खिड़की से आती हुई धूप बिन बुलाए मेहमान की तरह कमरे में उतरने लगी तो उम्मी को भोर होने का एहसास हुआ. उस ने एक नजर पास ही पलंग पर सोते हुए नागेश पर डाली. कैसी मीठी नींद सो रहा था. थकावट से भरी सिलवटें उस के चेहरे पर स्पष्ट थीं. इस महानगर में कितनी व्यस्त दिनचर्या है उस की. वह सोचने लगी कि पूरे दिन की भागदौड़ और आपाधापी में सुबह कब होती है और शाम कब ढलती है, पता ही नहीं चलता. नागेश के प्रति उस के मन में प्रेम का दरिया हिलोरे लेने लगा था.

सर्दी की ठिठुरती सुबह में नागेश कुछ देर और सो ले, यह सोच कर उस ने धीरे से रजाई उठाई और उठने को हुई तो नागेश गहरी नींद से जाग गया, ‘‘कहां जा रही हो, उम्मी? कुछ देर और सो लो न,’’ उस ने उम्मी को कस कर अपनी बांहों में जकड़ लिया.

‘‘उठने दो मुझे. देखो, कितनी देर हो गई है,’’ उस ने खुद को पति के बंधन से मुक्त करने का प्रयास किया, जबकि भीतर से उस की इच्छा हो रही थी कि बांहों का घेरा कुछ और सख्त हो जाए. सुबह देर तक सोना उसे शुरू से ही पसंद है. इस ठिठुरती सुबह में पति के गर्माहटभरे स्पर्श ने उसे वैसे भी सिहरा दिया था. उस ने घड़ी की ओर इशारा किया, ‘‘देखो, सुबह के 7 बज चुके हैं.’’

‘‘क्यों परेशान होती हो, उम्मी. आज तो इतवार है, छुट्टी है,’’ उनींदे से नागेश ने पत्नी को याद दिलाने की कोशिश की.

इस पर वह हंस दी, ‘‘छुट्टी तो आप की है जनाब, मेरी नहीं. अगर अब भी नहीं उठी तो पानी चला जाएगा.’’

‘‘2 जनों के लिए कितना पानी चाहिए?’’ नागेश चौंका. वह अब पूरी तरह जागा हुआ था.

‘‘क्यों, आज क्या खाना होटल में खाने का इरादा है? रात के बरतन मांजने हैं, कपड़े धोने हैं और…’’

उम्मी कुछ और कहती इस से पहले ही नागेश  ने अपनी उंगलियों से उस के होंठ ढांप दिए, ‘‘नहीं, आज तुम कोई काम नहीं करोगी, बस, मेरे पास बैठ कर बातें करोगी.’’

‘‘सच?’’ उम्मी को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ.

‘‘यह भी कोई पूछने की बात है. ये सर्द बहकती हवाएं, सुनहरा मौसम और

2 जवां दिल…तुम और मैं…ऐसे में किस का मन चाहेगा कि उस की बीवी घरगृहस्थी के कार्यों में उलझी रहे? बस, जल्दी से तैयार हो जाओ. हम बाहर घूमने चलेंगे. कितने दिन हो गए हमें यहां आए, तुम्हें कहीं भी नहीं घुमाया मैं ने.’’

‘‘तैयार तो हम बाद में होंगे, पहले चाय तो पी लें,’’ हंसते हुए उम्मी ने व्यावहारिक सा तर्क पति के सामने रख कर खुद को उस से समेटा और रसोई में जा कर 2 कप चाय बना कर ले आई.

 

अब तक नागेश भी पलंग के सिरहाने से टेक लगा कर बैठ गया था. वह एकटक उम्मी का चेहरा निहारता रहा. गृहस्थी की हजार अपेक्षाओं के बोझ तले पिसने वाली उम्मी में पहले वाली चंचलता कहां विलुप्त हो गई है, यह सोच कर उस का मन क्षुब्ध हो उठा था. दोष तो उस का ही है. वह तो दफ्तर जा कर कितने लोगों से हंसबोल लेता है. अलगाव का यह दुख तो उम्मी को ही सालता रहता होगा न?

