सरिता विशेष

निधि भागतेभागते थक चुकी थी. उस की सांसें बारबार उखड़ रही थीं. कपड़े झाडि़यों में उलझ कर कई जगह से फट गए थे. शुक्र है उस ने पैरों में स्पोर्ट्स शूज पहन रखे थे, वरना पांव तो कभी भी बेवफाई कर सकते थे. मगर शरीर तो आखिर शरीर ही है, उस की सहन करने की एक सीमा होती है. अब तो हिम्मत भी आगे बढ़ने से इनकार कर रही थी. मगर ‘नहीं, अभी कुछ देर और साथ दो मेरा…’ अपनी इच्छाशक्ति से रिक्वैस्ट करती हुई निधि ने अपनी अंदरूनी ताकत को जिंदगी का लालच दिया और एक बार फिर से अपना हौसला बढ़ा कर तेजी से भागने लगी उसी दिशा में आगे की ओर.

मगर इस बार हिम्मत उस की बातों में नहीं आई और उस ने आखिर दम तोड़ ही दिया. निधि ने एक पल ठहर कर भयभीत हिरणी की तरह इधरउधर देखा और पूरी तसल्ली करने के बाद एक पेड़ से अपनी पीठ टिका कर उखड़ी हुई सांसों को संयत करने लगी.

‘शायद सुबह होेने में अब ज्यादा देर नहीं है. मुझे सूरज निकलने से पहले ही कोई सुरक्षित ठिकाना तलाशना होगा वरना पता नहीं मैं फिर किसी सूरज का उगना देख भी सकूंगी या नहीं,’ मन ही मन यह सोचते हुए उस ने अंधेरे में देखने की कोशिश की तो उसे दूर कुछ रोशनी गुजरती हुई सी दिखाई दी. ‘शायद कोई सड़क है. मुझे किसी भी तरह वहां तक तो पहुंचना ही होगा, तभी किसी तरह की मदद की कोई उम्मीद जगेगी,’ सोचती हुई निधि ने फिर अपना सफर शुरू किया.

निधि का अनुमान सही निकला. यह सड़क ही थी. हरियाणा और राजस्थान को आपस में जोड़ता एक स्टेट हाईवे, कुछ ही दूरी पर एक छोटा सा टोल नाका भी बना हुआ था. निधि किसी तरह अपनेआप को ठेलती हुई वहां तक ले कर गई, मगर कुछ बोल पाती, इस से पहले ही गिर कर अचेत हो गई.

टोल कर्मचारियों ने उसे देखा तो वे घबरा गए. उस की हालत देख कर उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचित करना ही उचित समझा. कुछ ही देर में ऐंबुलैंस सहित पुलिस की गाड़ी वहां आ गई और महिला पुलिस की निगरानी में निधि को सिटी हौस्पिटल ले जाया गया.

डाक्टरों के थोड़े से प्रयास के बाद ही निधि को होश आ गया. खुद को पुलिस की निगरानी में पा कर निधि के मन में दबे हुए गुबार को शब्द मिले और वह महिला कौंस्टेबल से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ी. इंस्पैक्टर सरोज ने उस की पीठ पर हाथ रखते हुए उसे भरोसे का एहसास दिलाया और कहा, ‘‘देखो, तुम हमारे पास पूरी तरह सुरक्षित हो. और तुम्हें घबराने या किसी से डरने की जरूरत नहीं है. तुम बेखौफ हो कर अपने साथ हुए हादसे के बारे में हमें बताओ. हम तुम्हारी मदद करने की पूरी कोशिश करेंगे.’’

