सरिता विशेष

‘‘नैक्स्ट.’’

राहुल ने अपनी फाइल उठाई और इंटरव्यूकक्ष में प्रवेश कर गया. प्रवेश करने वाले को देख कर बोर्ड की चेयरपर्सन प्रभालता चौंक गईं. हालांकि उन्होंने अपनी हैरानी को अन्य लोगों पर जाहिर नहीं होने दिया पर उन की नजर आने वाले पर जड़ी रही. राहुल भी उस नजर को भांप गया था, इसलिए वह भी असहज हो रहा था. वह बोर्ड के सामने पहुंचा तब मैडम बोलीं, ‘‘सिट डाउन,’’ और वह बैठ गया.

‘‘तुम्हारा नाम?’’

‘‘राहुल वर्मा.’’

‘‘पिता का नाम?’’

‘‘राज वर्मा.’’

आमतौर पर माता का नाम नहीं पूछा जाता लेकिन चेयरपर्सन शायद उस का पूरा इतिहास जानना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने पूछ ही लिया, ‘‘माता का नाम?’’ जैसे छोटे बच्चे से अध्यापक पूछता है.

‘‘प्रभालता.’’

चेयरपर्सन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी साथ ही उन के चेहरे की चमक भी बढ़ती जा रही थी. बाकी लोग सवालजवाब को सुन रहे थे, चुप थे.

‘‘तुम्हारे पिता क्या करते हैं?’’

‘‘जी, मेरे पिता मेरे जन्म से पहले ही मां को छोड़ कर चले गए.’’

‘‘क्या कोई अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़ कर जाता है?’’

‘‘मेरे पिता और मां ‘लिव इन रिलेशन’ में थे. मां के अनुसार, वे जल्दी ही शादी करने जा रहे थे.’’

‘‘पर यह बात बताते समय क्या तुम्हारे मन में यह विचार नहीं आया कि तुम्हारी नौकरी की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है क्योंकि अभी हमारा समाज इतना आधुनिक नहीं हुआ है.’’

‘‘जो सच है उसे छिपाने का क्या फायदा? यदि बाद में पता चले तब वह शायद ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है.’’

सरिता विशेष

‘‘तुम बहुत अच्छा सोचते हो. वैसे तुम को इस पद का कोई अनुभव है?’’

‘‘नहीं, अभी कहीं काम नहीं कर रहा हूं. मैं कुछ ट्यूशन पढ़ा लेता हूं.’’

‘‘इंटरव्यू के बाद कहां जाओगे? सीधे घर?’’ प्रश्न अजीब था, लेकिन सब चुप रहे.

‘‘नहीं, पहले ट्यूशन पढ़ाने जाऊंगा.’’

‘‘तुम कहां रहते हो? तुम्हारी मां क्या करती हैं?’’

‘‘यहां आश्रम में रहते हैं. मां बीमार रहती हैं.’’

‘‘ठीक है, अब तुम जा सकते हो.’’ वह चौंक गया क्योंकि उस से पहले के लोगों से पद से संबंधित प्रश्न पूछे गए थे और उस से जो प्रश्न किए गए थे उन का साक्षात्कार से कोई संबंध नहीं था. वह उठा और चल दिया. मैडम उस से जिस लहजे में बात कर रही थीं उस से उसे लगा था कि मैडम शायद और लोगों से भिन्न हैं. लेकिन उस की आशाओं पर तुषारापात हो गया जब मैडम ने उसे जाने के लिए कह दिया. वह बाहर आया और जब घर चलने लगा तब चपरासी ने रोक दिया, ‘‘अभी जाना नहीं है. इंटरव्यू का परिणाम सुन कर जाना. अभी थोड़ी देर में परिणाम आ जाएगा.’’ वह रुक गया. राहुल का नंबर आने से पहले सबकुछ संस्था की परंपरा के अनुसार चल रहा था, लेकिन राहुल के इंटरव्यूकक्ष में प्रवेश करते ही सब बदल गया. इंटरव्यू के दौरान चुप रहने वाली चेयरपर्सन ने किसी और को बोलने का अवसर नहीं दिया.

