं अनिर्णय की स्थिति समाप्त हो चुकी थी. वह ताऊजी के लिए अपने भावी जीवन की बलि नहीं चढ़ा सकती. उस ने तुरंत शशांक को फोन मिला कर पूछा, ‘‘मुझ से शादी करोगे?’’

शशांक खुशी से उछल पड़ा, ‘‘डियर, इस दिन का तो मैं कब से इंतजार कर रहा था. बताओ मैं कब आऊं?’’

उस का दिल बल्लियों उछल रहा था.

ताऊजी के रुद्र रूप को सोच आज पूर्वा मुसकरा उठी थी. अंतत: वह ताऊजी के जाल से आजाद होने जा रही थी. अब उस के मन में न ताऊजी का डर था और न ही मम्मीपापा का.

वह ममतामयी ताईजी की शुक्रगुजार थी. उन्होंने सदा उस का साथ दिया.

पूर्वा के सिर से बड़ा बोझ उतर चुका था. वह तय कर चुकी थी कि वह अपने निर्णय पर अडिग रहेगी. इस घुटन भरी जिंदगी से आजाद हो कर खुली हवा में सांस लेगी. वह मंदमंद मुसकरा उठी थी.

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