निधि कुछ भी नहीं बोली, बस, टकटकी लगाए छत की तरफ देखती रही. किस पर लगाए इलजाम, किसे ठहराए दोषी, किसे सजा दिलवाए, किसे भिजवाए सलाखों के पीछे. जो भी उस की इस हालत के जिम्मेदार हैं, वो उस के अपने, उस के सगे ही तो थे. वे, जिन के साथ उस का खून का रिश्ता है. हां, ये हैं उस के पापा, जो उस की एक जिद पर सारी दुनिया उस पर न्योछावर कर देते थे. ये है उस की मां, जो उस की जरा सी तकलीफ पर पूरी रात आंखों में बिता दिया करती थीं. उस का भाई राज, जो उस के लिए शहरभर से बैर मोल ले लेता था. और तो और, उस की छुटकी सी बहन शालू भी, जो सदा उस के आगेपीछे दीदीदीदी कहती घूमा करती थी. निधि के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पाया. बस, उस की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे.

डाक्टर ने इंस्पैक्टर सरोज से कहा, ‘‘अभी पेशेंट काफी सदमे में है, इसे नौर्मल होने दीजिए, फिर आप लोग अपनी पूछताछ कीजिएगा.’’

इंस्पैक्टर सरोज निधि को डाक्टर की निगरानी में छोड़ कर अपनी टीम के साथ लौट गईं. हां, एक महिला कौंस्टेबल को उस की सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया गया था. सब के जाने के बाद निधि आंखें बंद कर लेट गई. रातभर भागते रहने के कारण उसे नींद आना स्वाभाविक था, मगर निधि सोना नहीं चाहती थी. वह तो यहां से भाग जाना चाहती थी अपने घर, अपने विनय के पास, उस की सुरक्षित बांहों के घेरे में जहां उसे किसी का डर नहीं, किसी की फिक्र नहीं. निधि के दिमाग में पिछले कई दिनों के घटनाक्रम चलचित्र की तरह घूमने लगे.

करीब 10 वर्षों पहले जब वह इंजीनियरिंग और एमबीए करने के बाद मुंबई में एक मल्टीनैशनल कंपनी में जौब करने लगी थी तभी उस की मुलाकात विनय से हुई थी. मजबूत और स्वस्थ शारीरिक बनावट वाला विनय अपने नाम के अनुरूप मन से बहुत ही विनय था. कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि बाहर से एकदम शांत और सीधा सा दिखने वाला विनय अपने भीतर कवि हृदय भी रखता है. सब के साथ निधि को भी यह बात उस साल कंपनी की न्यू ईयर पार्टी में ही पता चली थी, जब उस ने वहां एक प्रेमगीत गाया था. उस की प्रेम कविताओं की धारा में बहतीबहती निधि कब उस के प्रेमपाश में बंध गई, उसे भान ही नहीं हुआ.

अब तो निधि जब देखो तब किसी न किसी बहाने से उस के आसपास ही बने रहने की कोशिश में लगी रहती थी. उस ने यह बात छुटकी शालू से शेयर की थी. शालू ने ही तो उसे इस रास्ते पर आगे बढ़ने का हौसला दिया था. उस ने कहा था, ‘कोई सामान्य पुरुष होता तो तुम्हारी नजदीकियों का भरपूर फायदा उठाने की कोशिश करता मगर विनय तुम से एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखता है और उस की यही खूबी उसे सारी पुरुष जमात से अलग करती है.’

‘छुटकी की बात में दम है,’ सोच कर निधि विनय के और भी करीब होने लगी थी. निधि ने जब कंपनी के रिकौर्ड में विनय का प्रोफाइल देखा तो उसे सुखद महसूस हुआ कि वह न केवल उस की जाति से संबंध रखता है बल्कि वे दोनों तो एक ही प्रदेश से भी हैं. ‘अगर घर वालों को मानने में थोड़ी सी मेहनत की जाए तो हमारी शादी हो सकती है,’ सोच कर निधि खुद ही शरमा गई. वह अपनी सोच को बहुत आगे तक ले जा चुकी थी.

जिस शालू ने घर वालों के विरोध के बावजूद विनय से शादी करने में उस का पूरा साथ दिया, वही बहन आज उसे विनय के कारण जान से मारने की साजिश में शामिल हो गई. निधि को इस बात पर अब भी यकीन नहीं हो रहा था.

