ऐसा कभी नहीं हुआ कि अशरफ ने साल के 365 दिनों में एक दिन भी माणिकचंद के घर आने में नागा किया हो. लेकिन एक महीने से अशरफ का न तो औफिस में पता चला, न ही खेल के मैदान में.

अच्छी कदकाठी का 25 वर्षीय अशरफ रेलवे की फुटबौल टीम का खिलाड़ी और बिजली विभाग का कर्मचारी है. वह बेहद हंसमुख, मिलनसार, मददगार और बच्चों के साथ तुतला कर उन का दिल जीतने वाला है.

माणिकचंद 3 सालों से दिल के मरीज थे. औफिस का काम जैसेतैसे निबटा कर घर आते ही बिस्तर पर लेट जाते. लेकिन घर में किसी भी चीज की कमी महसूस नहीं होती. अशरफ औफिस या फुटबौल की प्रैक्टिस से लौटते हुए उन के घर का सारा सौदा, दवाइयां और बच्चों का सामान ले आता.

माणिकचंद की पत्नी अपर्णा अशरफ की हमदर्दी को देख कर अकसर सोचती कि क्या उन का बेटा भी बड़ा हो कर अपने परिवार से इतनी ही गहराई से जुड़ा रहेगा, सब की इतनी ही फिक्र करेगा. डर लगता है जमाने की हवा इतनी तेजी से बदल रही है कि जिन बच्चों की जरूरतों और खुशियों के लिए मातापिता रातों की नींद और दिन का चैन त्यागते हैं, वे जेब में पैसा आते ही नजरें फेर लेते हैं. शादी के बाद वे अपने परिवार में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें न तो बुजुर्ग मातापिता की सेहत की फिक्र होती है, न ही उन के गुजरबसर की परवा.

अशरफ के पिता रिटायर्ड हो गए थे. शादीशुदा 3 बेटों की आपसी कलह से वे परेशान हो कर छोटे बेटे को ले कर बेटी के साथ रहने के लिए मजबूर हो गए. वे जानते थे कि अगर अशरफ की अम्मी जिंदा होती तो बेटे जरूर कुछ महीनों के लिए उन्हें अपने घरों में रखने का एहसान करते क्योंकि उन की बीवियों को मुफ्त में काम करने और आराम देने वाली नौकरानी मिल जाती. अब्बा को अपने पास रखने का मतलब है उन की खिदमत में वक्त और पैसा बरबाद करना और उन की बंदिशों के कठघरे में कैद रहना. आजादी भला किस को प्यारी नहीं होती.

अशरफ का पुश्तैनी मकान नासिक में था. खेल के सिलसिले में उसे नासिक जाने का जब भी मौका मिलता, वहां दोचार दिन रह कर आता. वक्त और हालत के थपेड़ों ने उसे कुंठा व पीड़ा की खोहों से बाहर निकाल कर बेहद संवेदनशील और रिश्तों के प्रति ईमानदार बना दिया था.

बाजार जाते हुए उस दिन अपर्णा का ऐक्सिडैंट हो गया, कंधे की हड्डी टूट गई. अशरफ को फोन पर खबर मिली, तो वह ड्यूटी छोड़ कर भागा. पहले उन्हें अस्पताल में भरती कराया, फिर माणिकचंद को सूचित किया और फिर स्कूल से लौटे बच्चों को खाना खिला कर अपर्णा की दवाई लेने बाजार भागा.

पूरे डेढ़ महीने अशरफ का एक पैर माणिकचंद के घर में, एक पैर अस्पताल में रहा. सिर्फ  नहाने और खाना खाने के लिए वह बहन के घर जाता था. बढ़ी हुई दाढ़ी, मटमैले कपड़े, बेतरतीब सा व्यक्तित्व उस के माणिकचंद के पूरे परिवार के प्रति अटूट प्रेम और गहरी फिक्र का सुबूत देता.

माणिकचंद भी अशरफ की तारीफ करते नहीं अघाते, बच्चे तो उस के मुरीद बन कर आगेपीछे घूमते रहते. अशरफ की बेगर्ज खिदमत देख कर अपर्णा की आंखें छलछला जातीं.

ऐसा शख्स जिस की मौजूदगी माणिकचंद के परिवार के लिए बंद कमरे में अचानक आई ताजी हवा का काम करती हो, वही अगर एक महीने से नजरों से ओझल रहे तो, क्या परिवार में घुटन और बेचैनी नहीं फैलेगी?