अमूमन मैडम खुद परिणाम सुनाती थीं लेकिन आज यह जिम्मेदारी उन्होंने कालेज के प्राचार्य को सौंप दी. पहली बार कालेज डैमो के बाद चयन कर रहा था. 2 दिन बाद डैमो था. मैडम बाहर आईं और अपनी कार खुद ड्राइव कर ले गईं. उन्होंने ड्राइवर का भी इंतजार नहीं किया. मैडम कई बार आश्रम जा चुकी थीं. लेकिन इस बार मकसद दूसरा था. कालेज से निकल कर मैडम ने अपनी कार को आश्रम की ओर मोड़ दिया. रास्ते में उन्होंने आश्रम के बच्चों के लिए गिफ्ट, फल आदि खरीद लिए. आश्रम पहुंच कर वे संचालक के कमरे में चली गईं. संचालक से उन्होंने प्रभालता के बारे में पूछा. संचालक महोदय ने किसी के साथ उन को प्रभालता के पास भेज दिया.उस के कमरे में पहुंच कर वे झिझकीं, आखिर क्या कह कर वे उन से मिलेंगी. अंदर पहुंच कर उन्होंने देखाराहुल की मम्मी बिस्तर पर लेटी हुई थीं. कमरा साफसुथरा था. मैडम मुसकरा उठीं. बिस्तर पर लेटी प्रभालता ने आने वाली को देखा और पूछा, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं?’’

‘‘मैं प्रभा इंडस्ट्रीज की मालिक, प्रभालता.’’

वे हंस पड़ीं और बोलीं, ‘‘आप तो मेरी हमनाम हो. पर आप को मुझ से क्या काम है?’’ ‘‘आप का बेटा मेरे कालेज में इंटरव्यू देने आया था.’’

‘‘तो क्या आप इंटरव्यू देने वाले हर एक के घर जाती हैं?’’

‘‘नहीं, आप के बेटे ने जिस प्रकार इंटरव्यू में अपनेआप को प्रस्तुत किया उस के बाद उस मां से मिलने का मन किया, जिस ने इतने अच्छे संस्कार दिए.’’

राहुल की मम्मी मुसकरा कर बोलीं, ‘‘आप उस की कुछ ज्यादा ही तारीफ कर रही हैं.’’ लेकिन मैडम शायद जल्दी से मुद्दे पर आना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने पूछ ही लिया, ‘‘राहुल के पापा?’’

‘‘वे इस के जन्म से पहले ही चले गए.’’

‘‘यह तो राहुल ने बताया है. आप तो यह बताओ कि क्या उन को पता था कि आप गर्भवती हो?’’

‘‘उन को पता नहीं था.’’ मैडम ने ठंडी सांस ली. मन ही मन एक तसल्ली हुई. वे ऐसा क्यों कर रही थीं? अभी तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा था.

मैडम ने पूछा, ‘‘राहुल के पापा घर छोड़ कर क्यों चले गए?’’ ‘‘इस प्रश्न का उत्तर तो मैं आज भी खोज रही हूं. जिस दिन वे गए थे उस दिन हम दोनों की आपस में लड़ाई हुई थी. पर ऐसा तो होेता रहता था. मैं ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था. मैं डाक्टर के पास चली गई. मैं गर्भवती हो गई थी. मैं खुशीखुशी घर आ गई. मैं यह खुशखबरी सुनाने के लिए उन का इंतजार करने लगी. वह इंतजार आज भी है. वे आए ही नहीं.’’

‘‘उन के औफिस से पता नहीं किया?’’

‘‘उन्होंने इतनी जल्दीजल्दी नौकरियां बदलीं कि यह पता नहीं चला कि कहां काम कर रहे हैं. हां, इतना जरूर था कि उस बार उन्होंने कहा था, अब हम जल्दी शादी कर लेंगे. यहां अपनी गाड़ी लंबे समय तक चलेगी. मैं बहुत खुश हो गई क्योंकि इन शब्दों का मुझे बहुत दिनों से इंतजार था. डाक्टर की सूचना से मैं और खुश हो गई. परंतु शाम होतेहोते मेरी सारी खुशी काफूर हो गई. वे दोपहर का खाना खाने भी नहीं आए. और आज तक नहीं आए.’’ वातावरण गंभीर हो गया. कुछ देर वहां चुप्पी छा गई. फिर राहुल की मां ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘जब उन को कुछ दिन से नहीं देखा तब लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई. शादीशुदा नहीं थी और एक कुंआरी लड़की किसी मर्द के साथ एक कमरे में रहे, उस समय के लोगों के लिए अजूबा था. जब तक वे रहे तब तक लोग कुछ नहीं बोले, लेकिन उन के जाने के बाद लोगों की नजरें बदल गईं. लोगबाग मुझे ऐसीवैसी औरत समझने लगे. मेरा लोगों की नजरों से बचना मुश्किल होने लगा.

