कहानी

पीले पत्ते

अनुभा ने डा. प्रवीण की ओर देखा. वे शांत और अनिर्विकार भाव से व्हीलचेयर पर पड़े हुए थे. किसी वृक्ष का पीला पत्ता कब उस से अलग हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता, वैसे ही प्रवीण का जीवन भी पीला होता जा रहा था. वह अपने प्यार से बड़ी मुश्किल से थोड़ी सी हरीतिमा ला पाती थी. इन निष्क्रिय हाथपैरों में कब हलचल होगी? कब इन पथराई आंखों में चेतना जागेगी... ये विचार अनुभा के मन से एक पल को भी नहीं जा पाते थे.

‘‘मम्मी, मैं गिर पला,’’ तभी वेदांत रोते हुए वहां आया और अपनी छिली कुहनी दिखाने लगा.

‘‘अरे बेटा, तुझे तो सचमुच चोट लग गई है. ला, मैं दवाई लगा देती हूं,’’ अनुभा ने उसे पुचकारते हुए कहा.

अनुभा फर्स्टएड किट उठा लाई और डेटौल से नन्हें वेदांत की कुहनी का घाव साफ करने लगी.

‘‘मम्मी, आप डाक्तर हैं?’’ वेदांत अपनी तोतली जबान में पूछ रहा था.

वेदांत का सवाल अनुभा के हृदय को छू गया, बोली, ‘‘मैं नहीं बेटा, तेरे पापा डाक्टर हैं, बहुत बड़े डाक्टर.’’

‘‘डाक्तर हैं तो फिल बात क्यों नहीं कलते, मेला इलाज क्यों नहीं कलते.’’

‘‘बेटा, पापा की तबीयत अभी ठीक नहीं है. जैसे ही ठीक होगी, वे हम से बहुत सारी बातें करेंगे और तुम्हारी चोट का इलाज भी कर देंगे.’’

अस्पताल के लिए देर हो रही थी. वेदांत को नाश्ता करवा कर उसे आया को सौंपा और खुद डा. प्रवीण को फ्रैश कराने के लिए बाथरूम में ले गई. आज वह उन के पसंद के कपड़े स्काईब्लू शर्ट और ग्रे पैंट पहना रही थी. कभी जब वह ये कपड़े प्रवीण के हाथ में देती थी तो वे मुसकरा कर कहते थे,  ‘अनु, आज कौन सा खास दिन है, मेरे मनपसंद कपड़े निकाले हैं.’ पर अब तो होंठों पर स्पंदन भी नहीं आ रहे थे. डा. प्रवीण को तैयार करने के बाद उसे खुद भी तैयार होना था. वह विचारों पर रोक लगाते हुए हाथ शीघ्रता से चलाने लगी. यदि अस्पताल जाने में देर हो गईर् तो बड़ी अव्यवस्था हो जाएगी. डा. प्रवीण को तो उस ने कभी भी अस्पताल देरी से जाते नहीं देखा था, यहां तक कि वे कई बार जल्दी में टेबल पर रखा नाश्ता छोड़ कर भी चले जाते.

आज अस्पताल में ठीक 11 बजे हार्ट सर्जरी थी. डा. मोदी, सिंघानिया अस्पताल से इस विशेष सर्जरी को करने आने वाले थे. अनुभा डा. प्रवीण को ले कर अस्पताल रवाना हो गई. आज भी पहले मरीज को डा. प्रवीण ही हाथ लगाते हैं. यह अनुभा के मन की अंधश्रद्धा है या प्रवीण के प्रति मन में छिपा अथाह प्रेम, किसी भी कार्य का प्रारंभ करते हुए प्रवीण का हाथ जरूर लगवाती है. इस से उस के मन को समाधान मिलता है. आज भी डा. प्रवीण ने पेशेंट को छुआ और फिर वह औपरेशन थिएटर में दाखिल हुआ. अनुभा ने प्रबंधन से अस्पताल की अन्य व्यवस्थाओं के बारे में पूछा. सारा काम सही रीति से चल रहा था. अस्पताल के व्यवस्थापन में अनुभा ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

