सरिता विशेष

मुंबई एअरपोर्ट पहुंच कर बोर्डिंग पास लेते हुए अभिरूप ने राधिका से पूछा, ‘‘विंडो सीट पसंद करोगी न?’’ राधिका ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. अभिरूप ने एक विंडो सीट के लिए कहा, दोनों ने अपना बोर्डिंग पास लिया. राधिका के पास बस अब हैंडबैग था. अभिरूप ने पूछा, ‘‘कौफी पिओगी?’’

‘‘लेकिन आप को तो कौफी अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘तो क्या हुआ, तुम्हें तो पसंद है न. तुम्हारा साथ दे दूंगा.’’

दोनों ने एकदूसरे को भावपूर्ण नजरों से देखा. दोनों की आंखों में बस अनुराग ही अनुराग था. दोनों ‘कैफे कौफी डे’ जा कर कुरसी पर बैठ गए. अभिरूप 2 कौफी ले आए. फ्लाइट के उड़ने में 1 घंटा था. राधिका ने कहा, ‘‘अब क्या करें, एअरपोर्ट आ कर इतनी देर बैठने से मुझे हमेशा कोफ्त होती है, यह समय काटना मुश्किल हो जाता है.’’

अभिरूप हंसे, ‘‘अच्छा, हो सकता है अब तुम्हें ऐसा न लगे. बंदा अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेगा कि तुम्हें बोरियत न हो.’’

अभिरूप के नाटकीय अंदाज पर राधिका हंस पड़ी. अभिरूप की नजर हंसती हुई राधिका पर टिक गई, बोले, ‘‘ऐसे ही हंसती रहना अब हमेशा, बहुत अच्छी लगती हो हंसते हुए.’’

राधिका शरमा गईं, मन में रोमांच की एक तेज लहर सी उठी. लगा, इस उम्र में भी ऐसी बात सुन कर शर्म आ सकती है. और फिर सचमुच अभिरूप के साथ समय कब कटा, पता ही न चला उन्हें. वे ध्यान से उन्हें देखती रही थीं, एकदम चुस्तदुरुस्त, हमेशा हंसतामुसकराता चेहरा, राजनीति, मौसम विज्ञान से ले कर मनोविज्ञान तक, हर विषय पर उन की इतनी अच्छी पकड़ थी कि किसी भी विषय पर वे घंटों बात कर सकते थे.

दोनों तय समय पर प्लेन में अपनी सीट पर जा कर बैठ गए. राधिका विंडो सीट पर बैठ गईं, बीच वाली सीट पर अभिरूप और तीसरी सीट पर एक लड़का आ कर बैठ गया. उड़ान भरते ही राधिका बाहर दिख रहे रूई के गोलों जैसे बादलों में खो गईं. थोड़ी देर में उन्होंने अभिरूप पर नजर डाली. उन की आंखें बंद थीं. बादलों में खोएखोए राधिका के मन में पिछले दिनों की घटनाएं चलचित्र की तरह घूमने लगीं.

55 साल की राधिका और 60 साल के अभिरूप पहली बार सोसायटी के सामने मार्केट में बनी लाइब्रेरी में मिले थे. राधिका ने जब भी उन्हें देखा, ऐसा ही लगा जैसे उम्र उन्हें बस छू कर निकल गई है.

अभिरूप के घर में उन का बेटा विनय, बहू अवनि और पोती रिमझिम थी. अभिरूप एक कंपनी में वाइस प्रैसीडैंट थे. शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यधिक फिट होने के कारण वे आज भी कार्यरत थे. योग्यता के कारण उन्हें एक्सटेंशन मिलता जा रहा था.

उन की पत्नी नीला की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी जिस में वे बालबाल बचे थे.