‘‘इधर, मेरी कंपनी ने भी मुझे नौकरी से निकाल दिया. मुझे अपना ही बच्चा बोझ लगने लगा. कभीकभी मुझे अपने बच्चे पर रोना आने लगता. तब मेरी एक सहकर्मी काम आई. उस की सहायता से मैं वहां से बहुत दूर आ गई. वहां मुझे शांति मिली क्योंकि मेरी सहकर्मी ने उन को सबकुछ बता दिया था. इसलिए कोई गंदी नजरों से देखने वाला नहीं था. परंतु मुझे अपने बच्चे की चिंता थी. इसलिए मुझे लगा, इस बच्चे को दुनिया में आना ही नहीं चाहिए. लेकिन जब आश्रम के संचालकजी को पता चला तब उन्होंने समझाया और कहा, हम यहां जीवन देने के लिए बैठे हैं, लेने के लिए नहीं. क्या पता यह बच्चा ही तुम को तुम्हारे पति से मिला दे. आश्रम वालों ने हर कदम पर मेरा साथ दिया.

‘‘मैं आप से ये सब क्यों कह रही हूं? मुझे आप अपनी सी लगीं शायद.’’

मैडम मन ही मन बुदबुदाईं, ‘अपनी? पर अगर सच पता चल जाए तो शायद वे उस से घृणा करने लगें.’ मैडम को अब वहां बैठना भारी लगा. इसलिए वे उठ गईं लेकिन फिर मिलने का वादा कर के. वहां से उठ कर वे आश्रम के संचालक के पास आ कर बैठ गईं. उन से उन की बीमारी का पता चला. यह भी पता चला कि उन को इस आश्रम में भेजा गया था कि यहां वे स्वास्थ्य लाभ कर सकें. उन्होंने ही बताया, इन की इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है. कहती हैं कि मैं तब तक नहीं मरूंगी जब तक अपने बेटे को उस के बाप को सौंप न दूं. डाक्टर भी हैरान हैं. मैडम वापस घर आ गईं, जहां फाइलें उन का इंतजार कर रही थीं. उन का समय निकल गया. रात को 10 बजे के करीब उन के पतिदेव राज वर्मा घर आ गए.

खाना खापी कर जब दोनों सोने जा रहे थे तब मैडम बोलीं, ‘‘तुम्हारा बेटा बिलकुल तुम पर गया है.’’

‘‘मेरा बेटा? क्यों मजाक कर रही हो. संतान के लिए हम दोनों तड़प रहे हैं.’’ ‘‘मैं मजाक नहीं कर रही हूं. आज कालेज में इंटरव्यू थे. वह भी आया था. जब वह इंटरव्यू के लिए आया, उसे देख कर लगा कि तुम आ गए. वह बिलकुल आप की तरह था. उस के चश्मा लगा था, तुम्हारे नहीं लगा है. वह तो अच्छा था कि बोर्ड के अन्य सदस्यों ने आप को नहीं देखा हुआ था, वरना वे मुझ से भी ज्यादा हैरान होते.’’

‘‘मैं अभी भी नहीं समझा.’’

‘‘तुम्हारी लिव इन रिलेशन मिल गई है. तुम्हारी ‘वह’ उस समय गर्भवती थी.’’

‘‘पर उस ने मुझे तो कभी नहीं बताया.’’

‘‘उसे भी नहीं पता था. आप से झगड़े के बाद वह अस्पताल गई थी तब उसे पता चला. वह बहुत खुश थी. तुम्हें सूचना देने के लिए वह तुम्हारा इंतजार कर रही थी. और…आज भी कर रही है.’’

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‘‘तुम यह सब कैसे जानती हो?’’

‘‘मैं उस से मिली हूं. वह इसी शहर में है. उस की कहानी सुन कर मुझे अपनेआप से घृणा होने लगी. एक बेटे को उस के बाप के प्यार से वंचित करने का गुनाह हो गया. मैं ने भी उसे ऐसीवैसी औरत समझा था. मेरे मन में भी यही था कि जो औरत बिना शादी के एक मर्द के साथ रह सकती है वह किसी के साथ भी भाग सकती है. मैं गलत साबित हुई. सच में, वह वास्तव में, आप से दिल से प्यार करती है. ‘‘प्रभा इंडस्ट्रीज के मालिक का बेटा आश्रम में रहे, यह मैं नहीं चाहती.’’

