सरिता विशेष

भोजन की मेज पर राजेश को न पा कर रामेंद्र विचलित हो उठे, बेमन से रोटी का कौर तोड़ कर बोले, ‘‘आज फिर राजेश ने आने में देरी कर दी.’’

‘‘मित्रों में देरी हो ही जाती है. आप चिंता मत कीजिए,’’ अलका ने सब्जी का डोंगा उन की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

‘‘राजेश का रात गए तक बाहर रुकना उचित नहीं है. 10 बज चुके हैं.’’

‘‘मैं क्या कर सकती हूं. मैं ने थोड़े ही उसे बाहर रुकने को कहा है,’’ अलका समझाने लगी.

‘‘तुम्हीं ने उस की हर मांग पूरी कर के उसे सिर चढ़ा रखा है. आवश्यकता से अधिक लाड़प्यार ठीक नहीं होता.’’

क्रोध से भर कर अलका कोई कड़वा उत्तर देने जा रही थी, पर तभी यह सोच कर चुप रही कि रामेंद्र से उलझना व उन पर क्रोध प्रकट करना बुद्धिमानी नहीं है. नाहक ही पतिपत्नी की मामूली सी तकरार बढ़ कर बतंगड़ बन जाएगी. फिर हफ्तेभर के लिए बोलचाल बंद हो जाना मामूली सी बात है. मन को संयत कर के वह पति को समझाने लगी, ‘‘राजेश बुरे रास्ते पर जाने वाला लड़का नहीं है, आप अकारण ही उसे संदेह की नजर से देखने लगे हैं.’’ रामेंद्र ने थोड़ा सा खा कर ही हाथ खींच लिया. अलका भी उठ कर खड़ी हो गई. त्रिशाला का मन क्षुब्ध हो उठा. आज उस ने अपने हाथों से सब्जियां बना कर सजाई थीं, सोचा था कि मातापिता दोनों की राय लेगी कि उस की बनाई सब्जियां नौकर से अधिक स्वादिष्ठ बनी हैं या नहीं. पर दोनों की नोकझोंक में खाने का स्वाद ही खराब हो गया. वह भी उठ कर खड़ी हो गई.

नौकर ने 3 प्याले कौफी बना कर तीनों के हाथों में थमा दी. परंतु रामेंद्र बगैर कौफी पिए ही अपने शयनकक्ष में चले गए और बिस्तर पर पड़ गए. बिस्तर पर पड़ेपड़े वे सोचने लगे कि अलका का व्यवहार दिनप्रतिदिन उन की तरफ से रूखा क्यों होता जा रहा है? वह पति के बजाय बेटे को अहमियत देती रहती है. रातरात भर घर से गायब रहने वाला बेटा उसे शरीफ लगता है. वह सोचती क्यों नहीं कि बड़े घर का इकलौता लड़का सभी की नजरों में खटकता है. लोग उसे बहका कर गलत रास्ते पर डाल सकते हैं. कुछ क्षण के उपरांत अलका भी शयनकक्ष में दाखिल हो गई. फिर गुसलखाने में जा कर रोज की तरह साड़ी बदल कर ढीलाढाला रेशमी गाउन पहन कर पलंग पर आ लेटी.

रामेंद्र ने निर्विकार भाव से करवट बदली. बच्चों के प्रति अलका की लापरवाही उन्हें कचोटती रहती थी कि ब्यूटीपार्लरों में 4-4 घंटे बिता कर अपने ढलते रूपयौवन के प्रति सजग रहने वाली अलका आखिर राजेश की तरफ ध्यान क्यों नहीं देती? अलका के शरीर से उठ रही इत्र की तेज खुशबू भी उन के मन की चिंता दूर नहीं कर पाई. वे दरवाजे की तरफ कान लगाए राजेश के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए बारबार दीवारघड़ी की ओर देखने लगे. डेढ़ बज के आसपास बाहर लगी घंटी की टनटनाहट गूंजी तो रामेंद्र अलका को गहरी नींद सोई देख कर खुद ही दरवाजा खोलने के उद्देश्य से बाहर निकले, पर उन के पहुंचने के पूर्व ही त्रिशाला दरवाजा खोल चुकी थी. राजेश उन्हें देख कर पहले कुछ ठिठका, फिर सफाई पेश करता हुआ बोला, ‘‘माफ करना पिताजी, फिल्म देखने व मित्रों के साथ भोजन करने में समय का कुछ खयाल ही नहीं रहा.’’ बेटे को खूब जीभर कर खरीखोटी सुनाने की उन की इच्छा उन के मन में ही रह गई क्योंकि राजेश ने शीघ्रता से अपने कमरे में दाखिल हो कर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था.