अकसर अभिरूप और राधिका मिल ही जाते थे, कभी लाइब्रेरी में तो कभी सैर करते हुए. राधिका अकेली रहती थीं. एक ही बेटा था अनुज, जो अमेरिका में अपनी विदेशी पत्नी कैरेन और बेटे अमन के साथ रहता था. राधिका शुरू में तो साल दो साल में अमेरिका गईं लेकिन उन्हें वहां अच्छा नहीं लगता था. उन का मन यहीं अपने घर में लगता था. अब अनुज ही चक्कर लगा लेता था. शाम को राधिका कुछ साउथ इंडियन बच्चों को हिंदी की ट्यूशंस पढ़ाती थीं. सैर पर जाना उन की दिनचर्या का हिस्सा था. पुस्तकें पढ़ती थीं, वक्तजरूरत या कभी तबीयत खराब होने पर साफसफाई करने वाली मेड लता थी ही.

राधिका के पति विनोद का निधन तो सालों पहले हो गया था. विनोद जो पैसा छोड़ गए थे वह और जो विनय भी जबरदस्ती भेजता रहता था, उन के लिए काफी था.

अभिरूप शनिवार और रविवार को ही राधिका को सैर करते दिखते थे. पता नहीं चला, कब बात होने लगी, वे घर भी आए, दिल खुले, अंतरंगता बढ़ी. दोनों बाहर भी साथ आनेजाने लगे थे. सबकुछ अपनेआप होता चला गया था. दोनों ही बच्चों की परवा, लोगों की बातों से विचलित नहीं हुए. अपनी उम्र के लोगों से बात कर के एक अजीब सा सुकून मिलता है. एक जैसी समस्याएं, एक जैसी खुशियां, सबकुछ शेयर करना बहुत अच्छा लगने लगा. राधिका को ऐसा लगा, वे अकेली नहीं हैं, दोनों एकदूसरे के दर्द को आसानी से समझ सकते हैं. सामने वाले के पास हमारी बात सुनने का समय है, वह हमें गंभीरता से ले रहा है, इस उम्र में यह एहसास ही खासा सुकून देने वाला होता है.

राधिका कुछ अपनी कहतीं, कुछ उन की सुनतीं. मरते पौधों को पानीखाद मिले, अच्छी देखभाल हो तो वे भी जी उठते हैं. इन 2 अकेले प्राणियों को एकदूसरे की सहानुभूति मिली, अपनापन मिला तो दोनों के जीवन में जान आने लगी थी.और एक दिन अभिरूप ने जब राधिका के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो वे बुरी तरह चौंक गई थीं. बस, मुंह से यही निकला था, ‘क्या, इस उम्र में?’

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‘क्यों, उम्र को क्या हुआ है तुम्हारी? अगर हम साथ हो जाएं तो जो जीवन हम काट रहे हैं उसे एक अर्थ, एक उद्देश्य दे सकते हैं.’

वे चुप रही थीं, सोचने के लिए समय मांगा था. बहुत सोचा था, लगा था यह भी सही है अकेलापन सहा नहीं जाता, काटने को दौड़ता है, घड़ी की सूइयां ठहरी हुई सी लगती हैं. सब से बड़ी बात तो यह है कि कई बातें ऐसी होती हैं, कुछ दुखदर्द ऐसे होते

हैं जिन्हें जीवनसाथी के साथ ही बांटा जा सकता है. बड़े बच्चों की मां के पुनर्विवाह की बात न तो समाज सोचता है न तो स्वयं, कोई विवेकानंद या दयानंद पैदा नहीं होता इस समाज में. बस, यादों के सहारे ही विधवा जीवन निकालना होता है.

राधिका रातदिन पता नहीं कितने विचारों में डूबतीउतराती रहीं. वे सोचतीं, अपने एकाकी मन का क्या करें जो रहरह कर किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ़ रहा था जिस के सामने फूट पड़ें, अंदर का सबकुछ बहा डालें किसी झरने की तरह. सभी चाहतें, उमंगें, केवल बच्चों और जवानों के लिए ही होती हैं क्या? उन की उम्र के लोगों की जीवन जीने की कोई साध नहीं होती? सच पूछा जाए तो उन्हें लग रहा था कि जीवन का यही सब से सुंदर, सब से रोमांचकारी समय था. जीवन की संध्या में ही सही. अंतरात्मा का शून्य भरने कोई आया तो था. वे विमुग्ध थीं, अपनेआप पर, अभिरूप पर, अपनी नियति पर.

