हरीश बाबू एकदम स्तब्ध रह गए. ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था. उम्र भी आजकल के हिसाब से कुछ भी नहीं. अभी 1 वर्ष ही हुआ है सेवानिवृत्त हुए. 62वां वर्ष चल रहा है उन का. निर्मला उन से पूरे 5 वर्ष छोटी है. पिछले महीने जन्मदिन मनाया है धूमधाम से. सभी बच्चे आए थे, 2 बेटे, 1 बेटी. सभी संपन्न, प्रतिष्ठित और सुखी.

20 वर्ष की उम्र में निर्मला को ले कर आए थे गठजोड़े में बांध. वह 15 वर्ष की पहाड़ी नदी जैसी अल्हड़ किशोरी थी. गांव के माहौल की बात भूल, पल्ला सिर से उतार कर कमर में खोंस के गिलहरी की तरह चढ़ जाती थी पेड़ पर कच्चे आम तोड़ने. अम्मा ने कभी डांटा नहीं, स्नेह से हंसती थीं. वही निर्मला सारा जीवन उन को समर्पित रह कर इस उम्र में हरीश बाबू के साथ विश्वासघात कर गई.

हरीश बाबू अपनी नौकरी में मस्त थे. पूरा घर तो निर्मला ने संभाल रखा था, बच्चों की शिक्षासंस्कार, आगे चल कर उन का विवाह. कभी भी हरीश बाबू को कुछ नहीं करना पड़ा. नतीजतन, परिवार के बच्चों में अच्छे संस्कार यानी मातापिता के प्रति आदरसम्मान, भाईबहनों में प्रेमलगाव, बहुओं में सब के प्रति अपनापन आज भी जीवित हैं. सारा जीवन व्यस्तता में निकल गया.

सेवानिवृत्ति के बाद सोच रहे थे कि भारतदर्शन पर निकल पड़ेंगे. यहां तो दोनों बेटों का सम्मिलित परिवार है और दोनों बहुओं में बहुत प्यार है. इसलिए घर में कोई असुविधा नहीं होगी. दोनों मिलबैठ चयन कर रहे थे कि पहले कहां जाएं- जंगल, पहाड़ या समुद्र. निर्णय ले भी नहीं पाए कि निर्मला के मन में बेईमानी आ गई और वह उन को छोड़ कर चली गई. हार्ट स्पैशलिस्ट बेटा भी कुछ नहीं कर पाया मां को बचाने के लिए. इस समय ही पत्नी की सब से ज्यादा जरूरत होती है और इसी समय में वह उन को छोड़ कर इतनी दूर चली गई कि उन की आवाज भी वहां नहीं पहुंच सकती.

वैसे तो भरापूरा घर है, 4 पोतापोती, 2 बेटे, 2 बहुएं. बेटी भी अब बच्चों की छुट्टी होते ही पापा के पास दौड़ी आती पर यह अकेलापन तो उन का अपना है, उसे कौन पूरा करेगा? सुबह सुनहरी धूप में शरीर सेंकते हरीश बाबू लौन में बैठे थे. बेंत की कुरसीमेज, हरे रंग की. निर्मला की पसंद बहुत ही सुंदर थी, मानो कलाकार की पसंद हो.

उन की पहली पोस्टिंग आगरा थी, दूसरी मथुरा और इसी आगरामथुरा राजमार्ग के बीच में लगभग 10 किलोमीटर अंदर गांव में उन की पैतृक हवेली है. वहां से ही बाइक से वे काम पर आतेजाते थे.

