फोन की घंटी लगातार बज रही थी, किचन में काम करतेकरते उमा झुंझला उठी थी, ‘फोन उठाने भी कोई नहीं आएगा, एक पैर पर खड़ी मैं इधर भी देखूं, उधर भी देखूं-..’ गैस का रेगुलेटर कम कर के वह दौड़ी

और रिसीवर उठाया, हैलो– कहते ही सुमित की आवाज सुनाई पड़ी, जो बहुत खुश हो कर कह रहा था, ममा, आप के आशीर्वाद से मेरा भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया है- मैरिट सूची में नाम ऊपर होने के कारण आशा है कि मुख्य सेवा में मेरा नाम आ जाएगा- मैं 1-2 दिन में घर पहुंचूंगा-

उमा कुछ कहती कि फोन कट गया-

उमा ने सोचा कार्तिकेय को जा कर खुशखबरी सुना दूं, शयनकक्ष में गई तो देखा कार्तिकेय गहरी नींद में सोए हुए हैं- कल रात 1 बजे, 3 दिन के टूर के बाद लौटे थे- थके होंगे वरना 6 बजे के बाद तो बिस्तर पर रह ही नहीं सकते- साढे़ 6 से 7 बजे तक उन का ‘योगा’ करने का समय है और 7 बजे से आसपास के एरिया की फोन के द्वारा जानकारी हासिल करने का, क्योंकि सभी एरिया के स्टाफ अफसरों को नित्य अपने एरिया के कामों की जानकारी देने के निर्देश दिए हुए हैं, ताकि कहीं कोई समस्या होने पर तुरंत उस का समाधान किया जा सके- एक पब्लिक अंडरटेकिंग कंपनी में चीफ इंजीनियर जो हैं-

अनुज ट्यूशन गया है और पिताजी सुबह की सैर के लिए- सन, सन की आवाज आई तो, याद आया कि गैस पर, दही जमाने के लिए दूध गरम करने के लिए रखा था- दोपहर के खाने में सब को खाने के साथ ताजा दही चाहिए इसलिए रोजाना सुबह उठ कर पहले यही काम करना पड़ता है- जल्दी से जा कर गैस का रेगुलेटर बंद किया- अनुज ने आज नाश्ते में आलू के परांठे खाने की फरमाइश की थी इसलिए कुकर में आलू रख कर आटा गूंधने लगी.

उसे याद आया, पिताजी ने उसे एक बार समझाते हुए कहा था, ‘उमा, तुझ में धैर्य क्यों नहीं है? जीवन में प्रत्येक वस्तु, पलक झपकते ही हासिल नहीं हो जाती बल्कि उस के लिए धीरज के साथ प्रयत्न करना पड़ता है- यह बात और है कि किसीकिसी को अपने मकसद में सफलता कम प्रयास करने पर ही मिल जाती है और किसी को बहुत ज्यादा मेहनत करने के बाद, लेकिन सच्ची लगन, धैर्य और विश्वास हो तो कोई वजह नहीं कि मानव अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर पाए- पता नहीं इनसान जरा सी असफलता से बेकार ही इतना विचलित क्यों हो उठता है.?’ और आज सचमुच पिताजी की कही बात सत्य सिद्ध हुई थी, बेवजह ही इतने मानसिक तनाव झेलने के बाद यह खुशी का क्षण आ ही गया— हाथ आटा गूंध रहे थे किंतु अनायास ही दिमाग में आज से 6 साल पहले का दिन चलचित्र की भांति मंडराने लगा.

उस दिन सुबह से ही मन बेचैन था, 12वीं का परीक्षाफल निकलने वाला था- सुमित शुरू से ही पढ़ाई में अच्छा था- हमेशा ही कक्षा में प्रथम आता था, अतः सभी शिक्षक उसे प्यार करते थे और उस से बहुत खुश रहते थे- 10वीं की बोर्ड की परीक्षा में मैरिट सूची में आ कर उस ने न केवल अपना बल्कि अपने स्कूल का नाम भी रोशन किया था और इस साल भी सभी उस से यही आशा कर रहे थे.

महाराष्ट में तो प्रवेश परीक्षा होती नहीं है, केवल 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर ही मेडिकल और इंजीनियरिंग कालिज में एडमीशन मिल जाता है, इसलिए शहर के नामी कालिज में सुमित का दाखिला करा कर हम भविष्य के लिए आश्वस्त हो गए थे.

