सरिता विशेष

‘‘आज का अखबार कहां है?’’ किशोरीलाल ने पत्नी रमा से पूछा.

‘‘अभी देती हूं.’’

‘‘अरे, आज तो इतवार है न, वो साहित्य वाला पेज कहां है?’’

‘‘ये रहा,’’ रमा ने सोफे के नीचे से मुड़ातुड़ा सा अखबार निकाल कर किशोरीलाल की तरफ बढ़ाया.

‘‘इसे तुम ने छिपा कर क्यों रखा था?’’

‘‘अरे, इस में आज एक कहानी आई है, बड़ी अजीब सी. कहीं हमारे बच्चे न पढ़ लें, इसलिए छिपा लिया था. लगता है आजकल के लेखक जरा ज्यादा ही आगे की सोचने लगे हैं.’’

‘‘अच्छा, ऐसा क्या लिख दिया है लेखक ने जो इतना कोस रही हो नए लेखकों को?’’ किशोरीलाल की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

‘‘लिखा है कि अगर मांबाप सैरसपाटे में बाधा बनें तो उन्हें अस्पताल में भरती करवा देना चाहिए चैकअप के बहाने.’’

‘‘अच्छा, जरा देखूं तो,’’ कहते हुए वे अखबार के संडे स्पैशल पेज में प्रकाशित युवा लेखिका की कहानी ‘स्थायी समाधान’ पढ़ने लगे.

कहानी के अनुसार नायक अपने बुजुर्ग पिता को ले कर परेशान था कि उन की सप्ताहभर की ऐसी व्यवस्था कहां की जाए जहां उन्हें खानेपीने की कोई दिक्कत न हो और उन के स्वास्थ्य का भी पूरा खयाल रखा जा सके क्योंकि उसे अपने परिवार सहित अपनी ससुराल में होने वाली शादी में जाना है.

तब उस का दोस्त उसे समाधान बताता है कि वह अपने पिता को शहर में नए खुले होटल जैसे अस्पताल में चैकअप के बहाने भरती करवा दे क्योंकि  वहां भरती होने वालों की सारी जिम्मेदारी डाक्टरों और वहां के स्टाफ की होती है, खानेपीने से ले कर जांच और रिपोर्ट्स तक की. नायक को दोस्त का यह सुझाव बहुत पसंद आता है.

एक ही बार में किशोरीलाल पूरी कहानी पढ़ गए. रमा इस दौरान उन के चेहरे पर आतेजाते भावों को पढ़ रही थीं. चेहरे पर प्रशंसा के भावों के साथ जब उन्होंने अखबार समेटा तो रमा को आश्चर्य हुआ.

‘‘बिलकुल सही और व्यावहारिक समाधान सुझाया है लेखिका ने,’’ किशोरीलाल ने कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया दी.

‘‘क्या खाक सही सुझाया है? अरे, ऐसे भी कोई करता है अपने वृद्ध पिता के साथ?’’

‘‘तो तुम ही बताओ, ऐसे में उसे क्या करना चाहिए था?’’ रमा को तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा तो वे ही बोले, ‘‘अच्छा, तुम जाओ एक कप चाय और पिला दो, आज इतवार है.’’

रिटायर्ड किशोरीलाल अपने परिवार के साथ एक सुखी जीवन जी रहे हैं. परिवार में पत्नी के अलावा बेटा आलोक और बहू रश्मि तथा किशोर पोती आयुषी है. बेटाबहू दोनों ही नौकरीपेशा हैं और पोती अभीअभी कालेज में गई है.

नौकरीपेशा होने के बावजूद बहू उन का बहुत खयाल रखती है और अपने सासससुर को पूरा मानसम्मान देती है. उन्हें भी बहू से कोई शिकायत नहीं है. पत्नी रमा रसोई में बहू की हर संभव सहायता करती हैं. दिन में उन्हें और पोती को गरमागरम खाना परोसती हैं और शाम को बहू के घर लौटने से पहले रात के खाने की काफीकुछ तैयारी कर के रखती हैं.