आगरे की एक अभिजात कालोनी में उन का सुंदर घर बहुत पीछे बना है. सभी बच्चे बड़े हो गए. अब उन को स्कूल में डालने की समस्या आई. निर्मला बच्चों को अच्छे संस्थान में पढ़ाना चाहती थी, हरीश बाबू भी आगरा में पढ़े थे और उस समय पोस्ंिटग भी आगरा में थी. निर्मला ने ही यह जगह पसंद की थी. साथसाथ 2 प्लौट ले लिए. उसे खुला हुआ बड़ा सा घर और साथ में बागबगीचा चाहिए था. उसी की पसंद का घर बना, उस ने ही यहां फलफूल, सब्जी की क्यारियां हिसाब से लगाईं जो अब भरी जवानी पर हैं. पैतृक गांव में विशाल संपत्ति है, अम्मा ने वर्षों तक संभाला. उन के बाद कई बार बेचने की बात चली पर निर्मला ने नहीं बेचने दिया. वह खुद ही गाड़ी ले कर गांव आतीजाती थी. पूरी संपत्ति, घर, सब की देखभाल खुद ही करती. पहले उन से भी अनुरोध करती चलने का, पर वे नहीं जाते तो फिर उस ने कहना छोड़ दिया था.

पुराना ड्राइवर राजू उसी गांव का बेटा है. निर्मला ही भुखमरी के कगार से उसे उठा कर लाई थी. 10वीं पास करा कर और ड्राइविंग सिखा कर उसे अपना ड्राइवर रख लिया. वह निर्मला के साथ रहता था. असल में उसे गांव के घर, खेत, खलिहान से लगाव था. दोएक दिन रह कर आती थी. ब्याह हो कर इसी घर में आई थी.

सभी बच्चों का जन्म गांव में ही हुआ. बीच में 2 वर्ष पति विदेश गए थे तब वह अम्मा के साथ गांव में ही रही थी. अम्मा से बहुत लगाव था उस को, अम्मा भी बेटी की तरह प्यार करती थीं उसे. पर अम्मा आगरा में आ कर कभी नहीं रहीं, उन का मन पड़ा रहता घर, खेत और भैंसों में. आती भी थीं तो बच्चों के जन्मदिन या तीजत्योहार पर, दिनभर रह कर शाम को लौट जातीं. घंटेभर का ही तो रास्ता है.

एक दिन बेटी माधुरी आई, दोनों बेटे दीपेंद्र और रूपेंद्र भी साथ में थे.

‘‘पापा, एक बात कहनी है.’’

‘‘कहो.’’

तीनों कुरसी पर बैठ गए. दीपेंद्र ने कहा, ‘‘पापा, अब गांव की संपत्ति की देखभाल तो मुश्किल है. मां हैं नहीं, आप तो कुछ जानते नहीं हैं गांव के विषय में. अम्माजी के बाद मां ने ही संभाल रखा था.’’

‘‘हां, यह समस्या तो है.’’

‘‘कुछ लोग उस को लेना चाहते हैं. वे लोग आ भी रहे हैं, फोन भी कर रहे हैं.’’

थोड़ा अवाक् हुए, ‘‘हवेली, खेत, बाग सब?’’

‘‘नहींनहीं, करोड़ों का है सबकुछ. टुकड़ों में, कोई हवेली, कोई खेत, कोई बाग…’’

‘‘तो क्या तुम लोग…’’

‘‘जी पापा, उस को कौन संभालेगा अब. हमारे पास न समय है न जानकारी या अनुभव. आप को अकेला छोड़ नहीं सकते. ऐसे में इतनी बड़ी संपत्ति को लावारिस रहने देना…’’

बच्चों की बातों के औचित्य को समझा उन्होंने, ‘‘ठीक ही है, पर सब चीजों का अलगअलग ही सही, मूल्यांकन होना चाहिए. नहीं तो दो कौड़ी भी नहीं देगा कोई, औनेपौने में सबकुछ छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं है.’’

‘‘पर हम तो कुछ भी नहीं जानते जमीन, मकान के विषय में. 4 दुधारू भैंस हैं. राजू कह रहा था, हरी ग्वाला लेना चाहता है बच्चों समेत. एकएक भैंस 10-12 हजार रुपए की है. हरी ने कहा है, सब के लिए 10 हजार देगा.’’

‘‘पागल है क्या?’’