डा. प्रवीण के केबिन में बैठीबैठी अनुभा खयालों के गहरे अंधकार में डूबउतरा रही थी. गले में स्टेथोस्कोप डाले हुए डा. प्रवीण रहरह कर अनुभा की आंखों के सामने आ रहे थे. एक ऐक्सिडैंट मनुष्य के जीवन में क्याक्या परिवर्तन ला देता है, उस के जीवन की चौखट ही बदल कर रख देता है. आज भी अनुभा के समक्ष से वह दृश्य नहीं हटता जब उन की कार का ऐक्सिडैंट ट्रक से हुआ था. एक मैडिकल सैमिनार में भाग लेने के लिए डा. प्रवीण पुणे जा रहे थे. वह भी अपनी मौसी से मिल लेगी, यह सोच साथ हो ली थी. पर किसे पता था कि वह यात्रा उन पर बिजली बन कर टूट कर गिरने वाली थी. तेजी से आते हुए ट्रक ने उन की कार को जोरदार टक्कर मारी थी. नन्हा वेदांत छिटक कर दूर गिर गया था. अनुभा के हाथ और पैर दोनों में फ्रैक्चर हुए थे. डा. प्रवीण के सिर पर गहरी चोट लगी थी. करीब एक घंटे तक उन्हें कोई मदद नहीं मिल पाई थी. डा. प्रवीण बेहोश हो गए थे. कराहती पड़ी हुई अनुभा में इतनी हिम्मत न थी कि वह रोते हुए वेदांत को उठा सके. बस, पड़ेपड़े ही वह मदद के लिए पुकार रही थी.

 2-3 वाहन तो उस की पुकार बिना सुने निकल गए. वह तो भला हो कालेज के उन विद्यार्थियों का जो बस से पिकनिक के लिए जा रहे थे, उन्होंने अनुभा और प्रवीण को उठाया और अपनी बस में ले जा कर अस्पताल में भरती करवाया. आज भी यह घटना अनुभा के मस्तिष्क में गुंजित हो, उसे शून्य कर देती है. अस्पताल में अनुभा स्वयं की चोटों की परवा न करते हुए बारबार प्रवीण का नाम ले रही थी. पर डा. प्रवीण तो संवेदनाशून्य हो गए थे. अनुभा की चीखें सुन कर भी वे सिर उठा कर भी नहीं देख रहे थे. डाक्टरों ने कहा था कि मस्तिष्क से शरीर को सूचना मिलनी ही बंद हो गई है, इसलिए पूरे शरीर में कोई हरकत हो ही नहीं सकती.

अनुभा प्रवीण को बड़े से बड़े डाक्टर के पास ले गई पर कोई फायदा नहीं हुआ. आज इस घटना को पूरे 2 वर्ष बीत गए हैं. डा. प्रवीण जिंदा लाश की तरह हैं. पर अनुभा के लिए तो उन का जीवित रहना ही सबकुछ है. डा. प्रवीण के मातापिता डाक्टर बेटे के लिए डाक्टर बहू ही चाहते थे. किंतु अनुभा के पिता का इलाज करतेकरते दोनों के मध्य प्रेमांकुर फूट गए थे और यही बाद में गहन प्रेम में परिवर्तित हो गया. कितने ही डाक्टर लड़कियों के रिश्ते उन्होंने ठुकरा दिए और एक दिन डा. प्रवीण अनुभा को पत्नी बना कर सीधे घर ले आए थे. शुरुआत में मांबाप का विरोध हुआ, किंतु धीरेधीरे सब ठीक हो ही रहा था कि यह ऐक्सिडैंट हो गया. डा. प्रवीण के मातापिता को एक बार फिर कहने का मौका मिल गया कि यदि डाक्टर लड़की से विवाह हुआ होता तो आज वह अस्पताल संभाल लेती.

इस घटना के करीब 6 महीने बाद तक वह इस तरह खोईखोई रहने लगी थी मानो डाक्टर प्रवीण के साथ वह भी संवेदनाशून्य हो गई हो. इस संसार में रह कर भी वह सब से दूर किसी अलग ही दुनिया में रहने लगी थी.  डा. प्रवीण का जीवनधारा प्राइवेट अस्पताल बंद हो चुका था. अनुभा के मातापिता ने उसे संभालने की बहुत कोशिश की पर सब व्यर्थ. इसी समय डा. प्रवीण के खास दोस्त डा. विनीत ने अनुभा का मार्गदर्शन किया. दर्द से खोखले पड़ गए उस के मनमस्तिष्क में आत्मविश्वासभरा, उसे समझाया कि वह अस्पताल अच्छे से चला सकती है.