सूरज की तेज रोशनी बादलों के पीछे छिप कर आंखमिचौली खेल रही थी. तेज हवा का झोंका, उम्मी की लंबी जुल्फों से छेड़खानी कर रहा था. मंदमंद शीतल बयार उम्मी के मन में अनचीन्हा स्फुरण भर रही थी. ये सुनहरे क्षण कहीं मुट्ठी में बंद रेत के समान सरक न जाएं, इस से पहले ही उस ने प्रश्न किया, ‘‘कहां ले चलोगे मुझे?’’

‘‘दिल्ली के ऐतिहासिक स्थल नहीं देखे न तुम ने? वहीं चलते हैं.’’

‘‘ऊं हूं, मुझे तो कनाट प्लेस जाना है,’’ उम्मी ने मनुहार की.

‘‘क्यों, वहां जा कर क्या करोगी?’’

‘‘भूल गए? पिछले महीने ही तो तुम ने मुझे गैस चूल्हा ले कर देने का वादा किया था. स्टोव पर खाना पकाने में मुझे बहुत परेशानी होती है. बरतन भी इतने काले हो जाते हैं कि उन्हें घिसतेघिसते मैं तो थक ही जाती हूं,’’ उम्मी ने रूठते हुए कहा.

उस का बस चलता तो वह अपनी सारी परेशानियों का जिक्र उसी पल कर देती, पर नागेश ने उसे बीच में ही रोक दिया था, ‘‘क्या करूं, उम्मी, मन तो करता है कि तुम्हारी हर फरमाइश पूरी कर दूं इसी वक्त, पर कर नहीं पाता. एक खर्च में कटौती करो तो दूसरा पहले ही सामने आ जाता है. इस बार वादा करता हूं कि तनख्वाह मिलने पर सब से पहला काम यही करूंगा, तुम्हें गैसचूल्हा ले दूंगा. पर इस समय पैसे नहीं हैं मेरे पास.’’

‘‘कोई बात नहीं, बाद में ही सही, पर भूलना मत. तुम्हारी आदत है, पहले वादा करते हो, फिर भूल जाते हो.’’

बच्चों की तरह मचलने का अंदाज नागेश को भा गया था. कुछ समय तक कमरे में मौन व्याप्त रहा. संवादहीनता की स्थिति छाई रही दोनों के बीच. नागेश को लगा कनाट प्लेस चल कर, कुछ भी न ले कर देने की बात पर उम्मी शायद नाराज हो गई है. उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. बेकार में उस का दिल दुखा दिया. चाय का कप खाली हो चुका था. खाली कप उम्मी की ओर बढ़ाते हुए उस ने बात छेड़ी, ‘‘उम्मी, पिक्चर देखने चलोगी? बहुत अच्छी फिल्म लगी है?’’

‘‘कौन सी?’’

‘‘नाम तो अखबार में देख लेते हैं. योगेश बता रहा था रोमैंटिक फिल्म है.’’

‘‘फिर तो अच्छी ही होगी. नागेश, तुम्हें याद है, कालेज के दिनों में हम दोनों कितनी फिल्में देखा करते थे?’’

‘‘हां, तुम अपने मातापिता से झूठ बोल कर मेरे साथ पिक्चर देखती थीं. उस के बाद हम गरमागरम कौफी पीते थे. कितना मजा आता था उन दिनों. अब तो जिंदगी नीरस बन गई है. बिलकुल बेजान सी,’’ नागेश मायूस हो उठा.

उम्मी ने माहौल को कुछ हलका करने का प्रयास किया, ‘‘जानते हो, घर लौट कर जब बाबूजी को मेरे झूठ का पता चलता था तो ऐसी करारी डांट पड़ती थी कि क्या बताऊं.’’

नागेश ने उम्मी का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘उस पल मुझे ही कोसती होगी तुम.’’

‘‘धत, तुम्हें क्यों कोसती. मैं तो इंतजार करती थी, कब दूसरी फिल्म लगे और तुम्हारे साथ शाम बिताने का मौका मिले.’’

उम्मी ने पति के कंधे पर सिर टिका दिया. एकदूसरे के प्यार से पगे 2 युवाप्रेमी कितनी ही देर तक छत को निहारते रहे, बिलकुल ऐसे, जैसे कल ही परिणयसूत्र में बंधे हों.