‘‘क्या आप ठीक महसूस कर रही हैं?’’ ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने आ कर पूछा तो निधि ने आंखें खोल दीं.

‘‘जी,’’ उस ने संक्षिप्त सा जवाब दिया और उठ कर बैड पर बैठ गई. उसे बैठा देख कर कौंस्टेबल ने इंस्पैक्टर सरोज को फोन कर दिया और 15 मिनट में वे भी वहां पहुंच गईं.

‘‘क्या आप अपने बारे में कुछ बताएंगी?’’ सरोज ने पूछा. निधि ने एक बार फिर चुप्पी साध ली. क्या बताती वह उन्हें कि वह अपनों की ही साजिश का शिकार हुई है. उसे जन्म देने वाले ही उसे मौत की नींद सुला देना चाहते हैं.

‘‘जी, मैं मुंबई की रहने वाली हूं. यहां किसी दोस्त से मिलने आई थी, मगर एक हादसे का शिकार हो गई. कुछ गुंडों ने मुझ पर हमला कर दिया था. मेरा बैग और मोबाइल छीन लिया. शायद किसी बुरी नीयत से वे मेरा पीछा कर रहे थे. मगर मैं किसी तरह उन के चंगुल से बच कर यहां तक आ गई,’’ निधि ने असली बात छिपा ली.

‘‘देखिए, आप हम से कुछ भी छिपाने की कोशिश न करें और न ही डरें. हम आप की मदद करना चाहते हैं. आप चाहें तो उन गुंडों के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवा सकती हैं,’’ सरोज ने उसे कुरेदा. मगर निधि ने एक बार फिर से चुप्पी साध ली और अपनी आंखें बंद कर के अपने दर्द को दिल के भीतर ही समेटने की कोशिश करने लगी.

रात हो चली थी. हौस्पिटल में भरती लगभग सभी मरीज नींद की आगोश में जा चुके थे. हां, कभीकभी कोई मरीज दर्द से कराह उठता था तो अवश्य ही वार्ड की शांति भंग हो जाती थी. ड्यूटी पर तैनात नर्स और कंपाउंडर भी उबासियां ले रहे थे मगर निधि की आंखों में दूरदूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था.

वह उस वक्त को कोस रही थी जब उस ने शालू की बातों में आ कर घर लौटने का मन बनाया था. मौका भी तो कुछ ऐसा ही था. वह चाह कर भी इनकार नहीं कर सकी थी. उस की छुटकी की शादी जो तय हो गई थी. शालू ने जब चहकते हुए बताया था कि मम्मीपापा उसे विनय सहित अपनाने को राजी हो गए हैं तो उस के सिर से भी मांबाप की मरजी के खिलाफ जा कर शादी करने के अपराधबोध का भारी बोझा उतर गया था जिसे वह इतने सालों से ढो रही थी.

इधर, विनय को भी 2 महीने के लिए ट्रेनिंग पर आस्ट्रेलिया जाना था. निधि ने सोचा, एक पंथ दो काज हो जाएंगे. विनय के बिना यहां अकेले मुंबई में रहना किसी सजा से कम नहीं था. इसलिए उस ने कंपनी से एक महीने की लंबी छुट््टी ले ली और अपने पैतृक गांव सिरसा आ गई.

मां तो निधि को देखते ही उस से लिपट गई थी. पापा ने भी कलेजे से लगा लिया था अपनी लाड़ो को. राज शादी के किसी काम के सिलसिले में शहर गया हुआ था. शालू ने उसे बांहों में भींचा तो फिर छोड़ा ही नहीं…न जाने कितने गिलेशिकवे थे जिन्हें वह शब्दों में बयां नहीं कर सकी थी. बस, आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. निधि के आने से शादी वाले घर में एक अलग ही रौनक आ गई थी.

रात में छुटकी ने उस से चिपटते हुए पूछा, ‘जीजी, एक बार फिर से बता न, तू ने जीजाजी जैसे विश्वामित्र को आखिर कैसे रिझाया?’