सुमित के मौसा, दिवाकर काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. बेचारी अनिला 2 छोटेछोटे बच्चों के साथ परेशान थी. दिवाकर अपने मातापिता की एकलौती संतान थे, इसलिए अनिला को ससुराल पक्ष से भी कोई मदद नहीं मिल पाती थी- सुमित को अपने मौसामौसी से बेहद लगाव था इसलिए उस ने स्वयं ही दिल्ली मौसी के पास जाने की इच्छा जताई तो उमा ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ जाने की आज्ञादे दी. वैसे उमा ने कभी बच्चों को अकेले नहीं भेजा था, इसलिए वह थोड़ी झिझक रही थी, किंतु कार्तिकेय का विचार था कि एक उम्र के पश्चात बच्चों को स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता आनी चाहिए और यह तभी संभव है जब बच्चों को अकेले रहने और आनेजाने की आदत डाली जाए.

1-2 दिन में सुमित आने वाला था. 10वीं का परीक्षाफल निकलने से पहले जब वह सुमित से बारबार पूछती कि क्या तुम पास हो जाओगे, तो एक दिन वह झुंझला कर बोला था, ‘ममा, आप मुझे किसी से कम क्यों आंक रही हैं. मैं मैरिट में अवश्य आ जाऊंगा.’

सचमुच मैरिट लिस्ट में उस का नाम देख कर घर भर की छाती गर्व से फूल उठी थी. वह सब की आशाओं का केंद्र बिंदु बन बैठा था. दादी कहतीं, ‘डाक्टर बनाऊंगी अपने पोते को, कम से कम बुढ़ापे में मेरी सेवा तो करेगा. दूसरों के पास तो दिखाने नहीं जाना पड़ेगा— उन का वश चले तो एक ही बार में मरीज का खून चूस लें.’

दादा कहते, ‘डाक्टर नहीं, मैं अपने पोते को अपनी तरह कलक्टर बनाऊंगा ताकि वह समाज में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने में सहायक बन कर समाज के उत्थान हेतु काम कर सके.’

कार्तिकेय चाहते थे कि उन का बेटा उन की तरह इंजीनियर बन कर देश के नवनिर्माण में सहयोग करे. 12वीं में उसे गणित और जीवविज्ञान दोनों विषय दिलवा दिए गए ताकि जिस ग्रुप में उस के अंक होंगे उसी में उसे दाखिला दिलवा दिया जाए. मगर परिवार का कोई भी सदस्य उस मासूम की इच्छा नहीं पूछ रहा था कि उसे क्या बनना है. उस की रुचि किस में है? मैं तो मूकदृष्टा थी. डर था तो केवल इतना कि वह कहीं दो नावों में सवार हो कर मंझधार में ही न गिर जाए? बस, मन ही मन यही सोचती कि जो भी अच्छा हो, क्योंकि आज प्रतियोगिताओं के दायरे में कैद बच्चे अपनी सुकुमारता, चंचलता और बचपना खो बैठे हैं. प्रतियोगिताओं में उच्च वरीयताक्रम के बच्चे ही सफल माने जाते हैं बाकी दूसरे सभी असफल. हो सकता है कि उन की तथाकथित असफलता के पीछे मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक कारण रहे हों, लेकिन आज उन की समस्याओं के समाधान के लिए समय किस के पास है? असफलता तो असफलता ही है, उन के मनमस्तिौक पर लगा एक अमिट कलंक.

घंटी बजने की आवाज सुन कर मैं ने दरवाजा खोला तो अनुज को खड़ा पाया. परीक्षाफल के बारे में पूछने पर वह बोला, ‘मालूम नहीं, ममा, बहुत भीड़ थी इसलिए देख ही नहीं पाया.’

दोपहर में कार्तिकेय उस के कालिज जा कर मार्कशीट ले कर आए. मुंह उतरा हुआ था, देख कर मन में खलबली मच गई. किसी अनहोनी की आशंका से मन कांप उठा, ‘क्या हुआ? कैसा रहा रिजल्ट?’ बेचैनी से मैं पूछ ही उठी.

‘पानी तो पिलाओ, मुंह सूखा जा रहा है,’ कार्तिकेयने पानी मांगते हुए कहा था.

पानी ले कर आई तो कार्तिकेय ने सुमित की मार्कशीट मेरे सामने रख दी. सभी विषयों में कम अंक देख कर मुंह से निकल गया, ‘यह मार्कशीट अपने सुमित की हो ही नहीं सकती. रोल नंबर उसी का है न?’ अविश्वास की मुद्रा में मुंह से निकल गया.

‘क्यों बेवकूफों जैसी बातें करती हो, मार्कशीट भी उसी की है, नाम और रोल नंबर भी,’ वह फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘अच्छा हुआ, मांपिताजी कानपुर दीदी के पास गए हैं वरना ऐसे नंबर देख उन के दिल पर क्या गुजरती?’