अनुभा ने निराश स्वर में उत्तर दिया था, ‘पर मैं डाक्टर नहीं हूं.’ डा. विनीत ने उसे समझाया था कि वह डाक्टर नहीं है तो क्या हुआ, अच्छी व्यवस्थापक तो है. कुछ डाक्टरों को वेतन दे कर काम पर रखा जा सकता है और कुछ विशेषज्ञ डाक्टरों को समयसमय पर बुलाया जा सकता है. शुरूशुरू में उसे यह सब बड़ा कठिन लग रहा था, पर बाद में उसे लगा कि वह यह आसानी से कर सकती हैं. डा. प्रवीण के द्वारा की गई बचत इस समय काम आई. डा. विनीत ने जीजान से सहयोग दिया और बंद पड़े हुए जीवनधारा अस्पताल में नया जीवन आ गया.

अब तो अस्पताल में 4 डाक्टर, 8 नर्स और 8 वार्डबौय का अच्छाखासा समूह है और रोज ही अलगअलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ डाक्टर आ कर अपनी सेवा देते हैं. वहां मरीजों की पीड़ा देख कर अनुभा अपने दुख भूलने लगी. जब व्यक्ति अपने से बढ़ कर दुख देख लेता है तो उसे अपना खुद का दुख कम लगने लगता है. डा. प्रवीण को भी इसी अस्पताल में नली के द्वारा तरल भोजन दिया जाने लगा. अनुभा ने प्रवीण की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यहां तक कि हर दिन उन की  शेविंग भी की जाती, व्हीलचेयर पर बैठे डाक्टर प्रवीण इतने तरोताजा लगते कि अजनबी व्यक्ति आ कर उन से बात करने लगते थे. डा. प्रवीण आज भी अपने केबिन में अपनी कुरसी पर बैठते थे. अनुभा डा. प्रवीण के सम्मान में कहीं कोई कमी नहीं चाहती थी.

अनुभा की मेहनत और लगन देख कर उस के सासससुर भी उस क लोहा मान गए थे और अनुभा तो इसे अपना पुनर्जन्म मानती है. कहां पहले की सहमीसकुचाई सीधीसादी अनुभा और अब कहां आत्मविश्वास से भरी सुलझे विचारों वाली अनुभा. जिंदगी के कड़वे अनुभव इंसान को प्रौढ़ बना देते हैं, दुख इंसान को मांझ कर रख देता है और वक्त द्वारा ली गई परीक्षाओं में जो खरा उतरता है वह इंसान दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है. आज अनुभा इसी दौर से गुजर रही थी. अब वह सबकुछ ठीक तरह से संभालने लगी थी. डा. प्रवीण जो सब की नजरों में संवेदनाशून्य हो गए थे, उस की नजरों में सुखदुख के साथी थे. कोई भी बात वह उन्हें ऐसे बताती जैसे वे सभीकुछ सुन रहे हों और अभी जवाब देंगे. निर्णय तो वह स्वयं लेती पर इस बात की तसल्ली होती कि उस ने डा. प्रवीण की राय ली.

सबकुछ ठीक चल रहा था पर आजकल अनुभा को कुछ परेशान कर रहा था, वह था डा. विनीत की आंखों का बदलता हुआ भाव. औरत को पुरुष की आंखों में बदलते भाव को पहचानने में देर नहीं लगती. जितनी आसानी से वह प्रेम की भावना पहचान लेती है, उतनी ही आसानी से आसक्ति और वासना की भी. पुरुषगंध से ही वह उस के भीतर छिपी भावना को पहचानने में समर्थ होती है. यह प्रकृति की दी हुई शक्ति है उस के पास और इसी शक्ति के जोर पर अनुभा ने डा. विनीत के मन की भावना पहचान ली. आतेजाते हुए डा. विनीत का मुसकरा कर उसे देखना, देर तक डा. प्रवीण के केबिन में आ कर  बैठना, उस से कुछ अधिक ही आत्मीयता जताना, वह सबकुछ समझ रही थी.

डा. विनीत के इस व्यवहार से वह अस्वस्थ हो रही थी. वह तो डा. विनीत को प्रवीण का सब से अच्छा दोस्त मानती थी, क्या मित्रता भी कीमत मांगती है? क्या व्यक्ति अपने एहसानों का मूल्य चाहता है? क्या मार्गदर्शक ही राह पर धुंध फैला देता है? वह इन सवालों में उलझ कर रह जाती थी. एक दिन अनुभा जब वेदांत को छोड़ने प्ले स्कूल जा रही थी, डा. विनीत ने उसे रोक लिया और कहा, ‘‘कब तक अपनी जिम्मेदारियों का बोझ अकेले उठाती रहोगी. अनुभा, अपना हाथ बंटाने को किसी को साथ क्यों नहीं ले लेती?’’ ‘‘ये सारी जिम्मेदारियां मेरी अपनी हैं और मुझे अकेले ही इन्हें उठाना है. फिर भी मैं अकेली नहीं हूं, मेरे साथ प्रवीण और वेदांत हैं,’’ अनुभा ने कुछ सख्ती से जवाब दिया.