‘कितनी बार सुनेगी तू? आखिर तेरा मन भरता क्यों नहीं, एक ही किस्से को बारबार सुन कर तू बोर नहीं होती?’ निधि ने झूठे गुस्से से कहा.

‘अरे, अब तक तो फोन पर ही सुनती आई थी, आमनेसामने सुनने का मौका तो आज ही हाथ लगा है, सुना न. आज तो मैं तेरे चेहरे की लाली भी देखूंगी, जब तू बोलेगी,’ शालू ने जिद की तो निधि छुटकी की जिद नहीं टाल सकी और एक बार फिर से कूद पड़ी यादों की झील में डुबकी लगाने.

‘मुंबई की बरसात तो तू जानती ही है. बादलों का कोई भरोसा नहीं, जब जी चाहे बरस पड़ते हैं. हालांकि हम मुंबई वाले इस की ज्यादा परवा नहीं करते मगर उस दिन बात कुछ और ही थी. सुबह से ही बरसात हो रही थी. दोपहर होतेहोते तो सारे शहर में पानी ही पानी हो गया था.

‘मौसम विभाग ने भारी वर्षा की चेतावनी जारी कर के लोगों को घर में ही रहने की सलाह दी. मगर जो घर से बाहर थे उन्हें तो घर लौटना ही था. मैं भी अपने औफिस में बैठी बारिश के रुकने का इंतजार कर रही थी. लगभग सभी लोग अपने घर जाने की व्यवस्था कर चुके थे. बस, मैं और विनय ही बचे थे.

‘बारिश के थोड़ा सा हलके होने के आसार दिखे तो विनय ने मुझ से कहा, ‘आप को एतराज न हो तो मैं आप को अपनी बाइक पर घर छोड़ सकता हूं.’

‘मगर बाइक पर तो हम भीग जाएंगे…’ मैं ने कहा.

‘घर ही तो जाना है, किसी पार्टी में तो नहीं? घर पहुंच कर कपड़े बदल लेना,’ विनय ने मुसकराते हुए कहा.

‘मुसकराते हुए कितना प्यारा लगता है ये, पता नहीं मुसकराता क्यों नहीं है,’ मैं ने यह मन ही मन सोचा और खुद भी मुसकरा दी. अंत में मैं ने विनय से लिफ्ट लेना तय कर लिया.

‘जैसा कि मैं ने कहा था, घर पहुंचतेपहुंचते मैं और विनय पूरी तरह से भीग चुके थे. मैं ने विनय को एक कप अदरक वाली चाय पीने का औफर देते हुए अंदर आने को कहा. पहले तो उस ने मना कर दिया मगर अचानक ही उसे तेज छींकें आने लगीं तो मैं ने ही हाथ पकड़ कर उसे भीतर खींच लिया था. उसे छूने का यह मेरा पहला अनुभव था. मैं ने महसूस किया कि विनय भी मेरे छूने से थोड़ा सा नर्वस हो गया था.

‘मैं ने कपड़े बदल कर चाय का पानी चढ़ा दिया. तभी मुझे खयाल आया कि विनय भी तो भीगा हुआ है. मगर मेरे पास उसे देने के लिए जैंट्स कपड़े तो थे ही नहीं. मैं ने गैस धीमी कर के उसे तौलिया दिया और साथ ही बदलने के लिए अपना नाइट सूट भी. यह देख कर विनय सकपका गया. मगर फिर जोर से हंस पड़ा और कपड़े बदलने चला गया.

‘बाथरूम से बाहर आया तो उस का हुलिया देख कर मेरी भी हंसी छूट गई. विनय मेरे नाइट सूट में बहुत ही फनी लग रहा था. अभी हम दोनों चाय पी ही रहे थे कि बाहर बारिश फिर से बहुत तेज हो चली थी. मैं ने झिझकते हुए विनय से घर न जाने की जिद की. विनय को भी शायद यही ठीक लगा और वह मेरे पास ही रुक गया.