‘‘यही तो समस्या है. मां के न रहने से सब यही सोच रहे हैं कि हम लोगों को न तो कुछ पता है और न हम वहां रहने जा रहे हैं तो पानी के मोल ले लो.’’

‘‘तो फिर?’’

थोड़ा झिझकते हुए बेटी ने कहा, ‘‘पापा, आप 2-1 दिन के लिए जा कर वैल्यूएशन करा आएं तो…’’

‘‘पर मैं…मैं कैसे वैल्यूएशन करूंगा. मुझे तो गजभर जमीन का भी कोई अंदाजा नहीं.’’

‘‘हां, आप को नहीं पता, सतीश 2 दिन के लिए जा कर सब देखभाल कर दाम लगा देगा, कहां है?’’

‘‘सतीश…?’’

‘‘जी पापा, उस का तो काम ही यही है, जमीनजायदाद खरीदना, बेचना.’’

‘‘ठीक है, चला जाऊंगा. उसे रख कर भी क्या होगा.’’

‘‘राजू साथ रहेगा. कोई असुविधा नहीं होगी. वह गांव का ही बेटा है, इस समय क्या दाम चल रहा है, उसे पता है.’’

भोर में ही निकले हरीश बाबू. धूप चढ़ने से पहले पहुंच जाएंगे. घर के नौकर को साथ भेज रही थीं बहुएं कि 2-4 दिन रहना पड़े तो खानेपीने की उन को असुविधा न हो. पर राजू ने ही मना किया.

‘‘मांजी तो हर महीने 1-2 चक्कर लगाती ही थीं, पूरी व्यवस्था है. मेरी मां हैं, बहन है खाने के लिए कोई परेशानी नहीं होगी.’’

नौकर की घर पर भी बहुत जरूरत थी तो सब मान गए.

गाड़ी ने गांव का रास्ता पकड़ा. हरीश बाबू का मन उदास हुआ. आज बेटों की सुविधा के लिए वे गांव चल पड़े और निर्मला विनती करती रही कि एक बार गांव चलो, देखो न तुम्हारे लिए कितने सारे सरप्राइज गिफ्ट जमा कर रखे हैं वहां. पर वे नहीं आए. न तो समय निकाला न मन ही था. कहतेकहते बेचारी निर्मला ही संसार छोड़ गई. उन्होंने मन ही मन निर्मला से क्षमायाचना की.

10 वर्ष बाद गांव आ रहे थे. अंतिम बार अम्मा का क्रियाकर्म करने आए थे बस. पर निर्मला का गांव से गठबंधन नहीं टूटा था. वह बराबर आती, 8-10 दिन रह भी जाती अकेली ही, बच्चे भी नहीं जाते थे. वह बड़े शहर कानपुर की पलीबढ़ी थी पर गांव से लगाव था उस को. हां, बच्चों और पति को कभी जबरदस्ती यहां लाने का झगड़ा नहीं किया. राजू को साथ ले आती, जब तक मन लगता, रहती, फिर लौट जाती. बच्चे हंसते, हरीश बाबू गुस्सा करते पर निर्मला ने आना नहीं छोड़ा.

10 वर्षों में विशेष परिवर्तन तो नहीं हुआ, बस इतना है कि बस्ता ले कर स्कूल जाते बच्चों की संख्या काफी बढ़ी है. पहले की तरह घर में पहने बनियाननेकर या मैलेकुचैले कपड़ों के साथ नंगे पैर कोई नहीं है. सब स्कूल डै्रस में हैं. पैरों में बिना मोजे के जूते हैं, कपड़ों पर इस्त्री नहीं, पर वे साफ धुले हैं और तेल चुपड़े बालों में कंघी हुई है. बच्चे साफसुथरे लग रहे हैं. कच्ची गड्ढेदार सड़क भी पक्की तारकोल की बन गई है. राजू ने पहली बार मुंह खोला, ‘‘यह सड़क मांजी के कारण ही बनी है.’’

चौंके बुरी तरह, अवाक् हो, बोले, ‘‘क्या कह रहा है? कैसे?’’