उस के स्वर की हड़बड़ाहट से वे समझ चुके थे कि राजेश शराब पी कर घर लौटा है. सिर्फ शराब ही क्या, कल को वह जुआ भी खेल सकता है, कालगर्ल का उपयोग भी कर सकता है. मित्रों के इशारे पर पिता की कठिन परिश्रम की कमाई उड़ाने में भी उसे संकोच नहीं होगा. उद्विग्नतावश उन्हें नींद नहीं आ रही थी. बारबार करवटें बदल रहे थे. फिर मन बहलाने के खयाल से उन्होंने किताबों के रैक में से एक किताब निकाल कर तेज रोशनी का बल्ब जला कर उस के पृष्ठ पलटने शुरू कर दिए. तभी किताब में से निकल कर कुछ नीचे गिरा. उन्होंने झुक कर उठाया तो देखा, वह इरा की तसवीर थी, जो न मालूम कब उन्होंने पुस्तक में रख छोड़ी थी. तसवीर पर नजर पड़ते ही पुरानी स्मृतियां सजीव हो उठीं. वे एकटक उस को निहारते रह गए. ऐसा लगा जैसे व्यंग्य से वह हंस रही हो कि यही है तुम्हारी सुखद गृहस्थ पत्नी, बेटा. कोई भी तुम्हारे कहने में नहीं है. तुम किसी से संतुष्ट नहीं हो. क्या यही सब पाने के लिए तुम ने मेरा परित्याग किया था… लगा, इरा अपनी मनपसंद हरी साड़ी में लिपटी उन के सिरहाने आ कर बैठ गई हो व मुसकरा कर उन्हें निहार रही हो. कल्पनालोक में गोते लगाते हुए वे उस की घनी स्याह रेशमी केशराशि को सहलाते हुए भर्राए कंठ से कह उठे, ‘सबकुछ अपनी पसंद का तो नहीं होता, इरा. मैं तुम्हें हृदय की गहराइयों से चाहता था, पर…’

इरा अचानक हंस पड़ी, फिर रोने लगी, ‘तुम झूठे हो, तुम ने मुझे अपनाना ही कहां चाहा था.’ उन की आंखों की कोरों से भी अश्रु फूट पड़े, ‘इरा, तुम मेरी मजबूरी नहीं समझ पाओगी.’ दरअसल, रामेंद्र अपनी पढ़ाई समाप्त कर के छुट्टियां बिताने अपने ननिहाल कलकत्ता के नजदीक एक गांव में गए. एक दिन जब वे नहर में नहाने गए तो वहां कपड़े धोती हुई सांवली रंगत की बड़ीबड़ी आंखों वाली इरा को ठगे से घूरते रह गए. वह उन की नानी के घर के बराबर में ही रहती थी. दोनों घरों में आनाजाना होने के कारण रामेंद्र को उस से बात करने में कोई मुश्किल पेश नहीं आई. सभी गांव वालों का नहानाधोना नहर पर होने के कारण वहां मेले जैसा दृश्य उपस्थित रहता था. वे अपने हमउम्र साथियों के साथ वहीं मौजूद रहते थे, इधरउधर घूम कर प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लूटते रहते. इरा नहर में कपड़े धो कर जब उन्हें आसपास के झाड़झंकार पर सूखने के लिए डालने आती तो वहां पर पहले से मौजूद रामेंद्र चुपके से उस की तसवीरें खींच लेते. कैमरे की चमक से चकित इरा उन की तरफ घूरती तो वे मुंह फेर कर इधरउधर ताकने लगते. इरा के आकर्षण में डूबे वे जब बारबार नानी के गांव आने लगे तो सब के कान खड़े हो गए. लोग उन दोनों पर नजर रखने लगे, पर दुनिया वालों से अनजान वे दोनों प्रेमालाप में डूबे रहते.

‘मुझे दुलहन बना कर अपने घर कब ले जाओगे?’ इरा पूछती.

‘बहुत जल्दी,’ वे इरा का मन रखने को कह देते, पर अपने घर वालों की कट्टरता भांप कर सोच में पड़ जाते. फिर बात बदल कर गंभीरता से कह उठते, ‘इरा, तुम मछली खाना बंद क्यों नहीं कर देतीं? क्या सब्जियों की कमी है जो इन मासूम प्राणियों का भक्षण करती रहती हो?’

यह सुन वह हंस पड़ती, ‘सभी बंगाली खाते हैं.’

‘पर हमारे घर में मांसाहार वर्जित है.’