‘मेरी रूमपार्टनर आजकल छुट्टी पर अपने घर गईर् हुई थी और मेरा टिफिन भी बारिश के कारण नहीं आया था. खाने की बात आने पर विनय ने मुसकराते हुए रसोई संभाली और बहुत ही टैस्टी मटरपुलाव बना लिया. बातें करतेकरते हमारा आपसी संकोच काफी हद तक दूर हो चुका था.

‘हम देररात तक हंसीमजाक करते हुए एक ही सोफे पर बैठे टीवी देखते रहे. फिर न जाने कब हमें नींद आ गई और जब सुबह मैं उठी तो विनय की बांहों में थी. विनय अभी भी सो ही रहा था. पता नहीं क्या सम्मोहन था उस के मासूम चेहरे में कि मैं अपनेआप को रोक नहीं पाई और मैं ने झुक कर उस के होंठ चूम लिए. नींद में ही विनय ने मुझे बांहों में कस लिया और फिर हम दोनों…अब छोड़ न छुटकी. अब आगे बताते हुए मुझे शर्म आ रही है,’ निधि ने शर्माते हुए कहा तो छुटकी ने जोर से उसे गुदगुदी कर दी और दोनों बहनें खिलखिला उठीं.

दर्द में भी निधि के चेहरे पर एक मुसकान आ गई. मगर अचानक ही आंखों में फिर से डर की परछाइयां तैरने लगीं. उसे याद आ गया 10 दिनों पहले का वह मंजर जब शालू की शादी तय करवाने वाला बिचौलिया पंडित रामशरण शास्त्री शादी में होने वाले लेनदेन के सिलसिले में कुछ बात करने के लिए पापा से मिलने घर आया था. निधि को देख कर बोला, ‘यह आप की बड़ी बिटिया है क्या?’

‘हां जी, यह हमारी बड़ी बेटी निधि है और अपने पति के साथ मुंबई में रहती है. वो रेवाड़ी वाले चौधरीजी हैं न, उन के बेटे से ही शादी हुई है इस की,’ मां ने निधि की तरफ प्यार से देखते हुए शास्त्रीजी से उस का परिचय करवाया.

‘क्या बात करती हो भाभीजी? चौधरीजी और आप के पति दोनों एक ही गोत्र से संबंध रखते हैं. इस नाते तो यह शादी नाजायज हुई. यह तो भाईबहन का आपस में शादी करने जैसा ही पाप हुआ है,’ शास्त्रीजी ने अपने कानों को हाथ लगाते हुए कहा.

‘मगर हमारे परिवारों का आपस में तो कोई संबंध नहीं है,’ निधि के पापा ने अपनी सफाई देते हुए कहा.

‘उस से क्या फर्क पड़ता है? क्या हमारे पुरखों ने शादियों में गोत्र टालने का प्रावधान यों ही मजाक में किया था? नहीं साहब, हम चाहे कितने भी मौडर्न हो जाएं, लेकिन समाज की परिपाटी तो सभी को निभानी पड़ती है,’ शास्त्रीजी अब अपना यहां आने का मकसद भूल चुके थे और इस नई बहस में उलझ गए. पापामम्मी ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, मगर शास्त्रीजी ने किसी की एक न सुनी और आखिर में वे पापा से भुगतने को तैयार रहने की धमकी देते हुए चले गए.

किसी अनजानी आशंका से निधि का मन कांप गया और जैसा कि उसे डर था, शास्त्रीजी तीसरे ही दिन वापस आए तो उन के तेवर कुछ अलग ही थे. पापा और शास्त्रीजी बैठक में धीरेधीरे बातें कर रहे थे जोकि बीचबीच में तेज भी हो रही थीं. निधि के कान उधर ही लगे थे. उस ने सुना वे कह रहे थे, ‘पंचों की राय है कि निधि बिटिया की शादी को खारिज करार दिया जाए और वह पूरी पंचायत के सामने अपने पति को राखी बांध कर भाई बनाए,’ यह सुनते ही निधि के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह सांस रोके आगे का वार्त्तालाप सुनने लगी.