‘रिचैकिंग करवाएंगे,’ उन की बात अनसुनी करते हुए उमा ने कहा.

‘रिचैकिंग से क्या होगा? हर सब्जेक्ट में तो ऐसे ही हैं. गनीमत है पास हो गया, लेकिन ऐसे भी पास होने से क्या फायदा?’ कार्तिकेय, फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘तुम्हारी सोशल विजिट भी बहुत हो गई थी उन दिनों, उसी का परिणाम है यह रिजल्ट.’

कार्तिकेय का इस समय उस पर आरोप लगाना पता नहीं क्यों उमा को बेहद अनुचित लगा था किंतु स्थिति की गंभीरता को समझ कर, उस के आरोपों पर ध्यान न देते हुए उमा ने पूरे भरोसे के साथ किंतु धीमे स्वर में कहा, ‘यह रिजल्ट उस का है ही नहीं. क्या आप सोच सकते हो कि वह एकाएक इतना गिर जाएगा?’

‘तुम्हारे कहने से क्या होता है, जो सामने है वही यथार्थ है,’ कार्तिकेय ने एकएक शब्द पर बल देते हुए कहा. वह अनुज को सामने पा कर फिर बोल उठे, ‘इन को तो हीरो बनने से ही फुरसत नहीं है. एक ने तो नाक कटा दी और दूसरा शायद जान ही ले ले,’ कह कर वह आफिस चले गए.

अनुज सिर नीचा कर के अपने कमरे में चला गया. मां को गुस्से में उलटासीधा बोलते तो उस ने जबतब सुना था, किंतु पिताजी को इतना अपसेट नहीं देखा था. मां पहले कभी उन के सामने कभी कुछ कहतीं तो वह उन का पक्ष लेते हुए कहते, ‘बच्चे हैं, अभी शैतानी नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे, रोनेपीटने के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी है.’

तब मां बिगड़ कर कहतीं, ‘चढ़ाओ, और चढ़ाओ अपने सिर. कभी अनहोनी हो जाए तो मुझे दोष नहीं देना.’ तो वह कहते, ‘अनहोनी कैसे होगी? मेरे बच्चे हैं, देखना नाक ऊंची ही रखेंगे.’ फिर हमारी तरफ मुखातिब हो कर कहते, ‘बेटा, कभी मुझे शर्मिंदा मत करना, मेरे विश्वास को ठेस मत पहुंचाना.’

आज वही डैडी सुमित भैया के परीक्षाफल को देख कर इतने दुखी हैं? वैसे उन के रिजल्ट पर तो उसे भी भरोसा नहीं हो रहा था. ‘कभी किसी दिन यदि कोई पेपर खराब भी होता तो उसे अवश्य बताते, कहीं कुछ गड़बड़ तो अवश्य हुई थी, कहीं कंप्यूटर में तो माव्फ़र्स फीड करने में किसी ने गड़बड़ी तो नहीं कर दी—?’ सवाल मस्तिष्क में कुलबुला तो रहे थे किंतु कोई समाधान उस के पास न था.

तभी फोन की घंटी बज उठी. फोन अमिता आंटी का था. अनुज मम्मी के कमरे में गया तो देखा, मम्मी सुबक रही हैं, उन को फोन देना उचित न समझ कर कह दिया कि वह सो रही हैं. परीक्षाफल पूछने पर कह दिया कि ‘पता नहीं’. वह जानता था कि वह कालोनी की इनफारमेशन सेंटर हैं. हर घर के समाचार उन के पास रहते हैं और पल भर में ही सब के पास पहुंच भी जाते हैं. पता नहीं उन को सब की घरेलू जिंदगी में इतनी दिलचस्पी क्यों रहती है? वैसे जब से उन की एकलौती पुत्री ने घर से भाग कर लव मैरिज की है तब से वह थोड़ा शांत जरूर हो गई हैं, लेकिन आदत तो आदत ही है, फोन रखने के बाद मम्मी ने अनुज से पूछा, ‘किस का फोन था?’

‘अमिता आंटी का.’

‘क्या कहा तू ने?’

‘कह दिया अभी पता नहीं चला है, डैडी ने किसी को भेजा है.’

‘कब तक झूठ बोलोगे? सचाई छिपाने से भी नहीं छिपती,’ उन की आंखों से आंसू निकलते जा रहे थे और वह कहे जा रही थी, ‘तुम लोगों ने कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. कल तक जिन के सामने मैं गर्व से कहती थी कि मेरे बच्चे हीरे हैं, अब उन्हें क्या जवाब दूंगी? तुम तो कोयला ही निकले. अपने मुंह पर तो कालिख पोती ही तुम ने हमारे मुंह पर भी पोत दी.’