‘पहले शादी तो करो. मैं मछली खाना बंद कर दूंगी.’ एक दिन ननिहाल वालों ने उन की चोरी पकड़ कर उन्हें खूब डांटाफटकारा. इरा को भी काफी जलील किया गया. घबरा कर वे प्यारव्यार भूल कर ननिहाल से भाग आए. मामामामी ने उन के मातापिता को पत्र लिख कर संपूर्ण वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया. पत्र पढ़ते ही घर में तूफान जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई. मां ने रोरो कर आंखें लाल कर लीं. पिताजी क्रोध से भर कर दहाड़ उठे, ‘वह गंवई गांव की मछुआरिन क्या हमारे घर की बहू बनने के लायक है? आइंदा वहां गए तो तुम्हारी टांगें तोड़ कर रख दूंगा.’ उस के बाद पिताजी जबरदस्ती उन्हें अपनी फैक्टरी में ले जा कर काम में लगाने लगे. उधर, मां ने उन के रिश्ते की बात शुरू कर दी. एक दिन टूटीफूटी लिखावट में इरा का पत्र मिला. लिखा था, ‘मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं…आ कर ले जाओ.’ वे तड़प उठे व मातापिता की निगाहों से छिप कर नानी के गांव जा पहुंचे, पर उन के वहां पहुंचने से पूर्व ही इरा के घर वाले उसे ले कर कहीं लापता हो चुके थे. घर पर ताला लगा देख उन्होंने लोगों से पूछताछ की तो पता लगा कि अविवाहित बेटी के गर्भवती होने की बदनामी के डर से उन्होंने हमेशा के लिए गांव छोड़ दिया. वे पागलों की भांति इधरउधर भटक कर उस की तलाश करने लगे परंतु कहीं कुछ पता न चला. उधर, उन के मातापिता ने जबरदस्ती उन का विवाह बिरादरी की एक लड़की अलका के साथ संपन्न कर दिया. तभी अलका ने करवट बदली. बिस्तर हिलने से इरा की तसवीर फिसल कर फिर से नीचे जा गिरी. ‘‘सोए नहीं अभी तक?’’ अलका आंखें खोल कर असमंजस से पूछने लगी, ‘‘तुम अभी तक राजेश की चिंता में जाग रहे हो? क्या वह आया नहीं अभी तक?’’ अलका चिंतित हो उठ कर बैठ गई.

‘‘वह आ चुका है और कमरे में सो रहा है.’’‘‘तुम भी सो जाओ, नहीं तो बीमार पड़ जाओगे,’’ अलका ने कहा और फिर अलमारी खोल कर नींद की एक गोली ला कर उन्हें थमा दी.

पानी के साथ गोली निगल कर वे सोने की कोशिश करने लगे. अलका कहती रही, ‘‘जब बाप के पैर का जूता बेटे के पैरों में सही बैठने लगे तो बाप को बेटे के कार्यों में मीनमेख न निकाल कर, उसे मित्रवत समझाना चाहिए.’’ पर रामेंद्र का ध्यान कहीं और अटका हुआ था. सुबह बिस्तर से उठ कर वे स्नान, नाश्ते से निबट कर फैक्टरी जाने हेतु कार की तरफ बढ़े तो पाया कि राजेश अभी भी सो रहा है. अलका ने कहा कि वह राजेश को फैक्टरी भेज देगी, ताकि उस को जिम्मेदारी निभाने की आदत पड़ जाए. रामेंद्र जैसे ही फैक्टरी के दफ्तर में प्रविष्ट हुए तो वहां पहले से उपस्थित एक अनजान लड़की को बैठा देख कर चकित रह गए.

लड़की ने उठ कर उन्हें नमस्ते किया.

‘‘कौन हो तुम? क्या चाहती हो?’’ वे रूखेपन से बोले.

‘‘मेरा नाम श्वेता है. नौकरी पाने की उम्मीद ले कर आई हूं.’’

‘‘हमारे यहां कोई रिक्त स्थान नहीं है. तुम जा सकती हो,’’ कह कर वे अंदर जा कर काम देखने लगे. कुछ देर बाद जब वे किसी कार्यवश बाहर निकले तो लड़की को उसी अवस्था में बैठी देख कर हतप्रभ रह गए, ‘‘तुम गईं नहीं?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘मुझे राजेश ने भेजा है.’’

‘‘तुम उसे कैसे जानती हो?’’

‘‘मैं आप की बेटी त्रिशाला की सहेली हूं,’’ कहतेकहते श्वेता का स्वर आर्द्र हो उठा, ‘‘मैं अपने सौतेले बाप व सौतेले भाइयों से बेहद परेशान हूं. आप मुझे नौकरी दे कर मुझ पर बहुत बड़ा एहसान करेंगे. मैं व मेरी मां दोनों भूखों मरने से बच जाएंगी.’’

‘‘सौतेला बाप,’’ उन के मन में जिज्ञासा पनपी.

श्वेता ने कुछ झिझक के साथ कहा, ‘‘मेरी मां ने प्रेमी से धोखा खाने के पश्चात 2 बेटों के बाप, विधुर डेविड से शादी की थी. मैं मां के प्रेमी की निशानी हूं.’’

छि:छि:…रामेंद्र का मन घिन से भर उठा. कहीं अवैध संतान भी किसी की सगी होती है. जी चाहा अभी इस लड़की को धक्के दे कर फैक्टरी से बाहर निकाल दें पर श्वेता के चेहरे की दयनीयता देख उन की कठोरता बर्फ की भांति पिघल गई. उस का सूखा चेहरा बता रहा था कि उस ने कई दिनों से पेटभर कर भोजन नहीं किया है. सहानुभूतिवश उन्होंने श्वेता को थोड़े वेतन पर महिला श्रमिकों की देखरेख पर रख लिया. श्वेता उन के समक्ष नतमस्तक हो उठी व कुछ संकोच के साथ बोली, ‘‘सर, अपने बारे में मैं ने जो कुछ आप को बताया है उसे अपने तक ही सीमित रखें. राजेश व त्रिशाला को भी न बताएं.’’