‘‘मांजी के भतीजे बहुत बड़े सरकारी अफसर बन कर आए थे न, तब उन से कह कर…’’

हां, 7-8 वर्ष पहले विमल यहां जिलाधिकारी था तो उसी से यह

10 किलोमीटर का रास्ता पक्का करवाया था निर्मला ने. तो यही उस का सरप्राइज गिफ्ट है. मन में थोड़ी शांति आई. गाड़ी बिना झटके खाए आराम से आगे फिसलती जा रही थी.

45 वर्ष के विवाहित जीवन में छोटामोटा मनमुटाव छोड़ गंभीर झगड़ा कभी नहीं हुआ निर्मला से. उस की सूझबूझ, दूरदर्शिता की कद्र करते थे, उस को मूल्य देते थे, प्रशंसा भी करते थे हरीश बाबू. उन्होंने सदा ही उस के निर्णय को माना है बस, 1 को छोड़. उस की इच्छा थी कि सेवानिवृत्ति के बाद दोनों गांव में आ कर शांति से जीवन जिएंगे. कहती थी, ‘अम्मा ने साम्राज्य छोड़ा है हम लोगों के लिए. हम को उसे ठीक से चलाना चाहिए. हम खेती कराएंगे, बागों का रखरखाव करेंगे, डेरी बनवाएंगे, मुरगी फार्म खोलेंगे तो देखना बुढ़ापे में भी कितने व्यस्त रहेंगे. मजा आएगा जीवन का. और शहर, बच्चे कौन दूर हैं? घंटेभर का ही तो रास्ता है, गाड़ी है, राजू है.’

पर वह उन को हिला नहीं पाई. अपनी ही जन्मभूमि के प्रति उन के अंदर कोई लगाव नहीं था. कुछ घंटों के लिए भी वे नहीं आए जबकि निर्मला नियम से आती, हफ्ताभर रह कर जाती, कितना कहती, ‘चलो न एक बार, देखो बहुत सारे सरप्राइज गिफ्ट रखे हैं मैं ने वहां तुम्हारे लिए.’

पता नहीं वे सब क्या थे? अब गांव जा भी रहे हैं हरीश बाबू तो निर्मला नहीं है, अकेले उन गिफ्टों को कौन दिखाएगा? वंचित ही रह गए वे निर्मला के रखे उन गिफ्टों से. हृदय की गहराई से गहरी सांस निकल हवा में जा मिली.

निर्मला में एक व्यक्तित्व था जो सब उस का सम्मान करते थे. घर की कुशल निर्देशिका थी. भाईभाई, देवरानीजेठानी में प्रेमसद्भाव बना हुआ है. इस परिवार की नींव वह इतनी मजबूत कर गई है कि वह हिलेगी नहीं, कम से कम इस पीढ़ी में तो नहीं.

हरीश बाबू को थोड़ी थकान लगने लगी, ‘‘राजू, और कितनी दूर है?’’

‘‘बस आ गए. बाबूजी, चाय पी लीजिए.’’

‘‘चाय? यहां कहां?’’

‘‘है सामने ही.’’

‘‘गांव में किसी ने स्टौल खोला है क्या?’’

‘‘जी, अपना गोकुल है, मुरारी चाचा का बेटा.’’

हरीश बाबू ने सोचा था झोंपड़ी में गंदे बरतन में काढ़ा जैसी चाय बेचता होगा पर पास आ चौंके, पक्की साफसुथरी दुकान है. गैस पर केतली, दूध, चाय, चीनी अलगअलग शीशे के शो केस में बिस्कुट, डबलरोटी, मक्खन. झूलते नमकीन के पैकेट और काउंटर के पीछे साफसुथरा कुरताजींस पहने एक नई उम्र का प्रियदर्शन लड़का गोकुल. यहां जब आखिरी बार आए थे तब दसएक वर्ष का बालक होगा, अब युवक है. उस ने गाड़ी देख पहचान लिया. दौड़ आया, दरवाजा खोल पैर छुए, झरझर रो पड़ा.