अपर्णा जब भी कोई नई डिश बना कर परोसती तो ‘अशरफ अंकल के साथ खाएंगे’  कह कर बच्चे प्लेट ढक कर रख देते. अपर्णा मुसकरा कर किचन में चली जाती. पूरा परिवार यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि अशरफ उन्हें भूल जाएगा. दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं क्योंकि इन पर मतलबपरस्ती की परत नहीं चढ़ी होती. होती है तो बस, अटूट विश्वास की मजबूत छड़ों से बनी स्नेह की छत.

आखिर अशरफ है कहां? कहीं किसी दुर्घटना का शिकार तो नहीं हो गया? फोन भी बंद है उस का. ऐसे न जाने कितने खयाल माणिकचंद के दिमाग को दीमक की तरह कुतरते. उधर, सूबे का सब से ज्यादा संवेदनशील शहर आग की लपटों से घिरा हुआ था. हिंदूमुसलिम दंगा शुरू हो गया था. कर्फ्यू लग गया.

तीसरे दिन शाम को कर्फ्यू में 2 घंटे की ढील दी गई तो दिसंबर की हाड़कंपा देने वाली ठंड के साथ धुंधभरी शाम को मोटरसाइकिल पर आए 2 सायों ने माणिकचंद के घर के दरवाजे की घंटी बजाई. दरवाजे के सैफ्टी मिरर से देख कर माणिकचंद ने दरवाजा खोल दिया, ‘‘मंजूर साहब आप? आइए, आइए. कैसे आना हुआ?’’ माणिकचंद ने सांप्रदायिक दंगे के बीच मुसलमान मेहमान का गर्मजोशी से स्वागत किया, बोले, ‘‘सब ठीक तो है न?’’

‘‘जी, खैरियत ही तो नहीं है,’’ अशरफ के बहनोई मंजूर अली ने रोबीले स्वर में इस अंदाज से कहा जैसे उन की खैरियत न होने के पीछे माणिकचंद की कोई साजिश हो.

‘‘क्या हो गया?’’ माणिकचंद ने इंसानियत के नाते पूछा.

‘‘अशरफ आप के घर में है क्या?’’

‘‘नहीं तो. पिछले एक महीने से मेरा पूरा घर उस के लिए परेशान है. क्या वह आप के घर पर नहीं है?’’

‘‘मेरे घर में तो वह अब कदम भी नहीं रख सकता.’’

‘‘क्यों, ऐसा क्या कर दिया उस ने? क्या गुनाह हो गया उस से?’’

‘‘गुनाह की तो सजा होती है माणिकचंद, लेकिन उस की हरकत ने मेरे पूरे खानदान को समाज से बाहर कर देने की वजह बना दी है.’’

‘‘आखिर क्या किया है अशरफ ने, साफसाफ बताइए न मंजूर साहब,’’ माणिकचंद चिंतित हो गए.

‘‘आप के अशरफ ने शादी कर ली है.’’

‘‘दैट्स गुड.’’ बांछें खिल गईं माणिकचंद परिवार की. ‘‘कब? कहां? किस से?’’ माणिकचंद ने जानना चाहा.

‘‘उस नालायक ने एक महीने पहले नासिक में गैरकौम की लड़की से शादी कर के हमारे मुंह पर कालिख पोत दी है.’’ मंजूर के ये चुभते शब्द सुन कर अशरफ की बहन के चेहरे पर उदासी के बादल घिर गए.

‘‘लड़की किस धर्म की है?’’ माणिकचंद बोले.

मंजूर ने बीवी की तरफ देखा, ‘बतलाएं कि नहीं? लेकिन बतलाना तो पड़ेगा ही.’ बीवी की आंखों में अपील थी. ‘‘लड़की हिंदू है,’’ मंजूर के शब्द धमाके की तरह गूंजे.

कड़ाके की सर्दी में भी माणिकचंद के माथे पर पसीना चुहचुहा गया. बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल कर होंठों पर जबान फेर कर बोले, ‘‘कहां की है लड़की?’’

‘‘नासिक की है. निकाह कर के घर पर ले कर आया तो इन्होंने उसे घर में घुसने नहीं दिया क्योंकि इन की भांजी के साथ अशरफ की बात पक्की हो गई थी. इन्होंने कह दिया कि हिंदूमुसलिम फसाद की वजह से पहले ही शहर की हवा गरम है. तुम हिंदू लड़की को ले कर हमारे घर में रहोगे, तो हिंदू हमारा घर फूंक देंगे,’’ कहती हुई अशरफ की बहन हिचकियां ले कर रो पड़ी.