‘‘नहीं बताऊंगा.’’श्वेता आश्वस्त हो कर घर चली गई और अगले दिन से नियमित काम पर आने लगी. पर रामेंद्र के मन में श्वेता व राजेश को ले कर उधेड़बुन शुरू हो चुकी थी. आखिर राजेश की श्वेता से किस प्रकार की जानपहचान है. श्वेता उस की सिफारिश ले कर नौकरी पाने क्यों आई? उन्होंने श्वेता के घर का संपूर्ण पता व उस की योग्यता के प्रमाणपत्रों की फोटोस्टेट की प्रतियां अपने पास संभाल कर रख लीं. राजेश पूरे दिन फैक्टरी में नहीं आया. शाम को रामेंद्र ने घर पहुंचते ही अलका से उस के बारे में पूछा तो पता लगा कि वह बुखार के कारण पूरे दिन घर में ही पड़ा रहा. वे दनदनाते हुए राजेश के कमरे में दाखिल हो गए, ‘‘कैसी है तबीयत?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘जी,’’ अचकचा कर राजेश ने उठते हुए कहा.

‘‘लेटे रहो, स्वास्थ्य का खयाल न रखोगे तो यही होगा. क्या आवश्यकता है देर तक घूमनेफिरने की?’’

‘‘कल एक मित्र के यहां पार्टी थी,’’ राजेश सफाई पेश करने लगा.

‘‘फैक्टरी का काम देखना अधिक आवश्यक है. तुम अपनी इंजीनियरिंग व एमबीए की पढ़ाई पूरी कर चुके

हो. अब तुम्हें अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहिए.’’

‘‘जी, जी.’’

‘‘श्वेता को कब से जानते हो?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘जी, काफी अरसे से. वह एक दुखी व निराश्रित लड़की है, इसलिए मैं ने उसे फैक्टरी में नौकरी पाने के लिए भेजा था, पर आप को इस बारे में बताना याद नहीं रहा.’’

‘‘मैं ने उसे नौकरी दे दी है. लड़की परिश्रमी मालूम पड़ती है, पर तुम्हें इस प्रकार के छोटे स्तर के लोगों से मित्रता नहीं रखनी चाहिए.’’

‘‘जी, खयाल रखूंगा.’’

रामेंद्र के उपदेश चालू रहे. कई दिनों बाद आज उन्हें बेटे से बात करने का अवसर मिला था. सो, देर तक उसे जमाने की ऊंचनीच समझाते रहे.तभी त्रिशाला ने पुकारा, ‘‘पिताजी, चाय ठंडी हुई जा रही है. मैं ने नाश्ते में पनीर के पकौड़े बनाए हैं, आप खा कर बताइए कैसे बने हैं?’’ रामेंद्र आ कर चायनाश्ता करने लगे. त्रिशाला बताती रही कि आजकल वह बेकरी का कोर्स कर रही है, फिर दूसरा कोई कोर्स करेगी.

वे पकौड़ों की प्रशंसा करते रहे. अलका काफी देर से खामोश बैठी थी. अवसर मिलते ही उबल पड़ी, ‘‘तुम्हें बीमार बेटे से इस प्रकार के प्रश्न नहीं पूछने चाहिए. श्वेता को सिर्फ वही अकेला नहीं, बल्कि हम सभी जानते हैं. वह त्रिशाला की सखी है, इस नाते घर में आनाजाना होता रहता है. राजेश ने दयावश ही उसे अपनी फैक्टरी में नौकरी पाने हेतु आप के पास भेज दिया होगा.’’

‘‘पर मैं ने भी तो बुरा नहीं कहा. बस, यही कहा कि बच्चों को अपने स्तर के लोगों से ही मित्रता रखनी चाहिए.’’

‘‘बच्चों के मन में, छोटेबड़े का भेदभाव बैठाना उचित नहीं है.’’

‘‘ये दोनों अब बच्चे नहीं रहे, तभी तो कह रहा हूं,’’ रामेंद्र हार मानने को तैयार नहीं थे,  ‘‘देखो अलका, छोटी सी चिनगारी से आग का दरिया उमड़ पड़ता है. युवा बच्चों के कदम फिसलते देर नहीं लगती. तुम राजेश पर नजर रखा करो, उस का श्वेता जैसी लड़कियों के साथ उठनाबैठना उचित नहीं.’’ अलका पति रामेंद्र व इरा की प्रेम कहानी से भली प्रकार वाकिफ थी, इसलिए उस के मन में आया कि कह दे कि राजेश तुम्हारे जैसा नहीं है कि मछुआरिन जैसी लड़की के प्रेमपाश में बंध जाएगा. उस के लिए एक से एक बड़े घरों के रिश्ते आ रहे हैं. तुम्हें तो सिर्फ श्वेता से दोस्ती ही दिखाई दे रही है, उस के बड़े घरों के मित्र क्यों नहीं दिखाई देते? पर वह शांत बनी रही. इरा का नाम लेने से घर में फालतू का क्लेश ही उत्पन्न होता. श्वेता ने जिस खूबी से फैक्टरी का कार्य संभाला, उसे देख रामेंद्र दंग रह गए. श्वेता उन्हें राजेश व त्रिशाला से अधिक समझदार मालूम पड़ने लगी. काम पर आते वक्त अधिकतर महिला श्रमिक अपने साथ बच्चों को ले आती थीं जो इधरउधर घूम कर गंदगी फैलाते व लोगों की डांट खाते रहते थे. इस बाबत श्वेता ने सुझाव दिया, ‘‘क्यों न फैक्टरी के पीछे की खाली पड़ी जमीन पर एक टिनशेड डाल कर इन बच्चों के रहने, सोने, खेलने एवं थोड़ाबहुत पढ़नेलिखने की व्यवस्था कर दी जाए?’’ सुझाव सभी को पसंद आया. तत्काल टिनशेड की व्यवस्था कर दी गई. साथ ही, बच्चों की देखरेख के लिए एक आया व अक्षरज्ञान के लिए एक सेवानिवृत्त वृद्ध अध्यापिका की व्यवस्था कर दी गई. अपने बच्चों को प्रसन्न व साफसुथरा देख कर महिला श्रमिक दोगुने उत्साह से काम करने लगीं व सभी के मन में श्वेता के प्रति सम्मान के भाव उत्पन्न हो गए.