और फिर जब अभिरूप आशाभरी नजरों से उन का उत्तर सुनने के लिए आए तो उन्होंने कहा था, ‘आप ठीक कह रहे हैं. जब सभी अपने सुखों में जी रहे हैं तो हम भी क्यों न जिएं,’ और उन की आंखों ने किसी झरने का रूप ले लिया था.

आखिरकार, बहुत सोचविचार कर पिछले हफ्ते ही दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली थी. विनय और अवनि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी इस बात पर. विनय बहुत ही गंभीर मुद्रा में बैठा रह गया था.

अनुज ने बस इतना कहा था, ‘मां, जैसा आप ठीक समझें, आप का अकेलापन महसूस होता है मुझे. मुझे किसी बात से परेशानी नहीं है,’ उस ने अभिरूप से फोन पर ठीक तरह से बात भी की थी. अभिरूप और राधिका को विनय और अवनि के साथ रहने के बजाय राधिका के ही घर में रहना ठीक लगा था. वे राधिका के ही घर में शिफ्ट हो गए थे और आज दोनों हिमाचल घूमने जा रहे थे.

मुंबई से उन की चंडीगढ़ की फ्लाइट थी. चंडीगढ़ से उन्हें आगे जाना था. स्नैक्स सर्व होने की घोषणा हुई तो राधिका की तंद्रा भंग हुई. अभिरूप ने भी चौंक कर आंखें खोलीं, बोले, ‘‘अरे, बैठते ही शायद मेरी आंख लग गई थी, तुम भी सो गई थीं?’’

‘‘नहीं, मेरी आंख कभी नहीं लगती सफर में.’’

‘‘फिर क्या सोचती रहीं?’’

‘‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही.’’

‘‘मैं जानता हूं तुम क्या सोच रही थीं.’’

‘‘क्या, बताओ?’’

‘‘हम दोनों हनीमून पर जा रहे हैं, यही सोच रही थीं न?’’

राधिका बुरी तरह शरमाती हुई संकोच से भर उठीं, ‘‘नहींनहीं, ऐसा तो कुछ नहीं.’’

अभिरूप हंस दिए, ‘‘तुम तो मजाक पर घबरा गईं. वैसे, तुम्हें विनय, अवनि, रिमझिम कैसे लगे?’’

‘‘अच्छे हैं सब, पर पता नहीं मुझे कब अपनाएंगे, यही सोचती हूं. उन का भी तो दोष नहीं है. अचानक मुझे कैसे अपनी मां मान सकते हैं, समय तो लगेगा.’’

‘‘हां, बच्चे हमारे दोस्तों की तरह यही सोच कर तो खुश नहीं हो सकते न कि हम दोनों को एकदूसरे की जरूरत है. उन का अपना ढंग है सोचने का. मैं जानता हूं अपने बच्चों को. विनय को कुछ समय लगेगा फिर सब ठीक हो जाएगा.’’

राधिका कुछ नहीं बोलीं, इस बात से कुछ उदास तो मन था ही.

चंडीगढ़ पहुंच कर दोनों सनबीम होटल पहुंचे. अभिरूप ने 8 दिन का प्रोग्राम योजनाबद्ध किया था. हर जगह बुकिंग थी. 1 बज रहा था. दोनों फ्रैश हुए. लंच किया. तब तक टैक्सी आ गई. पहले रौकगार्डन गए, फिर सुखना लेक और फिर रोजगार्डन. राधिका को अपने अंदर एक नई औरत जन्म लेती दिख रही थी. रौकगार्डन में भूलभुलैया जैसे रास्तों पर अभिरूप उसे परेशान करने के लिए छिप गए, राधिका सहमी सी इधरउधर देख रही थीं. अभिरूप ने राधिका की कितनी ही फोटो लीं, फिर अचानक राधिका के पास जा कर उन्हें डराया तो राधिका का चेहरा देख अभिरूप हंस पड़े. राधिका उन के पास से आती मनमोहक खुशबू में खो सी गई थीं.