अनुज जानता था अभी मां से कुछ भी कहना ठीक नहीं है और उमा सदमे की स्थिति में कहती जा रही थीं, ‘अरे, इन्हीं हाथों से खिलाया, पिलाया, पढ़ाया, दिनरात एक कर दिए अपनी सभी इच्छाएं कुरबान कर दीं तुम दोनों पर, किंतु क्या मिला मुझे? यह अपमान, दुख और?’

तभी दोबारा फोन की घंटी घनघना उठी, तब तक अनुज वहां से चला गया था. उमा अचानक सामने रखे सुमित के आईकार्ड पर लगे फोटो पर तड़ातड़ चांटे मारने लगी, बोल, क्या जवाब दूं दुनिया को— उन को जिन्होंने 10वीं में मैरिट में आने पर मिठाई खाई थी, हमारे आत्मगर्वित चेहरे को देख कर जिन आंखों में ईर्ष्या पैदा हो गई थी, वह आज क्या हमारा मजाक नहीं उड़ाएंगे?’

ममा, क्या हो गया है आप को? पागल तो नहीं हो गईं—? कम से कम आप तो धीरज रखिए, अनुज ने कहा.

हां, मैं पागल हो गई हूं अनुज, मैं अब और धीरज कैसे रखूं? सच बेटा, बेटियों से कहीं अधिक मुश्किल है आज बेटों को पालना— बेटी एक बार न भी पढ़े तो लायक लड़का देख कर शादी कर दो, उस का जीवन तो कट ही जाएगा, लेकिन तुम लोग कुछ बन नहीं पाए तो क्या करोगे? तुम्हारे पिता के पास तो इतना पैसा भी नहीं है कि कोई व्यापार करा सकें, लेकिन यह भी तो जरूरी नहीं कि व्यापार में भी सफल हो पाओ. हर जगह प्रतियोगिता है, आज यदि एक जगह सफल नहीं हो पाए तो कैसे आशा करें कि दूसरी जगह भी सफल हो पाओगे?

तभी दरवाजे की घंटी बजी, अनुज दरवाजा खोलने गया तो देखा रमा ताई खड़ी हैं. उमा की अव्यवस्थित हालत देख कर वह बोलीं, क्या हालत बना रखी है उमा तुम ने?

क्या करूं, दीदी, आप ही बताओ… उमा ने कहा.

कार्तिकेय से सुन कर बुरा तो बहुत लगा, लेकिन यही तो जिंदगी है उमा, जीवन एक धूपछांव है, कभी दुख, कभी सुख. कभी सफलता कभी असफलता. सच्चा मानव तो वह है जो किसी भी हालत में हार न माने,और धैर्य व संयम का परिचय देते हुए लक्ष्य पाने का निरंतर उपाय करता रहे.

तुम ही सोचो, जब तुम्हें इतना दुख हो रहा है— अपमानित महसूस कर रही हो तो सुमित को कितना दुख हो रहा होगा? उमा, सुमित बहुत ही भावुक लड़का है. उस के आने पर तुम्हें बहुत ही संयमित व्यवहार करना होगा. उसे धैर्य बंधाना होगा. सोचना होगा कि आगे क्या और कैसे करना है? एक बार एक परीक्षा में असफल होने का अर्थ यह नहीं है कि वह नकारा हो गया. हो सकता है दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो जाए.

रमा भरी जवानी में ही विधवा हो गई थीं, समाज की परवा न कर छोटी नौकरी करते हुए उन्होंने न केवल बच्चों को पढ़ाया बल्कि खुद भी एम-ए-, बी-एड- कर के आज माध्यमिक स्कूल में शिक्षिका के पद पर काम कर रही हैं. दोनों बच्चे अच्छी जगहों पर नौकरी कर रहे हैं और उन्हें भी अपने मृदु व्यवहार के कारण समाज में सम्मानजनक स्थान मिला हुआ है.

कहती तो आप ठीक हैं, दीदी, लेकिन मन खुद ही बेकाबू हो उठता है, क्याक्या सपने संजोए थे, सब धूल में मिल गए, उमा ने कहा.

फिर वही बात, धैर्य रखो, सब ठीक हो जाएगा. दूर क्यों जाती हो, अब मेरे देवर को ही लो, 2 बार मैट्रिक में फेल हुए, लेकिन आज अफसर हैं कि नहीं? हिम्मत रखो, यदि तुम ही मुंह छिपाओगी तो दूसरों को तो कहने का और भी मौका मिलेगा. सामने भले ही अफसोस जाहिर करें, लेकिन पीठ पीछे वही लोग मजाक बनाने से नहीं चूकेंगे, रमा बोली.