सरिता विशेष

रामेंद्र ने श्वेता के कार्य से संतुष्ट हो कर उस का वेतन बढ़ा दिया, पर हृदय से वे उस को नापसंद ही करते रहे. उन के मन से यह कभी नहीं निकल पाया कि वह एक अवैध संतान है, जिस के पिता का कोई अतापता नहीं है. उन के मन में उस की मां के प्रति भी नफरत के भाव पनपते रहते, जिस ने अपने कुंआरे दामन पर कलंक लगा कर श्वेता को जन्म दिया था. श्वेता ने कई बार उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया पर रामेंद्र ने उन लोगों के प्रति पनपी वितृष्णा के कारण वहां जाना स्वीकार नहीं किया. वे श्वेता के मुंह से यह भी सुन चुके थे कि उस का सौतेला शराबी बाप उस की मां को मारतापीटता है, पर फिर भी उन्होंने उस के घर जाना उचित नहीं समझा. ऐसे निम्नश्रेणी के लोगों के पचड़े में पड़ना उन्हें कतई स्वीकार नहीं था. एक दिन अलका व त्रिशाला घूमने के उद्देश्य से फैक्टरी में आईं तो श्वेता को घर आने का निमंत्रण दे गईं. छुट्टी के दिन कुछ संकोच के साथ श्वेता घर आई व औपचारिक बातचीत के पश्चात तुरंत जाने को उद्यत हुई मगर त्रिशाला ने जिद कर के उसे रोक लिया व उस के सामने मेज पर चाय के प्याले व भांतिभांति का नाश्ता लगा दिया. रामेंद्र मन मसोस कर देखते रहे कि घर के लोग किस प्रकार विशिष्ट अतिथि की भांति श्वेता को खिलापिला रहे हैं.

फिर तीनों लौन में जा कर बैडमिंटन खेलने लगे. श्वेता के लंबेलंबे हाथों में तैरता रैकेट हवा में उड़ता नजर आ रहा था. वह कभी राजेश के साथ तो कभी त्रिशाला के साथ देर तक खेलती रही. फिर राजेश रात हो जाने के कारण श्वेता को छोड़ने उस के साथ चला गया. उस के जाते ही रामेंद्र पत्नी पर बरस पड़े, ‘‘फैक्टरी की साधारण सी नौकर को घर में बुला कर आवश्यकता से अधिक मानसम्मान करना क्या उचित है?’’

‘‘वह त्रिशाला के साथ पढ़ी हुई, उस की सहेली भी तो है.’’

‘‘इस वक्त वह हमारी नौकर है. उस के साथ नौकरों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए.’’

‘‘ठीक है, मैं त्रिशाला को समझा दूंगी.’’

‘‘इसी वक्त समझाओ. बुलाओ उसे,’’ रामेंद्र क्रोध से सुलग रहे थे.

अलका ने कमरे में आराम कर रही त्रिशाला को आवाज दे कर बुलाया. जब वह कमरे में आई तो रामेंद्र अलका के कहने से पूर्व ही उसे डांटने लगे कि उस ने श्वेता से फालतू की मित्रता क्यों कर रखी है. आइंदा कभी उस से बात करने की आवश्यकता नहीं है.

त्रिशाला ने सहम कर कहा, ‘‘ठीक है, मैं आगे से श्वेता से दूर रहूंगी.’’ राजेश वापस लौटा तो रामेंद्र ने उसे भी डांटा कि वह श्वेता को कार से छोड़ने क्यों गया? उस के लिए किराए का आटोरिकशा क्यों नहीं कर दिया.