‘‘उस की मां?’’

‘‘वह भी हमारे साथ रहेगी.’’

‘‘क्या तुम अपने ही घर में सौतन को बरदाश्त कर सकोगी?’’

‘‘मुझ से ज्यादा, तुम पर, उस का हक है. भले ही वह तुम्हारी ब्याहता नहीं है. मुझे बस यही चिंता है कि सारी सचाई जान कर क्या वह मुझे माफ करेगी?’’ ‘‘क्या राहुल इस सचाई को स्वीकार कर सकेगा?’’ दोनों रातभर ढंग से सो नहीं पाए. सुबह दोनों जल्दी उठ गए. जल्दी से तैयार हो गए. एक डर के साथ दोनों आश्रम की ओर रवाना हो गए. उन के कमरे का एक दरवाजा बाहर सड़क की ओर खुलता था उसी ओर दोनों गए. दरवाजा खुला हुआ था.

पहले मैडम ने प्रवेश किया. मैडम को दरवाजे पर देख कर वे मुसकरा उठीं, ‘‘आज कैसे?’’

‘‘आज मैं तुम्हारे लिए सरप्राइज लाई हूं,’’ फिर दरवाजे की ओर मुंह कर के बोलीं, ‘‘राजजी, अंदर आ जाओ.’’ वे अंदर आ गए. दोनों ने एक लंबे अरसे बाद एकदूसरे को देखा और एकदूसरे को देखते ही रहे, फिर प्रभा बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगी. राज ने तत्काल उस के पास पहुंच कर उसे अपनी बांहों में भर लिया. वे यह भूल गए कि उन की ब्याहता पत्नी साथ है. प्रभा ने भी उन्हें बांहों में भर लिया. मैडम कुछ देर तक शांत रहीं, फिर अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए खांसी, तब दोनों को एहसास हुआ कि कोई और भी मौजूद है, एकदूसरे से अलग हो गए. तभी राहुल ने वहां प्रवेश किया और मैडम को देख कर चौंक गया और मैडम से पूछा, ‘‘आप यहां कैसे?’’ मैडम के कुछ कहने से पूर्व ही उस की नजर मां के पास बैठे शख्स की ओर पड़ी. तभी उस की मां बोल पड़ीं, ‘‘ये तुम्हारे पापा हैं, पैर छुओ, बेटा.’’

राहुल बोला, ‘‘अब क्यों आए हैं? अब मैं अपनी मां का खयाल रख सकता हूं. उस समय कहां थे जब मां को आप की सब से ज्यादा जरूरत थी. मां ने क्याक्या नहीं भुगता. उन को दूसरों को जवाब देना पड़ा. आप को अंदाजा भी नहीं होगा.’’ वह आगे भी कुछ कहता तभी मैडम बोल पड़ीं, ‘‘तुम्हारे पापा का कोई दोष नहीं है.’’

यह सुन कर राहुल बोला, ‘‘मैडम, आप बीच में मत पडि़ए. यह हमारा पारिवारिक मामला है. आप मत बोलिए.’’

मैडम बोलीं, ‘‘मैं तुम्हारे पापा की ब्याहता हूं.’’ यह सुनते ही मां और राहुल चौंक गए.

राहुल बोला, ‘‘तभी आप ने वे प्रश्न पूछे जिन का इंटरव्यू से कोई संबंध नहीं था.’’ ‘‘तुम को देख कर मैं चौंक गई थी. पर मुझे खुशी भी हुई थी. लेकिन मैं चाहती थी कि पहले अपनी शंकाओं का समाधान कर लूं. जैसेजैसे उत्तर मिल रहे थे, मेरी खुशी बढ़ती जा रही थी. बस, मेरी एक ही चिंता थी कि क्या तुम्हारे पापा को पता था कि तुम्हारी मां गर्भवती थीं? इसलिए मैं ने तुम से पूछा था कि इंटरव्यू के बाद कहां जाओगे? क्योंकि मैं तुम्हारी मम्मी से अकेले में मिलना चाहती थी. मैं तुम्हारी मम्मी से मिली भी थी और यह भी पता चल गया कि उस समय तक तुम्हारे पिता को यह बात पता नहीं थी. मुझे एक तरह से संतुष्टि हुई थी. एक और गुनाह से बच गई थी.’’