‘मगर यह कैसे संभव है? निधि की शादी को 5 साल हो चुके हैं, ऐसे में वह कैसे यह सब कर सकती है?’ पापा ने विरोध किया था.

‘तो फिर आप शालू की सगाई को टूटा हुआ समझें. आप के होने वाले समधी इस हालात में आप के साथ रिश्ता रखने के इच्छुक नहीं हैं. और सिर्फ वही नहीं, अब तो शालू को कोई भी गैरतमंद आदमी अपने परिवार की बहू नहीं बनाएगा. यह भी पंचायत ने ही तय किया है,’ शास्त्री ने अपना दोटूक फैसला सुनाया.

‘क्या इस के अलावा और कोई रास्ता नहीं है?’ पापा ने हारे खिलाड़ी की तरह हथियार डालते हुए विनती की.

‘है क्यों नहीं, रास्ता है न. मगर निर्णय तो आप को ही लेना पड़ेगा. हां, निधि के रहते शालू की शादी नहीं हो सकती, यह तो तय है. आप को 2 दिनों बाद पंचायत ने तलब किया है, आप वहां आ कर अपना पक्ष रख सकते हैं.’ शास्त्रीजी पापा को पंचायत का फरमान सुना कर कह कर चले गए.

उस दिन घर में मातम सा पसर गया था. खाना बना तो था मगर किसी से भी एक निवाला तक नहीं निगला गया. सब चुपचाप थे. अपनेअपने विचारों में गुम. हर दिमाग में मंथन चल रहा था. न जाने कौन क्या सोच रहा था.

2 दिनों बाद निधि के पापा चौपाल में बुलाई गई विशेष पंचायत में पहुंचे और जब वापस आए तो निधि ने महसूस किया कि पापा और भाई दोनों का मूड उखड़ा हुआ था. मां ने पूछा तो भी वे टाल गए.

रात को अचानक निधि की नींद खुली तो उस ने देखा कि शालू बिस्तर पर नहीं है. ‘शायद बाथरूम में होगी’ सोच कर निधि उस का इंतजार करने लगी. मगर जब वह काफी देर तक नहीं आई तो निधि कमरे से बाहर निकल आई. पापा के बैडरूम की लाइट जलती देख कर वह उधर चल दी. भीतर से बहुत धीमीधीमी आवाजें आ रही थीं. निधि के अलावा पूरा परिवार वहां मौजूद था. सब किसी गहन मंत्रणा में लगे थे. निधि ने कानाफूसी सुनने की कोशिश की, मगर पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकी. हां, इतना अंदाजा उसे हो गया था कि यह मीटिंग उसी को ले कर हो रही है.

भाई राज ने कहा, ‘समस्या की जड़ को ही खत्म कर देते हैं. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.’ यह सुनते ही निधि कांप उठी.

तभी पापा ने कहा, ‘समाज मेें अपनी इज्जत के लिए मैं ऐसी कई औलादें कुरबान कर सकता हूं.’

‘क्या कोई और रास्ता नहीं है जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे,’ इस बार मां की ममता ने विरोध किया मगर सब ने उसे सिरे से खारिज कर दिया.

निधि समझ गई कि यह मीटिंग उसे रास्ते से हटाने के लिए हो रही है. वह चुपचाप वहां से हट गई और वापस बिस्तर पर आ कर लेट गई. अब उस ने अपनेआप को यहां से सुरक्षित निकलने के बारे में सोचना शुरू किया. ‘विनय तो इतनी जल्दी यहां आ नहीं सकेगा. अपनी फ्रैंड राशि को मैसेज कर देती हूं ताकि वह कल किसी बहाने से आ कर मुझे घर से ले जाए. आगे तो मैं संभाल लूंगी.’ यह सोचते हुए निधि ने अपने मोबाइल की तरफ हाथ बढ़ाया. मोबाइल अपनी जगह पर न पा कर निधि समझ गई कि किसी सोचीसमझी साजिश के तहत उस का संपर्क बाहर की दुनिया से काट दिया गया है.