जब सिर उठा कर राजेश ने अपनी गलती की माफी मांगी तभी रामेंद्र संतुष्ट हो पाए. पर शयनकक्ष में अलका ने उन्हें आड़े हाथों लिया, ‘‘यह तुम्हारे अंदर ऊंचनीच का भेदभाव कब से पनप उठा? तुम्हारी फैक्टरी की गाडि़यां भी तो श्रमिकों को लाने, ले जाने का काम करती हैं. कई बार तुम ने गाडि़यों से महिला श्रमिकों को उन के घर व अस्पताल पहुंचाया है.’’ कोई उत्तर न दे कर रामेंद्र विचारों के भंवरजाल में डूबतेउतराते रहे कि अलका कहां समझ पाएगी कि श्वेता में व अन्य महिला श्रमिकों में जमीनआसमान का अंतर है. श्वेता खूबसूरत है, उच्च शिक्षित है. उस में राजेश जैसे लड़कों को अपनी तरफ आकर्षित करने की क्षमता है. राजेश फैक्टरी में आने लगा, यह देख कर रामेंद्र संतुष्ट हुए कि वह काम में रुचि लेने लगा है. पर जब उन्होंने उसे चोरीछिपे श्वेता से बातें करते देखा तो उन का माथा ठनक गया. उन्हें दाल में काला नजर आया. वे शुरू से अब तक की कडि़यां जोड़ने लगे तो उन्हें ये सब राजेश की गहरी चाल नजर आई.

उन्हें लगा, वह फैक्टरी में श्वेता के कारण ही आता है. जरूर दोनों में गहरा प्यार है, जिसे दोनों अभी प्रकट नहीं करना चाहते. वक्त आने पर अवश्य प्रकट करेंगे. कहीं दोनों छिप कर ‘कोर्ट मैरिज’ न कर लें. कहीं ऐसा तो नहीं, श्वेता ही राजेश को अपने रूपजाल में फंसा रही हो. कोठी, कार, दौलत का लालच कम तो नहीं होता. मन का संदेह उन्होंने अलका के सामने प्रकट किया तो वह बिगड़ उठी, ‘‘अपनी युवावस्था में तुम जैसे रहे हो, बेटे को भी वैसा ही समझते हो. पता नहीं क्यों तुम्हारे मन में इकलौते बेटे के प्रति बुराइयां पनपती रहती हैं? तुम उसे गलत समझते हो, जबकि वह श्वेता को बहन के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझता. तुम ऐसा करो कि श्वेता को नौकरी से ही निकाल दो. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी,’’ कह कर वह मुंह फेर कर सो गई.

अलका के व्यवहार से रामेंद्र के मन को भारी ठेस लगी. यदि उन्होंने इरा से प्यार कर के गलती की तो क्या बेटे को भी वही गलती करने की छूट दे दें? मन रोंआसा हो कर फिर से इरा के इर्दगिर्द जा पहुंचा. वे फिर विचारों में खो गए कि पता नहीं कहां होगी इरा. उस की कोख में पलने वाले उन के खून का क्या हुआ. क्या मालूम जीवित भी है या नहीं. यदि राजेश फैक्टरी की जिम्मेदारी संभाल ले तो वे एक बार फिर से उस की खोज करने जाएंगे. अपने बच्चे का पता करेंगे. हो सका तो उसे अपनाने का प्रयास भी करेंगे ताकि इरा के मन से उन के प्रति वर्षों का जमा मैल निकल जाए. उस के सारे दुख, लांछन, सुख में बदल जाएं. वे उस वक्त अपने मातापिता व समाज से डरने वाले कायर युवक थे, पर अब एक जिम्मेदार पुरुष हैं. लाखों के मालिक हैं. इरा को अलग से एक मकान में रख कर उस का संपूर्ण खर्चा उठा सकते हैं अपने पुराने विचारों से निकल कर वे सोचने लगे कि राजेश अब विवाहयोग्य हो चुका है, उस का विवाह कर देना ही उचित रहेगा. पत्नी आ कर उस पर अंकुश रखेगी तो वह सही रास्ते पर आ जाएगा.

उधर, वे इस वक्त श्वेता को भी निकालने के लिए तैयार नहीं थे. कारण कि उस ने जिस खूबी से काम संभाला था वह हर किसी के वश का नहीं था. वे सोचने लगे कि हो सकता है राजेश व श्वेता के प्रति मैं भारी गलतफहमी का शिकार होऊं, अलका सही कह रही हो. अगले दिन उन्होंने अवसर पाते ही श्वेता के मन को टटोलना शुरू कर दिया, ‘‘तुम शादी क्यों नहीं कर लेतीं? तुम्हारी आयु की लड़कियां कभी का घर बसा चुकी हैं.’’ श्वेता के चेहरे पर भांतिभांति के भाव तैर उठे. वह आवेश से भर कर बोली, ‘‘अपनी मां की दुर्दशा देख कर भी क्या मैं विवाह के बारे में सोच सकती हूं? आप मर्द हैं, नारी मन को क्या समझ पाएंगे. मेरी मां ने अपने प्रेमी से धोखा खा कर किस प्रकार से मुझे जीवित रखा, पढ़ालिखा कर अपने पैरों पर खड़ा किया. इतनी लंबी जीवनयात्रा में किस प्रकार वे आधा पेट खा कर रहीं, समाज से कितनी अधिक मानसिक प्रताड़ना सहन कीं, उन के अतिरिक्त कौन समझ सकता है. मुझे नफरत है उस पुरुष से जो मेरी मां को मौत के कगार पर छोड़ गया. उसे पिता मानने को मैं कतई तैयार नहीं हूं,’’ यह कहने के साथ श्वेता की आंखें बरस पड़ीं. वह फिर बोली, ‘‘और वह मेरा सौतेला बाप, कितना घिनौना इंसान है, शराब पी कर मेरी व मेरी मां की जानवरों की भांति पिटाई करता है. क्या वह बाप कहलाने के योग्य है? मुझे नफरत हो चुकी है मर्द जाति से.’’