‘‘क्या पापा ने सारी बातें आप को बता दी थीं?’’

‘‘मैं विस्तार से बताती हूं, उस दिन तुम्हारे पापा कुछ फाइलों पर मेरे पापा के दस्तखत लेने घर आए थे. तभी पापा को दिल का दौरा पड़ा. तुम्हारे पापा ने उस समय सब संभाल लिया था. डाक्टरों ने उन को बाहर ले जाने के लिए कहा. मेरे पापा के साथ तुम्हारे पापा चले गए. उन्होंने तुम्हारे घर पर सूचित करने की जिम्मेदारी मुझ पर डाल दी. मैं तुम्हारी मम्मी को सूचित करना भूल गई. पापा को वहीं करीब 15 दिन लग गए.’’ सब सुन रहे थे. मैडम बता रही थीं, ‘‘अब मेरे पापा को मेरी और अपने व्यापार की चिंता हुई. उन को सब से विश्वसनीय तुम्हारे पापा लगे. तुम्हारे पापा ने अपने लिव इन रिलेशन के बारे में बता दिया फिर भी मेरे पापा राजी थे, वे अपनी जिद पर अड़े रहे. राज को पापा यह बात बारबार कहते रहे कि वह तुम्हारी ब्याहता नहीं है, हो सकता है कि उसे कोई और मिल जाए. डाक्टर ने कह दिया था कि पापा के लिए कोई भी सदमे वाली बात जानलेवा हो सकती है. तब मैं ने तुम्हारे पापा को सुझाव दिया, हम दोनों नकली शादी कर लेते हैं. और हमारी शादी सादगी से बिना तामझाम के हो गई. ‘‘फिर पापा लग गए राज को व्यापार की बारीकियां समझाने. उन्होंने सारा व्यापार मेरे और राज के नाम कर दिया.

‘‘पापा को यह सब समझने में 15 दिन लग गए. इस दौरान तुम्हारे पापा एक रोबोट की तरह कार्य कर रहे थे. उन को लग रहा था कि वे अपनी ‘उस’ को धोखा दे रहे हैं. ‘‘इस बीच, मेरे पापा की मृत्यु हो गई. उन के अंतिम संस्कार और बाकी रस्मों में और 15 दिन लग गए. ‘‘जब फुरसत हुई तब तुम्हारे पापा ने मुझे याद दिलाया. मैं अपनी नकली शादी की बात को लगभग भूल गई थी. मैं राज को वास्तव में चाहने लगी थी. इसलिए राज की बात सुन कर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई, फिर भी मैं राज के साथ गई परंतु वहां ‘वे’ नहीं मिलीं. आसपास पूछा तब पता चला कि एक दिन एक जीप आई थी, उस में बैठ कर वे चली गईं. कहां गईं, किसी ने नहीं बताया. उन के कार्यालय भी गए परंतु निराशा ही हाथ लगी. ‘‘हम ने खोजने की बहुत कोशिश की. तुम्हारे पापा ने मुझ से बोलना बंद कर दिया. बस, वे सारे कार्य कर रहे थे. लेकिन धीरेधीरे समय ने घाव को भर दिया. लेकिन तुम्हारे पापा मुझ से मन से नहीं जुड़ पाए.

‘‘मेरे गुनाहों की मुझे सजा मिली, मैं मां नहीं बन पाई.’’ वातावरण गंभीर हो गया था. मैडम ने राहुल से पूछा, ‘‘क्या अब भी तुम अपने पापा को दोषी मानते हो? हां, तुम यह कह सकते हो कि तुम्हारे पापा बच्चे थोड़े ही थे. परंतु तुम्हारे पापा के बारे में तुम्हारी मम्मी ज्यादा जानती हैं.’’

‘‘हां, बेटा, मैडम सही बोल रही हैं. तुम्हारे पापा को अपने से ज्यादा दूसरों के दुख परेशान करते हैं. वे बहुत संवेदनशील हैं.’’ राहुल ने सौरी कहते हुए पापा के पांव छू लिए. फिर मैडम से एक प्रश्न पूछे बिना न रह सका, ‘‘आप बात को छिपा भी सकती थीं. आप ने यह सब क्यों किया?’’ ‘‘बेटा, मुझ से जो गुनाह हो गया था उस का प्रायश्चित्त भी तो करना था,’’ फिर बोलीं, ‘‘आप लोग बातें करें. मैं चलती हूं,’’ कहते हुए मैडम चलने लगीं. तब राहुल बोला, ‘‘आप कहां चल दीं?’’