सुखना लेक में दोनों ने बोटिंग की, आसपास के लोगों को कैमरा दे कर अभिरूप ने राधिका के कंधे पर हाथ रखते हुए, कभी उन का हाथ पकड़ कर, कई फोटो खिंचवाईं, फोटोग्राफी के शौकीन अभिरूप का उत्साह देख कर राधिका को अच्छा लग रहा

था. रोजगार्डन में जा कर तो राधिका जैसे एक तरुण युवती बन गईं. लगभग 850 किस्म के गुलाबों के करीब 35 हजार पौधे थे. हर तरफ गुलाब ही गुलाब, बेहद खूबसूरत और साफसुथरा गार्डन था. एक जगह फौआरे के पास दोनों थोड़ी देर बैठ गए. वहां पर बहुत ही सुंदर लाल और पीले फूलों वाले व्यवस्थित पेड़ थे. पूरे गार्डन का चक्कर लगातेलगाते 8 बज रहे थे, दोनों डिनर कर के वापस होटल पहुंच गए.

एक हफ्ते से दोनों एकसाथ ही रह रहे थे लेकिन संकोचवश दोनों ने शारीरिक रूप से एक दूरी बना रखी थी. आज दोनों कपड़े बदल कर जब लेटे, राधिका ने कहा, ‘‘आज तो हम बहुत घूमे, अब थकान लग रही है.’’

‘‘हां, कुछ थकान तो है लेकिन तुम्हारे साथ ने मुझे दिनभर एक अलग स्फूर्ति से भर दिया था.’’

राधिका कुछ नहीं बोलीं, चुपचाप बैड के एक कोने में लेटी रहीं. अभिरूप ने आज पहली बार उन की कमर पर हाथ रखा. राधिका सिहर उठीं. पता नहीं कितने सालों से तनमन में दबा कुछ पिघलने लगा. वे सोचने लगीं, क्या उन्हें उस के शरीर से भी उम्मीदें होंगी. अभिरूप धीरेधीरे उन्हें सपनों की दुनिया में जैसे ले जा रहे थे, अब उन्हें महसूस हुआ शरीर की भी कुछ इच्छाएं, आकांक्षाएं थीं, उन्हें भी किसी के स्निग्धस्पर्श की कामना थी. राधिका के मन में बहुत कुछ चल रहा था. सोच रही थीं, सुना तो है कि पुरुष का पौरुष हमेशा सलामत रहता है पर स्त्री को ले कर पता नहीं क्यों हमेशा नकारात्मक भ्रांतियां ही पाली जाती हैं. क्या कभी किसी ने कहा है कि उम्रदराज औरत भी अपने शरीर का आनंद ले सकती है. फिर उस के मन के सारे संदेह, शंकाएं, तर्कवितर्क सब पता नहीं कहां विलुप्त होने लगे.

कुछ समय बाद दोनों की मनोदशा एक सी थी. दोनों को किसी के प्यार, किसी की चाहत ने जैसे एक नया जीवन दे दिया था. अब जैसे दोनों नया जीवन पूरी तरह जीने के लिए तैयार थे.

सुबह उठे तो दोनों कुछ देर तो एकदूसरे से नजरें चुराते रहे, फिर एकदूसरे को देख कर मुसकरा पड़े. आंखों में अब प्यार ही प्यार था. दोनों एकदूसरे से चिपक गए.

आज दोनों टैक्सी से नारकंडा के लिए निकल गए. थकान के बावजूद दोनों दिनभर कुछ अलग नए खयालों में खोए रहे. शाम को होटल पहुंचे, फ्रैश हुए, डिनर किया. फिर वही समय आ गया जिस की दिनभर उन्हें दिल ही दिल में प्रतीक्षा थी. एकदूसरे के सामीप्य से दोनों का रोमरोम पुलकित हो उठा था.

दोनों चैल पैलेस पहुंचे. भव्य पैलेस की सुंदरता देख राधिका के मुंह से इतना ही निकला, ‘‘आप ने यहां बुक किया है रूम?’’