जो हुआ सो हुआ, हमारा दुख है, सहन करते हुए उपाय तो ढूंढ़ना ही पडे़गा, लेकिन दीदी, दूसरों की उपहास भरी निगाहों से कैसे पीछा छुड़ा पाऊंगी? यही सोच कर मैं और भी ज्यादा बेचैन हो रही हूं, उमा ने कहा.

हमारे समाज में यही तो बुराई है कि लोगों के कहने से डर कर हम असंयमित व्यवहार करने लगते हैं और हमें भलेबुरे और उचितअनुचित का भी ज्ञान नहीं रहता— तुम्हें समाज की परवा न कर सुमित के बारे में सोचना होगा, उसे डांटनेफटकारने के बजाय उस की इच्छा जाननी होगी, कारण पता लगाना होगा कि ऐसा कैसे हुआ है? रमा ने सलाह देते हुए कहा.

आप ठीक कह रही हैं, दीदी, शायद यही सही रास्ता है, उमा ने कहा.

शाम को कार्तिकेय के आफिस से आने के बाद उमा ने रमा दीदी की सलाह उन्हें बताई तो उन्हें भी महसूस हुआ कि सुमित को विश्वास में ले कर ही कुछ फैसला लिया जा सकता है.

तीसरे दिन सुमित आया. उस ने आते ही पूछा, रिजल्ट निकला क्या?

हां, निकल तो गया, लेकिन बताओ तुम्हें कितने प्रतिशत अंकों की उम्मीद थी…? कार्तिकेय ने पूछा.

लो बेटा, पहले नाश्ता कर लो, तुम्हारे लिए गरमगरम आलू के परांठे बनाए हैं, उमा ने बात को बीच में काटते हुए कहा.

क्या बात है, मां, रास्ते में मैं ने अनुज से पूछा था कि क्या रिजल्ट निकला तो उस ने मना कर दिया और डैडी कह रहे हैं कि निकल गया- आप मुझ से जरूर कुछ छिपा रहे हैं, उस ने हम दोनों की तरफ संदेह की नजरों से देखते हुए कहा.

रिजल्ट निकल गया बेटा, लेकिन तुम नाश्ता तो करो, तब तक यह बताओ कि तुम्हें कितने प्रतिशत अंक आने की आशा थी? उमा ने पूछा.

80 से 85 प्रतिशत तो आने ही चाहिए. अब आप मार्कशीट दिखाएं तभी मैं नाश्ता करूंगा, सुमित बोला.

उस की जिद देख कर कार्तिकेय ने मार्कशीट उस के आगे कर दी. मार्कशीट देख कर वह बौखला कर बोला, यह मेरे अंक हो ही नहीं सकते.

शांत हो जाओ, धैर्य रखो, कभीकभी ऐसी अनहोनी हो जाती है- तुम यदि चाहोगे तो कापियों की रिचैकिंग करवाएंगे.

रिचैकिंग से क्या होगा, मेरा तो भविष्य ही बिगड़ गया, कहते हुए वह कमरे में घुस गया और कमरा अंदर से बंद कर लिया.

अरे, कोई उसे रोको, कहीं कुछ कर न ले, उमा कार्तिकेय को देख कर चिल्लाई.

नहीं, वह कुछ नहीं करेगा. वह मेरा बेटा है, उसे कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दो, कार्तिकेय ने आत्मविश्वास के साथ कहा.

इतनी देर से अनुज दीवार के सहारे खड़ा हम सब की बातें सुन रहा था, लेकिन सुमित का कमरा बंद करना उसे झकझोर गया- वह डर के कारण मेरे पास आ कर निशब्द खड़ा हो गया, लेकिन उस की आंखें कह रही

थीं, ‘ममा, भैया को रोको’, शायद कार्तिकेय की बात पर उसे यकीन नहीं हो रहा था.

उस की ऐसी हालत देख कर कार्तिकेय ने दरवाजा खटखटाते हुए  कहा, सुमित बेटा, दरवाजा खोलो, बाहर आ जाओ— हम सब तुम्हारे दुख में बराबर के हिस्सेदार हैं, सुख तो तुम एक बार अकेले झेल ही लोगे, लेकिन दुख अकेले नहीं, दुख सब के साथ बांटने पर ही हलका हो पाता है.