खिड़की से आती मंदमंद शीतल बयार का वेग कुछ तेज हो गया था. मन में विचारों की घटाएं उमड़ने लगी थीं. अचानक उम्मी को लगा, अगर वह अब भी नहीं उठी, तो हो चुका दिल्लीभ्रमण, सुबह के 9 बजने को आए. इस बार नागेश ने रोकने का प्रयास किया तो उस ने आज का ताजा अखबार उस के समक्ष रख कर कहा, ‘‘आप अखबार पढि़ए. तब तक मैं 1-1 कप चाय और बना कर लाती हूं. फिर तो हम दोनों एकसाथ ही पूरा दिन गुजारेंगे,’’ कह कर वह रसोई की तरफ बढ़ गई. मीठी धुन गुनगुनाते हुए उस ने स्टोव जलाया. फिर चाय का पानी चढ़ाया और दूध का बरतन ढूंढ़ने लगी. रात का दूध तो वह सुबह वाली चाय में खत्म कर चुकी थी. अचानक उसे ध्यान आया, सुबह का दूध तो उस ने बाहर से उठाया ही नहीं. उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. बाहर का दरवाजा खोल कर वह दूध की बोतलें उठाने के लिए लपकी तो वहां से बोतलें नदारद थीं.

बदहवास सी उम्मी ने नागेश को पुकारा, ‘‘अब चाय कैसे बनेगी? चौकीदार दूध तो दे कर ही नहीं गया?’’

‘‘यह कैसे हो सकता है? सुबह घंटी बजने की आवाज तो मैं ने खुद ही सुनी थी,’’ नागेश अपनी जगह से हिला न डुला, पूर्ववत बैठे हुए बोला.

अब चिल्लाने की सी आवाज में उम्मी बोली, ‘‘एक बार उठ कर तो आइए. पड़ोस वाले दीपकजी से पूछ लेते हैं. कहीं ऐसा न हो, दूध की गाड़ी ही न आई हो?’’

‘‘तुम भी कमाल करती हो. जब मैं कह रहा हूं, बोतलों की आवाज मैं ने अपने कानों से सुनी है, तो मानती क्यों नहीं?’’

 

नागेश झल्लाता हुआ हाथ में अखबार लिए ही मुख्यदार तक पहुंच गया. दरवाजा खोलते ही उस का सामना, पड़ोस में रहने वाले दीपकजी से हो गया. वे सुबह की सैर से वापस लौटे थे. उम्मी और नागेश ने पूछताछ की तो उन्होंने झट से इस बात की पुष्टि कर दी कि दूध की बोतलें तो उन्होंने यहीं रखी देखी थीं और चौकीदार को घंटी बजाते हुए भी देखा था.

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं, कोई राहगीर बोतलें उठा कर ले गया हो?’’ उन्होंने प्रश्नसचूक दृष्टि से दोनों पतिपत्नी को घूरा, फिर वे अपने घर के अंदर घुस गए.

अब तो उम्मी रोंआसी हो उठी, ‘‘कैसेकैसे चोर बसते हैं इस जमाने में? छोटी सी चीज के लिए भी उन की नीयत बिगड़ते देर नहीं लगती. अब चाय कैसे बनेगी?’’

‘‘कुसूर लोगों का नहीं, तुम्हारा है. और देर से उठो. एक दिन कोई पूरा घर ही बुहार कर ले जाएगा,’’ नागेश झुंझला उठा था.

‘‘तुम भी कमाल करते हो. देर से मैं उठी या तुम ने ही नहीं उठने दिया? मैं तो सोच रही थी…पूरा हफ्ता घड़ी दो घड़ी भी तुम से बोलनेबतियाने का मौका नहीं मिलता. आज छुट्टी के दिन कुछ देर बैठ कर बातें करते हैं. मुझे क्या मालूम था?’’ उम्मी का गला अवरुद्ध हो उठा.

उधर नागेश का आवेग अभी भी कम नहीं हुआ था, ‘‘बातचीत का यह मतलब तो नहीं कि रोजमर्रा के काम न किए जाएं,’’ कहते हुए उस ने मुख्यद्वार भीतर से बंद कर लिया और अखबार पर नजर गड़ाने की असफल सी चेष्टा करने लगा.