‘‘हां, मेरी रानी आज की रात महल में रुकेगी,’’ हंसते हुए अभिरूप ने कहा.

राधिका को भी हंसी आ गई, ‘‘लेकिन यह तो बहुत महंगा होगा, अभि?’’

‘‘तो क्या हुआ? सस्तेमहंगे की चिंता तुम मत करना अब, मैं हूं न. बस, तुम तो मुझे अभि कह कर, मेरा हाथ पकड़ कर जीवन में अब साथ चलती रहो.’’

राधिका ने अभिरूप के कंधे पर सिर रख दिया.

दोनों ने पूरा पैलेस देखा. इस महल को हिमाचल सरकार द्वारा एक फाइवस्टार होटल का रूप दे दिया गया था. बहुत बड़ा सुंदर गार्डन था, जहां सफेद गोल कुरसियां और मेजें रखी थीं. अचानक वहां कई बंदर आ गए. वहां घूमते वेटर ने बताया कि डरने की बात नहीं है. ये किसी को काटते नहीं हैं. राधिका ने कस कर अभिरूप का हाथ पकड़ रखा था. वेटर की बात सुनी तो जान में जान  आई. अभिरूप राधिका के डरे हुए चेहरे का मजा ले रहे थे. हर तरफ देवदार के सुंदर पेड़, खूबसूरत फूलों से सजा पूरा गार्डन. शाम के 5 बज रहे थे. राधिका ने जैसे ही अपने दोनों हाथ समेट कर सीने से लगाए, अभिरूप ने कहा, ‘‘मैं अभी आया,’’ कह कर अभिरूप चले गए, राधिका कुछ समझ नहीं पाईं. कुछ ही पलों में पीछे से राधिका के कंधे पर शौल डालते हुए अभिरूप ने कहा, ‘‘तुम्हें ठंड लग रही थी न, यही लेने गया था रूम से.’’

इस बात पर राधिका की आंखें भर आईं, बोलीं, ‘‘मैं ने कभी नहीं सोचा था कि अब मेरा कोई ध्यान रखेगा, मेरी चिंता करेगा. सच अभि, थक गई थी मैं अकेली रहतेरहते.’’

अभिरूप ने राधिका का हाथ पकड़ लिया, ‘‘हां राधिका, सच कहती हो, जीवन की सांध्यबेला में एक साथी की कमी कुछ ज्यादा ही महसूस होती है, मैं भी जी उठा हूं तुम्हें पा कर.’’

दोनों कुछ देर ऐसे ही एकदूसरे का हाथ पकड़ कर बैठे रहे. सुंदर जगह थी, दूर तक हरे, स्लेटी, नीले रंग आपस में घुलमिल गए थे, जैसे पहाड़, पेड़ और आसमान अपनीअपनी संज्ञा भूल कर केवल रंग ही रह गए थे.

फिर पैलेस के ‘किंग्स डायनिंग हौल’ में डिनर करने गए. वहां चलते धीमेधीमे पुराने गानों के संगीत ने अलग ही समां बांधा हुआ था. दोनों को बहुत ही रोमांटिक माहौल लगा. दोनों अपनेआप को बहुत युवा और जोश से भरा हुआ महसूस कर रहे थे. डिनर कर के पैलेस में ही थोड़ी देर टहल कर अपने रूम में चले गए. अगली सुबह उन्हें चंडीगढ़ के लिए निकलना था. शानदार पैलेस के इस भव्य रूम की रात के हर पल को दोनों ने पूरी तरह जिया. दोनों के मन में पिछले जीवन की कोई उदासी, कोई

दुख, कोई संदेह लेशमात्र को नहीं था. दोनों अब पूरी तरह से एकदूसरे को समर्पित थे. अब दिलों में था प्यार ही प्यार और ढेर सारा विश्वास.