‘‘बाबूजी, अम्मऽऽऽ….’’

वे अवाक्, पर कुछ बोल नहीं पाए. वह आंसू पोंछ दौड़ कर लौट गया. उन्होंने देखा अलमारी खोल उस ने सुंदर पोर्सलीन के कपप्लेट निकाले और एक टी बैग. गरम पानी से कपप्लेट धो उस ने टी बैग डाल ताजी चाय बनाई. फिर दौड़ आया सुगंधित ताजी चाय ले. उन्होंने चाय ली, एक घूंट भरा, तारीफ की, ‘‘चाय अच्छी है.’’

वह हंसा, ‘‘अम्माजी आतेजाते पीती थीं. उन के लिए बढि़या चाय और कपप्लेट मंगा कर रखे हैं…’’

चौंके वे, पर कुछ बोले नहीं. प्याला खाली कर रख दिया. साथ में एक 10 रुपए का नोट. वह रो पड़ा.

‘‘बाबूजी, अम्मा ने जीवनभर की रोटी दी है. पैसा नहीं लूंगा.’’

चला गया आंसू पोंछता. उन की समझ में कुछ नहीं आया.

राजू ने गाड़ी स्टार्ट की.

‘‘इस ने पैसे क्यों नहीं लिए?’’

‘‘कैसे लेता बाबूजी, आवारा बच्चों की संगत में फंस गया था. मुरारी आ कर मांजी के पास रो पड़ा तो उन्होंने इसे बुला डांटा भी और समझाया भी. फिर अपने पैसों से यहां पक्की दुकान बनवा चाय की दुकान खुलवा दी. लंबी सड़क है इसलिए खूब चलती भी है. यह खेत मांजी ने रामभरोसे से खरीदा है, जहां दुकान है. आप का है यह खेत. अब सुधर गया है गोकुल, कमाई करता है खूब, घर पक्का बनवा लिया है.’’

हरीश बाबू अवाक्, निर्मला ने कभी बताया नहीं. नया खेत खरीदना, पक्का कमरा बना चाय की दुकान खोल एक बरबाद होते लड़के के जीवन को बचाना, ये तो बड़ीबड़ी बातें हैं पर उस ने कभी चर्चा नहीं की. इतना पैसा आया कहां से? तभी उन्हें ध्यान आया कि खेतबाग की आमदनी कम नहीं है. पहले कभी अम्मा ने हिसाब नहीं दिया, पीछे निर्मला ने भी नहीं. उन को ध्यान भी नहीं था कि यहां स्टेट बैंक की शाखा पहले से है, उसी में अम्मा का खाता था. निर्मला का भी होगा, तो खेत खरीद कर दुकान बनाने में निर्मला ने उन को परेशान नहीं किया होगा.

घर के सामने आते ही पुरानी स्मृतियां ताजा हो गईं. इसी घर में 15 वर्ष की निर्मला को ब्याह कर लाए थे

20 वर्ष की उम्र में. नईनई नौकरी थी, मथुरा में पोस्टिंग थी. इतनी कम उम्र में निर्मला को अकेली नहीं आने दिया था अम्मा ने, वैसे भी उस जमाने में शादी होते ही बेटे के साथ बहू को भेज देने का चलन नहीं था. मथुरा पास भी था तो वे शनिवार को आ कर सोमवार भोर में मथुरा लौटते थे. कोई असुविधा नहीं थी. जीप थी, सरकारी कोठी में सेवा के लिए सरकारी नौकर, माली थे.

राजू ने गाड़ी रोकी, उतर कर गेट खोला.

पूरे 10 वर्ष बाद हरीश बाबू ने इस घर में पैर रखा. अम्मा और अपने बचपन, किशोरावस्था व जवानी की हजार स्मृतियों का दुशाला ओढ़े यह घर न तो बूढ़ा हुआ है न ही जर्जर. नियमित रखरखाव, रंगरोगन में झिलमिलाता, पूर्ण यौवन लिए मुसकराता उन के स्वागत में खड़ा हंस रहा है. जबकि वे इसी की गोद में जन्म ले कर बुढ़ापे की चपेट में आ गए हैं. तभी कोई पैरों पर पछाड़ खा आ गिरी और हाहाकार कर रो उठी.