किंचित उपहासनात्मक स्वर में डा. विनीत बोले, ‘‘प्रवीण और वेदांत, एक छोटा बच्चा जिस के बड़े होने तक तुम न जाने अपने कितने अरमान कुचल दोगी और दूसरी ओर एक ऐसी निष्चेतन देह से मोह जिस में प्राण नाममात्र के लिए अटके पड़े हैं.’’‘‘डा. विनीत, आप प्रवीण के लिए ऐसा कुछ भी नहीं कह सकते. वे जैसे भी हैं, मैं उन के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती. जब तक उन का सहारा है, मैं हर मुश्किल पार कर लूंगी.’’ 

‘‘तुम निष्प्राण देह से सहारे की बात कर रही हो. अनुभा, तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि किस के सहारे तुम यहां तक आई हो,’’ डा. विनीत तल्खी से बोले.

अनुभा को यह बात गहरे तक चुभ गई, छटपटा कर बोली, ‘‘उपकार कर के जो व्यक्ति उस के बदले में कुछ मांगने लगे, उस का उपकार उपकार नहीं रह जाता, बल्कि बोझ बन जाता है. और मैं आप का यह बोझ जल्द ही उतार दूंगी,’’ भरे गले से किंतु दृढ़ निश्चय के साथ अनुभा ने कहा और वेदांत को ले कर आगे बढ़ गई. डा. विनीत मन मसोस कर रह गए.

इतनी समतल सी दिखने वाली जिंदगी ऐसे ऊबड़खाबड़ रास्तों पर ले जाएगी, अनुभा ने कभी सोचा भी न था. जिस जीवनयात्रा में प्रवीण और उसे साथसाथ चलना था, उस में प्रवीण बीच में ही थक कर उस से आज्ञा मांग रहे थे, नहीं, नहीं, वह इतनी सहजता से प्रवीण को जाने नहीं देगी. वह कुछ करेगी. मुंबई के तो सारे डाक्टरों ने जवाब दे दिया, क्या दुनिया के किसी कोने में कोई डाक्टर होगा जो उस के प्रवीण का इलाज कर देगा. वह अस्पताल में मैडिकल साइंस पर आधारित वैबसाइट पर सर्च करती हुई कंप्यूटर पर घंटों बैठी रहती, कहीं कोई तो सुराग मिले.

वह इन विषयों पर मैडिकल और रिसर्च से जुड़ी विभिन्न पत्रिकाएं मंगाने लगी. वह किसी भी हाल में डा. प्रवीण का इलाज कराना चाहती थी. एक दिन उस ने एक पत्रिका में अमेरिका के उच्च कोटि के न्यूरोसर्जन डा. पीटर एडबर्ग के बारे में पढ़ा. अच्छा यह रहा कि वे अगले महीने कुछ दिनों के लिए भारत आने वाले थे. अनुभा यह अवसर किसी हाल में हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी. वह प्रवीण को उन के पास ले कर गई. डाक्टर पीटर ने प्रवीण की अच्छी तरह जांच की, कुछ टैस्ट करवाए और आखिर में इस निर्णय पर पहुंचे कि यदि दिमाग की एक नस, जो पूरी तरह बंद हो गई है, औपरेशन के द्वारा खोल दी जाए तो रक्त का संचालन ठीक तरह से फिर प्रारंभ होगा और शायद मस्तिष्क अपने कार्य करने फिर प्रारंभ कर दे. पर अभी निश्चितरूप से कुछ कहा नहीं जा सकता.

औपरेशन यदि सफल नहीं हुआ तो डाक्टर प्रवीण की जान भी जा सकती थी. डाक्टर पीटर की एक शर्त और थी कि यह औपरेशन सिर्फ अमेरिका में हो सकता है, इसलिए पेशेंट को वहीं लाना पड़ेगा. अनुभा एक बार फिर पसोपेश में पड़ गई थी कि डा. प्रवीण का औपरेशन करवाए कि नहीं. यदि औपरेशन असफल हुआ तो वह उन की देह भी खो देगी. लेकिन निर्णय भी उस ने स्वयं लिया. वह डा. प्रवीण का विवश और पराश्रित रूप और नहीं देख सकती थी, धड़कते हृदय से उस ने औपरेशन के लिए हां कर दी. समय बहुत कम था और उसे ज्यादा से ज्यादा पैसे इकट्ठे करने थे. अपनी सारी जमापूंजी इकट्ठा करने के बाद भी इतना पैसा जमा नहीं हो पाया था कि अमेरिका में औपरेशन हो सके. अचानक अनुभा के ससुर को ये बातें किसी रिश्तेदार के द्वारा पता चलीं और अब तक उस का विरोध करने वाले ससुर उस की मदद करने को तत्पर हो गए. रुपयों का प्रबंध भी उन्होंने ही किया. अनुभा की प्रवीण को बचाने की इच्छा में वे भी सहयोग देना चाहते थे. वे अनुभा के साथ अमेरिका आ गए. वेदांत को अनुभा की मां के पास छोड़ दिया था.