सुबह दोनों चंडीगढ़ के लिए निकल गए. दोपहर तक वहां पहुंचे. वहां मैरीलैंड में रूम बुक था. हर जगह अभिरूप ने अच्छे से अच्छा प्रबंध किया था. राधिका उन की प्लानिंग की तारीफ करती रहीं. दोनों ने लंच कर के फिर थोड़ा आराम किया. दोनों की अपने बेटों से फोन पर 1-2 बार बात होती रही थी. शाम को दोनों सैक्टर 17 में शौपिंग के लिए गए. राधिका ने कहा, ‘‘हम लोग विनय, अवनि और रिमझिम के लिए कुछ गिफ्ट्स ले कर चलेंगे, उन्हें अच्छा लगेगा.’’

‘‘जरूर, जैसी तुम्हारी इच्छा.’’

राधिका ने विनय के लिए शर्ट, अवनि के लिए सुंदर सूट और रिमझिम के लिए फ्रौक ली. अभिरूप ने राधिका को भी जबरदस्ती शौपिंग करवाई. फिर वहीं खापी कर दोनों होटल वापस आ गए.

अगले दिन मुंबई पहुंच कर दोनों राधिका के ही घर पहुंचे. अभिरूप ने कहा, ‘‘ऐसा करते हैं, चलो, शाम को बच्चों से मिल आते हैं. उन्हें गिफ्ट्स भी दे देते हैं. कई दिन हो गए देखे हुए.’’

दोनों विनय के घर पहुंचे. वहां ताला लगा था. बराबर में रहने वाले पड़ोसी ने बताया कि अवनि को डेंगू हो गया है. वह अस्पताल में एडमिट है. राधिका ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘रिमझिम कहां है?’’ पड़ोसी ने ‘कुछ पता नहीं’ कह कर सिर हिला दिया. दोनों घबराए, अस्पताल पहुंचे. पूछताछ कर रूम तक पहुंचे तो विनय रिमझिम को गोद में लिए बाहर बैठा था. उन्हें देख कर परेशान सा खड़ा हो गया.

अभिरूप ने हलकी सी डांट लगाई, ‘‘फोन पर बता नहीं सकते थे?’’

‘‘नहीं पापा, आप लोगों को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं लगा.’’

राधिका ने स्नेहिल स्वर में कहा, ‘‘बेटा, जरूर बताना चाहिए था, हम लौट आते. रिमझिम भी छोटी है, तुम्हें इतनी परेशानी न होती. आओ बेटा,’’ कह कर रिमझिम को अपने पास बुलाया राधिका ने. विनय ने राधिका की बात का कोई उत्तर नहीं दिया, बस, मुंह घुमा लिया. राधिका को दुख हुआ. उन्होंने फिर पूछा, ‘‘अवनि कैसी है अब?’’

‘‘प्लेटलेट्स बहुत कम हैं, ठीक होने में टाइम लगेगा, बहुत कमजोर हो गई है.’’

अभिरूप बोले, ‘‘राधिका, तुम रिमझिम को घर ले जाओ. विनय, तुम भी घर जा कर थोड़ा आराम कर लो. मैं यहीं हूं, फिर आ जाना.’’

बुरी तरह थका हुआ विनय राधिका और रिमझिम के साथ कार से घर चला गया. राधिका का घर पहले आया. राधिका ने कहा, ‘‘बस बेटा, मुझे यहीं उतार दो.’’

विनय ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘नहीं, आप वहीं चलिए, रिमझिम का सारा सामान वहीं तो है.’’

‘‘ठीक है.’’

राधिका ने विनय के घर पहुंच कर सब संभाल लिया. विनय तो बैड पर पड़ते ही सो गया. राधिका का दिल स्नेह से भर उठा. रिमझिम शांत और समझदार बच्ची थी. राधिका ने उसे खिलापिला कर सुला दिया और फिर सब के लिए खाना बनाने लगी. विनय गहरी नींद सोया. अभिरूप ने फोन किया तो राधिका ने कहा, ‘‘विनय को आराम की जरूरत है, थक गया होगा अस्पताल में बैठेबैठे.’’

‘‘हां, ठीक है. मैं यहीं हूं.’’