हैरानपरेशान सी उम्मी सोचने लगी, ‘क्या यह वही नागेश है जिस ने कुछ समय पहले उसे अपनी पलकों में कैद कर के रखा हुआ था. बात का बतंगड़ बने, इस से पहले ही उस ने स्थिति को संभालने का प्रयास किया, ‘‘चलो, जो हो गया सो हो गया. अब बाजार जा कर दूध की एक थैली ले आओ. तब तक मैं चाय का पानी चढ़ा देती हूं.’’

‘‘सप्ताह में एक छुट्टी मिलती है, उस दिन भी एक न एक काम पकड़ा ही देती हो तुम. हर समय तुम्हारे आगेपीछे घूमता रहूं, बस, यही चाहती हो न तुम?’’ नागेश की आवाज में तल्खी आ गई थी.

उम्मी ने लाख बात टालनी चाही, पर नागेश तो जैसे इसी बात पर तुला था कि उम्मी को समझा कर ही दम लेगा. एक ही झटके में उस ने पत्नी द्वारा अब तक किए सभी नएपुराने नुकसानों का कच्चाचिट्ठा खोल कर रख दिया.

अकारण ही पति के बदले हुए तेवर देख कर उम्मी का पारा भी सातवें आसमान पर चढ़ गया था. कुछ देर पहले पति के प्रति उपजी सहानुभूति और प्रेम की लहर न जाने कहां विलुप्त हो गई, अपने अंदर उठती क्रोध की लहरों को उस के लिए भी रोकनाछिपाना मुश्किल हो उठा जैसे, बोली, ‘‘दूसरे के काम में मीनमेख निकालना सभी को आता है. एक दिन खुद को करना पड़े तो आटेदाल का भाव मालूम हो जाए.’’

उम्मी धीरेधीरे बड़बड़ाती रही कि गलती आखिर इंसान से ही होती है, और आज तो मेरी गलती भी नहीं थी. एक बार उस ने नागेश को फिर से चेतावनी दी, ‘‘दूध लाओगे तो चाय बना दूंगी वरना यों ही बैठे रहो.’’

‘‘तुम्हारे जैसी फूहड़ और बदजबान बीवी होगी तो यही होगा. कोई काम तुम्हारी मां ने सही तरीके से करना सिखाया भी है तुम्हें?’’

औरत कुछ भी बरदाश्त कर सकती है लेकिन मायके की तौहीन बरदाश्त नहीं कर सकती. उस के मुंह से मानो ज्वालामुखी फट पड़ा, ‘‘मां के घर थाली हाथ में मिलती थी, काम करने वाले नौकर थे. यहां की तरह नहीं, सुबह 6 बजे से ही खड़खडि़या बंध जाती है पैरों में.’’

‘‘तो ले आतीं न 2-4 को अपने साथ. अकेली ही क्यों चली आईं?’’ पत्नी के ताने पर नागेश भी तिलमिला उठा था.

‘‘नौकर मुफ्त में काम नहीं करते, पगार भी देनी पड़ती है उन्हें.’’

‘‘तुम्हारी फरमाइशें कम हों तो 4 पैसे बचें न.’’

नागेश ने अपनी तरफ से तो बात धीरे से कही थी, पर उम्मी ने सुन लिया था. उस का आवेश अब और बढ़ गया, ‘‘क्या मांग लिया तुम से मैं ने? कितने दिनों से गैस का चूल्हा ले कर देने को कह रही हूं. रोज आजकलआजकल कहते रहते हो. मेरी बहनों को देखो, क्या नहीं है उन के पास? टीवी, फ्रिज, वीसीआर, यहां तक कि गाड़ी भी है. मेरी तरह घुटघुट कर नहीं जीतीं, मजे से सैरसपाटा करती हैं.’’

‘‘तो कमाओ न, कमाती क्यों नहीं? पूरा दिन सहेलियों से गपें मारती रहती हो,’’ नागेश ने अपना तर्क दिया.

इस पर उम्मी बिफर उठी, ‘‘कौन सी सहेलियां हैं मेरी? जो थीं, वे भी कभी अच्छी नहीं लगीं तुम्हें.’’