‘‘हांहां, मैं ने उसे घर से निकाल दिया. मेरी 2-2 जवान बेटियां हैं. कब तक हिंदू लड़की को छिपा कर रखते. मुसलमान हमें जाति से बाहर कर देंगे और हिंदू हमें जिंदा जला देंगे,’’ मंजूर की दहाड़ सुन कर माणिकचंद के घर की दीवारें भी दहल गईं.

‘‘बड़ी आस ले कर सहारा मांगने आया था मेरा भाई, लेकिन इन्होंने उसे घर में घुसने ही नहीं दिया,’’ अशरफ की बहन की दर्दीली आवाज ने माणिकचंद की रगों का खून जमा दिया. अपनी मुखालफत सुन कर मंजूर ने बीवी को कच्चा खा जाने वाली नजरों से घूरा.

माणिकचंद के घर में मौत का सा सन्नाटा पसर गया. अपर्णा गहरी चिंता में बैठी, फर्श पर बिछे कालीन को एकटक देख रही थी.

‘‘अपनी बीवी को ले कर कहां गया होगा अशरफ,’’ होंठों में ही बुदबुदाए माणिकचंद.

‘‘वो मर जाए, हमारी बला से. हमें उस से कोई मतलब नहीं है. उस नालायक ने न तो हमारी इज्जत का खयाल रखा, न ही मुझे अपनी बहन के सामने मुंह दिखाने के काबिल छोड़ा. अगर मुझे अपने बच्चों की फिक्र न होती तो इन भाईबहनों को जान से मार डालता. इस दुष्ट खानदान ने पूरी कौम के लिए हिंदुओं के दिलों में नफरत की आग फैला दी है,’’ पत्नी की ओर देख कर मंजूर फिर भड़के. माणिकचंद खामोश थे.

‘‘मैं ने क्या किया है भला? मुझे तो पता भी नहीं था,’’ अशरफ की बहन घिघियाई.

‘‘खामोश रहो. ज्यादा नाटक करने की जरूरत नहीं. माणिकचंद, यह औरत इस साजिश में शामिल है. ये मेरी बहन से चिढ़ती है, इसलिए अपने भाई की शादी गुपचुप तरीके से होने दी. ये अच्छी तरह जानती है कि इस उम्र में मैं इसे तलाक नहीं दे सकता.’’ मंजूर की अपनी पत्नी को दी जा रही यह धमकी सुन कर माणिकचंद सन्न रह गए.

इतना बेदर्द फैसला. क्या खूनी रिश्ते इतने निष्ठुर होते हैं कि कुटुंब के किसी व्यक्ति के निजी फैसले से नाखुश हो कर उस को दंडित करने के लिए उस के पूरे परिवार से ही रिश्ता तोड़ दें. क्या परिवार के आश्रित लोगों के जज्बात और एहसास की कोई कीमत नहीं. क्या 21वीं सदी में भी नौजवान पीढ़ी अपने बुजुर्गों की उंगली पकड़ कर ही चलती रहेगी. मजहब और कौम के नाम पर वह अपनी मोहब्बतों को कुरबान करती रहेगी. क्या उसे अपने तरीके से जीने और खुशियां हासिल करने का हक नहीं है.

कर्फ्यू लगने का वक्त हो रहा था, इसलिए मंजूर ने स्कूटर स्टार्ट कर दिया, अशरफ की बहन चुपचाप सिर झुकाए पीछे की सीट पर बैठ गई.

वह रात माणिकचंद के लिए कत्ल की रात थी. अपनी तमन्नाओं को खुशियों में तबदील करने की कोशिश अशरफ को घर से निकल कर फुटपाथ पर खड़ा कर देगी, इस तूफान का इल्म नहीं था उन्हें. न जाने कहां, किस हाल में होगा अशरफ? मेरे घर क्यों नहीं आया, क्या मुझ पर एतबार नहीं था उसे? हजारों सवाल दिलोदिमाग में बवंडर उठाते रहे.

पूरा शहर दंगे की आग में धूधू कर रहा था, उस पर मुसलमान लड़के का हिंदू लड़की से शादी करना, जले में नमक छिड़कने की तरह होगा. सियासी पार्टियां मजहब के तवे पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेकेंगी और चूल्हे की लकडि़यों की तरह धूधू कर जलेंगे बेकुसूर लोगों के मासूम ख्वाब. कट्टरपंथी और फिरकापरस्त चिंगारी को हवा दे कर अशरफ का चमन खिलने से पहले ही जला कर खाक कर देंगे. हमेशा हंसते रहने वाला अशरफ जिंदगी की अंधेरी खोहों में गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाएगा.