कार्तिकेय की बात सुन कर सुमित दरवाजा खोल कर उन से लिपट कर रोने लगा, विश्वास कीजिए पापा, मेरे सारे पेपर अच्छे हुए थे— पता नहीं अंक क्यों इतने कम आए?

कोई बात नहीं, बेटा, जीवन में कभीकभी अप्रत्याशित घट जाता है. उस के लिए इतना निराश होने की आवश्यकता नहीं है. अब हमें आगे के लिए सोचना है. क्या करना चाहते हो, अगले वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठना चाहोगे या किसी कालिज में दाखिला ले कर पढ़ना चाहोगे? कार्तिकेय ने पूछा.

पापा, मैं कालिज में दाखिला ले कर पढ़ने के बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो कर अपनी योग्यता सिद्ध करना चाहूंगा, लेकिन अब मैं यहां नहीं पढ़ना चाहूंगा बल्कि दिल्ली में मौसीजी के पास रह कर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करूंगा, सुमित ने कहा.

ठीक है, जैसी तेरी इच्छा. वैसे भी तेरे मौसाजी तो इसी वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने के लिए कह रहे थे. किंतु हम सोच रहे थे कि तुम्हारा काम यहीं हो जाएगा, लेकिन तब उन की बात पर हम ने यान ही नहीं दिया था. दिल्ली में अच्छे कोंचिंग इंस्टीट्यूट भी हैं, कार्तिकेय बोले.

उमा की सुमित को दिल्ली भेजने की बिलकुल भी इच्छा नहीं थी. अनुज भी भैया के दूर होने की सोच कर उदास हो गया था, इसलिए दोनों ही चाहते थे कि वह यहीं रह कर कुछ करे. यहां भी तो सुविधाओं की कमी नहीं है, यहां रह कर भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की जा सकती है.

कल सुमित की कुशलक्षेम पूछने के लिए दिवाकर और अनिला का फोन आया था, उस के खराब रिजल्ट की बात सुन कर उन्होंने फिर अपनी बात दोहराई तो उमा को भी लगने लगा कि शायद दिल्ली भेजना ही उस के लिए अच्छा हो. कभीकभी स्थान परिवर्तन भी सुखद रहता है और फिर जब स्वयं सुमित की भी यही इच्छा है…

वैसे भी जीवन में कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है. बच्चों को सदा बांध कर तो नहीं रखा जा सकता. संतोष इतना था कि दिल्ली जैसे महानगर में वह अकेला नहीं बल्कि दिवाकर और अनिला की छत्रछाया और मार्गदर्शन में रहेगा.

दिवाकर दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे, सुमित को सदा प्रथम आते देख कर उन्होंने कई बार कहा था कि उसे दिल्ली भेज दिया जाए जिस से वह प्रतियोगी परीक्षाओं की उचित तैयारी कर किसी अच्छे इंस्टीट्यूट से इंजीनियंरिंग या मेडिकल की डिगरी ले तो भविष्य के लिए अच्छा होगा.

सुमित को दिल्ली भेज दिया था. वह बीचबीच में छुट्टियों में घर आता रहता था. एक बार सुमित और अनुज किसी बात पर झगड़ रहे थे. बेकार ही उमा कह बैठी, पता नहीं, कब तुम दोनों को अक्ल आएगी? दूर रहते हो तब यह हालत है. यह नहीं कि बैठ कर परीक्षा की तैयारी करो. पड़ोस के नंदा साहब के लड़के को देखो, प्रथम बार में ही मेडिकल में सेलेक्शन हो गया. कितनी प्रशंसा करती है वह अपने बेटे की- मैं किस मुंह से तुम्हारी तारीफ करूं- यही हाल रहा तो जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाओगे— जब तक हम हैं, दालरोटी तो मिल ही जाएगी, उस के बाद भूखों मरना.

सुमित तो सिर झुका कर बैठ गया किंतु अनुज बोल उठा, ममा, आप ने कभी अधूरे चित्र को देखा है, कितना अनाकर्षक लगता है…

मुझे असमंजस में पड़ा देख कर वह फिर बोला, ममा, अभी हम अधूरे चित्र के समान ही हैं— कभी कोई चित्र शीघ्र पूर्णता प्राप्त कर लेता है और कभीकभी पूर्ण होने में समय लगता है.

मैं उस की बात का आशय समझ कर कह उठी, बेटा, पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं.

कार्तिकेय, जो पीछे खड़े सारा वार्तालाप सुन रहे थे, भी कह उठे, बातें बनाना तो बहुत आसान है बेटा, किंतु कुछ कर पाना—कुछ बन पाना बहुत ही कठिन है. जब तक परिश्रम और लगन से येय की प्राप्ति की ओर अग्रसर नहीं होगे तब तक सफल नहीं हो पाओगे.