पत्नी की जवाबदेही पर नागेश बौखला उठा. जैसे सारे शब्द ही चुक गए थे उस के. फिर भी पीछे हटना उस की शान के खिलाफ था. बोला, ‘‘ढंग से खर्च करो. तुम्हारी बहनें तुम्हारी तरह खर्चीली नहीं हैं,’’ कह कर वह बड़बड़ाता हुआ घर से बाहर निकल गया.

दरवाजा बंद होने और स्कूटर स्टार्ट होने की आवाज से उम्मी जान चुकी थी कि नागेश जा चुका था. गुस्से में आ कर उस ने भी पास ही पड़े स्टूल को दीवार पर दे मारा. फिर आरामकुरसी पर धम्म से बैठ गई. बिलकुल उस योद्धा की तरह जो कुछ ही समय पहले युद्धस्थली से हार कर लौटा हो. आंखों से छलक आए आसुंओं को उस ने साड़ी के पल्लू से पोंछा और लगी भुनभुनाने कि न जाने क्या समझता है खुद को नागेश. 3 हजार रुपल्ली कमा कर, जैसे कहीं का बादशाह बन बैठा हो. कितने पैसे होते हैं मेरे पर्स में, जो कह रहा है कि मैं उड़ा देती हूं? मानअपमान की तो जैसे कोई भाषा ही नहीं, जो मुंह में आया, बस कह दिया.

उस की आंखें छलछला आईं. क्या यही सब पाने के लिए नागेश से विवाह किया था उस ने. मातापिता, भाईबहनों तक से विरोध किया था उस ने. बस, यही सोचती रही थी कि नागेश के सान्निध्य में उसे दुनिया की हर खुशी मिल जाएगी, पर कहां हुआ ऐसा? वैसे, तब नागेश ऐसा नहीं था. उस की बंद आंखों में नागेश के साथ गुजारी वे सुनहरी शामें उतरने लगी थीं जब दोनों प्रेमी घंटों नदी के किनारे बैठ कर सुनहरे सपनों के महल सजाते थे. एक बार उस ने नागेश से पूछा था कि नागेश, प्रेम की परिभाषा क्या होती है?

इस पर उस ने बताया था कि प्रेम की सही परिभाषा है, खुश रहना, हृदय से हृदय तक एकदूसरे की बात को बिना कहे ही समझ लेना. भावनाओं में आत्मसात हो जाना. स्वयं से अधिक अपने प्रिय को चाहना, यही प्रेम की परिभाषा है.

उम्मी आत्मविभोर हो उठती थी तब, जब नागेश कहता था कि सही रूप में प्रेम तभी पैदा होता है जब 2 युवामन एक छत के नीचे रहते हों.

पर ऐसा कब हुआ? जिंदगी तो गृहस्थी के चक्कर में फंस कर रह गई. पूरा हफ्ता वह इसी प्रतीक्षा में रह जाती है कि कब नागेश की छुट्टी हो और वह कुछ पल उस के साथ बिताए, पर कुछ समय बाद झगड़ा हो ही जाता है. विशेषरूप से छुट्टी के दिन तो ऐसा अवश्य होता है. कभी सब्जी में नमक ज्यादा पड़ गया तो किचकिच, कभी कमीज के बटन लगाना भूल गई तो चिड़चिड़ाहट, और क्या कहे? कहीं घर से बाहर घूमने जा रहे हों और उम्मी को तैयार होने में जरा सा विलंब हो जाए तो भी नागेश झल्लाने लगता. ऐसे में हीलहुज्जत, हारमनुहार सभी बातें बेकार हो जातीं.

उम्मी भावुक हो उठी थी. आखिर क्यों होता है ऐसा? उस की हर इच्छाअनिच्छा का ध्यान रखने वाला सहृदय प्रेमी, ब्याह के कुछेक महीनों में ही क्यों बदल गया? पहले तो कांटे की सी नुकीली चुभन भी उसे रक्तरंजित करती, तो उस पर स्नेह का लेप लगा कर, समूल नष्ट करने का प्रयास करता था नागेश और अब उस की हृदयभावना से भी अनभिज्ञ रहता है. तभी उम्मी के मन में एक कुविचार कौंधा कि यह भी तो हो सकता है कि नागेश उसे अब प्यार ही न करता हो. तभी तो प्रशंसा के दो शब्द भी नहीं निकलते कभी उस के मुंह से. प्रशंसा के दो शब्द कहने में शब्दों के कलेवर ही तो चढ़ाने होते हैं. उसे महसूस होने लगा कि नागेश का कहा हुआ हर वाक्य निरर्थक था, निराधार था. सबकुछ झूठ था, मिथ्या था मृगमरीचिका सा. न जाने कब तक विचारों के भंवरजाल में फंसी रही थी वह.