वे खुद भी बाहर के छोटेमोटे काम जैसे फलसब्जीदूध लाना, पानीबिजली के बिल भरवाना आदि कर देते हैं. कुल मिला कर संतुष्ट हैं अपने पारिवारिक जीवन से.

किशोरीलाल को साहित्य से बड़ा प्रेम है. रोज 2 घंटे नियम से अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ना उन की दिनचर्या में शामिल है. रविवार को कालेज, औफिस में छुट्टी होने के कारण घर में सब देर तक सोते हैं, इसलिए किशोरीलाल और रमा आराम से बाहर बालकनी में बैठ कर सुबह की ताजा हवा का आनंद लेते हुए देर तक अखबार पढ़ते हैं, समाचारों पर चर्चा करते हैं और चाय की चुस्कियां लेते हैं.

कभीकभी किसी न्यूज को ले कर दोनों के विचार नहीं मिलते तो यह चर्चा बहस में तबदील हो जाती है. तब किशोरीलाल को ही हथियार डालने पड़ते हैं पत्नी के आगे.

रमा चाय बनाने जा रही थीं कि बेटे ने आवाज लगाई, ‘‘मां, चाय हमारे लिए भी बना लेना.’’

बहू भी उठ कर आ गई, सब गपशप करते हुए चाय पी रहे थे. मगर रमा अपने बेटेबहू का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थीं. वे पढ़ना चाह रही थीं उस चेहरे को, जो इस चेहरे के पीछे छिपा था. मगर सफल नहीं हो सकीं क्योंकि उन्हें वहां छलकपट जैसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया.

‘‘दादी, पता है, इस साल हम शिमला घूमने जाएंगे,’’ आयुषी ने दादी की गोद में सिर रखते हुए बताया.

‘‘अच्छा, लेकिन हमें तो किसी ने बताया ही नहीं.’’

‘‘अरे, अभी फाइनल कहां हुआ है? वो मम्मी की सहेली हैं न संगीता आंटी, वो जा रही हैं अपने परिवार के साथ. उन्होंने ही मम्मी को भी साथ चलने के लिए कहा है.’’

‘‘फिर, क्या कहा तेरी मम्मी ने?’’ रमा के दिमाग में फिर से सुबह वाली कहानी घूम गई.

‘‘कुछ नहीं, सोच कर बताएंगी, ऐसा कहा. दादी, प्लीज, हम जाएं क्या?’’ आयुषी ने उन के गले में बांहें डालते हुए कहा.

‘‘मैं ने कब मना किया?’’

‘‘वो मम्मी ने तो हां कर दी थी मगर पापा कह रहे थे कि आप लोगों का ध्यान कौन रखेगा. आप को अकेले छोड़ कर कैसे जा सकते हैं.’’

तभी फोन की घंटी बजी और आयुषी बात अधूरी ही छोड़ कर फोन अटैंड करनी चली गई. रमा को बेटे पर प्यार उमड़ आया, सोच कर अच्छा लगा कि उन का बेटा कहानी वाले बेटे की तरह नहीं है.

कई दिन हो गए मगर घर में फिर ऐसी कोई चर्चा न सुन कर उन्हें लगा कि शायद बात ठंडे बस्ते में चली गई है. मगर एक रात सोने से पहले किशोरीलाल ने फिर जैसे सांप को पिटारे से बाहर निकाल दिया.

‘‘बच्चे शिमला घूमने जाना चाहते हैं,’’ उन्होंने पत्नी से कहा.

‘‘तो, परेशानी क्या है?’’

‘‘वो हमें ले कर चिंतित हैं कि हमारा खयाल कौन रखेगा?’’

‘‘हमें क्या हुआ है? अच्छेभले तो हैं. हम अपना खयाल खुद रख सकते हैं.’’

‘‘सो तो है मगर कई बार तुम्हें अचानक अस्थमा का दौरा पड़ जाता है, उसी की फिक्र है उन्हें. ऐसे में मैं अकेले कैसे संभाल पाऊंगा.’’

‘‘इतनी ही फिक्र है तो न जाएं, कोईर् जरूरी है क्या शिमला घूमना.’’