वे बुरी तरह घबरा गए, ‘यह क्या मुसीबत?’ देखा नजर भर और पहले से भी ज्यादा घबरा गए. आतंक की एक सिहरन उन के पूरे शरीर में फैल गई, ‘यह तो मर गई है कब की, तो क्या उस की…?’

मुसीबत का नाम सत्या है जो 6 वर्ष पूर्व मृत घोषित हो चुकी है. वह कैसे शरीर धारण कर उन के पैरों के पास निर्मला को याद कर तड़पतड़प दहाड़ मार कर रो रही है और यह, जो दौड़ता आ कर खड़ेखड़े सुबक रहा है, वह भी तो हाथपैर तुड़वा, अपाहिज हो कर भी सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड के बिस्तर नंबर 5 से कहीं गायब हो गया था, उसी समय के आसपास. वे जागते हुए सुबहसवेरे, उजली धूप में खड़े हुए क्या सपना देख रहे हैं या आंखों का भ्रमजाल अथवा किसी जादूगर का रचा इंद्रजाल? पर नहीं, यह तो वास्तविकता है क्योंकि दोनों ने रोना बंद कर के उन को प्रणाम किया.

‘‘आइए, बाबूजी. चाय का पानी चढ़ा दे सत्या.’’

हरीश बाबू की आंखों के सामने 5 वर्ष पहले की वह शाम उभर आई. सत्या उन की पुरानी महरी की विधवा बेटी है. 11 वर्ष की उम्र में एक अधबूढ़े शराबी से महरी ने उस का ब्याह कर दिया था. निर्मला होती तो यह शादी नहीं होने देती पर उस समय वे दोनों छोटे साले के पास घूमने मुंबई गए थे. मुंबई से 1 महीने बाद लौटने पर सुना था कि सत्या की शादी हो गई. निर्मला द्वारा महरी को डांटतेफटकारते सुना था पर ध्यान नहीं दिया. नौकरचाकरों से लगावजुड़ाव नहीं था हरीश बाबू को. बस राजू ही थोड़ा उन के निकट आ गया है.

15 वर्ष की होतेहोते सत्या विधवा हो मां के पास लौट आई. सत्या तब महरी के साथ काम करने आती. निर्मला की लाड़ली थी वह. मां के मरने के बाद पूरा काम उस ने ही संभाला. पीछे वाली बस्ती में रहती थी. भाईभाभी को पूरी कमाई दे कर गाली और पिटाई ही मिलती उसे. जयपाल छोटी जाति का लड़का था, बस्ती से थोड़ा हट कर दलितों की बस्ती में रहता था. रिकशा चलाता था. दोनों में आतेजाते प्रेम हो गया. धीमरों को पता चला तो वे आगबबूला हो गए. धीमर ऊंची जाति है, ऊपर से विधवा. उस की ओर नजर उठाने की हिम्मत कैसे की दलित जाति के लड़के ने?

एक दिन दोनों को बात करते देख लिया उन लोगों ने. वे मार ही डालते जयपाल को पर राजू दौड़ता हुआ खबर ले कर आया तो निर्मला तुरंत पुलिस को फोन कर गाड़ी ले कर पहुंची. दोनों को बचा लाई. जयपाल की हालत गंभीर थी. उसे अस्पताल पहुंचाया. सत्या को अपने घर ले आई. घर में वह ही रहती थी. उधर, जयपाल की जान तो बच गई पर पैरों की इतनी हड्डियां टूटी थीं कि रिकशा चलाना दूर ठीक से चल भी नहीं पाएगा जीवनभर. अस्पताल से जिस दिन छुट्टी होनी थी उस से पहले ही वह जाने कहां चला गया. उस का पता ही नहीं चला.