‘‘तुम्हारे परिवार का मसला है, इसलिए मैं यहां से जा रही हूं.’’

‘‘अब आप भी इस परिवार का अंग हो, मां.’’

‘‘क्या कहा तुम ने मुझे? इस शब्द को सुनने के लिए कब से तरस रही थी. एक बार और कहो.’’ राहुल ने मैडम के पैर छू लिए. मैडम ने उसे गले लगा लिया. फिर मैडम ने राहुल से कहा, ‘‘अपना जरूरी सामान ले लो, चलना है.’’

‘‘कहां?’’

‘‘घर.’’

‘‘किस हैसियत से, मां?’’

‘‘तुम एक करोड़पति बाप के बेटे हो और रहोगे. उसी हैसियत से चलोगे.’’

‘‘लेकिन मेरी मां.’’

‘‘उसी हैसियत से क्योंकि वे एक करोड़पति की बीवी हैं.’’

‘‘लेकिन वे तो आप हैं.’’

‘‘बेटे, मैं ने सब इंतजाम कर दिया है. तुम्हारी मां उसी हैसियत से चलें.’’

‘‘पर…?’’

‘‘परवर कुछ नहीं, बेटा, मेरी और तुम्हारे पापा की शादी असली जरूर थी लेकिन वहां दिल नहीं मिले थे. इसलिए तुम्हारी मम्मी ही उन की असली पत्नी रहेंगी. मैं अलग हो जाऊंगी.’’ ‘‘नहीं, आप अलग क्यों होंगी? आप तो राहुल का ध्यान रखोगी. मैं ने केवल इतना जीवन चाहा था कि मैं अपने बेटे को उस के बाप को सौंप दूं,’’ फिर प्रभावती अपने पति की ओर मुड़ीं और बोलीं, ‘‘आप अपने बेटे से खुश हैं न? मैं ने उस का अच्छा खयाल रखा है न?’’

‘‘हांहां,’’ उन के आगे बोलने से पूर्व मैडम ने कहा, ‘‘अच्छा बोलो. आप के इलाज के लिए मैं ने बड़े डाक्टर से बात कर ली है,’’ और फिर राहुल से पूछा, ‘‘अब तो अपने घर चलोगे?’’ तभी आश्रम के संचालक महोदय आए और बोले, ‘‘मैडम, सब इंतजाम हो गया.’’

‘‘क्या इंतजाम?’’ राहुल ने पूछा.

‘‘तुम्हारे मम्मीपापा की शादी. तुम को और तुम्हारी मम्मी को उन की हैसियत दिलाने की.’’ खैर, मैडम ने जो चाहा वही हुआ. राहुल की मम्मी की विदाई उसी तरह हुई जैसी शादी के बाद एक लड़की की होती है. आश्रम में सब की आंखें नम थीं और वे खुश भी थे. उधर प्रभा ने घर में भी नई मालकिन के स्वागत की भव्य तैयारी करवाई थी, इस सब से बेखबर कि लोग क्या कहेंगे. अगली सुबह सब के लिए नई थी. लेकिन कितनी देर…? क्योंकि जीवन धूपछांव का खेल है. राहुल की मां की सांसें जल्दीजल्दी चल रही थीं, डाक्टर भी आ गए. उन्होंने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘बेटा, मैं ने यही मांगा था कि मैं अपने बेटे को उस के पापा को सौंप कर मरूं, बस, मेरी इतनी ही जिद थी.’’ राहुल बेचारा, मां जब थीं तब पापा नहीं थे और आज पापा हैं लेकिन मां अंतिम सांसें ले रही थीं. उस की मां ने उस से यह वचन ले लिया था कि वह अपनी नई मां का उसी तरह खयाल रखेगा जिस तरह वह उस का रखता था. राहुल ने अपनी मां को वचन दे दिया. मैडम ने भी उन को वचन दे दिया और कहा, ‘‘मैं तुम्हारे अतीत के लिए तो कुछ नहीं कर सकती परंतु वर्तमान में तुम्हारे लिए कुछ कर सकूं तो शायद यही मेरा प्रायश्चित्त हो.’’

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