‘‘सभी मर्द एकजैसे नहीं होते. मैं व राजेश क्या ऐसे हैं?’’

‘‘आप मालिक हैं. आप की दी नौकरी से हमारा गुजारा चल रहा है. मैं आप के बारे में क्या कह सकती हूं.’’‘‘राजेश के बारे में तो कह सकती हो?’’

‘‘वह आयु में मुझ से छोटा है. बात, व्यवहार में बिलकुल लापरवाह. बच्चों जैसा भोला मालूम पड़ता है. उस के बारे में मैं क्या कह सकती हूं. मालिक तो वह भी है. आप दोनों की बदौलत ही हमें दो वक्त की रोटी मिलने लगी है.’’ श्वेता के उत्तर से रामेंद्र संतुष्ट नहीं हुए. वे उसे डांट कर स्पष्ट कह देना चाहते थे कि वह राजेश से बात करना बिलकुल बंद कर दे पर कह नहीं पाए. फिर आकस्मिक रूप से श्वेता 2 दिन तक काम पर नहीं आई तो वे चिंतित हो उठे. तीसरे दिन उस के घर जानकारी हेतु किसी को भेजना ही चाहते थे कि वह आ कर खड़ी हो गई. उस के चेहरे पर खरोंचों के निशान व सूजन थी. हाथपैरों में भी चोटों के निशान थे. ‘‘यह क्या हाल बना रखा है?’’ वे पूछ बैठे. फैक्टरी के कर्मचारी भी आ कर कारण जानने हेतु उत्सुक हो उठे थे. श्वेता ने रोरो कर बताया कि उस के सौतेले बाप व भाइयों ने मारमार कर बुरा हाल कर दिया. वे नहीं चाहते कि मैं अपने वेतन में से कुछ रुपए भी मां के इलाज पर खर्च करूं. मां बीमार रहती हैं व सरकारी अस्पताल की दवा से कुछ फायदा नहीं होता. वे लोग मेरा पूरा वेतन खुद हड़पना चाहते हैं.

‘‘तुम खुद स्वावलंबी हो, उस घर को छोड़ क्यों नहीं देतीं?’’

‘‘मैं यही कहने आप के पास आई हूं कि आप हम दोनों मांबेटी को यहां टिनशेड के नीचे रहने की इजाजत दे दें.’’

मैनेजर ने भी श्वेता की बात का समर्थन किया कि यहां काफी जगह खाली पड़ी है, मांबेटी आराम से गुजरबसर कर लेंगी. रात में सुरक्षा की दृष्टि से पहरेदार रहते ही हैं. रामेंद्र सोच में पड़ गए कि फैक्टरी के नियम सभी कर्मचारियों पर समानरूप से लागू होते हैं. यदि आज श्वेता को जगह दी तो कल अन्य महिला श्रमिक भी जगह मांगने लग जाएंगी. इसलिए उन्होंने इस की इजाजत नहीं दी. उन्होंने कहा कि शहर में किराए के मकानों की कमी तो नहीं है. सो, उन्होंने श्वेता को मकान खोजने हेतु 2 दिनों का अवकाश प्रदान कर दिया. श्वेता के प्रति उन की असहनीय कठोरता पर अलका कई दिन तक व्यग्र बनी रही व उन्हें सुनाती रही कि पता नहीं, उस लड़की में तुम ने कौन सी बुराइयां देख ली हैं, जो उस के प्रति सीमा से अधिक निर्दयी बनते जा रहे हो. यदि उसे घर के पिछवाड़े का सर्वेंट क्वार्टर ही दे देते, तब भी मांबेटी चैन से रह लेतीं. पूरी दुनिया में उन का हमारे अतिरिक्त और कोई दूसरा सहारा भी तो नहीं है. पर रामेंद्र पत्थर बने रहे. फैक्टरी के कर्मचारियों पर फालतू की दया दिखाना उन्होंने सीखा नहीं था. उधर, श्वेता ने 2 दिन की छुट्टी में किराए का मकान ले कर उस में अपना सामान जमा कर लिया. तीसरे दिन से फिर से उस का नौकरी पर आना शुरू हो गया.  वह रामेंद्र से कहती रहती, ‘‘मां आप की बेहद कृतज्ञ हैं. वे आप से मिलना चाहती हैं.’’ रामेंद्र टाल जाते. सोचते, खामखां इन साधारण लोगों को मुंह लगाने से क्या लाभ.

2 हफ्ते पश्चात श्वेता फिर से गंभीर रहने लगी तो रामेंद्र ने उस से कारण पूछा तो वह बोली, ‘‘वे लोग नहीं चाहते कि हम अलग घर में चैन से जीएं,’’ उस का आशय अपने सौतेले बाप व भाइयों से था.

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरा वेतन चाहिए.’’

‘‘यह तो घोर अन्याय है. वे इंसान हैं या हैवान.’’