सत्या को वास्तव में ही जयपाल से प्रेम हो गया था. जयपाल की खबर सुनते ही उस ने यमुना में डूब अपनी जान दे दी. भोर में ही घर से निकल गई थी. उस का शव तो नहीं मिला. घाट पर उस की साड़ी और चप्पलें पड़ी थीं. यमुना में बड़ेबड़े कछुए बड़ी संख्या में हैं. इंसान क्या हाथी के शरीर को भी घंटेभर में चट कर जाएं, यही हुआ होगा.

उस दिन भोर में निर्मला हफ्तेभर के लिए गांव आई थी राजू को ले कर. वह होती तो खोजखबर और भी कराती. सत्या व जयपाल की प्रेम कहानी का अंत ऐसे हुआ था.

वे यादों से बाहर आए और सोचने लगे, ‘अब सभी गांव वाले उन दोनों को भूल भी चुके हैं और वे दोनों ही यहां मौजूद हैं.’ राजू ने कहा, ‘‘अम्माजी ने दोनों की मंदिर में स्वयं खड़े हो कर विधिवत शादी करा दी थी, बाबूजी. अब वे दोनों पतिपत्नी हैं. घर में ही नीचे रहते हैं. सफाई वगैरह करते हैं. अम्माजी आती थीं तो उन की खूब सेवा करते थे दोनों.’’

हरीश बाबू को अचानक लगा कि निर्मला सामने आ खिलखिला पड़ी. मानो कह रही हो, ‘कहो, कैसी रही?’ जैसे कम उम्र में उन को बुद्धू बना निर्मला हंसते हुए कहती थी. तो यह चाय की दुकान, मृत सत्या और गायब जयपाल की जोड़ी यह सब तुम्हारा सरप्राइज है? काश तुम्हारे रहते मैं गांव आता तो…’ हरीश बाबू बुदबुदाए.

पूरा घर चमचमा रहा है. कहीं धूल का कण, मकड़ी का जाला, बगीचे में तिनकाभर खरपतवार, फालतू घास नहीं. सब साफसुथरा, सामने खिले, अधखिले फूलों की भरमार, पनपते स्वस्थ पौधे, पीछे क्यारियों में तैयार सब्जी या तैयार होते पौधे. उन का बैडरूम ऊपर है. उस के साथ लंबीचौड़ी बालकनी. उस के एक तरफ बेला दूसरी तरफ चमेली की बेल छाई है जिन की व्यवस्थित नियमित कटाईछंटाई होती है. निर्मला ने योजना बना कर दोनों को रोपा था. लजाई सी हरीश बाबू से बोली थी, ‘जब हम सोएंगे तो ये दोनों फूलती बेल हम को रातभर सुगंध देंगी.’

कितनी रातें, कभी चांदनी में, कभी तारों की छांव में उन्होंने यहां बैठ बातें करते बिताई हैं. वे बालकनी में आ कर खड़े हुए. चमेली की एक झुकी डाल ने उन के माथे को छुआ, चौंके, उन्हें लगा कि निर्मला ने प्यार किया. इस बीच सत्या चायबिस्कुट ले आई, ‘‘बाबूजी, कुनकुना पानी ला रही हूं. नहा लें, नाश्ता बनाती हूं.’’

उन्होंने स्नेह से देखा, ‘‘क्या बनाएगी?’’

‘‘मक्का पिसवा लाई हूं, उस के परांठे और आलूटमाटर की सब्जी. अम्माजी ने कई तरह के अचार डाले हैं, वे भी हैं.’’

‘‘जयपाल कुछ करता है?’’

उस ने सिर झुकाया, ‘‘अम्माजी ने 5 बीघा खेत खरीद दिया है, पैरों से चल नहीं पाता है ठीक से, पर बैठ कर निराई कर लेता है. बाकी काम के लिए एक नौकर रखा है.’’

‘‘पूरा घर तू अकेली साफ करती है?’’

उस ने फिर सिर हिलाया.