सुमित के 2 बार प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हो जाने से हम सब निराश हो गए थे. कार्तिकेय ने तो सुमित से बातें करना ही छोड़ दिया था. वह बीचबीच में घर आता भी तो अपने कमरे में ही बंद पड़ा किताबों में सिर छिपाए रहता, मेरे मुंह से ही जबतब न चाहते हुए भी अनचाहे शब्द निकल जाते. तब दादाजी ही उस का पक्ष लेते हुए कहते, बेटा, ऐसा कह कर उस का मनोबल मत तोड़ा कर— सब डाक्टर और इंजीनियर ही बन जाएं तो अन्य क्षेत्रें का काम कैसे चलेगा? धैर्य रखो— एक दिन अवश्य वह सफल होगा.

पिताजी, न जाने वह शुभ घड़ी कब आएगी—? मांजी तो पोते से इलाज करवाने की अधूरी इच्छा लिए ही चली गईं. अब और न जाने क्या देखना बाकी है—?

बेटा, इच्छा तो इच्छा ही है, कभी पूरी हो पाती है कभी नहीं. वैसे भी क्या आज तक किसी मनुष्य की समस्त इच्छाएं पूर्ण हुई हैं, लिहाजा उस के लिए किसी को दोष देना और अपमानित करना उचित नहीं है, वह उतने ही संयम से उक्कार देते, तब लगता कि मुझ में और कार्तिकेय में पिताजी के समान सूझबूझ क्यों नहीं है. सुमित की परीक्षा की इन घडि़यों में अपने मधुर वचनों से और उस के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का पता लगा कर उस का मनोबल बढ़ाने का प्रयास क्यों नहीं करते?

वैसे भी सुमित को बचपन से ही मुझ से ज्यादा अपने पापा से लगाव था, अतः उन की बेरुखी से वह बुरी तरह घायल हो गया था. तभी, इस बार सुमित जो गया, आया ही नहीं.

अनिला लिखती, ‘दीदी, सुमित ने स्वयं को पढ़ाई में डुबो लिया है, लेकिन पता नहीं क्यों वह सफल नहीं हो पा रहा है…? जबजब वह घर से लौटता है तबतब वह और भी ज्यादा निराश हो जाता है. शायद अपनी उपेक्षा और अवहेलना के कारण.’

अब उमा को भी महसूस होने लगा था कि शायद अभी तक का हमारा व्यवहार ही उस के प्रति गलत रहा है. तभी उस में आत्मविश्वास की कमी आती जा रही है, और हो सकता है वह पढ़ने का प्रयत्न करता हो, लेकिन अति दबाव में आ कर वह पूरी तरह यान केंद्रित न कर पा रहा हो.

प्रारंभ से ही बच्चों को हम अपनी आकांक्षाओं, आशाओं के इतने बड़े जाल में फांस देते हैं कि वह बेचारे अपना अस्तित्व ही खो बैठते हैं, समझ नहीं पाते कि उन की स्वयं की रुचि किस में है, उन्हें कौन से विषय चुनने चाहिए. वैसे भी हमारी आज की शिक्षा प्रणाली बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाधक है. वह उन्हें सिर्फ परीक्षा में सफल होने हेतु विभिन्न प्रकार के तरीके उपलब्ध कराती है न कि जीवन के रणसंग्राम में विपरीत परिस्थितियों से जूझने के. बच्चे की सफलता, असफलता और योग्यता का मापदंड केवल विभिन्न अवसरों पर होने वाली परीक्षाएं ही हैं. चाहे उसे देते समय बच्चे की शारीरिक, मानसिक स्थिति कैसी भी क्यों न हो?

सुमित के न आने के कारण उमा ही बीचबीच में जा कर मिल आती. उसे अकेला ही आया देख कर वह निराश हो जाता था. वह जानती थी कि उस की आंखें पिता के प्यार के लिए तरस रही हैं, लेकिन कार्तिकेय ने भी स्वयं को एक कवच में छिपा रखा था, जहां बेटे की अवहेलना से उपजी आह पहुंच ही नहीं पाती थी. शायद पुरुष बच्चों की सफलता को ही ग्रहण कर गर्व से कह सकता है— ‘आखिर बेटा किस का है?’ लेकिन एक नारी—एक मां ही बच्चों की सफलताअसफलता से उत्पन्न सुखदुख में बराबर का साथ दे कर उन्हें सदैव अपने आंचल की छाया प्रदान करती रहती है.