माणिकचंद जिंदगी की कंटीली झाडि़यों से गुजरे हुए, जख्म खाए, तजरबेकार व्यक्ति थे. नाजुक दौर के इस संवेदशील मसले पर सोचते हुए पूरी रात कट गई.

यह नौजवान पीढ़ी तो भावनाओं को अहमियत देती है. इस पीढ़ी के युवा इंसान की कद्र और पहचान उस की जबान, कौम, मजहब से नहीं, बल्कि उस के किरदार से करते हैं. ये तो दिल के सौदागर हैं. जिस से दिल मिल जाए, उस के लिए जान निछावर. लेकिन बुजुर्गों की तंग और अडि़यल सोच कभी खानदान की इज्जत के नाम पर तो कभी भाईबहनों के भविष्य के नाम पर उन को मानसिक चोटें देने से बाज नहीं आती.

कर्फ्यू 3 दिनों बाद खुला. माणिकचंद ने अशरफ के औफिस जा कर पूछा, लेकिन वहां से भी कोई सूचना नहीं मिली. कहीं अशरफ अपनी पत्नी के साथ वापस नासिक तो नहीं चला गया, अपनों के दिल से निकाले गए लोगों के पास भटकने के सिवा और क्या रास्ता होता है.

माणिकचंद और अपर्णा चिंता व बेचैनी के अंधेरे में भटक रहे थे कि रोशनी की किरण की तरह अशरफ का एक पुराना दोस्त सगीर, जो शहर से 50 किलोमीटर दूर रहता है, बाजार में मिल गया. पहले तो उस ने इनकार किया, लेकिन माणिकचंद ने अपर्णा के बीमार हो जाने की वजह बताई तो वह कुछ पसीजा, ‘‘अशरफ अपनी पत्नी के साथ हमारा मेहमान है.’’ यह सुन कर वे खुश हुए लेकिन उन की खुशी तब काफूर हो गई जब उस ने यह बताया कि वह अपने मातापिता, बीवीबच्चों के साथ 2 कमरों के कच्चे मकान में रहता है. जहां टाटपट्टी के घेरे में ईंटों के फर्श पर बैठ कर नहाया जाता है. और सुबह मुंहअंधेरे टौयलेट के लिए खेतों में जाया जाता है. हिंदुओं की उस बस्ती में 8-10 घर मुसलमानों के हैं. अगर किसी को कानोंकान भी खबर हो जाती कि मुसलमानों ने हिंदू लड़की को छिपा कर रखा है तो मुसलमान टोला लाशों का ढेर बन जाता है. गरीब मुसलमान दोस्त के परिवार ने टिकुली लगाने और एडि़यों को महावर से सजाने वाली बहू को कैसे बुरके में छिपाया होगा, यह सोच कर माणिकचंद सहम गए.

एक खूनखराबा हिंदुस्तान के बंटवारे के वक्त हुआ था जिस की कड़वाहट आज तक नासूर बन दोनों कौमों के दिलों में पल रही है. क्या अशरफ फिर उस इतिहास को दोहराने का सबब बनेगा? नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा. कभी भी ऐसा नहीं होने दूंगा.

माणिकचंद ने सगीर के सामने दोनों हाथ जोड़ दिए, ‘‘मुझे एक बार अशरफ से मिलने दो, जिंदगीभर तुम्हारा एहसानमंद रहूंगा.’’

पूरी रात करवट बदलते कटी. सुबहसुबह सगीर के गांव जाने के लिए माणिकचंद स्कूटर निकालने लगे. तभी एक औटोरिक्शा गेट के सामने रुका. 80 वर्षीय उन के दारजी के साथ चाईजी उतरती दिखाई दीं. माणिकचंद ने पैर छू कर उन का सामान उठा लिया.

नाश्ते के बाद उन्हें बाहर जाते देख कर चाईजी ने आवाज लगाई, ‘‘पुत्तर, हम सिर्फ 2 दिनों के लिए ही आए हैं. अमृतसर की प्रौपर्टी के बंटवारे के लिए मशवरा करना है.’’ न चाहते हुए भी माणिकचंद को उन्हें अशरफ के बारे में बतलाना पड़ा. दारजी का सवाल उन की आंखों में टंग गया, ‘‘तो क्या तुम मुसलमान लड़के को अपने घर में पनाह देना चाहते हो?’’ माणिकचंद की चुप्पी उन की मौनस्वीकृति थी.