अपने प्रति पहली बार रामेंद्र की सहानुभूति पा कर श्वेता की आंखें बरस पड़ीं, ‘‘सर, आप ही कुछ कीजिए न, आप जा कर कुछ सख्ती दिखाएंगे तो वे लोग दोबारा सिर नहीं उठा पाएंगे.’’

‘‘ठीक है, मैं प्रयास करूंगा,’’ रामेंद्र ने आश्वासन दे दिया पर गए नहीं.

एक दिन राजेश ने उन्हें उन की बात याद दिलाई, ‘‘पिताजी, आप को श्वेता के बाप, भाई को सबक सिखाने जाना था.’’

उन की भवों पर बल पड़ गए, ‘‘तुम्हें मतलब?’’

पर राजेश उन की भावभंगिमा से विचलित नहीं हुआ. उसी स्वर में बोला, ‘‘आप कहें तो मैं जा कर उन लोगों को हड़का आऊं?’’

‘‘नहीं, तुम इस मामले में मत पड़ो.’’

‘‘तो कौन पड़ेगा? आप को तो उस की चिंता ही नहीं है,’’ राजेश तैश में भर गया.

‘‘ठीक है, मैं देखूंगा,’’ उन्होंने उस को शांत करने को कह दिया पर गए नहीं.

तीसरे दिन श्वेता फिर देर से आई और आते ही गंभीरता से बोली, ‘‘मुझे आप से अति आवश्यक बातें करनी हैं, सर.’’

‘‘बोलो.’’

‘‘आप मेरे पिता समान हैं, इसलिए आप मुझे उचित सलाह ही देंगे. मैं ने एक निर्णय लिया है.’’

‘‘कैसा?’’

‘‘मैं विवाह कर रही हूं.’’

रामेंद्र चौंके, ‘‘यह अकस्मात बदलाव कैसे आया? तुम्हें तो मर्दों से नफरत थी?’’

‘‘मेरा मन बदल गया है. मां भी बारबार कहती हैं कि सभी मर्द एकजैसे नहीं होते. हम अकेली, असहाय औरतों को वे लोग चैन से जीने नहीं देंगे. सो, सुरक्षा की दृष्टि से एक मर्द तो होना ही चाहिए.’’

‘‘तो कौन है वह?’’

‘‘वह लाखों में एक है. उस से विवाह कर के मुझे वह सभी हासिल हो सकेगा जिस की चाहत प्रत्येक लड़की को होती है. घर, सम्मान, पैसा, जीवन की सभी सुखसुविधाएं. फिर मुझे आप की नौकरी करने की आवश्यकता भी नहीं रहेगी.’’

‘‘पर वह है कौन?’’ वे व्यग्र हो उठे.

 

उस ने झिझक के साथ कहा, ‘‘वह हमारे ही मोहल्ले का है. दीपक नाम है.’’

यह सुनते ही मानो रामेंद्र के सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो. वे राहत की सांस ले कर बोले, ‘‘ठीक है, तुम शादी तय करो, हम अवश्य आएंगे.’’

‘‘सर, आप को एक वादा करना पड़ेगा, तभी मैं शादी कर पाऊंगी.’’

‘‘कौन सा वादा?’’

‘‘आप को मेरा कन्यादान करना होगा,’’ श्वेता की आंखें भर आईं.

रामेंद्र का मन भी भर आया, बोले, ‘‘तुम चिंता मत करो. जब तुम ने मुझे पिता बनाया है तो मैं अवश्य कन्यादान करूंगा.’’

‘‘धन्यवाद, सर.’’

‘‘सर-वर नहीं, पिताजी कह कर पुकारो.’’

‘‘पिताजी…’’

‘‘अब तुम घर जा कर शादी की तैयारियां करो. वेतन कटने की चिंता मत करना. अब तुम हमारी कर्मचारी नहीं, बेटी हो,’’ रामेंद्र मुसकराए.

फिर खुद गाड़ी निकाल कर श्वेता को उस के घर छोड़ने चले गए. उस की मां से खूब बातचीत कर व खाना खा कर लौटे.

अलका, त्रिशाला, राजेश सभी उन के बदले व्यवहार से चकित थे. अलका ने इस का कारण पूछा तो रामेंद्र हंसते हुए बोले, ‘‘मैं उसे इस घर की बहू बनाने के विरुद्ध था, बेटी बनाने के लिए नहीं. मैं उसे बेटी बना कर बहुत खुश हूं. बड़ी बुद्धिमान, परिश्रमी बेटी है वह.’’ फिर उन्होंने खूब धूमधाम से श्वेता व दीपक का विवाह संपन्न कराया. कन्यादान करते वक्त उन्हें लग रहा था, जैसे वे इरा व अपनी अवैध संतान के प्रति समाज के डर से मुक्त हो कर कर्तव्य का पालन कर रहे हों. उन के मन में इरा व अपनी संतान को खोज कर उन्हें सुख पहुंचाने की कामना और अधिक बलवती हो उठी थी. वे श्वेता का अंजाम देख चुके थे. क्या मालूम इरा भी अपनी संतान सहित इसी प्रकार के कष्ट भोग रही हो.