सुमित की ऐसी दशा देख कर उमा काफी विचलित हो गई थी, लेकिन अब कुछ भी कर पाने में स्वयं को विवश पा रही थी. पितापुत्र के शीत युœ ने पूरे घर के माहौल को बदल दिया था. अब तो हंसमुख अनुज के व्यक्तित्व में भी परिवर्तन आ गया था. वह भी धीरेधीरे गंभीर होता जा रहा था. सिर्फ काम की बातें ही करता था. पूरे दिन अपने कमरे में कैद किताबों में ही उलझा रहता— शायद पापा की खामोशी ने उसे बुरी तरह झकझोर कर रख दिया था.

अनिला से ही पता चला कि सुमित ने बी-एससी- प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर सिविल सर्विसेस की कोचिंग करनी प्रारंभ कर दी है और उसी में रातदिन लगा रहता है-पिताजी के हंसमुख स्वभाव के कारण ही घर में थोड़ी रौनक थी वरना अजीब सी खामोशी छाती जा रहा थी— मां की मृत्यु के पश्चात वह दोपहर का समय अनाथाश्रम जा कर बच्चों और प्रौढ़ों को शिक्षादान करने में व्यतीत करते थे. इस नेक काम की दीप्ति से ही आलोकित उन का तनमन मरुस्थल हो आए. घर में थोड़ी शीतल बयार का झोंका दे कर प्रसन्नता देने का प्रयास करता रहता था.

उमा बेटा, एक कप चाय मिलेगी? सुबह की सैर से लौट कर आए पिताजी ने किचन में आ कर दूध से भरा जग रखते हुए कहा.

बस, एक मिनट, पिताजी—

वास्तव में उन की सैर और भैंस का ताजा दूध लाने का काम दोनों साथसाथ हो जाते थे. कभीकभी सब्जी, फल इत्यादि यदि उचित दाम में मिल जाते तो वह भी ले आते थे.

चाय का कप टेबुल पर रखते हुए उमा ने कहा, पिताजी, आप का स्वप्न पूरा हो गया.

स्वप्न— कैसा स्वप्न—? क्या सुमित सिविल सर्विसेज में आ गया? पिताजी ने चौंकते हुए पूछा.

हां, पिताजी, आज ही उस का फोन आया था, उमा ने कहा.

मुझे मालूम था, आखिर पोता किस का है? वह हर्षातिरेक से बोल उठे थे, साथ ही उन की आंखों में खुशी के आंसू भी छलक आए थे.

सब आप के आशीर्वाद के कारण ही हुआ है. बेटा, बड़ों का आशीर्वाद तो सदा बच्चों के साथ रहता है, लेकिन उस की इस सफलता का मुख्य श्रेय दिवाकर और अनिला को है जिन्होंने उसे पलपल सहयोग और मार्गदर्शन दिया वरना जैसा व्यवहार उसे तुम दोनों से मिला उस स्थिति में वह पथभ्रष्ट हो कर या तो चोरउचक्का बन जाता या बेरोजगारों की संख्या में एक वृद्धि और हो जाती.

पिताजी ज्यादा ही भावुक हो चले थे, वरना इतने कठोर शब्द वह कभी नहीं बोलते. वह सच ही कह रहे थे, वास्तव में दिवाकर और अनिला ने उसे उस समय सहारा दिया जब वह हमारी ओर से निराश हो गया था. मैं पीछे मुड़ी तो देखा कार्तिकेय खड़े थे. एक बार फिर उन का चेहरा दमक उठा था शायद आत्माभिमान के कारण— योग्य पिता के योग्य पुत्र होने के कारण, लेकिन वह जानती थी कि वह अपने मुंह से प्रशंसा का एक शब्द भी नहीं कहेंगे. मैं कुछ कहने को हुई कि वह अपने कमरे में चले गए.

आज सुमित के कारण हमारी नाक ऊंची हो गई थी. कल तक जो बेटा नालायक था, आज वह लायक हो गया. संतान योग्य है तो मातापिता भी योग्य हो जाते हैं वरना पता नहीं कैसे परवरिश की बच्चों की कि वे ऐसे निकल गए कि ताने सुनसुन कर जीना दुश्वार हो जाता है. यह दुनिया का कैसा दस्तूर है?

आज का मानव, जीवन में आए तनिक से झंझावातों से स्वयं को इतना असुरक्षित क्यों महसूस करने लगता है कि अपने भी उसे पराए लगने लगते हैं? अनुज का कथन याद हो आया था— ‘एक अधूरा चित्र तो पूर्णता की ओर अग्रसर हो रहा है दूसरा भी समय आने पर रंग बिखेरेगा ही,’ इस आशा ने मन में नई उमंग जगा दी थी.