यानी कि यहां से निकलना इतना आसान नहीं होगा जितना वह सोच रही है. तो फिर अभी अनजान बने रहने में ही भलाई है. मुझे मौके का इंतजार करना होगा. निधि ने सोचा और चुपचाप लेट गई. नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. तभी शालू भी आ कर बगल में लेट गई.

‘कहां चली गई थी?’ निधि ने उसे टटोला.

‘कहीं नहीं, यों ही नींद नहीं आ रही थी, तो छत पर टहल रही थी,’ शालू साफ झूठ बोल गई.

‘आ चल, मैं सुला दूं,’ कह हर निधि ने उस का सिर सहलाने की कोशिश की मगर शालू ने ‘रहने दो’ कह कर उस का हाथ? परे कर दिया.

निधि सारे घटनाक्रम से अनजान बने रहने का नाटक करती हुई घर की सारी गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए थी. उस ने अपने मोबाइल के बारे में भी सब से पूछताछ की मगर किसी ने भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया. ‘चलो, कोई बात नहीं, खो गया होगा. नया ले आएंगे,’ निधि ने भी बात को हवा में उड़ाने की कोशिश की.

आज निधि को वह मौका मिल ही गया जिस की उसे तलाश थी. वह इसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. मां तो पापा को ले कर अपने मायके गई हुई थीं शादी का निमंत्रण देने और राज गया था शादी के लिए कुछ पैसों का इंतजाम करने पापा के दोस्त के यहां. सभी लोग कल दोपहर तक ही आने वाले थे. घर में वह और शालू ही थे. निधि ने अपने सारे रुपए और गहने पर्स के हवाले किए और पर्स को सिरहाने छिपा कर रख लिया. उस ने अपने स्पोर्ट्स शूज भी सुरक्षित रख लिए.

रात को शालू ने घर के मुख्य दरवाजे पर ताला लगा दिया और चाबी अपनी तकिया के नीचे रख ली. मौका पा कर निधि ने सोई हुई शालू के बालों को सहलाने के बहाने धीरे से वह चाबी निकाल ली और जब शालू गहरी नींद में थी तो चुपके से दरवाजा खोल कर बाहर आ गई. घर से बाहर निकलने से पहले उस ने शालू के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और उस का मोबाइल बरामदे में ला कर रख दिया ताकि न तो निधि खुद दरवाजा खोल कर बाहर आ सके और न किसी से संपर्क साध सके. इतना समय काफी था निधि के पास अपनेआप को बचाने के लिए.

इस तरह निधि खुद को एक बार तो मौत के मुंह से निकाल कर ले आई, मगर जब तक वह वापस मुंबई नहीं पहुंच जाती, तब तक सुरक्षित नहीं थी.

रात लगभग बीत चुकी थी. मगर निधि ने अब तक अपनी पलकें भी नहीं झपकाई थीं. उसे डर था कि कहीं कोई उसे तलाश करता हुआ यहां तक न आ पहुंचे.

‘अब तक तो सभी घर वालों को मेरे भागने के बारे में यकीन हो ही गया होगा. मुझे 1-2 दिन और यहीं पुलिस की सुरक्षा में रहना चाहिए,’ सोचतेसोचते निधि ने एक बार फिर सोने की कोशिश की और इस बार उसे नींद आ ही गई.

सुबह जब उस की आंख खुली तो सूरज सिर पर चढ़ आया था. डाक्टर सुबह के राउंड पर आ गई थीं. निधि को देख कर मुसकराईं और उस की तबीयत के बारे में पूछा. तभी इंस्पैक्टर सरोज भी आ गईं और उन्होंने निधि का हाथ अपने हाथ में ले कर एक बार फिर से सहानुभूति से पूछताछ शुरू की. निधि ने भी अब सहयोग करनेकी सोच ली थी. उस ने पूरी बात इंस्पैक्टर को बता कर अनुरोध किया और कहा, ‘‘मुझे अपने घर वालों से जान का खतरा है. मेरे पति एक सप्ताह बाद इंडिया आएंगे. तब तक मुझे सुरक्षा उपलब्ध करवाएं. मगर मैं किसी के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं करवाना चाहती.’’ इंस्पैक्टर सरोज मानवता के नाते उसे अपने साथ अपने घर ले गईं. निधि ने फोन पर विनय से संपर्क साधा और उसे पूरी घटना की जानकारी दी. सप्ताहभर बाद विनय आ कर निधि को साथ ले गया.