अमेरिका पहुंचते ही डा. प्रवीण को अस्पताल में भरती करवा दिया जहां उस के कई प्रकार के टैस्ट हो रहे थे. डा. पीटर खासतौर से उन का खयाल रख रहे  थे. उन की टीम के अन्य डाक्टरों से भी अनुभा की पहचान हो गई थी. सभी पूरी मदद कर रहे थे. अस्पताल की व्यवस्थाओं में पेशेंट से घर के लोगों का मिलना मुश्किल था, सिर्फ औपरेशन थिएटर ले जाने के पहले 2 मिनट के लिए डा. प्रवीण से मुलाकात करवाई. उस समय अनुभा टकटकी लगाए उन्हें देख रही थी. यह चेहरा फिर मुसकराएगा या हमेशा के लिए खो जाएगा, सबकुछ अनिश्चित था.

करीब 7 घंटे तक औपरेशन चलने वाला था. अनुभा सुन्न सी बैठी अस्पताल की सफेद दीवारों को देख रही थी. इन दीवारों पर उस के जीवन से जुड़ी हुई न जाने कितनी मीठीकड़वी यादें चित्र बन कर सामने आ रही थीं, तभी अनुभा के ससुर ने उस की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘धीरज रखो, बेटी, सब ठीक होगा.’’ निश्चित समय के बाद डा. पीटर ने बाहर आ कर कहा, ‘‘औपरेशन हो चुका है. अब हमें पेशेंट के होश में आने का इंतजार करना पड़ेगा.’’

अनुभा जानती थी कि यदि प्रवीण को होश नहीं आया तो वह उसे हमेशा के लिए खो देगी. वह मन ही मन सब को याद कर रही थी. उस की झोली दुखों के कांटों से तारतार है, फिर भी उस ने इतनी जगह सुरक्षित बचाई है जिस में वह प्रवीण के जीवनरूपी फूल को सहेज सके. लगभग 2 दिनों तक डा. प्रवीण की हालत नाजुक थी. उन्हें सांस देने के लिए औक्सीजन का इस्तेमाल करना पड़ रहा था. 2 दिनों के बाद जब उन की हालत कुछ स्थिर हुई तो अनुभा और उस के ससुर को उन से मिलने की अनुमति दी गई.

प्रवीण का सिर पट्टियों से बंधा हुआ था, होंठ और आंखें वैसे ही स्पंदनहीन थीं. अनुभा हिचकियों को रोक कर उसे देख रही थी. तभी नर्स ने उन्हें बाहर जाने का इशारा किया. ससुर बाहर निकल गए, अनुभा के पांव तो मानो जम गए थे, बाहर निकलना ही नहीं चाहते थे. नर्स ने फिर उसे आवाज दी. अनुभा मुड़ने को हुई, तभी उस का ध्यान गया कंबल में से बाहर निकले प्रवीण के दाहिने हाथ पर गया जिस में हरकत हुई थी. अनुभा आंसू पोंछ कर देखने लगी कि प्रवीण के हाथ का हिलना उस का भ्रम है या सच? पर यह सच था. सचमुच प्रवीण का हाथ हिला था. अचानक अस्पताल के सारे नियम भूल कर उस ने प्रवीण के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और यह क्या, प्रवीण ने उस का हाथ कस कर पकड़ लिया और जैसे अंधेरी गुफा से आवाज आती है, वैसे ही प्रवीण के मुख से आवाज आई, अनुभा.

हां, यह प्रवीण की ही आवाज थी. कहीं कुछ अस्पष्ट नहीं था. सबकुछ स्वच्छ हो गया था. मार्ग पर छाई धुंध को हटा कर मानो सूरज की किरणें झिलमिला कर अनुभा की बरसती आंखों पर पड़ रही थीं. वह इस प्रकाश की अभ्यस्त न थी. सारे पीले पत्ते झर गए थे, नई कोंपले जीवन की उम्मीद ले कर जो आई थीं.

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