नागेश को गए हुए 2 घंटे हो गए थे. उम्मी के दिल का आवेश अब थम गया था. उसे चिंता सताने लगी थी कि नागेश को गए हुए काफी समय बीत चुका है. दूध की थैलियां तो नुक्कड़ वाली दुकान पर ही मिल जाती हैं. अब तक तो उसे लौट आना चाहिए था. दूसरे ही पल, विचार कौंधा कि अच्छा ही है कुछ देर और बाहर रहे, नहीं तो फिर कोई बखेड़ा खड़ा हो जाएगा. ब्याह के बाद 6 महीनों का वृत्तांत क्रम से साकार हो उठा था.

सूरज की तेज रोशनी एक बार फिर बादलों के पीछे छिप गई थी. चारों ओर गहरा अंधेरा पसरने लगा था. गली में इक्कादुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे. उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा कि कहां चला गया होगा नागेश? कहीं कोई अनहोनी न घट गई हो? रोज अखबार अजीबोगरीब वारदातों से रंगा रहता है. क्रोध के आवेश में इंसान कुछ भी कर सकता है. उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. कहीं नागेश घर छोड़ कर तो नहीं चला गया? पर ऐसा भी वह क्यों करेगा. यह घर तो उस का है? वह तो घर का पोषक है.

 

उम्मी की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा फूट पड़ी. गलती सिर्फ नागेश की ही तो नहीं, उस की भी है. अगर नागेश किसी बात पर उलझता है तो वह भी चुप कहां रहती है. फौरन तूतड़ाक पर उतर आती है. मां कहती थी, ‘एक चुप सौ सुख.’ छोटी सी बात थी, दूध की थैली ही तो लानी थी, और महाभारत छिड़ गया. अगर नागेश मना कर रहा था तो वह खुद भी तो

ला सकती थी. घर को कुरुक्षेत्र का मैदान बनाने से तो बेहतर था समर्पण ही कर देती.

वह बेबसी से नागेश की प्रतीक्षा करने लगी. कभी खिड़की के परदे हटा कर बाहर झांकती, कभी घर के बाहर कदमों की आहट सुन कर चौकन्नी हो जाती. उसे धीरेधीरे विश्वास होने लगा कि अब नागेश नहीं लौटेगा, फिर सोचने लगी कि यह भी तो हो सकता है, उस का मन ही भर गया हो मुझ से. तो फिर मैं यहां क्यों रहूं? नहीं रहूंगी इस घर में मैं. अभी चली जाऊंगी. उस ने उठ कर अलमारी खोली और अपनी साडि़यां, सूटकेस में सहेज कर रखने लगी.

तभी दरवाजे की घंटी बजी. कौन होगा इस समय? मन ही मन सोचते हुए उस ने दरवाजा खोला तो सामने नागेश खड़ा था. उस की जान में जान आ गई. हलका सा हवा का झोंका भी उसे सुखद अनुभूति दे गया था. थकाहारा सा नागेश घर में घुसते ही कमरे में बिछे पलंग पर लेट गया. अजीब सी खामोशी छाई थी हर तरफ. दोनों ही दुविधा में थे कि हर तरफ पसरे हुए मौन को भंग कौन करे? पलंग के सिरहाने रखे हुए सूटकेस पर एक नजर डालते हुए आखिर नागेश ने ही पहल की, ‘‘कहीं जा रही हो?’’

‘‘हां, हमेशा के लिए, तुम्हारा घर छोड़ कर जा रही हूं.’’

‘‘कहां जाओगी?’’ नागेश का स्वर भीगने लगा.