‘‘कैसी बातें करती हो? यह कोई हल नहीं है समस्या का. भूल गईं, हम दोनों भी कितना घूमते थे. आलोक को कहां ले जाते थे हर जगह, मांबाबूजी के पास ही छोड़ जाते थे अकसर. अब इन का भी तो मन करता होगा अकेले कहीं कुछ दिन साथ बिताने का.’’

‘‘सुनो, एक काम करते हैं. कुछ दिनों के लिए तुम्हारी बहन के यहां चलते हैं. कईर् बार बुला चुकी हैं वो. इस बहाने हमारा भी कुछ चेंज हो जाएगा,’’ किशोरीलाल ने समस्या के समाधान की दिशा में सोचते हुए सुझाव दिया.

‘‘नहीं, इस उम्र में मुझे किसी के भी घर जाना पसंद नहीं.’’

‘‘वो तुम्हारी अपनी बहन है.’’

‘‘फिर भी, हर घर के अपने नियमकायदे होते हैं और वहां रहने वालों को उन का पालन करना ही होता है. सबकुछ उन्हीं के हिसाब से करो, बंध जाते हैं कहीं भी जा कर. अपना घर अपना ही होता है. जहां चाहो छींको, जहां मरजी खांसो. जब चाहो सोओ, जब मन करे उठो,’’ रमा ने पति का प्रस्ताव सिरे से नकार दिया.

किशोरीलाल अपनी जवानी के दिन याद करने लगे. हर साल गरमी में उन के 3-4 दोस्त परिवार सहित हिल स्टेशन पर घूमने जाने का प्रोग्राम बना लेते थे. आलोक तब छोटा था. वे उसे कभी उस के दादादादी और कभी नानानानी के पास छोड़ कर जाते थे क्योंकि छोटे बच्चे पहाड़ों पर पैदल नहीं चल सकते और उन्हें गोद में ले कर वे खुद नहीं चल सकते.

ऐसे में मातापिता और बच्चे दोनों ही मौजमस्ती नहीं कर पाते. साथ ही, बच्चों के बीमार होने का भी डर रहता था. अपनी समस्या का उन्हें यही सटीक समाधान सूझता था कि आलोक को दादी या नानी के पास छोड़ दिया जाए. रमा भी शायद यही सबकुछ सोच रही थीं.

‘‘आलोक, तुम लोगों का क्या प्रोग्राम है शिमला का?’’ रमा ने पूछा तो आलोक और रश्मि चौंक कर एकदूसरे की तरफ देखने लगे. किशोरीलाल अखबार पढ़तेपढ़ते मन ही मन मुसकरा दिए.

सरिता विशेष

‘‘वो शायद कैंसिल करना पड़ेगा,’’ आलोक ने रश्मि की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’

‘‘आप दोनों अकेले रह जाएंगे और आयुषी के कालेज की तरफ से भी इस बार समरकैंप में बच्चों को शिमला ही ले जा रहे हैं ट्रैकिंग के लिए, तो वह भी हमारे साथ नहीं जाएगी. फिर हम दोनों अकेले जा कर क्या करेंगे.’’

‘‘अरे, यह तो और भी अच्छा हुआ, कहते हैं न कि किसी काम को करने की दिशा में अगर सोचने लगो तो रास्ता अपनेआप नजर आने लगता है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि अगर आयुषी तुम्हारे साथ नहीं जा रही तो हम तीनों यहां आराम से रहेंगे. घर मैं संभाल लूंगी और बाहर तुम्हारे पापा, और अगर हमारे बूते से बाहर का कुछ हुआ, तो ये हमारी पोती है न, नई पौध, जरूरत पड़ने पर यह पीढ़ी सब संभाल लेती है-घर भी और बाहर भी. और जब आयुषी समरकैंप में जाएगी तब तक तुम दोनों आ ही जाओगे.’’

‘‘अरे हां, एक रास्ता यह भी तो है. हमारे दिमाग के घोड़े तो यहां तक दौड़े ही नहीं,’’ आलोक ने खुश होते हुए कहा.

‘‘इसीलिए तो कहते हैं ओल्ड इज गोल्ड,’’ रमा ने कनखियों से अपने पति की तरफ देखते हुए कहा तो घर में एक सम्मिलित हंसी गूंज उठी.