‘‘यह जानते हुए भी कि दंगे की वजह से यहां कर्फ्यू लगा. कितने हिंदूमुसलमानों को जान से हाथ धोना पड़ा. पूरा शहर मजहबी लड़ाई में बारूदी पहाड़ के मुहाने पर बैठा सियासी पलीते का इंतजार कर रहा है. ऐसे में दोनों को अपने घर में रखना सुलगती लपटों में जानबूझ कर अपने हाथ होम करना होगा. लड़की के मातापिता ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी होगी. पुलिस सूंघते हुए तुम्हारे घर आ पहुंचेगी. अशरफ के बहनोई ने उन्हें घर में घुसने नहीं दिया, तो तुम्हें क्या जरूरत है ओखली में सिर देने की. दफा करो मामला.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं दारजी? भूल गए बंटवारे के वक्त आप ने अपने पड़ोसी मेराज साहब के परिवार को 2 महीने तक पड़ोसी हिंदुओं की नजरों से छिपा कर रखा था. तब आप ने ही तो दादाजी को दलील दी थी कि खूनी रिश्तों से ज्यादा ऊंचा होता है इंसानियत का रिश्ता. मैं तो सिर्फ उस रिश्ते की कमजोर होती जड़ों में खादपानी डालने का काम कर रहा हूं. मुझे ताज्जुब ही नहीं, सख्त अफसोस हो रहा है कि आप की सोच इतनी तंग और कुंठित कैसे हो गई है?’’

‘‘नहीं, मेरी सोच नहीं बदली. लेकिन पिछले 65 सालों के हादसों ने नजरिया बदलने के लिए मजबूर कर दिया है.’’

‘‘वह क्यों दारजी?’’ माणिकचंद ने जानना चाहा.

‘‘पुत्तर, उस वक्त के मुसलमान नेक, वफादार और ईमान वाले थे. हिंदुओं को भाई समझते थे. उन के दिलों में वतन के लिए मोहब्बत और कुरबानी का जज्बा था. तुम्हें दादाजी ने बताया नहीं कि मेराज साहब का परिवार किसी भी कीमत पर हिंदुस्तान की मिट्टी से जुदा नहीं होना चाहता था. लेकिन सियासी करार ने उन्हें पराई मिट्टी में रहने के लिए मजबूर कर दिया. आज हिंदुस्तान के गुमराह मुसलमान सियासी हुक्मरानों की तुरुप चाल में फंस कर मुल्क के साथ गद्दारी करने से गुरेज नहीं करते. उन की हरकतों की वजह से आज उन्हें शक की नजर से देखा जाता है. लोगों का भरोसा उठ गया है इस कौम पर से.’’

‘‘नहीं दारजी, आप का सच, आधा सच है. पूरा सच यह है कि मुसलमान बरसों से अपने मजहबी रहनुमाओं द्वारा गुमराह किया जा रहा है. तालीम की कमी के चलते यह कौम तरक्कीपसंद समाज से काफी पिछड़ गई है. बड़े परिवार, सीमित आय ने उन की खुशहाली पर ग्रहण लगा दिया है. बदहाली इतनी है कि मुसलमान आज कुआं खोदता है तो पानी पीता है. ऐसे में भटके मुसलमान पैसों के लालच में जिहाद के नाम पर बाहरी लोगों की कठपुतलियां बन जाते हैं. सरकारी सहूलियतों के नाम पर उन्हें सिर्फ छला जाता है. राजनीतिक दल कुरसी के लिए हिंदूमुसलिम दंगों को हवा देते हैं.

‘‘लेकिन पढ़ालिखा मुसलमान आज भी अपनी वतनपरस्ती की मिसाल कायम कर रहा है. चंद लोगों की नासमझी की वजह से हम पूरी कौम को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते.’’

माणिकचंद की अर्थपूर्ण व तर्कपूर्ण बातों ने अपर्णा का हौसला बढ़ाया. उस ने पहली बार ससुर के सामने मुंह खोला, ‘‘पापाजी, याद है जब आप अल्सर के दर्द से छटपटा रहे थे तो इसी मुसलमान लड़के ने आप को गोद में उठा कर अस्पताल की तीसरी मंजिल पर पहुंचाया था. अस्पताल की बिजली गुल हो गई थी. अशरफ ने एक महीने तक आप की सेवा में दिनरात एक कर दिए थे. तब आप को उस की वफादारी पर शक क्यों नहीं हुआ. आप का उस से कोई खूनी रिश्ता नहीं था, आप उस के किसी काम नहीं आ सकते थे. फिर भी उस ने क्यों तीमारदारी की. उस ने ये सब इसलिए किया क्योंकि वह एक अच्छा इंसान है.’’