‘‘निधि, तुम इस मुश्किल वक्त में मेरे मम्मीपापा के पास भी तो जा सकती थीं,’’ विनय ने प्यार से कहा.

‘‘जा तो सकती थी, और सब से पहले यही खयाल ही मेरे मन में आया था मगर मुझे समय पर भरोसा नहीं था. कितनी मुश्किल से मैं अपनी जान बचा कर भागी थी, मुझे डर था कि कहीं कुएं से निकल कर खाई में गिरने जैसी बात न हो जाए. कहीं वहां भी ऐसे ही हालात पैदा न हो जाएं. अगर मेरी आशंका सही निकलती तो फिर मैं आज यहां तुम्हारे पास न होती.’’ निधि अब तक भी डर के साए में ही थी.

विनय को भी उस की बात में दम लगा, इसलिए उस ने भी अपने मन का वहम निकाल लेना ही उचित समझा. विनय ने अपने पापा को फोन कर के पूरे घटनाक्रम का ब्योरा दिया और निधि के खिलाफ रची गई औनर किलिंग की साजिश के बारे में भी उन्हें बताया. सुनते ही पापा भड़क उठे, बोले, ‘‘हद हो गई. किस आदम युग में जी रहे हैं लोग आज भी, क्या हो रहा है यह सब…क्या न्यायपुलिस कुछ भी नहीं बचा? लेकिन तुम लोग फिक्र मत करो. मैं निधि के पापा से मिल कर उन्हें समझाने की कोशिश करता हूं. मुझे विश्वास है कि कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा.’’

और जैसा कि चौधरीजी ने कहा था, वे एक दिन विनय की मां को ले कर निधि के पापा से मिलने उन के घर गए. उन का परिचय जानने के बाद निधि के पापा सकपका गए. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे उन का सामना कैसे करें. दरअसल, वे लोग अब भी इसी मुगालते में थे कि निधि घर से भाग कर कहीं चली गई है और उस की ससुराल वाले उसे ढूंढ़ते हुए यहां तक आए हैं. लेकिन जब उन्हें पता चला कि निधि सहीसलामत अपने पति के पास पहुंच गई है तो उन्होंने भी राहत की सांस ली.

चौधरीजी के कुछ कहने से पहले ही निधि के पापा ने अपने किए पर शर्मिंदा हो कर उन से माफी मांग ली और अपनी दकियानूसी सोच को त्याग कर निधि और विनय को आदर के साथ घर लाने की बात कही.

‘‘मगर ऐसा करने से अगर शालू का रिश्ता टूट गया तो?’’ चौधरीजी ने एक बार फिर उन का मन टटोलने की कोशिश की.

‘‘टूटता है तो टूट जाए मगर मैं अब एक बेटी का घर बसाने के लिए दूसरी बेटी का बसाबसाया घर नहीं उजाड़ सकता. यह बात मेरी मोटी बुद्धि में बहुत अच्छी तरह से आ गई है,’’ निधि के पापा ने कहा तो चौधरीजी ने उन्हें प्यार से गले लगा लिया. निधि की मां अपने आंसू पोंछते हुए मेहमानों के लिए चायनाश्ते का इंतजाम करने भीतर चली गईं.

लेकिन उस दिन के बाद निधि ने कभी उस घर में पैर न रखने का फैसला कर लिया था. जो मातापिता उसे मार डालने को तैयार हों उन के किसी वादे का वह भरोसा नहीं कर सकती. न जाने कब कौन पंडा या शास्त्री टपक पड़े, न जाने कब कौन सा खाप सरपंच आ धमके.