‘‘तुम्हें इस से क्या? तुम्हें तो मेरी सूरत भी अच्छी नहीं लगती न?’’ उस ने उड़ती सी निगाह नागेश पर डाली.

‘‘उम्मी, अब भी नाराज हो मुझ से?’’ नागेश के स्वर में पश्चात्ताप के भाव थे.

‘‘नाराज मैं नहीं, तुम्हीं रहते हो मुझ से, हर वक्त. हर समय झगड़ते रहते हो…’’

‘‘मैं लड़ता हूं कि तुम झगड़ती हो हर समय?’’

‘‘तुम लड़ते हो. जानते हो, तुम्हारे जाने के बाद पड़ोसिनें कैसेकैसे सवाल पूछती हैं मुझ से? मुझे तो शर्म आने लगती है.’’

 

इसी बीच उस ने अपना सूटकेस उठा लिया था. मगर पिछले कुछ घंटों में नागेश की अनुपस्थिति ने उसे एहसास दिला दिया था कि वह उस के बिना नहीं रह सकती. एकएक पल जैसे युग सा प्रतीत हुआ था उसे तब. और बचाखुचा मैल नागेश के साथ हुई अब तक की जिरह से यों भी धुलपुंछ गया था. फिर भी झुकने के लिए वह कतई तैयार नहीं थी. ऊहापोह के चक्रवात में उलझी उम्मी ने जैसे ही दरवाजे की सिटकिनी खोलने का प्रयास किया, नागेश ने उस के हाथ से बैग छीन लिया और उस का हाथ पकड़ कर अंदर खींच लिया, ‘‘पागल मत बनो, उम्मी. तुम चली गईं तो मेरा क्या होगा? तुम्हारी अनुपस्थिति में कैसे रहूंगा इस घर में, कम से कम यह तो सोचो.’’

‘‘क्यों, घर में झगड़ा करने के लिए कोई नहीं मिलेगा, इसलिए?’’ वह मन ही मन मुसकरा दी थी. नागेश के शब्दों ने उस के अंदर श्रेष्ठता का एहसास भर दिया था.

‘‘अच्छा बाबा, गलती मेरी ही है. अब तो माफ कर दो,’’ नागेश बोला.

नागेश का भोलाभाला चेहरा देख कर उम्मी जोर से हंस दी. फिर मन ही मन सोचने लगी कि कितना सुखद है नागेश का साहचर्य? उस की अनुपस्थिति में तो ऐसा लग रहा था जैसे वह भीड़भाड़ में कहीं खो गई हो.

कुछ ही पलों में नागेश ने अपनी बांहें फैला दीं तो वह सिमटती चली गई उस की आगोश में. फिर नागेश का हाथ अपने हाथ में ले कर उस ने नागेश के कंधे पर सिर टिका दिया और बोली, ‘‘अच्छा बताओ तो, इतनी देर कहां चले गए थे तुम?’’

‘‘फिल्म देखने चला गया था. मुझे मालूम था, घर वापस लौटूंगा तो

तुम बात भी नहीं करोगी. रूठी रहोगी मुझ से.’’

नागेश की मासूमियत पर उम्मी को तरस आ गया. फिर भी वह बात उसे बुरी लगी कि वह अकेला ही फिल्म क्यों देख आया? मचलते हुए उस ने शिकायत की, ‘‘कितनी अच्छी फिल्म थी और तुम अकेले ही देख आए? अब मैं किस के साथ देखूंगी?’’

नागेश ने मेज पर रखा कैलेंडर अपनी ओर घुमाया. फिर तारीखों पर नजर दौड़ाता हुआ बोला, ‘‘इस बुधवार को 26 जनवरी है, उस दिन चलेंगे. टिकट मैं एक दिन पहले ही ले आऊंगा, तुम सुबह ही तैयार हो जाना.’’

उम्मी नागेश का चेहरा देखते हुए सोचने लगी कि अगर अगली छुट्टी वाले दिन भी यही सब हुआ जो आज हुआ है तो फिर क्या होगा? कितना अच्छा होता अगर छुट्टी का दिन टल जाता?

अब तक आसमान पर चांद निकल आया था. फिर उम्मी शीघ्र रसोई में घुस गई क्योंकि सुबह के दोनों भूखे जो थे.