कड़वी सचाई ने दारजी को कुछ लमहों के लिए तो चुप करा दिया, लेकिन सांप्रदायिकता का काला सांप कुंडली मार कर बैठा था उन के जेहन में, बोल पड़े, ‘‘एक नौजवान भावुकता में बह कर किसी बुजुर्ग की सेवा कर देता है तो क्या उसे पूरी कौम का प्रतिनिधि समझ लिया जाए? मुसलमान हमारे साथ रहते जरूर हैं लेकिन अपने रहनसहन, खानपान और संस्कृति के कारण वे हम से बिलकुल भिन्न हैं. इसलिए इन के साथ मेलजोल तो रखा जा सकता है लेकिन इन के साथ रहा नहीं जा सकता है.’’

‘‘दारजी, यों तो 2 भाई भी इकट्ठे नहीं रह सकते, लेकिन जहां दिल मिलते हों वहां हर अलगाव में भी एकता दिखाई पड़ती है,’’ माणिकचंद हार मानने के मूड में नहीं थे.

‘‘ये सब कोरी, किताबी बातें हैं. तुम नहीं जानते, आज दोनों कौमों के बीच कितनी नफरत की आग धधक रही है. ऐसे में तुम्हारा अशरफ की मदद करना तुम्हारे परिवार पर भारी पड़ जाएगा,’’ कह कर दारजी हांफने लगे थे.

‘‘दारजी, अशरफ इस वक्त बिलकुल अकेला पड़ गया है. वह ड्यूटी पर जा नहीं रहा है, तो पैसों से भी मजबूर हो गया होगा. गांव में रह रहा है, साथ में पत्नी है. पता नहीं किनकिन परेशानियों को झेल रहा होगा. उस को हमारी मदद की जरूरत है,’’ माणिकचंद की पत्नी अपर्णा नम्रता से बोली.

‘‘जो जी में आए करो बहू. लेकिन कहे देती हूं, अगर दंगाइयों ने हमला बोल दिया तो अशरफ सीना तान कर तुम लोगों को बचाने के बजाय पीछे के दरवाजे से खिसक जाएगा. जो कौम अपने मुल्क की नहीं हुई, वह तुम्हारी क्या होगी,’’ इस बार चाई जी ने सीधे दिल पर चोट की.

‘‘बस, बस. आप लोग मेरे और अशरफ के बीच पनपी मोहब्बत व वफादारी की मजबूत जड़ों को हिलाने की कोशिश न कीजिए. मुझे मानवता से भरे इंसान के खिलाफ बरगलाएं नहीं,’’ माणिकचंद ने साफ कहा.

‘‘मैं तुम्हें आने वाले तूफान से आगाह कर रहा हूं,’’ दारजी भी हार मानने को तैयार नहीं थे.

‘‘दारजी, मैं अशरफ जैसे दोस्त के लिए समाजी, सियासी, मजहबी हर अत्याचार सहने के लिए तैयार हूं. मैं जातीयता की संकरी दीवार को तोड़ कर हिंदूमुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द का एक मजबूत पुल बनाना चाहता हूं.’’ माणिकचंद ने एक झटके से किक मारी और स्कूटर सगीर के गांव की तरफ मुड़ गया.

दारजी सफेद पलकों से बेटे की पीठ पर नजरें जमाए उस के हौसले और हिम्मत की दाद देते हुए 65 साल पहले की टीस की चुभन को शिद्दत से महसूस कर तड़प गए. काश, मेराज साहब की बेटी शम्सून से किए गए साथ जीनेमरने के वादे को पूरा करने के लिए वे भी बेटे की तरह अड़ कर खड़े हो जाते तो मेराज परिवार को पाकिस्तान जाने के लिए दुनिया की कोई भी ताकत मजबूर नहीं कर सकती थी. उन की हवेली में आदमियों के स्वर गूंज उठते, न कि धर्म के अंधविश्वासियों के नारे. मुल्क के बंटवारे की गरम हवा मोहब्बत के प्यारे मुकाम को छू कर ठंडी हवा के झोंकों में तबदील हो जाती.

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