‘‘मैं हूं तो खाने के लिए महाराज को बुला ले.’’

झरझर रो पड़ी वह, ‘‘बाबूजी, मैं करमजली अम्माजी की न सेवा कर पाई न अंतिम दर्शन, अब आप की सेवा तो करने दो. अम्माजी की भैंस दूध दे रही हैं. ताजा मट्ठा और मक्खन है, नाश्ते में दूंगी.’’

उन्होंने सोचा, ‘तो इसलिए ही यहां से लौटते समय निर्मला के साथ सब्जी की टोकरी के साथ ताजा मक्खन और डब्बाभर असली घी जाता था.’

नाश्ता निबटा भी नहीं था कि घर में पूरा गांव उमड़ पड़ा. सब की आंखों में आंसू. निर्मला का सरप्राइज गिफ्ट बस गोकुल की चाय दुकान नहीं, सत्याजयपाल नहीं और भी हैं, रोते हुए गांव वालों ने कितने रहस्य के परदे खोले. किस की बेटी के ब्याह का पूरा खर्चा दिया, किस के बेटे की उच्च शिक्षा की व्यवस्था की, किस की बीमारी में डाक्टर को दिखा दवा का पूरा कोर्स दिलवाया, किसे बच्चा पालने के लिए सिलाई मशीन खरीद दी, किस की गिरवी पड़ी जमीन, घर छुड़ा सिर के ऊपर की छत बचाई, पेट की रोटी जुटाई. अवाक् हरीश बाबू के सामने पूरे गांव के गरीब लोग सुबक रहे थे निर्मला के शोक में.

सब को विदा कर अपने कमरे में आए. निर्मला के बड़े फोटो के ऊपर ताजे फूलों की माला देखी. सत्या रोज नहाधो कर पूजा कर माला पहनाती है. अचानक लगा निर्मला कहीं नहीं गई, इसी घर में इधरउधर बगीचा, खेत, घर के आंगन, बरामदा, रसोईघर, कमरा, बालकनी में शादी के बाद जैसी चंचल किशोरी थी उसी तरह फुदकती फिर रही है और उन को देख होंठों में हंस रही है. ‘देखा, कितने सारे सरप्राइज हैं तुम्हारे लिए यहां.’

वे पास आए. जैसा पहले करते थे वैसे ही तुनक कर बोले, ‘‘क्या समझती हो? मुझे हरा दोगी? कभी नहीं, अब मेरा भी सरप्राइज रिटर्न गिफ्ट देख लो.’’

उन्होंने बैड पर रखा मोबाइल फोन उठा कर बच्चों का नंबर मिलाया. दूसरे दिन भोर में ही सारे बच्चे, पोतेपोती, बेटीदामाद तक आ पहुंचे.

‘‘पापा, यह क्या अनर्थ कर रहे हैं आप?’’

‘‘कोई अनर्थ नहीं, यह मेरा जन्मस्थान है. मेरी अपनी जगह. इतने दिन सिर पर दायित्व था तुम लोगों की पढ़ाई, फिर ब्याहशादी, अपनी नौकरी. पर अब सब पूरा कर लिया है मैं ने. अब मुक्त हूं. अपने घर में रहूंगा.’’

‘‘पर हम सब आप को कैसे अकेला छोड़ दें. हमारा भी तो कुछ कर्तव्य बनता है.’’

‘‘किस ने कहा, मैं अकेला हूं. पूरा गांव, सत्या, जयपाल हैं. राजू गाड़ी के साथ रहेगा. जब चाहे शहर का चक्कर लगा आऊंगा और अम्मा हैं, निर्मला है, अकेला कहां हूं मैं?’’

सत्या ने आ कर कहा, ‘‘खाना लगा दिया है, ठंडा हो जाएगा.’’

सब नीचे उतर गए. लेकिन वे निर्मला की ओर देखते रहे. फिर मुसकराए और दो बोल बोले, ‘‘क्यों? कैसा रहा मेरा रिटर्न गिफ्ट?’’