विनय जब सो कर उठा तो पूरे घर में खाने की खुशबू फैली हुई थी. डिनर तैयार था. रिमझिम सोई हुई थी. पहली बार उस के मन में राधिका के लिए कोमल भावना उत्पन्न हुई. डिनर कर के उसे अच्छा लगा. 3 दिन से अस्पताल की कैंटीन का खाना खा रहा था. उस ने कहा, ‘‘मैं पापा को भेज रहा हूं जा कर, रात में वहीं रहूंगा.’’

अभिरूप घर आ गए, उन्हें भी दिनभर की थकान थी, आते ही डिनर कर के वे भी सोने के लिए लेट गए. राधिका रिमझिम के पास ही लेट गई. अगली सुबह राधिका ने जल्दी उठ कर मेड के साथ सब काम निबटाया. रिमझिम को तैयार कर स्कूल भेजा. सब का नाश्ता बनाया और फिर तैयार हो कर अभिरूप से कहा, ‘‘अब मैं अवनि के पास जा रही हूं, विनय को भेज देती हूं.’’

विनय घर पर आ गया. अवनि काफी कमजोरी महसूस कर रही थी. राधिका उस का सिर प्यार से सहलाती रहीं तो ढीली तबीयत से बेचैन अवनि का स्वर भर्रा गया. बस ‘मां’ ही कहा.

यह संबोधन सुनते ही राधिका का दिल भर आया. बोलीं, ‘‘बेटा, किसी बात की चिंता न करना. मैं हूं न, सब संभाल लूंगी.’’

अवनि ने राधिका का हाथ कस कर पकड़ लिया. किसी को कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी. माहौल में उस समय कोई हलचल नहीं थी. सिर्फ शांति और मौन. कभीकभी मौन भी बहुत कुछ कह जाता है. बस, उसे समझने के लिए उस मौन भाषा के ज्ञान की जरूरत होती है. दोनों इस मौन में बसे प्यार को महसूस कर रही थीं.

3 दिन और यही क्रम चला. अवनि के शरीर में प्लेटलेट्स के सुधरने पर उसे डिस्चार्ज कर दिया गया. कमजोर अवनि की राधिका ने मन से देखभाल की. पूरे घर का माहौल एकदम बदल गया था. लग ही नहीं रहा था कि राधिका इस घर में नई आई हैं. अपने व्यवहार, अपने स्वभाव से उन्होंने बच्चों का मन जीत लिया था. वे अपने घर सुबह जातीं. उन का सामान, कपड़े आदि सब वहीं थे, फिर तैयार हो कर आ जातीं. घर पास में ही था. रिमझिम जब बड़ी मम्मी कह कर उन से चिपटती तो वेनिहाल हो जातीं.

अवनि ठीक हुई तो राधिका ने कहा, ‘‘अब मैं अपने घर जाऊंगी. मेरी कभी भी जरूरत हो निसंकोच बता देना, बच्चो.’’

विनय ने उन पर नजर डाली. रिमझिम को अपनी गोद में बिठा रखा था राधिका ने. आज उन में एक ममतामयी मां नजर आई उसे. बोला, ‘‘आप कहीं नहीं जाएंगी, मां. यहीं रहेंगे हम सब साथ.’’

अवनि ने भी सुर में सुर मिलाते हुए  ‘‘हां, साथ रहेंगे सब,’’ कहते हुए राधिका के हाथ पर हाथ रख दिया.

अभिरूप ने माहौल को हलका करते हुए कहा, ‘‘नहीं भई, कल अगर सासबहू में झगड़ा होगा तो कौन सुलझाएगा? मुझे भी कल से औफिस जाना है.’’

विनय हंस दिया, अवनि कहने लगी, ‘‘चलो, उस झगड़े का भी आनंद ले कर देखा जाएगा, क्यों मां?’’

सब खुले दिल से हंसे. विनय और अवनि उन दोनों के चेहरों की चमक निहार रहे थे. एक पड़ाव पर कुछ देर ठहर उन दोनों का जीवन नई कुलांचें भरने को तैयार था. उन के जीवन के इस पड़ाव के शुभारंभ के लिए दोनों ने मन ही मन उन्हें सच्चे दिल से शुभकामनाएं दी थीं.